08 जून, 2013

जो भारतीय नौसेना से टकरायेगा...वो...


इतिहास गवाह है कि भारत और भारतीय फौजों ने कभी दुश्मन देश पर आक्रमण नहीं किया है. प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल और आजतक कभी बाहरी देश पर बे-वजह चढ़ाई नहीं की है. अगर विदेशी मुल्क पर आक्रमण किया है तो उसके पीछे कोई ना कोई कारण या उस देश का उकसाना रहा होगा. इस बार भी भारतीय नौसेना के कदम अगर हिंद महासागर से बाहर दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर की और बढ़ रहे हैं तो उसके पीछे भी एक बड़ी वजह है। वो वजह है चीन की आक्रमक नीतियां.
     


                प्राचीन काल में अगर भगवान राम ने रामेश्वरम् से हिंद महासागर पर सेतु (राम-सेतु) बनाकर लंका (आधुनिक श्रीलंका) पर चढ़ाई की तो वो इसलिए कि रावण ने उनकी पत्नी का हरण किया था. पुरुषोत्तम राम और वानर सेना के लंका पर आक्रमण करने से पहले तक कभी नहीं सुना गया था कि आर्य-देश (भारत) की सेनाओं ने अपनी जमीन से बाहर कभी कदम भी रखा हो. लेकिन इतिहास गवाह है (राम-सेतु की सेटलाइट तस्वीरें) और हिंदुओं का सबसे धार्मिक माने जाने वाला ग्रन्थ, वाल्मीकि रचित रामायण की जरुरत पड़ने पर भारतीय सेनाएं और उसके शूरवीर (हनुमान जी जैसे) जवान नदी, नालों तो क्या समुद्र को लांघ सकते हैं. समंदर पर ना केवल पुल बना सकते हैं बल्कि उस पुल को लांघकर दुश्मन के अभेद्य किले (लंका) को जलाकर खाक कर सकते हैं.  पौराणिक इतिहास में ये शायद पहला ऐसा मौका था जब भारतीय नौसेना का जिक्र मिलता है.
              सिंधु घाटी की सभ्यता में भी धौलावीरा (गुजरात) में एक बंदरगाह के अवशेष मिले हैं. लेकिन ये साफ नहीं है कि ये बंदरगाह नौसेना के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इतिहासकार मानते है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के समकक्ष ही इस पुरातत्व बंदरगाह को समुद्री व्यापारी ही इस्तेमाल करते रहे होंगे.
              सम्राट अशोक ने लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर अपना पताका फहराया था. चक्रवर्ती अशोक के शिलालेख इस बात की जीत-जागते उदाहरण हैं। 
बावजूद इसके, चक्रवर्ती राजा अशोक ने अगर विदेशी मुल्कों पर अपना सिक्का जमाने की कोशिश की तो वो अपने शांति-दूत भेजकर ना की अपनी फौजें भेजकर.  अपने बच्चों तक को उसने शांति-दूत बनाकर बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा था. अशोक किसी भी मायने में ग्रीस के शक्तिशाली राजा सिंकदर (एल्क्जेंडर) से कम नहीं था. लेकिन उसने अपनी सेनाओं को भारत से कभी बाहर नहीं भेजा. अशोक ने सात समंदर पारचार देशों ,यूनान (ग्रीस), पर्शिया (ईरान), मिस्र (ईजिप्ट) और सीरिया में अगर किसी को भेजा तो वे उसके शांति-दूत ही थे. भारतवर्ष हमेशा से शांति-प्रिय देश रहा है और शायद आगे भी रहेगा. लेकिन जब-जब जरुरत पड़ी तब तक भारतीय फौजों ने अपनी सरजमीं से बाहर निकलकर दुश्मनों के दांत खट्टे किए हैं.
  मध्यकालीन युग के शुरुआत में भारत के शक्तिशाली चोल राजाओं ने तत्कालीन सुमात्रा ,जावा और उससे लगे द्वीपो (आज के इंडोनेशिया) पर अपनी नौसेनओं के द्वारा हमला किया तो वो इसलिए क्योंकि वहां के श्रीविजया साम्राज्य के राजा ने चोल राज्य के शांति-दूतों को चीन जाने के रास्ते में अडंगा लगाने की कोशिश की थी। 
लेकिन चोल नौसेना के आक्रमण करने के बाद से श्रीविजया राज्य के संबंध दक्षिण भारत के राजाओं से बेहद मधुर रहे, जो आजतक कायम हैं। काफी कम उदाहरण ही मिले जहां पर वर्णित है कि चोल राज्य की नौसेना ने पड़ोसी श्रीलंका या फिर मालद्वीप पर हमला किया।
            हाल ही में भारतीय नौसेना की वायुयान इकाई (एवियशन विंग) की डायमंड जुबली के अवसर पर मुझे गोवा के नेवल एयर बेस पर जाना का मौका मिला. वहां मेरी मुलाकात, इंडियन नेवी के कुछ सीनियर अधिकारियों से हुई. सभी का मानना है कि भारतीय नेवी का काम अब हिंद महासागर में सिर्फ अपने हितों की रक्षा करना नहीं रह गया है. भारतीय नौसेना अब एक आक्रमणकर्ता की भूमिका निभाने के लिए तैयार है. यानि जरुरत पड़ने पर वो अपने पड़ोसी मुल्कों की मदद करने के लिए किसी भी देश की नौसेना से भिड़ने के लिए सक्षम है.
          हिंद महासागर में मालदीव जैसे पड़ोसी देशों के लिए ही नही वरन साउथ चाइना सागर में एशियान देशों को भी हर संभव मदद करने के लिए तैयार है.
वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों की नौसेना के साथ फ्लैग-मीटिंग करने के लिए हाल ही में नेवी ने अपने चार सबसे उत्कृष्ट जहाजों-आईएनएस सतपुरा (बहुउद्देशीय स्टेलश शिप), आईएनएस किरीच (एंटी गाईडेड मिसाइल युद्धपोत), आईएनएस रणविजय (छोटा युद्धपोत), आईएनएस शक्ति (एंटी टैंक शिप) को भेजा है. ये सभी जहाज गये तो शांति मिशन (डिप्लोमेटिक मिशन) पर हैं लेकिन ये सभी युद्धपोत उस क्षेत्र में अपनी शक्ति का एहसास जरुर करा सकते हैं. क्योंकि किसी ने कहा है भी कि अपनी शक्ति का उपयोग करने के बजाय उसका एहसास कराने से बेहतर परिणाम की उम्मीद की जा सकती है.
           रक्षा मंत्री ए के एंटनी इन दिनों चार दिन की यात्रा पर सिंगापुर, थाईलैंड और आस्ट्रेलिया गये हुए थे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले हफ्ते ही जापान और थाईलैंड की यात्रा से लौंटे हैं.  प्रधानमंत्री की जापान यात्रा से चीन में सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है. चीनी हुक्मरान खुल कर तो कुछ नहीं बोल पा रहे हैं. लेकिन चीनी मीडिया के जरिये भारत-जापान की दोस्ती का मखौल उड़ा कर खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहावत जरुर सिद्ध कर रहा है.
    इसी हफ्ते आस्ट्रेलिया का दौरा करने वाले ए के एंटनी भारत के पहले रक्षा मंत्री बन गए हैं. एंटनी सबसे पहले राजधानी केनबरा के बजाय पर्थ पहुंचे. पर्थ को हिंद महासागर की राजधानी के रुप में देखा जाता है. इस शहर में आस्ट्रेलिया के कई सैन्य, सामरिक और नौसेना के महत्वपूर्ण ठिकाने हैं. एंटनी की आगवानी खुद वहां के रक्षा मंत्री स्टीफन स्मिथ ने की. पर्थ से केनबरा तक का चार घंटे का हवाई सफर दोनों मंत्रियों ने साथ में किया. बाद में केनबरा पहुंचकर दोनों देशों ने एक साझा बयान जारी कर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में समुद्री व्यापार, सैन्य और नौसेना के क्षेत्र में आपसी सहयोग करने का वादा किया.
                     भारत-आस्ट्रैलिया का सैन्य सहयोग सामरिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है ये इससे पता लगाया जा सकता है कि अमेरिका लगातार दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की बातचीत पर नजर लगाये बैठा है. जैसे ही दोनों देशों ने साझा बयान जारी किया, वो तुरंत अमेरिका के पैसिफिक कमांड ने अपने ट्विटर एकाउंट पर अपलोड कर दिया.              
             खुद रक्षा मंत्री ए के एंटनी मानते हैं कि भारतीय नौसेना दिन-ब-दिन शक्तिशाली हो रही है. यही वजह है कि दूसरे देशों की नौसेना हमारी देश की नौसेना से  सहयोग के लिए लगातार हाथ बढ़ा रही हैं. जल्द ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली माने जानी वाली अमेरिका नौसेना भारतीय नौसेना के साथ  मालाबार युद्भ्यास करने वाली है.
           भारतीय नौसेना का दमखम सोमालिया के समुद्री डकैतों के खिलाफ भी देखने को मिलता है। हमारे देश की नेवी उन चुनिंदा नौसेनाओं में से है जो गल्फ ऑफ एडन यानि फारस की खाड़ी से अपने देश के ही नहीं बल्कि दूसरे देशों के मालवाहक जहाजों को सोमालियाई डकैतों से सुरक्षित वहां से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर तक छोड़कर आते हैं।

                भारतीय नौसेना के जंगी बेड़े में लगातार अत्याधुनिक फाइटर प्लेन और जहाज शामिल हो रहे हैं.  नेवी के एवियशन विंग में दुनिया के सबसे अत्याधुनिक फाइटर प्लेन, 'मिग-29के' को शामिल किया गया है. पैतालीस स्क्वॉर्ड्रन के इस जंगी बेड़े को ब्लैक पैंथर का नाम भी दिया गया है. आवाज की स्पीड से लगभग दुगनी गति से उड़ने वाले ये जहाज पैंथर की भांति ही समुद्र में निगरानी रखते हैं और जरुरत पड़ने पर दुश्मन पर पैंथर की भांति टूट पड़ते हैं. 
इस फाइटर प्लेन की शक्ति दुगनी हो जायेगी जब एयरक्राफ्ट कैरियर, आईएनएस विराट (एडमिरल गोरशोकोव) को भारतीय नौसेना में शामिल कर लिया जायेगा. आईएनएस विराट इस साल के अंत तक रशिया से भारत पहुंच सकता है. मिग-29K हिंद महासागर में तैनात आईएनएस विराट पर तैनात किया जायेगा. वही से वो टेक-ऑफ कर सकता है और लैंड पर कर सकता है.
       भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी अरिहंत को भी नौसेना के बेड़े में जल्द ही शामिल किया जा सकता है। रशिया की मदद से बनाये जानी वाली इस पनडुब्बी को भारत में ही तैयार किया जा रहा है।
                           भारतीय नौसेना के स्वरुप बदलने के कई कारण हैं. पहला तो ये कि भारत के अपने पड़ोसी देशों से कई युद्ध हो चुके हैं. पाकिस्तान से तो तीन-तीन बार हो चुके हैं-1948,1965 और 1971. दुश्मन नंबर वन-1 यानि चीन से 1962 से भारत दो-दो हाथ कर चुका है. इसके अलावा पाकिस्तान से लगातार  हमारी सेना, पुलिस और बीएसएफ कश्मीर (और राजस्थान तक में कुछ हद तक) पोर्क्सी वार झेल रही है. कोई दिन ऐसा बीतता होगा जब पाकिस्तानी सेना सीज फायर का उल्लंघन कर फायरिंग की आड़ में आंतकवादियों को सीमा पार ना कराती हो. वो बात और है कि अधिकतर हमारी सेना और सुरक्षा एजेंसियां पाकिस्तानी सेना के मंसूबे नाकाम करने में कामयाब हो जाती है.
         पाकिस्तान तीन-तीन बार युद्ध में परास्त होने और फिर कारगिल-युद्ध में मुंह की खाने के बाद अकेले दम पर भारत से लड़ाई लड़ना भूल चुका है. लिहाजा उसने भारते के दूसरे दुश्मन देश (दुश्मन का दुश्मन, दोस्त) चीन से हाथ मिला लिया है. पाकिस्तान ने अपने ग्वादर बदंरगाह को चीन के हवाले कर दिया है. हालांकि चीन और पाकिस्तान दोनों ही दुनिया के सामने ये बघारते नहीं थकते हैं कि ये बंदरगाह पाकिस्तान ने चीन को व्यापारिक सहयोग के तहत रख-रखाव के लिये दिया है. लेकिन हकीकत ये है कि इस बंदरगाह को चोरी-छिपी गहरा किया जा रहा है. ये उसी सूरत में किया जाता है जब कि बंदरगाह पर लड़ाकू जहाजों और पनडुब्बियों के इस्तेमाल में लाया जाना हो. साफ है चीन जरुरत पड़ने पर इस बंदरगाह को अपने नेवी बेस के रुप में इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेगा. यानि चीन की नौसेना भारत को पश्चिमी दिशा से घेरने की तैयारी में है.
          पाकिस्तान और चीन समुद्री सहयोग पर इसलिए भी जोर दे रहे हैं क्योंकि 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान भारतीय नौसेना का दमखम दे चुका है. पहली बार भारतीय नौसेना की एवियशन विंग के फाइटर विमानों ने पूर्वी-पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) के चितगांव और ढाका के बंदरगाहों पर जो कहर ढाया था उसने पाकिस्तान की करारी शिकस्त में काफी भारतीय सेना की काफी हद तक मदद की थी. ये शायद पहला मौका (और आखिरी) था जब किसी युद्ध में भारतीय नौसेना का इस्तेमाल किया गया था.
         चीन पाकिस्तान के साथ-साथ भारत के दूसरे पड़ोसी देशों से भी मिलकर भारत को हिंद महासागर में ही घेरना चाहता है. वो हिंद महासागर जिसका नाम ही भारतवर्ष के नाम पर पड़ा है. मालदीव और श्रीलंका में भी चीनी नौसेना धीरे-धीरे अपने पांव पसार रही है. हिंद महासागर से सटे अफ्रीकी देशों में भी चीन अपनी धमक दिखाने के लिए तैयार है.
          चीन अपने पड़ोसी देशों पर भी अपनी फौज और नौसेना की धौंस यदा-कदा दिखाता रहता है। दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में जापान, वियतनाम, मलेशिया आदि देशों से चीन का कभी किसी टापू कर कब्जा करने को लेकर या फिर किसी और किसी वजह से कोई ना कोई विवाद चलता रहता है। ऐसे में इन देशों को भारतीय नौसेना में आशा की एक किरण नजर आ रही है। अगर चीन उनसे पंगे लेता है तो वे भारत से सहयोग की अपेक्षा कर सकते हैं। शायद इसी वजह से इंडियन नेवी एशियान देशों के साथ फ्लैग-मींटिग करती रहती है। जिसके चलते ही युद्धपोतों को फ्लैग-मीटिंग के लिए दक्षिण चीन सागर भेजा जाता है।
     इन सब वजहों के चलते ही भारतीय नौसेना दिन पर दिन अपनी ताकत बढ़ाने के लिए तैयारी कर रही है. रक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि अगला युद्ध पानी पर ही लड़ा जायेगा.’ हाल ही में कोरियन प्रायद्वीप में जो युद्ध की स्थिति खड़ी हुई थी उसमें अगर युद्ध होता तो शायद वो समुद्र में ही लड़ा जाता. हालात इतने बिगड़ गये थे कि अमेरिका ने भी अपनी नौसेना को तैयार रहने के आदेश जारी कर दिए थे.
                   ऐसे में जरुरी है कि भारतीय नौसेना को किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिये हरदम तैयार रहना होगा. चीन अगर भारत को हिंद महासागर में ही घेरने की तैयारी कर रहा है तो भारतीय नौसेना ने भी हिंद महासागर से बाहर निकलकर दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर तक पहुंचने का दृढ़ निश्चय कर लिया है. यानि भारतीय नौसेना अब अपने पड़ोसी देशों की मदद करने के लिए आक्रमणकर्ता की भूमिका भी निभाने के लिये एकदम तैयार है.
                    

28 मई, 2013

नक्सल समस्या और सेना का इस्तेमाल

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में राज्य के कई बड़े नेताओं सहित दो दर्जन से ज्यादा लोगों की हत्याओं के बाद से कयास लग रहे थे कि नक्सली समस्या से निपटने के लिये सेना का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लेकिन रक्षा मंत्री ने दो टूक शब्दों में साफ इंकार कर दिया है कि नक्सलियों से निबटने के लिए आर्मी का इस्तेमाल नहीं किया जायेगा।
यानि छत्तीसगढ़ पुलिस और केन्द्रीय अर्ध-सैनिक बलों को ही नक्सलियों से दो-दो हाथ करने पड़ेंगे। ना केवल दो-दो हाथ करने पड़ेगे बल्कि नक्सली समस्या को जड़ से खत्म करने में राज्य और केन्द्रीय सरकार की हर संभव मदद करनी पड़ेगी। भले ही नक्सली हिंसा पर उतारु हैं और नेताओं का क़त्ले-आम कर रह हैं लेकिन खुद भारतीय सेना और सरकार को लगता है कि उनसे निजात पाने के लिए अपनी ही सेना का इस्तेमाल बिल्कुल गलत है। सेना का मानना है कि ‘वे भी अपने ही लोग हैं’। यानि नक्सलियों को सेना अपने ही देश का मानती है। आर्मी कदापि नहीं चाहती कि सेना के जवान अपने ही देश के लोगों पर गोलियां बरसाये।

रक्षा मंत्री का सरकार के कई बड़े मंत्रियों से इस फैसले पर कई बार टकराव भी हुआ था। केन्द्र सरकार में ऊंचे ओहदे वाले एक पूर्व गृह मंत्री चाहते थे कि नक्सलियों के उन्मूलन के लिए सेना का इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन रक्षा मंत्री इस के पक्ष में नहीं थे। इसके कई कारण थे। पहला तो ये कि सेना को एक साथ दो-दो सीमाओं पर अपने चिर-परिचित प्रतिदंदियों से मुकाबला करना होता है। पाकिस्तानी सेना आये दिन एलओसी पर सीजफायर का उल्लंघन करती रहती है। जिसके लिये सेना को हमेशा पश्चिमी सीमा पर सजग रहना पड़ता है। सीमा पर फायरिंग की आड़ में पाकिस्तानी सेना हमारे देश में घुसपैठियों को दहशतगर्दी के लिए भेजती रहती है। वहीं दूसरी और चीन की सेना हमारे सीमा में घुसपैठ करती रहती है। ‘दुश्मन नंबर वन’ यानि चीनी सेना के नापाक इरादों को नेस्तानबूत करन के लिये सेना की मौजदूगी एलएसी यानि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर बेहद जरुरी है। ऐसे में सेना को देश के अंदर नक्सलियों से निबटने के लिए भेजना सही फैसला नहीं है।

 दूसरा ये कि सेना जम्मू-कश्मीर और नार्थ-ईस्ट के कई राज्यों में स्थानीय पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों के साथ आतंकवाद से निबटने के लिये मदद कर रही है। कुछ लोगों का मानना है कि जब सेना जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में ‘अपने लोगों पर गोली चला सकती है’ तो नक्सल-प्रभावित इलाकों में क्यों नही। ये कुछ हद तक सही तर्क हो सकता है। आखिर पंजाब में आंतकवाद के दौर में भी तो सेना का इस्तेमाल किया गया था। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को भला कोई भूला सकता है, जब सेना के टैंक तो अमृतसर में सिखों के सबसे पवित्र धर्म-स्थल की चौखट तक पहुंच गये थे। इसके ऑपरेशन के लिए तो एक आर्मी चीफ को अपनी जान तक धोनी पड़ी थी। पंजाब में आंतकवाद का खात्मा हुए सालों बीत चुके हैं लेकिन उस वक्त सेना के जो भी बड़े अधिकारी ऑपरेशन ब्लू स्टार में शामिल थे उन्हे अभी भी अपनी जान का डर सताता रहता है। कुछ महीनों पहले ही इंग्लैड में सेना के एक पूर्व अधिकारी पर जान-लेवा हमला किया गया था। वे अधिकारी भी ऑपरेशन ब्लू स्टार मे शामिल थे।

                          उत्तर-पूर्व राज्य में तो सेना ने स्पेशल पॉवर एक्ट की आड़ में इस कदर ‘बर्बरता’ बरसाई है कि वहां आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट के विरोध में शर्मिला एरोम नाम की एक महिला पिछले दस सालों से आमरण अनशन पर बैठी हुई है। मणि रत्नम और शाहरुख खान की ‘दिल से’ फिल्म को कौन भूल सकता है जिसमे सेना का भयावह चेहरा पहली बार दिखाई पड़ा था।
फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे सेना के जवान वहां की महिलाओं, लड़कियों और छोटी बच्चियों का यौन शोषण करते हैं। क्या वे हमारे लोग नहीं हैं ?

                   देश के अंदर की अराजकता ही क्यूं, विदेश तक में हमारी सेना का इस्तेमाल आंतकवाद के खिलाफ प्रयोग किया गया है। 80 के दशक के आखिरी सालों में श्रीलंका भेजी गई ‘शांति सेना’ को भला कौन भूला सकता है। उस शांति-सेना यानि आईपीकेएफ (इंडियन पीस कीपिंग फोर्स) में भारतीय सेना के ही जवान थे। उस शांति सेना के जवानों ने श्रीलंका के लोगों (लिट्टे) पर ही तो गोलियां चलाई थीं। वो बात और है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शांति सेना को प्रभाकरन की एलटीटीई (लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम) से मुंह की खानी पड़ी थी और बाद में सेना को श्रीलंका से वापस बुलाना पड़ा था।

                                लेकिन सेना का इस मामले पर अपना तर्क है। सेना के बड़े अधिकारी और थिंक-टैंक ये मानते है कि नक्सली समस्या और आंतकवाद में काफी बड़ा फर्क है। आतंकवाद कहीं ना कही देश-द्रोह से जुड़ा है। चाहे पंजाब हो या फिर जम्मू-कश्मीर या फिर उत्तर-पूर्व के नागालैंड, असम या फिर त्रिपुरा जैसे राज्य, वहां आतंकवाद की जड़ में था क्योंकि वहां के लोग अपने लिए एक अलग देश बनाने की मांग कर रहे हैं। यानि जो भी लोग इन राज्यों में विद्रोह कर रहे थे या कर रहे हैं वे वो लोग है जो भारत से अलग होने की मांग कर रहे हैं। जहां देश-द्रोह या राज-द्रोह होने की स्थिति बनेगी वहीं पर सेना का इस्तेमाल किया जायेगा।

जो लोग अपने देश से अलग होने की मानसिकता रखते हों, वे ‘अपने लोग’ कैसे हो सकते हैं। ऐसे लोगों पर गोलियां चलाने से सेना कदापि नहीं चूकेगी।
जो लोग अपने देश से अलग होने की मानसिकता रखते हों, वे ‘अपने लोग’ कैसे हो सकते हैं। ऐसे लोगों पर गोलियां चलाने से सेना कदापि नहीं चूकेगी। अलग देश बनाने की मांग करनी वाली अधिकतर ताकतें दूसरी देशों की खुफिया एजेंसियों जैसे पाकिस्तान की आईएसआई के इशारे पर काम करती हैं। या ये कह सकते है कि आईएसआई के हाथों की कठपुतलियों की तरह काम करती हैं। विदेशी ताकतों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है देश की सेना का। श्रीलंका में भी लिट्टे अपने लिए अलग देश बनाने की मांग कर रहा था। इसीलिए भारत सरकार ने श्रीलंका सरकार को अपनी सेना भेजकर मदद करने की कोशिश की थी।

 नक्सलवाद को सेना एक सामाजिक और आर्थिक समस्या के तौर पर दिखती है। वो समस्या जो उन इलाकों में सिर्फ और सिर्फ सरकार की अनदेखी के कारण पैदा हुई। आज़ादी के सालों बाद तक भी जहां मूल-भूत सुविधाएं तक नहीं पहुंच पाई हैं। स्कूल और अस्पताल तो दूर वहां बिजली-पानी तक भी वहां के लोगों को नसीब नहीं हुआ है। सच भी है
छत्तीसगढ़ के कई इलाके ऐसे है जहां आज तक कई सरकारी सर्वे भी नहीं हुआ है। यानि सरकार को कोई भी नुमाइंदा—संतरी से लेकर मंत्री और डीएम—तक वहां आज तक नहीं पहुंच पायें हैं
छत्तीसगढ़ के कई इलाके ऐसे है जहां आज तक कई सरकारी सर्वे भी नहीं हुआ है। यानि सरकार को कोई भी नुमाइंदा—संतरी से लेकर मंत्री और डीएम—तक वहां आज तक नहीं पहुंच पायें हैं। आलम ये है कि मुख्यमंत्री तक भी इन इलाकों का दौरा हेलीकॉप्टर के जरिये करते हैं। अब तो खैर नक्सलियों के डर से मुख्यमंत्री हवाई दौरा करते हैं लेकिन शायद पहले भी नक्सली प्रभावित इलाकों के मुख्यमंत्री हवाई दौरा ही करते होगें। जिसके चलते ही इन इलाकों का कभी सर्वे नहीं हुआ।

 अगर मुख्यमंत्री या फिर केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने भी कभी इन इलाकों का सड़क मार्ग से दौरा किया होता तो वहां का सरकारी अमला ये तो पता कर लेता है कि इन इलाकों में कौन रहता है। मंत्रियों के दौरे के बहाने ही सरकारी बाबू इन अपने एयर-कंडिशनर गेस्ट हाउस और ब्रिटिश-राज के बंगलों से बाहर निकल आते। या ये पता कर पाते कि आदमी नाम की कोई प्रजाति भी इन इलाकों में पाई जाती है। भले ही वे आदिवासी क्यों ना हों। जब उन इलाकों का सर्वे ही नहीं हो पाया है तो मूल-भूत सुविधाएं वहां कैसे पहुंच जायेंगी।

                              छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्य जहां पर नक्सली समस्या सबसे चरम पर है वहीं पर देश का सबसे ज्यादा खनिज का खजाना है। नक्सली विचारधारा का समर्थन करने वाले ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग का मानना है कि आजादी के बाद से जितनी भी सरकारें आईं उन्होनें इन इलाकों को लूटने से ज्यादा कुछ नहीं किया। जो अमीर थे वे और अमीर हो गए और जो गरीब थे उनकी हालत बद से बदतर होती चली गई। ऐसे में गरीब और आदिवासी लोगों के पास सरकारों के खिलाफ हथियार उठने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं था। अगर आदिवासी लोगों को मुख्य-धारा में लाये जाने की तनिक भी कोशिश की होती तो नौबत ये नहीं आती कि नक्सली लोकतंत्र को चलाने वाले नेताओं की ही मौत के घाट उतार देते।

 हालांकि नक्सली समस्या पिछले 30-40 सालों से देश के सामने मुंह बायें खड़ी है लेकिन नक्सल आंदोलन के अधिक हिंसक और जघन्य रुप लेने के पीछे ‘सलवा जूडम’ (या सलवा जुडूम) का एक बड़ा हाथ रहा है।

 सरकारों ने नक्सली समस्या का हल शांति पूर्वक या फिर लोकतांत्रिक या फिर अपने सुरक्षाबलों के जरिये निकालने के बजाय, स्थानीय लोगों (आदिवासियों) के हाथों में ही हथियार पकड़ा दिए। ये कैसा कानून है कि गोली का जबाब गोली और मौत का बदला मौत। सभ्य समाज और भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। शायद यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 में सलवा-जुडूम पर हमेशा हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया और केन्द्र और राज्य सरकारों को भी सख्त हिदायत दी गई कि भविष्य में नक्सल समस्या से निपटने के लिये ऐसे बेहूदा कदम कदापि ना उठाए। शनिवार यानि 25 मई को सुकमा में हुए नरसंहार के पीछे भी बताया जा रहा है कि नक्सली सलवा-जुडूम से जुड़े एक बड़े नेता की हत्या करना चाहते थे। और वे इसमें कामयाब भी हुए।

                           लेकिन सवाल ये है कि फिर उन्होनें दूसरे नेताओं की हत्या क्यों की ? क्यूं उन्होनें निहत्थे मजदूरों को मौत के घाट उतारा ? खैर इन सवालों के जबाब तो एनआईए (नेशनल एंवेस्टीगेशन एजेंसी) की जांच में सामने आने की उम्मीद है। नक्सली समस्या से निपटने के लिये जहां तक सेना के इस्तेमाल का जबाब है उसके लिए रक्षा मंत्री ने साफ इंकार कर दिया है। लेकिन सेना ने पुलिस और सीआरपीएफ जैसे अर्ध-सैनिक बलों की हर मदद देने का वादा किया है। सही भी है कि पुलिस और सीआरपीएफ जैसे पैरा-मिलेट्री फोर्स को ऐसी ट्रेनिंग दी जाये कि वे नक्सलियों से बेहतर तरीके से लड़ सकें। इसके लिये सेना से मदद ली जा सकती है।
पुलिस और सीआरपीएफ जैसे पैरा-मिलेट्री फोर्स को ऐसी ट्रेनिंग दी जाये कि वे नक्सलियों से बेहतर तरीके से लड़ सकें। इसके लिये सेना से मदद ली जा सकती है।

                           दरअसल, सभी राजनैतिक पार्टियों को नक्सल समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठना पड़ेगा। नक्सलवाद को उखाड़ फेंकने का श्रेय लेने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों में होड़ मची रहती है। ऐसे में होता ये है कि केन्द्र और राज्य सरकारों का समन्वय ठीक से नहीं हो पाता। ना ही स्थानीय पुलिस जो कि राज्य सरकारों के अधीन हैं उनका सीआरपीएफ जैसे केन्द्रीय बलों से ताल-मेल ठीक से हो पाता है। इस समय नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ के साथ-साथ बीएसएफ और दूसरे अर्ध-सैनिक बलों की कई टुकड़ियां ऑपरेशन के लिए लगाई गईं हैं। लेकिन सीआरपीएफ के पूर्व डीजी के. विजय कुमार को छोड़कर शायद ही किसी दूसरे मुखिया ने नक्सलियों से निपटने के लिये कोई ठोस कदम उठाये हैं। नतीजा ये है कि पैरा-मिलेट्री फोर्स के जवान नक्सलियों के निशाने पर रहते हैं—वर्ष 2010 में दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की मौत को भला कौन भूला सकता है।

 हर साल हजारों करोड़ रुपया अर्ध-सैनिक बलों की नक्सल क्षेत्र में तैनाती पर खर्च कर दिया जाता है। अगर यही पैसा स्थानीय पुलिस के आधुनिकीकरण में प्रयोग किया जाये तो परिणाम कई गुना बेहतर मिल सकते हैं। पुलिस को आधुनिक हथियार और ज़रुरत पड़ने पर हेलीकॉप्टर भी देने चाहिए। बाहरी फ़ोर्स होने के चलते भी केन्द्रीय सुरक्षा-बलों की टुकड़ियों को इन इलाकों में अपना बेस बनाने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है। किसी भी मिलिट्री ऑपरेशन से पहले वहां कि भौगोलिक स्थिति का ज्ञान तो होना ही चाहिए वहां के स्थानीय लोगों का भी मन जीतना पड़ता है। क्योंकि लोगों को अपनी तरफ किए बगैर आप अपने इंटेलीजेंस मजबूत नहीं कर सकते हैं। साथ ही विरोधियों की गतिविधियों पर भी पैनी नजर रखने के लिए मुखबिर तंत्र को मजबूत करना पड़ता है। शत्रु की चालें परखना पड़ता है। नहीं तो हश्र श्रीलंका में ‘शांति सेना’ जैसा हो सकता है।


                             ऐसे में जरुरी है कि नक्सल समस्या से निपटने के लिये दो मोर्चों पर लड़ा जाये। पहला ये कि केन्द्र और राज्य सरकारें इन (बेहद पिछड़े) इलाकों में विकास का काम तेज करे। आधार-भूत ढांचा खड़ा किया जाये। इस काम में देर लग सकती है लेकिन जिस दिन स्थानीय आदिवासी लोगों की समझ में आ जायेगा कि विकास से ही उनकी उन्नति के रास्ते खुलते हैं तो वे मुख्यधारा से जुड़ना शुरु हो जायेंगे। फिर वे भला नक्सलियों की मदद क्यूं करेंगे।
                             दूसरा ये कि स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ, कोबरा और बीएसएफ जैसे केन्द्रीय सरकारी बलों को एक साथ मिलकर नक्सलियों को हिंसा का मुंह तोड़ जबाब देना है। जबतक ऐसा नहीं होता है तब तक, छत्तीसगढ़ के अबूझमाड जैसे इलाके जहां सब को पता है कि नक्सलियों का ट्रेनिंग कैंप चलता है वहां घुस नहीं पायेंगे। एक साथ मिलकर ही नक्सलियों के गढ़ पर हमला बोल कर उन्हे गिरफ्तार किया जाये, उनके हथियार ज़ब्त कर लिए जायें। अगर जरुरत पड़े तो नक्सलियों का एनकाउंटर किया जायें (बशर्ते कि वो फर्जी ना हो)। जहां तक सेना का सवाल है अप्ररोक्ष रुप से ही सही, सेना नक्सल प्रभावित इलाकों में अपने पांव फैला रही है। छत्तीसगढ़ के ही नारायणपुरा इलाके में सेना ने अपना एक ट्रेनिंग कैंप शुरु कर दिया है। माना जाता है कि जिस इलाके में सेना का ट्रेनिंग कैंप चलता है वहां के सैकड़ों वर्ग किलोमीटर के दायरे में गैर-कानूनी गतिविधियों (या ये कहें कि नक्सली) कम ही हो पाती हैं। सेना की मूवमेंट होने से असामाजिक तत्वों के ज़हन में डर पैदा होता है।

30 अक्तूबर, 2011

खबरें बिकती हैं !

हाल ही में चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के एक बाहुबली नेता की विधायक पत्नी की विधानसभा की सदस्यता रद्द कर दी। ये शायद पहली बार था कि किसी विधायक को इसलिए पद से हटा दिया गया क्योंकि चुनाव के दौरान उसने पैसे देकर अखबार में खबर प्रकाशित कराई थी। लोगों का ध्यान सिर्फ इस तरफ गया कि विधायक की सीट चली गई थी। पैसे देकर खबर यानि ‘पेड न्यूज’ छापने वाले जिन अखबारों की वजह से (महिला) विधायक की गद्दी गई, उन्होंने भी इस खबर को प्रमुखता से अपने-अपने अखबारों में जगह दी। लेकिन सवाल ये है कि क्या दूर-दराज के इलाकों में ही ये पेड न्यूज सीमित है? इसका जबाब साफ शब्दों में है, 'नहीं'।

राजधानी दिल्ली में भी ये ‘महामारी’ बाकायदा अपनी जड़े फैला चुकी है। देश के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार की पोल तो विदेशी पत्र-पत्रिकांए खोल चुकी हैं। नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजी अखबार को अपनी पेज-3 पत्रिका पर ये साफ तौर पर लिखना पड़ा कि ये खबरें विज्ञापन या फिर प्रोमशनल खबरें हैं। लेकिन हकीकत ये है कि पेड न्यूज सिर्फ अखबारों तक ही सीमित नहीं है। ये महिषासुर रुपी ‘दानव’ न्यूज चैनलों में भी घुस चुका है। लेकिन इससे पहले की ये महामारी हम सभी को ग्रसित कर दे, जरुरत है इसके खिलाफ सख्त और कारगर कदम उठाने की।

पेड न्यूज का चलन कई सालों से चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ये ट्रैंड सिर्फ और सिर्फ इलेक्शन के दौरान तक ही सीमित था। वो भी दूर-दराज के इलाकों में स्थानीय अखबारों तक ही इसका दायरा था। चुनाव में अपना भाग्य आजमाइश करने वाले उम्मीदवार पैसे देकर अपने से जुड़ी खबरें (आसान शब्दो में कहें तो ‘पीआर’ न्यूज) अखबारों में छपवाते थे। अधिकतकर ये उम्मीदवार इलाके के छुटभैया नेता होते थे, जो अपने छोटे-मोटे (सामाजिक) कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर छपवाते थे। ये नेता अमूमन स्थानीय पत्रकारों (रिपोर्टर या स्ट्रिंगर) से सांठ-गांठ कर या यूं कहें की उनकी जेब गरम कर विज्ञापनों को खबर की शक्ल में छपवाते थे। कभी-कदाक ब्यूरो चीफ या फिर स्थानीय संपादकों को भी इसका हिस्सा पहुंच जाता था।

लेकिन जब अखबार के मालिकों तक ये फुसफुसाहट पहुंची कि उनके रिपोर्टर और संपादक तक इलेक्शन के दौरान अपनी जेबें भरते हैं तो उनके कान खड़े हो गए। मालिक तो आखिर मालिक ठहरें, सो उन्होंनें चुनाव के दौरान पैसों वाली खबरों के लिए अखबार में अलग जगह बनवा दी—विज्ञापन और खबरों के बीच। यानि जो काम पहले चोरी-छिपे होता था, उसे अब ‘कानूनी’ जामा पहनाने की जुगत शुरु हो चुकी थी। इस तरह की खबरों पर रंग पोत दिया गया। दरअसल, अखबार मालिक इन खबरों को बाकी खबरों से अलग दिखाना चाहते थे। उनके मन में एक तरफ डर था कि ‘लोग क्या कहेंगे’। वही दूसरी तरफ

इन अखबार के लाला-मालिकों को अपना ‘बिजनेस’ भी बढ़ाना था। हिंदी अखबारों में चुनाव के दौरान ये ‘रंगीन’ खबरें अलग ही दिखाई देने लगीं। जिसे समझ में आ गया कि इन रंगीन खबरों का क्या मतलब है तो आ जाए—हमने तो इन खबरों को रंग-पोत कर पाठकों को आगह तो कर दिया है कि, भई ये विज्ञापन नुमा खबरें हैं।

इन अखबार के लाला-मालिकों को अपना ‘बिजनेस’ भी बढ़ाना था। हिंदी अखबारों में चुनाव के दौरान ये ‘रंगीन’ खबरें अलग ही दिखाई देने लगीं। जिसे समझ में आ गया कि इन रंगीन खबरों का क्या मतलब है तो आ जाए—हमने तो इन खबरों को रंग-पोत कर पाठकों को आगह तो कर दिया है कि, भई ये विज्ञापन नुमा खबरें हैं। जिस पाठक की समझ नहीं आया कि इन रंगीन खबरों का मतलब क्या है तो और भी अच्छा है। किसी-किसी अखबार में इन रंगीन खबरों के कोने में छोटा सा लिखा भी रहता था—‘विज्ञापन’। अब ये पढ़ने वाले पर है था कि उसे क्या ये ‘विज्ञापन’ लिखा हुआ समझ आता है या नहीं। प्रेस काउंसिल का भी डर नहीं है कि भई ये खबर छपी है या विज्ञापन।
लेकिन धीरे-धीरे इसी विज्ञापन नुमा खबर ने कब देश-दुनिया की खबरों के बीच में अपनी पैठ (सही कहें तो जगह) बना ली किसी को पता तक नहीं चला। दरअसल, रंगीन खबरों को देखकर (माफ कीजिए पढ़कर) लोग इन अखबारों की विश्वस्नीयता पर सवाल करने लगे थे। इसीलिए इस तरह की चुनावी विज्ञापनों पर से रंग उतार दिया गया और ब्लैक एंड व्हाइट खबरों के बीच में ही छिपा दिया गया। जिसका गवाह बना उत्तर-प्रदेश का बिसौली विधानसभा।


मुझे याद है कि दिल्ली में जब एमसीडी (स्थानीय निकाय, दिल्ली नगर निगम) का चुनाव हुआ तो मैं एक ऐसे न्यूज चैनल समूह से जुडा़ था जिसका अपना एक राष्ट्रीय चैनल तो था ही कई प्रादेशिक चैनल भी थे। समूह का अपना हिंदी अखबार और कई मैग्जीन थीं। इसी क्रम में समूह ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानि दिल्ली-एनसीआर (दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव) के लिए एक चैनल खोला था। इस चैनल के शुरुआत से ही मैं जुड़ गया था। चैनल ने आते ही दिल्ली में अपना डंका पीटना शुरुना कर दिया। मुझे अभी भी अच्छे से याद है कि हमारे चैनल की क्राइम रिपोर्टिंग से दूसरे नेशनल न्यूज चैनल के दिल्ली क्राइम ब्यूरो खौफ खाने लगे थे। दिल्ली-एनसीआर की शायद ही कोई ही बड़ी क्राइम खबरें होगी जो हमारे चैनल में ना ‘ब्रेक’ होती हो। आलम ये था कि जिन क्राइम रिपोर्टर्स ने ये चैनल छोड़कर दूसरे ‘बड़े’ चैनल ज्वाइन किए थे, वो हमारे चैनल के एसाइनमेंट पर फोन कर हमारी खबरों की डिटेल (जानकारी) लेते थे। जल्द ही चैनल टॉप पर था।
लेकिन टॉप पर रहने का हमें एक नुकसान हुआ। दिल्ली चैनल के हेड का प्रमोशन हुआ और उन्हें नेशनल न्यूज चैनल की डूबती नैय्या को पार करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। फिर क्या था उसके बाद तो चैनल में गंद—पैसों की गंद—शुरु हो गई। शायद एमसी़डी के चुनाव उसके लिए कई हद तक जिम्मेदार थे। या यूं कहें कि चुनावों की आड़ में चैनल का मैनजमेंट और बॉस जिम्मेदार थे। चैनल के मैनेजमेंट में शायद कोई समूह के ही अखबार से जुड़ा होगा। एक दिन चैनल के टॉप अधिकारियों की बैठक हुई और हमें यानि रिपोर्टर्स को एक ‘खास और खुफिया’ काम सौंपा गया।
चैनल के ‘पुराने चावलों’ को हम तक ये खास काम कराने का मैसेज पहुंचाया गया। बताया गया कि सभी रिपोर्टर्स, भले ही उनकी कोई भी बीट हो, एमसीडी इलेक्शन की कवरेज में जुटना है। एक रीजनल चैनल के हिसाब से नगर निगम के चुनाव हमारे लिए एक बड़ी खबर थी, हमें अपनी बीट छोड़ने में कोई गुरेज नहीं था। अखबार के दिनों में भी भले ही मेरी बीट क्राइम रही हो, लेकिन उससे पहले हुए एमसीडी चुनाव में भी मैने इलेक्शन-रिपोर्टिंग की थी। लेकिन तभी उस ‘खास’ काम के साथ एक ‘खुफिया’ काम भी सौंपा गया। वो खुफिया काम था चैनल के लिए ‘रेवेन्यू जेनरेट’ करना। सीधे शब्दों में पैसा जुटाना। यानि अब रिपोर्टिंग के साथ-साथ ‘मार्केटिंग’ का भी काम करना था। रेवेन्यू कैसे इकठ्ठा करना ये भी समझाया गया। “करना कुछ नहीं है सिर्फ आपको मॉनेटरिंग करनी है, बाकी का काम स्ट्रिंगर संभाल लेंगे… आप सभी (रिपोर्टर्स) के साथ दो-दो स्ट्रिंगर ‘अटैच्ड’ किए जायेंगे… सभी को अलग-अलग पार्टी और एरिया दिया जायेगा… कोई ‘कन्फूयजन’ नहीं होगा”, एक पुराने चावल ने गुटखे का पीक थूकते हुए कहा। दूसरा बोला, “ये (...बीप) स्ट्रिंगर बहुत तेज होते हैं, इनपर काबू करना बहुत जरुरी है । ” मैनेजमेंट चाहता है कि आप रिपोर्टंग के साथ-साथ चैनल का रेवन्यू भी बढ़ाएं।
साफ निर्देश दिए गये कि चुनाव में खड़े होने वाले सभी पार्टियों के उम्मीदवारों को ‘पकड़ना’ हैं। यहां तक की जबतक सभी पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी ना कर दें, तबतक ‘संभावित’ उम्मीदवारों को भी नहीं छोड़ना हैं। टिकट के जितने भी दावेदार हैं वे सभी ‘दुधारी गाय’ हैं। “चुनाव का ही वक्त ऐसा होता है जब इनका दूध निकाला जा सकता है।” करना कुछ नहीं है, बस जितने भी उम्मीदवार हैं उन सभी को ‘लाइव-चैट’ पर लाना है और इस काम के लिए उनकी “रेट-लिस्ट” बनाओ। जगह-जगह लोगों से ‘बोल दिल्ली बोल’ के नारे लगवाओ, नेता खुद-ब-खुद खींचे चले आयेंगे। उम्मीदवारों को लोगों के बीच लाकर भिड़वाओं। नेताओं को लाइव पर लाने का काम स्ट्रिंगर करेंगे। भीड़ खुद नेता जुटायेंगे। जो भी नेता आयेगा वो अपने समर्थक लेकर आयेगा। उन्हीं नेताओं से मेज-कुर्सी और शामियाने का इंतजाम कराओ। शामियाना नहीं मिला तो खुले पार्क में नेताओं का भिड़वाओं। लेकिन जैसे भी हो कुछ तो करना पड़ेगा बॉस।

“मैनजमेंट ने साफ निर्देश दिए हैं कि आपके चैनल से कोई रेवेन्यू नहीं मिल रहा है। उल्टा चैनल चलाने के लिए मैनेजमेंट को पैसा देना पड़ता है।”, चैनल के पुराने और वफादार लोग बोल रहे थे। जो बातें खुले तौर पर नहीं बोली जा रही थीं, उन्हे एक दूसरे के कान में फुस-फुसाहट के जरिये सभी चैनल के कर्मचारियों (पत्रकार कहना तो बेमानी ही था) तक पहुंचायी जा रही थी। किसी भी दिन चैनल बंद करने की नौबत आ सकती है। इसलिए चैनल बंद होने से बेहतर है कि मैनेजमेंट के लिए पैसा कमाओ।
लेकिन एक रिपोर्टर ने पूछ ही लिया, “सर इसमें हमारा क्या फायदा होगा।” अरे यार, फायदा क्यों नहीं होगा। “देखो, नेताओं को लाइव पर लाने के लिए हम पैसा लेंगे। मोल-भाव का काम स्ट्रिंगर का रहेगा। तुम्हें उसमें नहीं पड़ना है। बस तुम्हें ये देखना है कि स्ट्रिंगर कितने पर तय कर रहा है।

जितना भी भाव तय होगा उसका दस प्रतिशत रिपोर्टर और पांच प्रतिशत स्ट्रिंगर को दिया जायेगा। बाकी मैनेजमेंट के खाते में जायेगा।” तो सर, ये काम तो स्ट्रिंगर ही कर सकता है, दूसरे रिपोर्टर ने पूछ लिया। फिर वही बात, अरे यार तुम्हें बताया ना कि ये स्ट्रिंगर बहुत ‘तेज’ होते हैं। लेंगे 10 रुपये और बतायेंगे 5 रुपये। तुम्हें ये ध्यान रखना है कि पूरे दस की ही ‘पर्ची कटे’

जितना भी भाव तय होगा उसका दस प्रतिशत रिपोर्टर और पांच प्रतिशत स्ट्रिंगर को दिया जायेगा। बाकी मैनेजमेंट के खाते में जायेगा।” तो सर, ये काम तो स्ट्रिंगर ही कर सकता है, दूसरे रिपोर्टर ने पूछ लिया। फिर वही बात, अरे यार तुम्हें बताया ना कि ये स्ट्रिंगर बहुत ‘तेज’ होते हैं। लेंगे 10 रुपये और बतायेंगे 5 रुपये। तुम्हें ये ध्यान रखना है कि पूरे दस की ही ‘पर्ची कटे’।
‘इनपुट’ के कर्ताधर्ता बोलते चले जा रहे थे, “एक और फायदा है तुम जैसे रिपोर्टर्स का इसमें। तुम्हारा चेहरा भी तो ‘चमकेगा’ ना। जिस रिपोर्टर के इलाके में ‘बोल दिल्ली बोल’ के नारे लगेंगे, वहां वही रिपोर्टर लाइव-एंकरिंग करेगा। वैसे भी तुमसे स्टोरी (खबर) तो कोई होती नहीं है। इस बहाने तुम्हारी रिपोर्टिंग भी हो जायेगी और टी.वी पर भी दिख जाओगे।”
ये सब चिकनी-चुपड़ी बातें सुनकर अधिकतर रिपोर्टर्स की बांछे खिल गई। “ अरे यार मेरी सैलरी तो मुश्किल से 10 हजार है। अगर एक-एक लाख के चार-पांच मुर्गे भी फंस गए तो एक महीने में ही 40-50 (हजार) कही नहीं गए। ऊपर से एंकरिंग भी। कई बार एंकरिंग का टेस्ट दिया, हर बार फेल कर देतें हैं। इस बहाने क्या पता स्टूडियो एंकरिंग का भी चांस मिल जाये। ”
लेकिन इन रिपोर्टर्स के बीच एक-दो ऐसे भी रिपोर्टर थे, जिन्हे ये बात बिल्कुल नागवार गुजरी। “लेकिन सर, मार्केटिंग टीम का काम हम लोग क्यों करेंगे। ये तो पत्रकारिता के सिद्वांतों के खिलाफ है। ” जबाब मिला, अगर किसी को कोई परेशानी है तो बॉस (चैनल हेड) से जाकर बात करले। “हम जो ये बाते कर रहें है, वे उनके ही आदेश पर हो रहा है। हम अपनी तरफ से कुछ नहीं कह रहें हैं। ”
मेरी समझ में बिल्कुल साफ आ चुका था। भाई जिन सिद्धांतों को आर्दश मानकर हम ‘कुछ’ करने के लिए पत्रकारिता में शामिल हुए थे, वो धराशायी होते दिख रहे थे। लेकिन मैं ठान चुका था कि ‘बाजारु-पत्रकारिता’ नहीं करनी है। मैंने चैनल हेड तक अपनी बात पहुंचा दी थी। “अगर सभी रिपोर्टर इलेक्शन कवरेज में झोंक दिए गए तो क्राइम की खबरों का क्या होगा…वीकली क्राइम शो भी तो निकालना हैं। ” लिहाजा मुझे एमसीडी चुनावों से छुट्टी मिल गई थी।
दिल्ली नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे थे। सभी रिपोर्टर और ‘उनके’ स्ट्रिंगर चैनल का ‘रेवेन्यू’ बढ़ाने में जुट चुके थे।

न्यूजरुम में सुबह दस बजे से लेकर रात तक यही चर्चा रहती थी कि फलां नेता ने आज के इलेक्शन कवरेज के लिए टेंट शामियाने का इंतजाम किया कि नहीं...कौन कितने सर्मथक लेकर पहुंच रहा है..अरे भाई सर्मथक नहीं आए तो ‘लाइव’ में “मजा कैसे आयेगा।” शायद ही कोई सा दिन ऐसा बचा होगा कि जिस दिन लाइव कवरेज के दौरान नेताओं के सर्मथकों में जूतम-पैजार ना होता और जिस दिन पुलिस को बीच-बचाव ना करना पड़ा हो।

न्यूजरुम में सुबह दस बजे से लेकर रात तक यही चर्चा रहती थी कि फलां नेता ने आज के इलेक्शन कवरेज के लिए टेंट शामियाने का इंतजाम किया कि नहीं...कौन कितने सर्मथक लेकर पहुंच रहा है..अरे भाई सर्मथक नहीं आए तो ‘लाइव’ में “मजा कैसे आयेगा।” शायद ही कोई सा दिन ऐसा बचा होगा कि जिस दिन लाइव कवरेज के दौरान नेताओं के सर्मथकों में जूतम-पैजार ना होता और जिस दिन पुलिस को बीच-बचाव ना करना पड़ा हो। दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने अपने आला-कमान को ‘मैसेज’ पहुंचा दिया था कि अगर चैनल को इस तरह की कवरेज करनी है तो पहले पुलिस-थाने से अनुमति लेनी ही पड़ेगी। “खुले-आम कानून-व्यवस्था का मजाक नहीं बनने दिया जायेगा।”

लेकिन रह-रहकर मुझे एक बात खाए जा रही थी। आखिर मैं ये किस दल-दल में फंस गया हूं। कभी सोचा नहीं था कि मैं ऐसे चैनल में काम करुंगा जहां पैसों के लिए खबरें करनी पड़ेंगी। या खबरों के लिए पैसे लेने पड़ेंगे। जहां पैसों के लिए खबरों को बेचा नहीं जाता था बल्कि पैसों के लिए खबरों को ‘बनाया’ जा रहा था। इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि जल्द ही मुझे दूसरे चैनल से नौकरी का ऑफर मिल गया। फिर क्या था, तनिक भर भी इंतजार किए बगैर मैने एमसीडी चुनाव से पहले ही दिल्ली-एनसीआर के उस चैनल से इस्तीफा दे दिया।
चुनाव खत्म होने के बाद मुझे कई चौकाने वाली बातें पता चली अपने उस चैनल के बारे में जिसे जी-जान लगाकर हमने दिल्ली-एनसीआर में सींचा था। पता चला कि

चैनल को कोई खास रेवेन्यू हाथ ही नहीं लगा था। सबकुछ रिपोर्टर-स्ट्रिंगर की जोड़ी ने अपनी झोली में डाल लिया था। पता चला कि जितना पैसा नेता इलेक्शन कवरेज के लिए देते थे। उसका आधा हिस्सा खुद रिपोर्टर-स्ट्रिंगर ने रख लिया था और बाकी 50 प्रतिशत ही चैनल के खाते में जाता था। चैनल के हिस्से में से भी 10 और 5 प्रतिशत रिपोर्टर और स्ट्रिंगर को मिलना ही था।

चैनल को कोई खास रेवेन्यू हाथ ही नहीं लगा था। सबकुछ रिपोर्टर-स्ट्रिंगर की जोड़ी ने अपनी झोली में डाल लिया था। पता चला कि जितना पैसा नेता इलेक्शन कवरेज के लिए देते थे। उसका आधा हिस्सा खुद रिपोर्टर-स्ट्रिंगर ने रख लिया था और बाकी 50 प्रतिशत ही चैनल के खाते में जाता था। चैनल के हिस्से में से भी 10 और 5 प्रतिशत रिपोर्टर और स्ट्रिंगर को मिलना ही था। लेकिन मैनेजमेंट से ये बातें ज्यादा दिन तक छिपी नहीं रहीं कि किस इनपुट और एसाइन्मेंट के बंदे ने एमसीडी चुनाव में कितने न्यारे-वारे किए हैं। चुनाव के फौरन बाद किस रिपोर्टर ने अपने घर के सभी कमरों में एसी लगवाया है.... किसने नई कार खरीदी है... नोएडा से सटे वसुंधरा में फ्लैट बुक किया है।
जल्द ही चैनल के कई रिपोर्टर्स का तबादला दिल्ली से बाहर कर दिया गया। इनपुट और एसाइनमेंट के कई दिग्गजों को समूह के ही किसी दूसरे चैनल में ले जाकर डाल दिया गया। कई को नौकरी से ही बाहर कर दिया गया। करीब दो-तीन साल में ही चैनल का बंटाधार हो चुका था। जिस चैनल ने पूरे समूह की धाक दिल्ली-एनसीआर में बनाई थी, उस चैनल की काली-हकीकत सबके सामने आ चुकी थी। नेता से लेकर सरकारी बाबू और आम आदमी भी जान चुका था ये हकीकत। नतीजा, कुछ ही सालों बाद चैनल दिल्ली-एनसीआर से अपना बोरी-बिस्तर समेट चुका था।
अब लगातार पेड न्यूज के बारे में खबरें आ रही हैं। जाहिर है ये खतरे की घंटी सभी पत्रकारों के लिए है। अगर इससे अभी नहीं सचेते तो सभी का हश्र वही होगा जैसे हमारे उस दिल्ली-एनसीआर के रीजनल चैनल का हुआ था।

25 दिसम्बर, 2010

बुद्धं शरणं गच्छामि !

...महात्मा बुद्ध के दूसरे उपदेशों की तरह ही हमारे देश के लोगों ने उनके सबसे प्रिय वन, ‘जेतवन’ को भी भुला दिया है। शायद यही वजह थी कि जिस टैक्सी से हम श्रावस्ती पहुंचे थे, उसका ड्राइवर उसी इलाके का होने के बाबजूद जेतवन के महत्व को नहीं जानता था...


“अरे सर, इस जंगल में भी जायेंगे क्या आप ? कुछ नहीं है इसमें...टिकट अलग से लगेगा। क्यों पैसे खर्च कर रहें हैं झाड़-झकांड़ देखने में...।” लेकिन हम तो आए ही थे इस झाड़-झकांड़ को देखने...इस पावन जंगल के दर्शन के लिए। “ये कोई साधारण जंगल नहीं है भाई…” इतना कहकर हम (मैं और मेरी पत्नी) गाड़ी से नीचे उतरे और प्रवेश के लिए टिकट खरीदकर जंगल में दाखिल हो चुके थे।
दरअसल, मुझे और मेरी पत्नी को हाल ही में बौद्ध धर्म के सबसे बड़े तीर्थ में से एक श्रावस्ती (शायद आठ बड़े तीर्थ में से एक) जाने का मौका मिला। सबसे बड़ा इसलिए, क्योंकि पूरे एशिया के एक बड़े हिस्से को अपने ज्ञान से उजियारा (‘लाईट ऑफ एशिया’) करने वाले महात्मा बुद्ध ने अपने जीवनकाल का एक बड़ा हिस्सा इसी जगह (यानि ‘जंगल’ में) बिताया था। ना केवल जीवन बिताया था बल्कि इसी जगह पर बौद्ध धर्म के अनुयायी और भिक्षुओं को ज्ञान बांटा था। यही ज्ञान, बौद्ध भिक्षु देश-विदेश में जाकर जनमानस तक पहुंचाते थे।
इसी पावन स्थली, श्रावस्ती पर है जेतवन नाम का वो ‘जंगल’, जिसे देखने के लिए हम वहां पहुंचे थे। लेकिन, शायद महात्मा बुद्ध के दूसरे उपदेशों की तरह ही हमारे देश के लोगों ने उनके सबसे प्रिय जंगल, ‘जेतवन’ को भी भुला दिया है। शायद यही वजह थी कि जिस टैक्सी से हम श्रावस्ती पहुंचे थे, उसका ड्राइवर उसी इलाके का होने के बाबजूद जेतवन के महत्व को नहीं जानता था।
कई सौ एकड़ में फैले जेतवन में घुसते ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अंदर ही अंदर में अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा था, कि मुझे ऐसी धरती पर कदम रखना का मौका मिला है जहां इतिहास में अग्रणी नाम रखने वाले महान गौतम बुद्ध ने पूरी 24 ऋतुएं गुजारी थी। जेतवन में जंगल से ज्यादा पुराने इमारतों के अवशेष अधिक है। इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पुराने अवशेषों को देखने मात्र से ही जीवन सफल हो जाता है। यहां तो हम उन अवशेषों में घूम रहे थे जहां कभी महात्मा बुद्ध रहा करते थे, भिक्षुओं को उपदेश देते थे। इसका सारा श्रेय जाता है पुरातत्व विभाग (एएसआई) को, जिसने बड़े ही करीने से इस जगह को संजोकर रखा है। वन में अब वृक्ष और इमारतों की बुनियादें (नींव) ही रह गई हैं। बुद्ध के निवार्ण (483 B.C) के सैकड़ों साल बाद तक उनके दिए उपदेशों को उनके अनुयायी और भिक्षु इसी जगह कलमबंद करते रहे थे।

श्रावस्ती में दाखिल होते ही एक शांत और सौम्य वातावरण का अहसास होने लगता है। हालांकि, जिस जगह आज ये श्रावस्ती बसा हुआ है, ये हमारे देश के सबसे पिछड़े इलाकों में प्रतीत होता है। श्रावस्ती, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर है और राप्ती नदी के किनारे बसा हुआ है। इसी (श्रावस्ती) नाम से अलग जिला बनाया गया है जिसका मुख्यालय भिनगा है। लेकिन प्राचीन समय में ऐसा नहीं था। उस वक्त श्रावस्ती को ‘सहेठ-महेठ’ के नाम से जाना जाता था। ईसा पूर्व में श्रावस्ती, भारत (आर्यवर्त) के 16 सबसे बड़े और संपन्न राज्यों (महाजनपद) में से एक, कौशल की राजधानी हुआ करती थी। महात्मा बुद्ध से पहले भी ये जगह बसी हुई थी। इसके प्रमाण यहां की पुरानी इमारतों में साफ दिखाई देतें हैं। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे काव्यों में इस जगह को ‘चंपकपुरी’ और ‘चंद्रिकापुरी’ के नाम से वर्णन किया गया है। पुरातत्व विभाग की खुदाई में यहां बौद्ध काल (563-325 ईसापूर्व) से काफी पहले की किलानुमा शैली की इमारतें (दाई तरफ फोटो देंखें) भी दिखाई पड़ती हैं।
बौद्ध धर्म के मुताबिक, जिस वक्त कौशल राज्य में प्रसन्नजीत नाम के राजा का शासन था, उस वक्त यहां एक धन्ना सेठ, अनाथपिण्डक (‘नगर श्रेष्ठ सुदत्त’ के नाम से भी जाना जाता था) भी रहता था। एक बार उसकी मुलाकात महात्मा बुद्ध से हुई और उन्हें श्रावस्ती आने का निमन्त्रण दिया। बुद्ध ने उसका निमत्रंण स्वीकार कर लिया। बुद्ध के प्रवास के लिए अनाथपिण्डक को जेतवन बेहद उपयोगी जगह लगी। इसके लिए उसने कौशल के राजकुमार से जेतवन खरीदने का आग्रह किया। कहते हैं कि राजकुमार ने इस जंगल की कीमत के बदले में सेठ अनाथपिण्डक से इतनी स्वर्ण मुद्रिकाएं मांगी कि जिससे पूरे जंगल की धरती ढक जाए। अपने गुरु को दान स्वरुप देने के लिए अनाथपिण्डक ने राजकुमार की शर्त पूरी की और जंगल को खरीद लिया। अनाथपिण्डक ने इस जंगल में बुद्ध के रहने के लिए कई इमारतें (बौद्ध विहार या बिहार), आश्रम और स्तूप बनवाए। ना केवल बुद्ध बल्कि इस जंगल के एक बड़े हिस्से में बड़ी तादाद में बौद्ध भिक्षुओं के रहने की जगह बनवाई। कई सभागार बनवाए जहां महात्मा बुद्ध इन भिक्षुओं को उपदेश देते थे।
इन्हीं इमारतों की बुनियादें मात्र रह गई हैं आज के जेतवन में। ऐसा नहीं है कि बौद्ध ग्रंथों में ही इस जगह का वर्णन मिलता है।

चीनी इतिहासकार, फा-ह्यान (गुप्त काल यानि तीसरी शताब्दी) और ह्वेन-सांग ( छठी शताब्दी हर्ष काल) ने जेतवन में कई मंजिला मंदिरों का बाखूबी जिक्र किया है। यही वजह है कि श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व भी काफी बढ़ जाता है।

चीनी इतिहासकार, फा-ह्यान (गुप्त काल यानि तीसरी शताब्दी) और ह्वेन-सांग ( छठी शताब्दी हर्ष काल) ने जेतवन में कई मंजिला मंदिरों का बाखूबी जिक्र किया है। यही वजह है कि श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व भी काफी बढ़ जाता है। जिस इमारत (‘गंध कुटी’) के बारे में इन चीनी इतिहासकारों ने मंदिर होने का दावा किया था, उस जगह जब हम पहुंचे तो पाया कि दर्जनों की तादाद में देशी-विदेशी पर्यटक और श्रद्धालु पूजा-अर्चना और ध्यान में लीन हैं। हालांकि, दोनों चीनी यात्रियों, फा-ह्यान और ह्वेन-सांग जब श्रावस्ती आये थे तो गंध कुटी (चंदन की लकड़ी से निर्मित होने के कारण ये नाम दिया गया होगा) की मात्र दो मंजिल ही रह गई थी, बाकी पांच मंजिले ध्वस्त हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने लोगों से सुना था कि ये मंदिर कभी सात मंजिला था और बुद्ध अपना अधिकतर समय इसी गंध कुटी में बिताते थे। इसीलिए शायद, पूरे जेतवन में ‘गंध कुटी’ को सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।

कहते हैं महात्मा बुद्ध को ये जगह काफी पसंद आ गई और वे हर वर्षा-ऋतु में यहां आकर प्रवास करने लगे। इस तरह उन्होंनें कुल 24 वर्षा-ऋतु इसी जेतवन में बिताई थी—अपने जीवन के शायद सबसे ज्यादा दिन बुद्ध ने यहीं बिताए थे। बुद्ध 29साल की उम्र में गृहस्थ जीवन को त्यागकर निवार्ण की खोज में जगह-जगह भटकते रहे। फिर गया में पीपल के एक पेड़ (बोधि-वृक्ष) के नीचे तपस्या में लीन होने के बाद जब ज्ञान की प्राप्ति हुई तो अपने “मज्झिमा प्रतिपदा” यानि ‘बीच के रास्ते’ का उपदेश देने के लिए जगह-जगह भ्रमण करते रहते थे। सिर्फ ऋतुकाल में ही वे प्रवास करते थे—जिसके लिए अनाथपिण्डक ने उनके लिए जेतवन तैयार कराया था। कहते हैं कि कुल 871 उपदेशों (सुत्रों) में से 844 सुत्र, महात्मा बुद्ध ने इसी जेतवन में दिये थे।
गया के बोधि-वृक्ष की भांति यहां भी ‘आनन्द बोधि वृक्ष’ है। कहते हैं कि बुद्ध के प्रिय शिष्य, आनन्द और महामौदगल्यायन के प्रयासों के चलते ही गया के महाबोधि वृक्ष की संतति तैयार की गई थी। इस संतति को अनाथपिण्डक ने जेतवन में लगाया (आरोपित) किया था। ये वृक्ष अब शायद बूढ़ा हो चला है इसी वजह से उसे रोकने के लिए लोहे के खंभों का सहारा दिया गया है। इस वृक्ष के चारों तरफ बड़ी तादाद में भिक्षु और साधारण स्त्री-पुरुष ध्यान में लीन थे। शायद इस आस में कि जिस तरह महाबोधि वृक्ष के नीचे अंतर्ध्यान लगाने से महात्मा बुद्ध को अध्यातम की प्राप्ति हुई, उन्हें भी इस वृक्ष की छत्र-छाया में ज्ञान की एक किरण प्राप्त हो जाए तो उनका भी जीवन सफल हो जाए।

श्रावस्ती का जिक्र हो और आंगुलीमाल (या अगुंलीमाल) का नाम ना आए, ऐसा भला कैसे हो सकता है। जेतवन के साथ-साथ ‘आंगुलीमाल की गुफा’ के लिए भी बेहद प्रसिद्ध है ये जगह। श्रावस्ती के आस-पास के लोग, जेतवन के लिए कम और डकैत आंगुलीमाल की गुफा (‘पक्की कुटी’ के नाम से भी जानी जाती है) के लिए ज्यादा पहचानते हैं। सही सुन रहें हैं आप ‘डकैत’ आंगुलीमाल । बौद्धकाल में इस इलाके में आंगुलीमाल नाम के एक खूंखार डकैत का आंतक था। कहते हैं कि जंगल और हाईवे से गुजरने वाले लोगों से वो लूटमार करता था और निशानी के तौर पर उनकी हाथ की एक अंगुली काटकर उसकी माला पहनता था—इसीलिए शायद उसका नाम ‘अंगुलीमाल’ पड़ा था। इधर-उधर विचरते हुए एक बार महात्मा बुद्ध की मुलाकात आंगुलीमाल से हुई। बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर उसने डाकू का चोला फेंका और उनका शिष्य बन गया।
लेकिन इस ढांचे को देखकर ये समझ नहीं आया कि ये वाकई गुफा है या कोई स्तूप या दोनों। क्योंकि, ऊपर (यानि बाहर का ढांचा) से तो ये एक स्तूप दिखाई पड़ता है। लेकिन स्तूप के अंदर करीब 15 से 20 मीटर लंबी एक गुफा है। ये ‘गुफा’ सहेठ-महेठ से थोड़ी दूरी पर है या ये कह सकते है कि शहर से बाहर दिखाई पड़ती है। हो सकता है जब डाकू आंगुलीमाल की महात्मा बुद्ध से मुलाकात हुई तो वो इसी गुफा में निवास करता हो। जब वो बौद्ध भिक्षु बना तो लोगों ने इस गुफा के ऊपर स्तूप बनावा दिया हो। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह स्तूप किसी महिला का था,जिसे आंगुलीमाल ने अपने तपोबल से प्रसव पीड़ा से मुक्त कर माता और उसके नवजात शिशु को नई जिंदगी दी थी। इतिहासकारों की मानें तो ये स्तूप गिरने की कगार पर था जिसके चलते इसके नीचे से बरसाती पानी निकालने के लिए एक गुफा का निर्माण किया गया था। लोग अनजाने में ही इस जगह को ‘आंगुलीमाल गुफा’ के नाम से बुलाने लगे। गुफा के अंदर जली हुई ईंटें साफ दिखाई पड़ी रही थी। शायद, ये उन आक्रंताओं के निशान थे जिन्होने श्रावस्ती पर समय-समय पर आक्रमण किए, लूटखसोट मचाई, बड़ी तादाद में बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम किया और पूरे शहर को ध्वस्त कर किया था। इन आक्रंताओं में सबसे प्रमुख थे, हूण राजा मिहिरकुल (छठी शताब्दी) और अलाउद्दीन खिलजी (13-14वी शताब्दी)।
गुफा के ठीक सामने है ‘कच्ची कुटी’। वास्तुशिल्प से तो ये भी कोई स्तूप या महल दिखाई पड़ता है। लेकिन पुरातत्व विभाग आजतक इस ढांचे के बारे में ठीक-ठीक से कोई मत नहीं निकल पाया है। ये बात और है कि यहां के लोग इसे महादानी अनाथपिण्डक (‘सुदत्त’) के निवास-स्थल के नाम से जानते हैं।
श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि

सम्राट अशोक ('देवानं प्रिय-प्रियदर्शी') ने यहां भी एक शिलालेख लगवाया था। इतिहास की पुस्तकों में इस बात का बाकयदा जिक्र किया गया है। लेकिन कई लोगों से पूछने पर भी वो जगह कहीं नहीं मिली जहां ये शिलालेख है।

सम्राट अशोक ('देवानं प्रिय-प्रियदर्शी') ने यहां भी एक शिलालेख लगवाया था। इतिहास की पुस्तकों में इस बात का बाकयदा जिक्र किया गया है। लेकिन कई लोगों से पूछने पर भी वो जगह कहीं नहीं मिली जहां ये शिलालेख है। किसी ने बताया कि शिलालेख को पुरातत्व विभाग ने म्यूजियम भेज दिया है। एक-दो लोगों ने बताया कि उस शिलालेख को यहां के लोग शिवलिंग के रुप में पूजा करते हैं और आस-पास के किसी गांव में वो मंदिर है जहां इस शिलालेख की पूजा की जाती है। गौरतलब है कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर अपने साम्राज्य के हर कोने में शिलालेख खुदवाये और लगावाये थे जिनपर बौद्ध धर्म की महत्ता और गुणगान किया गया था।
तीर्थ-पर्यटक स्थल के तौर पर श्रावस्ती को अपना मुकाम बनाने में शायद वक्त लगेगा। जरुरी है कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं इस ओर ध्यान दे कि यहां आने वाले पर्यटकों को सही जानकारी मिल जाए। केवल बौद्ध-परिपथ बनाने से ही काम नहीं चलेगा। दरअसल, सारनाथ (वाराणसी), श्रावस्ती, कपिलवस्तु और लुंबिनी जैसे बौद्ध तीर्थ स्थलों को आर्कषक बनाने के लिए इन जगहों को एक साथ जोड़ने की प्रकिया चल रही है और इस हाईवे को ‘बौद्ध परिपथ’ का नाम दिया गया है। क्योंकि अपने जीवन-काल में महात्मा बुद्ध इसी रास्ते से होकर सारनाथ, श्रावस्ती और दूसरी जगह भ्रमण पर जाते थे।
लेकिन, शिलालेख को शिवलिंग की तरह पूजने का सुनकर मैं थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था कि आखिर बौद्ध धर्म का जिस देश में जन्म हुआ था, वही से खत्म क्यों होने लगा। जबकि, एशिया के बाकी देशों (जैसे चीन, बर्मा, नेपाल, तिब्बत, भूटान, थाईलैंड, श्रीलंका इत्यादि) में बड़ी तादाद में बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।


यही वजह है कि श्रावस्ती में एशिया के कई देशों के अलग-अलग बौद्ध मंदिर है। लेकिन इन सबमें सबसे बड़ा और अनूठा है थाई मंदिर, महामंगलोए मंदिर (ऊपर वाली फोटो)। कई हजार एकड़ में फैले इस मंदिर का निर्माण कार्य अभी जारी है। इस मंदिर को थाईलैंड की एक बौद्ध संस्था बनावा रही है। इस मंदिर के परिसर में बुद्ध की अदम्य मूर्ति लगी हुई है। मंदिर के अंदर बेहद ही शांत वातावरण रहता है। उससे भी अच्छा यहां कार्यरत थाई भिक्षुणी हैं जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं से इतने सभ्य तरीके से पेश आते है जिसकी मिसाल कही और देखने को नहीं मिल सकती। भले ही उनमें से बहुत को ठीक-ठीक से हिंदी या इंग्लिश भी ना आती हो लेकिन वे सभी अपने सौम्य व्यवहार से यहां दर्शन करने आने वाले लोगों को मुग्ध करती हैं। गरीब हो या अमीर, अच्छे कपड़े पहने हुए हो या फिर कोई देहाती, सभी को वहां तैनात भिक्षुणी बड़े ही आदर के साथ मंदिर के अंदर ले जाती और (आध्यात्मिक) ध्यान और उपदेशों (बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, सघं शरणं गच्छामि...) के उच्चारण करने की प्रकिया बताती हैं।

थाई मंदिर के उलट जब हम श्रावस्ती से कुछ किलोमीटर दूर बने हिंदुओं के पवित्र स्थल, देवीपाटन पहुंचे तो एहसास हो गया कि क्यों हजारों साल पहले बौद्ध धर्म यहां के जनमानस के दिलों-दिमाग में बैठ गया था।

क्यों हिंदु धर्म पतन की दिशा में जा रहा था, जिसके चलते ही राजकुमा सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध (या गौतम बुद्ध) बनना पड़ा और हिंदु धर्म में सुधार की जरुरत पड़ी। क्यों बड़ी तादाद में शूद्र, दलित, निर्बल और असहाय लोगों ने हिंदु धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म का दामन थामा—जो अभी भी जारी है।

क्यों हिंदु धर्म पतन की दिशा में जा रहा था, जिसके चलते ही राजकुमा सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध (या गौतम बुद्ध) बनना पड़ा और हिंदु धर्म में सुधार की जरुरत पड़ी। क्यों बड़ी तादाद में शूद्र, दलित, निर्बल और असहाय लोगों ने हिंदु धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म का दामन थामा—जो अभी भी जारी है। श्रावस्ती जिला, देवीपाटन रेंज के अंन्तर्गत आता है। इस रेंज में आने वाले दूसरे जिले हैं, गोंडा, बहराइच और बलरामपुर। इस इलाके में हिंदुओं का शक्तिपीठ है ‘देवीपाटन’। इसी नाम से चार जिलों का बनाकर एक रेंज इसी नाम से बनाई गई है।

श्रावस्ती से लौटने के बाद हम पहुंचे इस पवित्र मंदिर में। लेकिन यहां पहुंचते ही मंदिर परिसर में बने यात्री-निवास के संचालक से तू-तू-मैं-मैं हो गई। हुई किस बात को लेकर, यात्री-निवास के बाथरुम को इस्तेमाल को लेकर। ‘बाहर’ के लोग बाथरुम इस्तेमाल नहीं कर सकते— क्योंकि पता नही कौनसी जाति या धर्म के हैं! ये है हमारे देश के मंदिरों और वहां काम करने वाले लोगों की हालत। मंदिर में दर्शन से पहले अगर किसी को साफ-सफाई पर ध्यान देना है तो बाहर सड़क पर जाओ, मंदिर में नहीं। मंदिर परिसर में बने सार्वजनिक शौचालय को शाम ढलते ही केयरटेकर शराब के नशे में बंद करके कही चला गया था। जिसके चलते ही हम यात्री-निवास पहुंचे थे लेकिन वहां के संचालक ने साफ मना कर दिया कि यहां ‘नहीं एंट्री’ कर सकते। एक आम शहरी के तौर पर जो पहुंचे थे हम वहां। वहां के संचालकों से शिकायत करने का भी कोई फायदा नहीं हुआ।
खैर बाथरुम को वही छोड़कर हम मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचे तो पूजा की सामग्री जैसे ही वहां बैठे भारी-भरकम शख्स (शायद पुजारी था) की तरफ बढ़ाई तो उसने चेहरा देखा और पास खड़े एक कम उम्र के चेले को बुलाया और हमारी पूजा सामग्री ‘देवी’ के सामने अपर्ण कर दी। उस पुजारी ने हाथ आगे तक नहीं बढ़ाया। शायद वो सिर्फ वीवीआईपी श्रद्धालुओं की ही पूजा-सामग्री देवी के सामने अपर्ण करता था।
बौद्ध मंदिर (थाई मंदिर) और एक हिंदु मंदिर (देवीपाटन) में छोटे-बड़े का अंतर साफ दिखाई दे रहा...क्या हमारे देश में फिर किसी दूसरे ‘महात्मा बुद्ध’ की दरकार है ?

21 नवम्बर, 2010

खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग...

...अगली लाइन पढ़ी तो लगा जैसे मेरे ऊपर किसी ने एक घड़ा भरकर पानी डाल दिया हो। लाइन कुछ यूं थी, "नीरज हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।" अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो कविता उस दुबले-पतले से दिखने वाले गार्ड ने मेरे ऊपर ही लिखी थी...
क्या आप विश्वास कर सकतें हैं कि गेट पर रखवाली करने वाला कोई सिक्योरिटी गार्ड भी एक कवि हो सकता है ? लेकिन ये सौ फीसदी सच है। एक दिन में अपने ऑफिस (नोएडा स्थित स्टार न्यूज हेडऑफिस) के बाहर अपनी कार (नीले रंग की वेगन-आर) पार्क कर रहा था, तभी एक दुबला-पतला सा सिक्योरिटी गार्ड वहां आया और गाड़ी लगवाने लगा। मुझे लगा कि ये उसका काम है--यानि गाड़ी को पार्किंग में ठीक से लगवाना और उनकी सुरक्षा करना--इसलिए वहां आया होगा।

लेकिन मुझे ताज्जुब तब हुआ जब उसने कहा,"सर आज मेरी पार्किंग धन्य हो गई।" मैने उससे पूछा कि ऐसा क्या हुआ कि आज उसकी पार्किंग धन्य हो गई। वो बोला कि "आज आपने अपनी कार जो यहां लगाई है।" उसकी बात सुनकर मैं हलका सा मुस्कराया और ऑफिस की तरफ लपक लिया। दरअसल, हमारे ऑफिस के बाहर कम ही कार पार्क हो सकती हैं और मैं अमूमन सुबह दस बजे के बाद ही ऑफिस पहुंचता हूं तो गाड़ी ऑफिस से दूर ही खड़ी करनी पड़ती है। मुझे भी उस दिन याद आया कि काफी दिनों बाद गाड़ी ऑफिस के बेहद करीब लगाई थी। उस सिक्योरिटी गार्ड की ड्यूटी मेन-गेट के इर्द-गिर्द पार्क होने वाली गाड़ियों की निगरानी करना है।

कुछ घंटे ऑफिस में चकलसबाजी करने के बाद जब मैं अपनी गाड़ी पार्किंग से निकालकर चलने लगा,तो वो गार्ड दौड़ता हुआ आया और गाड़ी निकलवाने लगा। मुझे फिर लगा कि ये गार्ड तो अपना काम बड़े ही बखूबी तरीके से निभाता है। लगा कि शायद वो सभी गाड़ियों को ऐसे ही लगवाता और निकलवाता है। अभी मैने गाड़ी स्टार्ट ही की थी कि वो बुदबुदाया, "सर, मैने आपके लिए कुछ लिखा है।" अभी भी मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसके कहने का तात्पर्य क्या है। इस बार उसने बिना कुछ कहे मेरी तरफ एक पेपर बढ़ा दिया। उस सफेद पेपर पर कुछ दोहा (टाईप) या फिर कविता लिखी थी। मेरी व्याकरणी हिंदी (और संस्कृत) बेहद खराब है। वो देखकर मैं झल्लाया, "क्या है?" वो गार्ड घबराते हुए बोला, "सर, मैने आपके ऊपर (व्यक्तिव) एक कविता लिखी है।" उसके ये कहते ही मैं झेंप गया।

मैने इस बार पेपर को हाथ में लिया और धीरे-धीरे पढ़ना शुरु किया, "सोहत वाहन नील रंग, बहुरंगी के बीच"। लेकिन समझ नहीं आया। जैसे ही अगली लाइन पढ़ी तो लगा जैसे मेरे ऊपर किसी ने एक घड़ा भरकर पानी डाल दिया हो। अगली लाइन कुछ यूं थी,"नीरज हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।" अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो कविता उस निर्बल से गार्ड ने मेरे ऊपर ही लिखी थी। अब कविता में अपना नाम देखकर भी नहीं समझता क्या! पूरी कविता कुछ इस प्रकार थी...

सोहत वाहन नील रंग, बहुरंगी के बीच।
"नीरज" हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।

नीरज नाम नीर बिनु विकसित।
स्वच्छ धवल रंच न कलुषित।।

श्यामल गात मनोहर नैना।
उदित भयो जिमि सूरज रैना।।

खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग।
रजनी दिवस बराबर लगभग।।

दुर्जन मनुज पड़हि नित भार।
सतजन मनहुं प्रीति बड़ भारी।।

कवि "नीरस" विनती करत मानो नीरज बात।
दिल बिच करो मुकाम तुम, दिन हो चाहे रात।।

इस कविता का जो अर्थ उस गार्ड ने मुझे बताया और जो थोड़ा बहुत मुझे याद है, वो कुछ इस तरह है... मेरी वैगन-आर कार का रंग नीला है। सो पार्किंग पर तैनात उस गार्ड ने बताया कि "नीले रंग की एक अकेली गाड़ी बहुतेरी गाड़ियों में सबसे अलग दिखाई दे रही है।" वाकई जब मैने पार्किंग में खड़ी गाड़ियों पर नजर दौड़ाई तो देखा कि मेरी (नीली) गाड़ी को छोड़कर बाकी गाड़ियां फीके रंग की थीं-कोई सफेद तो कोई गोल्डन तो कोई स्टील-ग्रे। अगली लाइन का मतलब था कि इस गाड़ी को देखकर ऐसा लगता है कि कीचड़ में कमल ("नीरज") खिला हुआ हो।

अगली लाइन का अर्थ मुझे थोड़ा कम आता है। लेकिन शायद कुछ ऐसे होगा, कि जिस तरह पानी के बिना कमल (नीरज) नहीं खिलता उसी तरह आपका मन भी एकदम स्वच्छ है। उससे अगली लाइन यानि,"श्यामल गात मनोहर नैना। उदित भयो जिमि सूरज रैना" का तात्पर्य था कि आपके सांवले रंग पर जिस तरह आपकी आंखे अच्छी लगती हैं वो ठीक उस तरह है जैसे कि सुबह के अंधियारे में सूरज (सूर्य) का निकलना।
इससे अगली लाइन में 'कवि-महाराज' यानि उस गार्ड ने वर्णन किया मेरे काम-काज के ऊपर-- खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग, रजनी दिवस बराबर लगभग। यानि मैं हर रोज देश-दुनिया की खबरें बताता हूं और इस कर्म में मेरे लिए दिन क्या और रात क्या सब बराबर है।
आगे था कि मैं बुरे (दुर्जन) लोगों पर भारी पड़ता हूं और अच्छे (सतजन) लोग मुझे बेहद प्रिय हैं। कवि "नीरस" यानि वो गार्ड अपने आप को नीरस कवि बताते हुए विनती कर रहा है कि हे नीरज मेरी बात मानों कि दिन-रात तुम सभी लोगों के दिल में अपना मुकाम बनाओ।
वाह क्या बात है! क्या कविता लिखी है। वो भी चंद घंटो में ही। मेरे इस कविता का यहां लिखने का उद्देश्य ये नहीं है कि कविराज-गार्ड ने ये पंक्तियां मेरे व्यक्तिव या फिर मेरी नीले रंग की कार पर लिखी है। बल्कि इसलिए कि

ये कविता एक ऐसे इंसान ने लिखी है जो बारह से भी ज्यादा घंटे गेट पर खड़ी कारों की निगरानी करता है। एक दरबान ने लिखी है... वो दरबान जिसे शहरी दुनिया में किसी अच्छे नजरिये से देखने का प्रचलन कम ही है।

ये कविता एक ऐसे इंसान ने लिखी है जो बारह से भी ज्यादा घंटे गेट पर खड़ी कारों की निगरानी करता है। एक दरबान ने लिखी है... वो दरबान जिसे शहरी दुनिया में किसी अच्छे नजरिये से देखने का प्रचलन कम ही है। क्योंकि शहर की किसी भी छोटी-बड़ी बिल्डिंग या इमारत में चले जाओ, वहां अनपढ़ या फिर कम साक्षर गार्ड ही ज्यादा दिखाएं देते है। शायद यही वजह थी कि शुरुआत में मैने उस गार्ड को भी 'ऐसा ही' समझ लिया था। लेकिन उसकी कविता पढ़कर और उससे बात करने के बाद ही ज्ञात हुआ कि वो सचमुच एक ज्ञानी तो नहीं लेकिन किसी ज्ञानी से कम भी नहीं है।
लेकिन एक सवाल बार-बार जेहन में घूम रहा था। वो 'ज्ञानी' यहां (यानि गेट पर दरबान गिरी) क्या कर रहा है ? उसपर उसका जबाब था, "किस्मत यहां तक ले आई सर। मैं पढ़ा-लिखा हूं, कम्पयूटर भी थोड़ा बहुत आता है।" आगे उसकी गुजारिश थी, "सर, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरुर बताना।" उसे आश्वसान देकर मैने गाड़ी स्टार्ट की और निकल गया। गाड़ी चलाते हुए भी यही सोचता रहा कि क्या आज के युग में कोई ऐसा इंसान भी है जो किसी के ऊपर गेट पर खड़े-खड़े ही कविता भी लिख सकता है। ऐसा हुनर तो लाखों में नहीं तो हजारों में भी कम ही मिलता है। हैटस ऑफ टू दयाराम!
उस 'कविराज' गार्ड का नाम दयाराम है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले दयाराम का मोबाइल नंबर है 8800119745 और ईमेल आईडी है dayaramlohar@gmail.com

01 जून, 2010

पीले रुमाल का फंदा

...किसी भी नए सदस्य को ठगों के गिरोह में शामिल करने से पहले वो उसे कब्रगाह पर बैठाकर गुड़ जरुर खिलाता था। एक बार कैप्टन स्लीमैन ने एक ठग से इसका कारण पहुंचा तो उसने जबाब दिया कि हुजूर ‘तपोनी’ (यानि कब्रगाह) का गुड़ जिसने भी चखा, उसके लिये “दुनिया ही दूसरी हो गई।” अगर आपने भी तपोनी का गुड़ खा लिया तो “फौरन ठग बन जाओगे…”

जिस रास्ते से वो गुजरता था, वहां कोसों दूर इंसान तो क्या इंसानों की छाप तक मिलनी बंद हो जाती थी। जहां-जहां भी वो जाता, लोग इलाका खाली कर उसकी पहुंच से दूर निकल जाते। जानते हैं क्यों ? इंसान के भेष में वो था एक खूंखार जानवर। पैसे के लिये वो लोगों को अपना निशाना बनाता था और उसका हथियार होता था रुमाल। जी हां एक पीला रुमाल ! वो रुमाल से देता था अपने शिकार को मौत। क्योंकि खून से लगता था दुनिया के सबसे खूंखार सीरियल किलर को डर। एक नहीं, दो नहीं, दो सौ नहीं तीन सौ नहीं पूरे 931 लोगों को उतारा था उसने अपने पीले रुमाल से मौत के घाट।

व्यापारी, काफिला और पीला रुमाल... ये दास्तां है एक ऐसे ठग की जिसे दुनिया का आजतक का सबसे क्रूर सीरियल किलर का खिताब हासिल है। बेहराम नाम का वो ठग असल में था ‘बेरहम’ ठग। भोले-भाले व्यापारियों के काफिले को अपना निशान बनाता था वो ठग। बेहराम ठग का दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक इस कदर खौफ था कि लोगों ने इस रास्ते से चलना बंद कर दिया था।
बेहराम ठग को समझने के लिए हमें उसी युग (1765-1840) में चलना होगा, जिसमें वो रहता था। 18वीं सदी खत्म होने को थी। मुगल साम्राज्य खत्म हो चला था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में अपनी जड़े जमा ली थीं। ब्रिटिश-पुलिस देश में कानून व्यवस्था दुरूस्त करने में जुटी थी। लेकिन दिल्ली से जबलपुर के रास्ते में पड़ने वाले थानों मे कोई सा दिन ऐसा गुजरता था जब कोई पीड़ित आदमी अपने किसी करीबी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज ना कराने आता हो। अंग्रेज अफसर परेशान थे कि इतनी बड़ी तादाद में लोग कैसे गायब हो रहे थे।
कराची, लाहौर, मंदसौर, मारवाड़, काठियावाड़, मुर्शिदाबाद के व्यापारी बड़ी तादाद में रहस्यमय परिस्थितियो में अपने पूरे की पूरे काफिलों के साथ गायब थे। तिजारत करने जाते इन व्यापारियों के मुनीम और कारिंदे भी रास्ते से गायब हो जाते। लखनऊ की खूबसूरत तवायफ हों, डोली में बैठकर ससुराल जाती नई–नवेली दुल्हनें या फिर बंगाल से इलाहाबाद और बनारस की तीर्थयात्रा पर आने वाले दल, सभी रास्ते से गायब हो रहे थे। छुट्टी से घर लौट रहे ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों की टोली भी अपनी ड्यूटी पर नहीं लौट रही थीं। उनका भी कही कोई अता-पता नहीं था।

पुलिस की फाइले लगातार गायब हो रहे लोगो की शिकायतों से बढ़ती जा रही थीं। लेकिन अंग्रेज अफसर चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। आलम ये हो गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी को एक फरमान जारी करना पड़ा। फरमान के मुताबिक कंपनी-बहादुर का कोई भी सिपाही या सैनिक इक्का-दुक्का यात्रा नहीं करेगा। यात्रा करते वक्त सभी सैनिक बड़े झुंड में चले और अपनी साथ ज्यादा नकदी ना लेकर चले।

व्यापारी हो या फिर तीर्थयात्रा पर निकले श्रद्धालु या फिर चार धाम के यात्रा करने जा रहे परिवार, सभी निकलते तो अपने-अपने घरों से लेकिन ना जाने कहां गायब हो जाते, ये एक रहस्य ही था। काफिले में चलने वाले लोगों को जमीन खा जाती है या आसमां निगल जाता है, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। लेकिन सबसे हैरानी की बात ये थी कि पुलिस को इन लगातार गायब हो रहे लोगों की लाश तक नहीं मिलती थी। लाश मिलने के बाद पुलिस की तफ्तीश आगे बढ़ सकती थी। आखिर कैसे गायब हो रही थी लाशें।

सन् 1809 मे इंग्लैंड से भारत आने वाले अंग्रेज अफसर कैप्टन विलियम स्लीमैन को ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगातार गायब हो रहे लोगों के रहस्य का पता लगाने की जिम्मेदारी सौपी। थोड़े ही दिनों मे कैप्टन स्लीमैन को पता चल गया कि इन लोगों के गायब होने के पीछे किसका हाथ है। इन लोगों को गायब करने वाली था ठगों का एक गिरोह। एक ऐसा गिरोह जो करता था लूटपाट के लिये हत्या। इस गिरोह में करीब 200 सदस्य थे। इस गिरोह का मुखिया था बेरहाम ठग नाम का एक क्रूर इंसान, जो हाईवे और जंगलों पर अपने साथियों के साथ घोड़ों पर घूमता रहता। उसके निशाने पर होते थे तिजारत करने जाने वाले व्यापारी, अमीर सेठ और वेश्याएं। हर वो शख्स जिसके पास धन-दौलत होती थी वो बन जाता था ठगों का शिकार। बेहराम ठग के नेतृत्व में ही गिरोह के बाकी सदस्य लूटपाट और हत्याओं को अंजाम देते थे।
ठगों के खिलाफ विलियम स्लीमैन ने पूरे उत्तर भारत में एक मुहिम छेड़ दी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने विलियम स्लीमैन को THUGEE AND DACOITY DEPARTMENT का इंचार्ज बना दिया। इस ऑफिस का मुख्यालय स्लीमैन ने जबलपुर में बनाया। स्लीमैन जानते थे कि जबलपुर और ग्वालियर के आस-पास ही ठग गिरोह सक्रिय है। ये दोनों ऐसी जगह थी जहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिये गुजरना पड़ता था। साथ ही साथ इस इलाके की सड़कें घने जंगल से होकर गुजरती थी। इसका फायदा ठग बडे आराम से उठाते थे। एक तो इन सुनसान जंगलों में किसी को भी निशाना बनाना आसान होता था साथ ही साथ अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद यहां छिपना भी आसान था।

विलियम स्लीमैन ने जबलपुर में अपना मुख्यालय बनाने के बाद सबसे पहले दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक के हाईवे के किनारे जंगल का सफाया कर दिया। इसके बाद स्लीमैन ने गुप्तचरों का एक बडा जाल बिछाया। कहते हैं कि भारत में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की नींव तभी की रखी हुई है। गुप्तचरों की मदद से स्लीमैन ने पहले तो ठगों की भाषा को समझने की कोशिश की। ठग अपनी इस विशेष भाषा को ‘रामोसी’ कहते थे। रामोसी एक सांकेतिक भाषा थी जिसे ठग अपने शिकार को खत्म करते वक्त इस्तेमाल करते थे।

1. पक्के ठग को कहते थे बोरा या औला
2. ठगों के गिरोह के सरगना को कहते थे जमादार
3. अशर्फी को कहते थे गान या खार
4. जिस जगह सारे ठग इकठ्ठा होते थे उसे कहते थे बाग या फूर
5. शिकार के आस-पास मंडराने वाले को कहते थे सोथा
6. जो ठग सोथा की मदद करता था उसे कहते थे दक्ष
7. पुलिस को वो बुलाते थे डानकी के नाम से
8. जो ठग शिकार को फांसी लगता था उसे फांसीगीर के नाम से जाना जाता था।
9. जिस जगह शिकार को दफनाया जाता था उसे तपोनी कहते थे।

करीब 10 साल की कड़ी मशक्कत के बाद कैप्टन स्लीमैन ने आखिरकार बेहराम ठग को गिरफ्तार कर ही लिया। उसके गिरफ्तार होने के बाद खुला उत्तर भारत मे लगातार हो रहे हजारों लोगों के गायब होने का राज़। एक ऐसा राज़ जो सिर्फ उस बेरहम गिरोह को मालूम था।

गिरफ्तार होने के बाद बेहराम ठग ने बताया कि उसके गिरोह के कुछ सदस्य व्यापारियों का भेष बनाकर जंगलों में घूमते रहते थे। व्यापारियों के भेष में इन ठगों का पीछा बाकी गिरोह करता रहता था। रात के अंधेरे में जो भी व्यापारियों का काफिला जंगल से गुजरता था, नकली भेष धारण करने वाले ठग उनके काफिले में शामिल हो जाते थे। ठगों का ये गिरोह धर्मशाला और बाबड़ी (पुराने जमाने के कुएं) इत्यादि के आस-पास भी बेहद सक्रिय रहता था।
काफिले के लोगों को जब गहरी नींद आने लगती तो दूर से गीदड़ के रोने की आवाज आने लगती। ये गीदड़ की आवाज पूरे गिरोह के लिए एक सांकेतिक आदेश होता था कि अब काफिले पर हमला बोला जा सकता है। थोड़ी ही देर में अपने गिरोह के साथियों के साथ बेहराम ठग वहां पहुंचा जाता। सारे ठग पहले सोते हुये लोगों का मुआयना करते। बेहराम ठग अपने गुर्गे को अपना सबसे पसंदीदा रुमाल लाने का आदेश देता। पीला रुमाल मिलते ही बेरहाम ठग अपनी जेब से एक सिक्का निकालता और रुमाल में एक सिक्का डालकर गॉठ बनाता। सिक्के से गॉठ लगाने के बाद बेहरम ठग एक-एककर सोते हुये काफिले के लोगों का गला घोट देता।
काफिले में शामिल सभी लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद बेरहाम ठग साथियों के साथ मिलकर जश्न मनाता था। लेकिन जश्न से पहले उन्हें करना होता था एक और काम। ठग मरे हुये लोगों की लाशों के घुटने की हड्डी तोड़ देते। हड्डी तोड़ने के बाद लाशों को तोड़ मोड़कर मौका-ए-वारदात पर ही एक गड्डा खोदकर दबा दिया जाता। दरअसल, काफिले में शामिल व्यापारियों को मारने के बाद बेहराम ठग और उसके गिरोह के सदस्य उनकी वही कब्रगाह बना देते थे। अगर वही उनकी कब्रगाह बनाना संभव ना हुआ तो उनकी लाशों को पास के ही किसे सूखे कुएं या फिर नदी में फेंक देते थे। यही वजह थी कि पुलिस को गुमशुदा लोगों की लाश कभी नहीं मिलती थी। और ना ही इन ठगों का कोई सुराग मिल पाता था।

जब तक बेहराम ठग और उसके साथी काफिले के लोगों को ठिकाने नहीं लगा देते, तब तक उसके गिरोह के दो सदस्य दूर खड़े हुये पूरे इलाके पर नजर रखते। शिकार का काम तमाम होने तक वे दोनों हाथ में सफेद रुमाल लिये हिलाते रहते। सफेद रुमाल से वे दोनों ठगों को इशारा करते रहते कि सबकुछ ठीक है। जैसे ही उन्हें खतरे का अंदेशा होता वे दोनों सफेद रुमाल हिलाना बंद कर देते। सफेद रुमाल नीचे होते ही ठग चौकन्ना हो जाते। रुमाल हिलने लगता तो अपने काम में एक बार फिर से मशगूल हो जाते।

अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद ठग मौका-ए-वारदात पर ही जश्न मनाते थे। जश्न के तौर पर जिस जगह मारे गये लोगों की कब्रगाह बनाई जाती थी उसके पहले नाच-गाना करते। कव्वाली का दौर चलता। गाने-बजाने से जब थक जाते तो कब्रगाह के ऊपर बैठकर ही वो गुड़ खाते थे।
कहते है ठग जिस किसी भी नए सदस्य को अपने गिरोह में शामिल करते थे तो उसे कब्रगाह पर बैठकर गुड़ जरुर खिलाया जाता था। एक बार कैप्टन स्लीमैन ने एक ठग से इसका कारण पहुंचा तो उसने जबाब दिया कि हजूर ‘तपोनी’ यानि कब्रगाह का गुड़ जिसने भी चखा उसके लिये दुनिया ही दूसरी हो गई। अगर आपने भी तपोनी का गुड़ खा लिया तो फौरन ठग बन जाओगे।
बेहराम ठग ने गिरफ्तार होने के बाद खुलासा किया कि उसके गिरोह ने पीले रुमाल से पूरे 931 लोगो को मौत के घाट उतारा है। उसने ये भी खुलासा किया कि अकेले उसने ही 150 लोगों के गले में रुमाल डालकर हत्या की है। बेहराम की गिरफ्तारी के बाद उसके गिरोह के बाकी सदस्य भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए। बेहराम सहित जितने भी इस गिरोह के कुख्यात सदस्य थे उन्हे जबलपुर के पेड़ों पर फांसी दे दी गई—जबलपुर में ये पेड़ अभी भी हैं। गिरोह के जितने भी नये सदस्य थे उनके लिये स्लीमैन ने जबलपुर में ही एक सुधारगृह खुलवा दिया—इस बंदीगृह के अवशेष अभी भी जबलपुर में मौजूद हैं। कहते हैं कि हफ्ते में एक दिन जबलपुर में एक हाट लगता है। हाट में लगनी वाली दुकानों के अधिकतर मालिक उन्हीं ठगों की औलाद है जिन्हे स्लीमैन मुख्यधारा में लाया था।
कहते तो ये भी है कि स्लीमैन का एक पड़पोता इंग्लैड में रहता है और उसने अपने ड्राइंगरुम में उस पीले रुमाल को संजों कर रख रखा है। वही पीला रुमाल जिससे बेहराम ठग लोगों को मौत के घाट उतारता था और जिसके चलते उसे इतिहास का अबतक का सबसे बड़ा सीरियल किलर माना जाता है।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)