ये पोस्ट मैने एक कमेंट के रुप में लिखी थी। ब्लॉगिंग करते वक्त शेखावाटी इलाके के एक ब्लॉग पर पहुंच गया। इलाके का नाम सुनते ही मुझे याद आ गया कि एक बार मै भी शेखावाटी इलाके में आया था। शायद 2002-03 का साल था वो। झुंझनू के एक गांव में कांग्रेस अध्यक्षा, सोनिया गांधी की रैली कवर करने के लिए मै आया था।
शेखावाटी ब्लॉग पर आया तो वो याद ताजा हो गई।

रैली कवर करने या अखबार की हेडलाईन की वजह से याद ताजा नहीं हुई बल्कि राजस्थान सरकार के मीडिया विभाग (सूचना एंवम जनसंर्पक विभाग) की कार्यशैली (या कारगुजारियों) और अपने साथी पत्रकारों के अड़ियल व्यवहार की वजह से।
दिन के करीब 12 बजे चले थे हम झुंझनू के लिए और रात में नौ बजे पहुंचे शेखावटी (या शेखावाटी) इलाके में ...उस वक्त राजस्थान में अशोक गहलौत की सरकार थी, सो दिल्ली से पत्रकारों (टी.वी और अखबार) को लाने ले जाने का पूरा जिम्मा राज्य सरकार पर था। केन्द्र में उस वक्त एनडीए (बीजेपी) की सरकार थी। राजस्थान सूखे की मार झेल रहा था। केन्द्र से कोई राहत नहीं मिल रही थी। बस इसीलिए आयोजित की गई थी शेखावाटी (राजस्थान का सीकर, झूंझनू, खेतरी इलाका) में किसान रैली।

करीब एक दर्जन पत्रकारों के लिए मीडिया विभाग ने बुलाई दो छोटी कारें। ठूंसठूंस कर भरा जाने लगा पत्रकरों को। खुद मीडिया विभाग के डायेरक्टर ( दिल्ली के बीकानेर हाउस में था उनका ऑफिस) भी उसी में बैठने लगे हमारे साथ। "दिल्ली के पत्रकारों की इतनी बेइज्जती" किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। फिर क्या था सभी बरस पड़े डायरेक्टर साहब पर। हारकर रास्ते में ही दो और गाड़ियां मंगानी पड़ी। फिर कही जाकर यात्रा चल पड़ी।
कई घंटे चलने के बाद भी जब डायरेक्टर साहब ने "चाय-पानी" के लिए भी नहीं पूछा तो हारकर एक वरिष्ठ साथी को ही बोलना पड़ा, "डायरेक्टर साहब किसी ढाबे पर ही रुकवा दीजिए, हम पत्रकार ज्यादा देर बिना चाय के नहीं रह सकते।" बस, फिर क्या था, डायरेक्टर साहब ने वाकई एक रोड-साईड ढाबे पर सभी गाड़ियों को रोकने का आदेश दे डाला। फिर क्या होना था, एक बार फिर डायेरक्टर साहब को पत्रकारों के गुस्से का कोप झेलना पड़ा। थोड़ी दूर जाकर एक हेरिटज रेस्टोरेंट पर गाड़ियां रोकी गई और सभी ने चाय-नाश्ता लिया। उस वक्त भी डायरेक्टर साहब का चेहरा देखने लायक था। अब तो वे पत्रकारों से दूर ही रहने लगे। बात करनी भी बंद कर दी। मुझे आजतक ये बात समझ नहीं आई कि सरकारी विभागों को प्रेस के लिए अलग सा खर्चा मिलता है। लेकिन ना जाने क्यों डायेरक्टर साहब कंजूसी में क्यों लगे हुए थे। कुछ पत्रकारों का मानना था कि
यही सब मौके होते है सरकारी अफसरों को "ऊपरी कमाई" के। "कम खर्च करो और बिल लंबा-चौड़ा थमा दो विभाग के हाथ में।"
यही सब मौके होते है सरकारी अफसरों को "ऊपरी कमाई" के। "कम खर्च करो और बिल लंबा-चौड़ा थमा दो विभाग के हाथ में।"
खैर जैसे-तैसे हम एक छोटे से कस्बे में (झूंझनू ही था शायद) पहुंचे। हमारी कारें एक बड़े से मंदिर के पार्किंग में रोक दी गई। काफी पुराना मंदिर था, शायद मध्यकालीन युग का। काफी भीड़ थी दर्शन करने वालों की वहां। हां, इससे पहले की आगे की कहानी बताऊं, उस कस्बे के बाहर ही डायरेक्टर साहब को दो-तीन बाबू स्वागत करने लेने के लिए खड़े थे। डायरेक्टर साहब वहां से कब खिसक लिए हमे पता ही नहीं चला। अब 40-45 साल के वे बाबू हमे आगे ले जा रहे थे। वो मंदिर सती माता का था शायद, ठीक से याद नहीं आ रहा है मुझे। मंदिर पहुंचकर हमे लगा कि शायद रास्ते में मंदिर पड़ा है तो हमे दिखाने के इरादे से यहां लाया गया है। हम उतरकर चलने लगे।

लेकिन तभी वे बाबू बोले," साहब, अपना सामान तो ले लिजिए।" अब हमसब एक दूसरे का मुंह तांकने लगे। समझ आ गया था कि इसी मंदिर में ये लोग हमे ठहराने की व्यवस्था कर चुके है।
मंदिर में ठहरने की बात सुनते ही साथी पत्रकार आग-बबूला हो गए। लेकिन मैने और एक-दो साथियों ने समझाया कि चलिए एक बार अंदर चलकर देखते है कि क्या व्यवस्था की है इन लोगो ने। नीचे एक भव्य मंदिर था और ऊपर बरामदे के चारों और कमरे बने हुए थें। उन्ही कमरों में हमारे रुकने का इंतजाम किया गया था। थोड़ी देर कमरे का मुआयना करने के बाद मै और मेरा साथी (अगर गलत नही हूं तो शायद उनका नाम रंजीत जामवाल था। इंग्लिश अखबार,
STATESMAN के रिपोर्टर) बिस्तर पर पसर गए। थोड़ी ही देर में सहारा अखबार के फोटोग्राफर भी आ गए। वे भी हमारे पास आकर बैठ गए। यात्रा में हम काफी थक चुके थे और उससे भी ज्यादा अपने पत्रकार बंधुओं और डायरेक्टर साहब की किच-किच की वजह से। अभी बैठकर बात कर ही रहे थे कि बाहर से कुछ शोरगुल की आवाज आने लगी। कमरे के बाहर आकर देखा तो ‘दिग्गज पत्रकारों’ का समूह फिर झगड़े के मूड में था। हमे अपने कमरे दिखाने लगे। “देखो यार, कैसे गुजरी की रात यहां, बिस्तर कितने गंदे है...बाथरुम देखो...बाल्टी तक नहीं है....पंखा बाबाआदम के जमाने का है...रात में मच्छर उठाकर ले जाएंगे।” एक बोला, बुलाओ, “उस .... को। खुद तो आराम से सरकारी गेस्ट हाउस में मजे काट रहा होगा और हमे यहां छोड़ गया।” दूसरे ने कहा,
इसकी शिकायत, मुख्यमंत्री के पीआरओ से करनी पड़ेगी। इतना सुनते ही प्रेस विभाग के बाबूओं के कान खड़े हो गए।
इसकी शिकायत, मुख्यमंत्री के पीआरओ से करनी पड़ेगी। इतना सुनते ही प्रेस विभाग के बाबूओं के कान खड़े हो गए। उन्होने चुपके से डायरेक्टर साहब को फोन किया। थोड़ी ही देर में डायरेक्टर साहब वहां पहुंच चुके थे। लेकिन तबतक सभी पत्रकार (मै और रंजीत जामवाल भी) मंदिर के अहाते से बाहर आ चुके थे—पत्रकार एकता का सवाल जो था भई।
डरते-डरते डायरेक्टर साहब ने पूछा, “अरे क्या हुआ है बंधुओं, आप सब बाहर कैसे।” सबसे सीनियर पत्रकार बोले, “ ऐसी की तैसी ..... साहब, खुद तो आप यहां से चुपचाप निकल लिए और हमें यहां मंदिर में छोड़ दिया।” अब तो डायरेक्टर साहब मिमियाने लगे, “नहीं-नहीं आपको छोड़कर नहीं गया था, मै तो डीएम साहब से कल की रैली के बारे में मीटिंग करने चला गया था...मै तो बताकर गया था कि थोड़ी देर में आ रहा हूं।” आप बताईये क्या तकलीफ है आपको। “अरे .... साहब, हम टी.वी में काम करते है, बिना टी.वी के तो हम एक घंटा भी नहीं रुक सकते। मंदिर में टी.वी की कोई व्यवस्था नहीं है। हम तो पूरी दुनिया से कट गए है।” अच्छा ये परेशानी का सबब है आप लोगो का। धीरे से कोई साथी बुदबुदाया, “ मंदिर में शराब भी तो नहीं पी सकते है।” इतना सुनते ही सब ठहाके मारकर हंसने लगे। डायरेक्टर साहब समझ गए थे कि मंदिर में ना रुकने की असली वजह क्या थी।

रा्त के दस बजे ही डायरेक्टर साहब ने अपने बाबूओं को एक “अच्छे से होटल” को ढूंढने का आदेश दे दिया। कोई भीड़ में बोल पड़ा, डायरेक्टर साहब आप अगर थोड़ी देर और हो जाते तो हम सीएम साहब के पीआरओ साहब को सबकुछ बताने वाले थे। ये सुनते ही डायरेक्टर साहब बोल उठे, अरे छोड़िए बाकी बाते, मै अभी यहां का एक शानदार हेरिटज रिसोर्ट देखकर आया हूं। सब वही चलते है। वहां राजस्थान का लोक नाच-गाना भी होता है और जो कुछ आपको चाहिए वो सबकुछ भी मिल जाएगा। ये सुनते ही सबकी बांछे खिल गई। दरअसल पत्रकारों के लिए शहर से बाहर कवरेज पर जाना किसी हॉली-डे से कम नहीं होता। काम का काम और पिकनिक का पिकनिक। हो गया ना एक पंथ दो काज।

रिसोर्ट में सभी ने जमकर शराब पी और लोक नृत्य का लुत्फ उठाया। देर रात होटल पहुंचे तो किसी ने भी कमरे में जाकर टी.वी पर न्यूज देखनी की जहमत नहीँ उठाई। राजस्थान की हेरिटज शराब पीने के बाद क्या किसी को दीन-दुनिया याद रहती है।
खैर, किसी तरह रात काटी और सुबह होते ही चल दिए रैली को कवर करने। लाखों की तादाद में भीड़ जुटी थी उस गांव के मैदान में। सोनिया गांधी ने जमकर केन्द्र में सतारुढ बीजेपी सरकार को खरी-खोटी सुनाई। मै मंद-मंद मुस्करा रहा था, अब तो स्टोरी जरुर पेज वन लगेगी। मै उस वक्त कांग्रेस के माऊथपीस अखबार,
नेशनल हेराल्ड में काम जो करता था—हाल ही में ये अखबार बंद हो गया है। अरे हां इससे पहले का एक और किस्सा सुनाना भूल गया। कई किलोमीटर दूर से ही गाड़ियों का काफिला रोक दिया गया था भीड़ के चलते। अब पत्रकारों के लिए इतनी दूर चलना “शान के खिलाफ था।” थोड़ी दी दूर गए थे कि कुछ साथी पत्रकार एसपीजी के अधिकारियों से टकरा गए—सोनिया गांधी की सुरक्षा एसपीजी के हवाले है। एक बुर्जग पत्रकार ने एसपीजी के कमांडो को हडकाया, “ हमे लोकल मत समझ लेना, दिल्ली से आए है हम। एक मिनट में अक्ल ठिकाने आ जाएगी।” देख रहे है आप इनको, दिल्ली में तो एकदम भिगी बिल्ली बने रहते है यहां आकर “चौ़डे” हो रहे है। “पीआईबी पत्रकार हूं मैं, शिकायत कर दी तो लेने के देने पड़ जाएंगे। फिर पीछे-पीछे फिरोगे....”
जैसे-तैसे रैली कवर करने के लिए मैदान में पहुंचे, तो टी.वी के कुछ पत्रकार फिर बिदक गए। “कहां है....(डायेरक्टर) साहब, यहां बुलाओ उन्हे।”

जैसे ही डायरेक्टर साहब प्रेस गैलरी पहुंचे, टी.वी पत्रकार बोल उठे, सर ये बताईये कि इनती दूरी पर कैमरा लगेगा तो कैमरामैन सोनिया जी को कैसे शूट (वीडियो फिल्म) करेगा। आपने छुटभैया नेताओं को तो आगे बैठा दिया और हमे यहां पीछे बैठा दिया। आपको यही सब करना था तो हमें दिल्ली से इनती दूर क्यो बुलाया। ऐसा काम तो हमारे स्ट्रिंगर (स्थानीय संवाददाता) भी कर सकते थे।
अब बारी थी रिपोर्ट फाईल करने की। टीवीवालों ने अपनी टेप सोनिया गांधी के विशेष हैलीकॉप्टर में सवार अधिकारियों को सौंप दी। दिक्कत थी हम जैसे अखबार और न्यूज एजेंसी के पत्रकारों के लिए। झूंझनु से दिल्ली पहुंचने में शाम हो सकती थी, तबतक अखबार का प्रिंट तैयार हो चुका होता है। सो डायरेक्टर साहब से कहा गया कि किसी पीसीओ पर ले चले, जहां फोन और फैक्स दोनो की व्यवस्था हो। डायरेक्टर साहब ने किसी अधिकारी से बात की और हमे ले चले गांव से थोड़ी दूर। एक आढ़ती के गोदाम नुमा ऑफिस के बाहर ले जाकर हम रोक दिया गया।
डायरेक्टर साहब के साथ चल रहे अधिकारी को देखते ही लालाजी गोदाम से निकाल आए और गदगद होकर बोले, “अहो भाग्य हमारे की तहसीलदार साहब हमारे ऑफिस पधारे है।”
डायरेक्टर साहब के साथ चल रहे अधिकारी को देखते ही लालाजी गोदाम से निकाल आए और गदगद होकर बोले, “अहो भाग्य हमारे की तहसीलदार साहब हमारे ऑफिस पधारे है।” तब जाकर हमे पता चला कि वो अधिकारी स्थानीय तहसीलदार था। तहसीलदार ने लालाजी को बताया कि ये सभी दिल्ली से आये हुए पत्रकार हैं इन सबको अपनी रिपोर्ट दफ्तर भेजनी है। ये सुनते ही लालाजी बोल उठे, “हुक्म सरकार, हमारे लायक कोई सेवा?” लालाजी, अब गांव के आस-पास ना तो कोई फोन है और ना ही फैक्स, इन्हे जल्दी थी, सो हम इन्हे यहां ले आए। अरे साहब आपने कैसी बात कर दी। ये फोन, फैक्स और ऑफिस सब आपके रहमोकरम पर ही तो चल रहा है। उसने हमसे मुखातिब होते हुए कहा, “ये तो हमारा भाग्य है कि आपकी सेवा करने का मौका मिल रहा है और इस बहाने तहसीलदार साहब भी यहां पधारे। आप मेरे फोन और फैक्स को अपने ही समझे, जहां फोन-फैक्स करना है कर लीजिए।” हम सभी ने वहां से अपनी-अपनी रिपोर्ट फाईल की। मैने अपने ऑफिस में फोन कर सारी डिटेल लिखवा दी थी। दफ्तरवालों ने बताया कि ये तो आज की फ्रंन्ट हेडलाईन है। मैने कहा कि अगर कुछ समझ में ना आए तो “एजेंसी की खबर पढ़ लेना।”
वहां से निकलने के बाद हम एक बार फिर वापस दिल्ली की और रुख कर चुके थे। देर शाम ऑफिस पहुंचा तो सबने बधाई दी कि पहली बार मेरी कोई स्टोरी अखबार की मुख्य हेडलाईन ली गई थी।