Friday, May 22, 2009

सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश


सरकार बनने का किसी क्राइम रिपोर्टर के खुश होने से क्या वास्ता हो सकता है? बिल्कुल है! दिल्ली के क्राइम रिपोर्टर तो पिछले एक महीने से सरकार बनने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। जब से चुनावों की घोषणा हुई थी और सरकार बनने से लेकर तक, क्राइम रिपोर्टर यही सोच रहे थे कि किसी की भी सरकार बने-चाहे वो कांग्रेस की हो या फिर बीजेपी की- बस जल्द से जल्द बन जानी चाहिए। इसलिए नहीं कि सरकार उनके लिए कोई पैकेज की घोषणा करने वाली है। जानने चाहेंगे क्यो ?
दरअसल चुनावों के घोषणा होने के चंद रोज बाद ही दिल्ली पुलिस ने आदेश जारी कर दिया कि कोई भी पुलिस अधिकारी तब तक प्रेस कांफ्रेंस नहीं करेगा, जबतक की सरकार का गठन ना हो जाए और प्रधानमंत्री सहित कैबिनट के मंत्री शपथ ग्रहण ना कर ले। ये आदेश दिल्ली पुलिस ने चुनाव सहिंता लागू होने के कुछ रोज बाद किया था। ये बात आजतक साफ नहीं हो पाई है कि क्या वाकई चुनाव आयोग ने दिल्ली पुलिस को ऐसा करने का आदेश दिया था या फिर गृह मंत्रालय ने। लेकिन दिल्ली पुलिस ने अपनी जुबां पर ताला लगा लिया। अब जबकि मंत्रिमंडल ने शपथ ग्रहण कर ली है तो पुलिस अधिकारियों पर प्रेस कांफ्रेंस ना करने का आदेश भी खत्म ही समझ लीजिए।

अगर आपको याद ना रहा हो तो यहां ये बात दीगर है कि इलेक्शन के घोषणा से पहले तक दिल्ली पुलिस की डीसीपी तो क्या, खुद पुलिस महकमें के मुखिया यानि कमिश्नर साहब तक को गृह मंत्रालय ने (अनौपचारिक) आदेश दे रखा था कि राजधानी की कानून-व्यवस्था पर हर पंद्रह दिन पर अपना पक्ष रखा जाएं। ये आदेश तब दिया गया था जब दिल्ली एक के बाद एक वारदात से दहल कर रह गई थी। पहले बाइकर्स गैंग के सरगना बंटी और फिर सत्ते गैंग ने लोगों को जीना मुहाल कर दिया था। मीडिया में दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे थे। हालांकि पुलिस का दावा था कि आंकड़ो पर गौर किया जाए तो राजधानी में क्राइम कम हो रहा है लेकिन किसी ने पुलिस के दावा पर पूरी तरह यकीन नहीं किया। हारकर गृह मंत्रालय को दखल देना पड़ा और पुलिस कमिश्नर को मीडिया के सामने आना पड़ा। ये वही कमिश्नर है जिनके दिल्ली पुलिस के मुखिया बनने के बाद कुछ सीनियर अधिकारी कहते सुने गए थे कि “ सीपी (कमिश्नर ऑफ पुलिस को महकमें मे इसी निक-नेम से जाना जाता है) साहब ने हमें मीडिया की खबरों पर ज्यादा गौर ना करने का मशवरा दिया है।” लेकिन कुछ दिनों बाद ही कमिश्नर साहब को अपनी सोच बदलनी पड़ गई।
खैर, सरकार बनने का क्राइम रिपोर्टर के खुश होने से क्या ताल्लुक। बिल्कुल ताल्लुक है। मुझे याद है कि करीब पांच-छह साल पहले मैं मध्य-प्रदेश के टूर पर गया था। वहां मैने कई लुटेरों की बस्तियों पर पुलिस के साथ मिलकर लाइव रेड की थी। उसी दौरान मेरी मुलाकात वहां के एक डीआईजी साहब से हुई। इंटरव्यू खत्म होने के बाद डीआईजी साहब बातों ही बातों में कहने लगे कि अगर हम ना हो तो आपका काम बंद हो जाएं। “ हम इंटरव्यू देते है तो आप की खबर पूरी होती है। वरना अधूरी ही रह जाएंगी।” मेरा जबाब था डीआईजी साहब, आप बिल्कुल ठीक फरमा रहे है। दरअसल आप जिस महकमें और पद पर बैठे है वो सरकार ने आपको दिया है। हम आप से इसलिए किसी भी खबर पर इंटरव्यू (बाइट या पक्ष) लेने आते है क्योंकि आप सरकार के नुमाइंदे है। आप जो बोलेंगे वो हमे मानना पड़ेगा।
क्राइम की जितनी खबरें टी.वी या अखबार में दिखाई पड़ती हैं उसमे से कम से कम बीस से तीस प्रतिशत वे होती है जो किसी भी क्राइम रिपोर्टर को पुलिस महकमें से मिलती है। वो माध्यम है प्रेस कांफ्रेंस के जरिए। पुलिस किसी चोर-उचक्के या गिरहकट (माफ कीजिए पॉकेटमार) को पकड़ती है और बड़ी शान से प्रेस कांफ्रेस करती है और उसमें उन आरोपियों के बारे में ऐसा कोई शगुफा छोड़ देगी कि वो खबर टी.वी या अखबार में दिखाई दे ही जाती है। कभी बताएगी कि ये चोर, अपनी गर्लफ्रेंड के गिफ्ट के लिए चोरी करता था... ये पढ़ा-लिखा चोर है, मंदी के मारे नौकरी नहीं मिली तो लूटपाट करने लगा। फलां आरोपी, मोटरसाइकिल की चोरियां महज अपने शौक के लिए करता था, बाइक का पैट्रोल खत्म होने पर उसे वहीं फेंक कर दूसरी मोटरसाइकिल चोरी कर लेता था। कभी बताया जाएगा कि ये अपनी बहन की शादी के लिए चोरी के पैसे से दहेज इकठ्ठा कर रहा था । ये सब पुलिसवाले के मुंह से निकला नहीं कि बस बन गई हेडलाईन। कभी-कभी अच्छी प्रेस कांफ्रेंस भी होती है। जैसे, किसी नामी-गिरामी बदमाश (बंटी, सत्ते इत्यादि) के एनकाउंटर के बाद या फिर किसी आंतकवादी को ढेर करने के बाद (जैसे बटला हाउस एनकाउंटर)।

अब जब ये प्रेस कांफ्रेंस ही बंद हो जाएंगी तो क्राइम रिपोर्टर तो उदास हो ही जाएगां ना। एनकाउंटर होगा कैसे, सभी पुलिसवाले तो इलेक्शन डयूटी पर तैनात है। बदमाश भी नेताओं के चुनाव प्रचार में जुट जाते है इलेक्शन के दौरान। आप यकीन करें या ना करें, लेकिन ये हकीकत है कि चुनाव के दौरान क्राइम ग्राफ नीचे आ जाता है।

अब जब ये प्रेस कांफ्रेंस ही बंद हो जाएंगी तो क्राइम रिपोर्टर तो उदास हो ही जाएगां ना। एनकाउंटर होगा कैसे, सभी पुलिसवाले तो इलेक्शन डयूटी पर तैनात है। बदमाश भी नेताओं के चुनाव प्रचार में जुट जाते है इलेक्शन के दौरान। आप यकीन करें या ना करें, लेकिन ये हकीकत है कि चुनाव के दौरान क्राइम ग्राफ नीचे आ जाता है।
क्राइम रिपोर्टिंग में बीस ये तीस प्रतिशत वे खबरें होती है जो ब्रेकिंग होती है। जैसे किसी बुजर्ग दंपत्ति की उनके ही नौकर ने लूटपाट के इरादे से हत्या कर दी। या फिर जैसे किसी बैंक में दिन-दहाड़े लूट हो गई। किसी लड़की को उसके प्रेमी ने प्यार में तकरार के बाद बीच सड़क में चाकू से गोद डाला। दो जिंदा महिलाएं ऑटो में जलकर खाक। लेकिन अगर खबर कुछ ऐसी हुई जैसे, बैंक से पैसे निकालकर बाहर निकल रहे व्यापारी को हथियारों की नोंक पर लूटा तो शायद ऐसी खबर के चलने का चांस कम होता है। ऐसे में, ऑफिस वाले कहेंगे, अरे यार कोई स्टोरी नहीं दे रहे हो आजकल। क्राइम रिपोर्टर मन ही मन बुदबुदाता है, “इलेक्शन के दौरान चलेगी कोई स्टोरी, जो बोल रहे हो स्टोरी नहीं दे रहे हो।” जी हां, इलेक्शन टाइम में क्राइम की खबरों को कम ही तरजीह दी जाती है। जबतक की कोई बहुत बड़ी ब्रेकिंग खबर ना हो अपराध और अपराध से जुड़ी टी.वी और अखबार से गायब रहती है।
टी.वी के क्राइम रिपोर्टर की करीब दस-बीस प्रतिशत खबरें वे होती है जो बहुत शानदार होती है, लेकिन ऑफिस से फोन आता है, खबर में किसी पुलिस अधिकारी की बाइट जरुरी है। “लोचा हो सकता है इस स्टोरी में बॉस, इसलिए ऑफिशियल बाइट के बिना नहीं चलेगी ये स्टोरी।” यानि तीस प्रतिशित खबरें प्रेस कांफ्रेस से मारी गई और बीस प्रतिशित बिना पुलिस की बाइट की। और अगर कोई बड़ी ब्रैकिंग नहीं हुई पंद्रह-बीस दिन तो बाकी कितनी प्रतिशत खबरें बची। मात्र बीस प्रतिशत।
ये बीस प्रतिशत वे खबरें होती है जो किसी भी क्राइम रिपोर्टर की अपनी होती है। ना तो वे कोई ब्रेकिंग न्यूज का हिस्सा होती है और ना ही पुलिस की प्रेस कांफ्रेंस की। जैसे, जब हाल ही में दो महिलाएं ऑटो में जिंदा जलकर खाक हो गई तो पुलिस ने बिना तफ्तीश किए दावा किया कि शॉट-सर्किट की वजह से आग लगने के कारण दोनों महिलाओं की मौत हुई है। ये वारदात रात को हुई थी। खबर सनसनीखेज थी, लिहाजा मैं सुबह होते ही उस इलाके के थाने पर पहुंच गया जहां ये वारदात हुई थी। थाने का गेट पुलिसवालों ने बंद कर रख था मीडियाकर्मियों के लिए। साफ था कि मामले में कुछ पेंच है। मेरे साथ बाकी चैनल के रिपोर्टर भी खड़े थे। इतने में एक पुलिसवाला दो महिलाओं और एक छोटे बच्चे के साथ वहां पहुंचे। पुलिसवाला उन महिलाओं में से एक को अंदर ले गया। इतने में हमने दूसरी महिला से बातचीत शुरु कर दी। बातों ही बातों में उसने बताया कि जिस महिला को पुलिसवाला थाने के अंदर ले गया था वो भी वारदात के वक्त ऑटो में मौजूद थी। लेकिन वो किसी तरह जान बचाकर भाग निकली थी। उस महिला ने बताया कि मौत के मुंह से निकल कर आने वाली वो महिला उसकी बेटी है और उसके साथ छोटा बच्चा उसका नाती है। महिला ने खुलासा किया कि ऑटो में आग अपने आप नहीं लगी बल्कि उसकी बेटी ने उसे बताया था कि किसी आदमी ने ज्वलनशील पदार्थ ऑटो पर डालकर आग लगा दी थी। इस बयान के बाद तो मानों पुलिस की जांच पर ही सवाल खड़े हो गए। आला-अधिकारी कैमरे पर तो कुछ नहीं बोले, लेकिन ये बात मान ली कि तीसरी महिला भी ऑटो में मौजूद थी। इससे पहले तक दिल्ली पुलिस दो महिलाओं के ही ऑटो में होने का दावा कर रही थी। यानि पुलिस की जांच में झोल था। ये होती है किसी भी क्राइम रिपोर्टर की अपनी स्टोरी। अगर इस तरह कि खबर यदा-कदा भी क्राइम रिपोर्टर के हाथ लग जाएं तो बल्ले-बल्ले।
अब मैं मध्य-प्रदेश के उन्ही डीआईजी साहब की बात पर एक बार फिर से लौटता हूं कि “हमारी (पुलिस की) वजह से ही तुम खबरें कर पाते हो।” बिल्कुल ठीक कहा था डीआईजी साहब ने। लेकिन ऐसी खबरों का क्या, जैसा मैने अभी ऑटो मे तीसरी महिला के बारे में जिक्र किया है। कोई भी क्राइम रिपोर्टर, किसी प्रेस कांफ्रेंस की खबर के कारण नहीं जाना जाता है। वो जाना जाता है ऐसी ही किसी स्कूप ( एक्सक्लूसिव खबर) के लिए। मुझे अब भी याद है कि वर्ष 2005 में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में एक महिला की दिन-दहाडे़ अस्पताल परिसर में ही आबरु लूट ली गई थी। दिल्ली में लगातार बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही थी तिस पर अस्पताल में बलात्कार से पुलिस महकमें की नींद हराम हो गई। महिला संगठनों के साथ-साथ सरकार ने भी पुलिस पर उंगलियां उठानी शुरु कर दी। आनन-फानन में पुलिस ने दो दिन बाद ही एक शख्स को पकड़ा और दावा किया कि उसी ने अस्पताल में महिला की इज्जत लूटी है। लेकिन पुलिस ने ना तो आरोपी से मीडिया को बात करने दिया और ना ही महिला से। मीडिया को महिला का पता तक नहीं बताया गया। महिला और उसके पति को एक गुप्त स्थान पर भेज दिया गया। लेकिन किसी तरह मैने उस पीड़ित महिला और पति का ढूंढ निकाला। मैने दोनों से बात की तो उन्होने साफ कर दिया कि पुलिस ने जिस आरोपी को पकड़ा है वो कोई और है। इतना सुनते ही मै भौचक्का रह गय़ा। मैने फौरन सहारा टी.वी (उस वक्त मैं वहां क्राइम रिपोर्टिंग करता था) में अपनी सीनियर्स को इस खुलासे की जानकारी दी। फिर क्या था मैने महिला का इंटरव्यू सहारा टी.वी पर चला दिया। इंटरव्यू चलते ही हड़कंप मच गया। मामले की जांच तुंरत क्राइम ब्रांच के हवाले कर दी गई। एक साल बाद अदालत ने उस निर्दोष व्यक्ति को बाइज्जत बरी कर दिया। वो बात और है कि दिल्ली पुलिस अभी तक असली आरोपी को पकड़ने में नाकाम रही है। लेकिन एक बेगुनाह बच गया।
बस

कहने का तात्पर्य ये है कि जो पुलिस बोलती है हम उसे तोते की तरह नहीं रटते है। क्राइम रिपोर्टर अपने विवेक से काम करता है। वो तो अपने सूत्रों और इंवेस्टीगेटीव स्किल (कौशल) से किसी भी मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करता है।

कहने का तात्पर्य ये है कि जो पुलिस बोलती है हम उसे तोते की तरह नहीं रटते है। क्राइम रिपोर्टर अपने विवेक से काम करता है। वो तो अपने सूत्रों और इन्वेस्टिगेटिव स्किल (कौशल) से किसी भी मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करता है। कोशिश करता है कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। डीआईजी साहब को मैने उस वक्त भी यही जबाब दिया था कि माना सभी खबरें आप से मिलती है, लेकिन उन मामलों को क्या जो सिर्फ और सिर्फ एक क्राइम रिपोर्टर की होती है। तब फिर कोई पुलिस अधिकारी दूध में पानी मिलाने से पहले सौ बार सोचेगा जरुर।
याद है ना किस तरह यू.पी पुलिस के एक आला-अधिकारी ने आरुषि हत्याकांड में प्रेस कांफ्रेंस कर एक छात्रा, नौकर और उसके पिता पर कीचड़ उछालने की कोशिश की थी। लेकिन उस प्रेस कांफ्रेस में मौजूद कम ही क्राइम रिपोर्टर को उन आईजी साहब के दावे पर यकीन था। नतीजा, आईजी साहब की छुट्टी हो गई और बाकी सब इतिहास बन चुका है।
इतिहास इसलिए कि इन चुनावों के दौरान ही आरुषि हत्याकांड की पहली बरसी बीत गई और एक्का-दुक्का टी.वी या अखबार को छोड़ दे तो इस सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री से जुड़ी कोई खबर नहीं दिखाई दी। ये बात जरुर है कि सीबीआई की एक टीम दिन-रात इस मामले की जांच में अभी भी जुटी है। उम्मीद करते है कि जल्द ही देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री के राज से पर्दा उठ पाएं। अगर क्राइम रिपोर्टर ना होते तो शायद नोएडा पुलिस और फिर सीबीआई इस मामलें को किसी भी तरह सुलझा लेती और आरुषि के साथ इंसाफ नहीं हुआ होता। इंसाफ तो खैर अभी भी नहीं हुआ है लेकिन अगर गलत लोग पकड़े जाते तो हमारी कानून-व्यवस्था और समाज के साथ एक खिलवाड़ होता, जो किसी सभ्य समाज में कतई मंजूर नहीं है। मैने खुद कई बार पुलिस अधिकारियों को कहते सुना है कि अगर मीडिया ना हो तो हम इस मर्डर मिस्ट्री को चुटकियों में सुलझा लेंगे। यानि प्रेस के उस सिंद्वात को क्राइम रिपोर्टर पूरी तरह से मानता है जिसमें मीडिया को समाज का ‘वॉच-डॉग’ माना जाता है।
समझ गए ना एक क्राइम रिपोर्टर की इस समाज में कितनी अहमियत है। वो सिर्फ सनसनीखेज खबरें परोसता ही नहीं, सैकड़ो-हजारों पीड़ित लोगों का रहनुमा भी होता है।

शायद ही कोई सा दिन ऐसा बीतता होगा जब उसपर किसी पुलिस के सताएं, तो कभी बदमाशों के सताएं लोगों के इंसाफ की आस में फोन ना आते हो। सभी सरकारी दफ्तरों, मंत्रियों और संतरियों के दरवाजों से थक-हारकर आदमी क्राइम रिपोर्टर को ही इंसाफ की आखिरी उम्मीद मानता है।

शायद ही कोई सा दिन ऐसा बीतता होगा जब उसपर किसी पुलिस के सताएं, तो कभी बदमाशों के सताएं लोगों के इंसाफ की आस में फोन ना आते हो। सभी सरकारी दफ्तरों, मंत्रियों और संतरियों के दरवाजों से थक-हारकर आदमी क्राइम रिपोर्टर को ही इंसाफ की आखिरी उम्मीद मानता है। कई बार तो अदालतों में सालों से लटके पड़े मामले भी तभी जोर पकड़ते है जब क्राइम रिपोर्टर उनका खुलासा करता है।
खैर, अब जब सरकार बन गई है तो सभी तरह के क्राइम की खबरें आपको देखने, सुनने और पढ़ने को मिलेगी। पुलिस के ‘दावों’ वाली भी, उनके दावों के झोलवाली भी, ब्रेकिंग न्यूज भी और स्कूप भी...

Saturday, March 14, 2009

पत्रकारों का स्वागत कैसे करें

ये पोस्ट मैने एक कमेंट के रुप में लिखी थी। ब्लॉगिंग करते वक्त शेखावाटी इलाके के एक ब्लॉग पर पहुंच गया। इलाके का नाम सुनते ही मुझे याद आ गया कि एक बार मै भी शेखावाटी इलाके में आया था। शायद 2002-03 का साल था वो। झुंझनू के एक गांव में कांग्रेस अध्यक्षा, सोनिया गांधी की रैली कवर करने के लिए मै आया था। शेखावाटी ब्लॉग पर आया तो वो याद ताजा हो गई। रैली कवर करने या अखबार की हेडलाईन की वजह से याद ताजा नहीं हुई बल्कि राजस्थान सरकार के मीडिया विभाग (सूचना एंवम जनसंर्पक विभाग) की कार्यशैली (या कारगुजारियों) और अपने साथी पत्रकारों के अड़ियल व्यवहार की वजह से।
दिन के करीब 12 बजे चले थे हम झुंझनू के लिए और रात में नौ बजे पहुंचे शेखावटी (या शेखावाटी) इलाके में ...उस वक्त राजस्थान में अशोक गहलौत की सरकार थी, सो दिल्ली से पत्रकारों (टी.वी और अखबार) को लाने ले जाने का पूरा जिम्मा राज्य सरकार पर था। केन्द्र में उस वक्त एनडीए (बीजेपी) की सरकार थी। राजस्थान सूखे की मार झेल रहा था। केन्द्र से कोई राहत नहीं मिल रही थी। बस इसीलिए आयोजित की गई थी शेखावाटी (राजस्थान का सीकर, झूंझनू, खेतरी इलाका) में किसान रैली।
करीब एक दर्जन पत्रकारों के लिए मीडिया विभाग ने बुलाई दो छोटी कारें। ठूंसठूंस कर भरा जाने लगा पत्रकरों को। खुद मीडिया विभाग के डायेरक्टर ( दिल्ली के बीकानेर हाउस में था उनका ऑफिस) भी उसी में बैठने लगे हमारे साथ। "दिल्ली के पत्रकारों की इतनी बेइज्जती" किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। फिर क्या था सभी बरस पड़े डायरेक्टर साहब पर। हारकर रास्ते में ही दो और गाड़ियां मंगानी पड़ी। फिर कही जाकर यात्रा चल पड़ी।
कई घंटे चलने के बाद भी जब डायरेक्टर साहब ने "चाय-पानी" के लिए भी नहीं पूछा तो हारकर एक वरिष्ठ साथी को ही बोलना पड़ा, "डायरेक्टर साहब किसी ढाबे पर ही रुकवा दीजिए, हम पत्रकार ज्यादा देर बिना चाय के नहीं रह सकते।" बस, फिर क्या था, डायरेक्टर साहब ने वाकई एक रोड-साईड ढाबे पर सभी गाड़ियों को रोकने का आदेश दे डाला। फिर क्या होना था, एक बार फिर डायेरक्टर साहब को पत्रकारों के गुस्से का कोप झेलना पड़ा। थोड़ी दूर जाकर एक हेरिटज रेस्टोरेंट पर गाड़ियां रोकी गई और सभी ने चाय-नाश्ता लिया। उस वक्त भी डायरेक्टर साहब का चेहरा देखने लायक था। अब तो वे पत्रकारों से दूर ही रहने लगे। बात करनी भी बंद कर दी। मुझे आजतक ये बात समझ नहीं आई कि सरकारी विभागों को प्रेस के लिए अलग सा खर्चा मिलता है। लेकिन ना जाने क्यों डायेरक्टर साहब कंजूसी में क्यों लगे हुए थे। कुछ पत्रकारों का मानना था कि

यही सब मौके होते है सरकारी अफसरों को "ऊपरी कमाई" के। "कम खर्च करो और बिल लंबा-चौड़ा थमा दो विभाग के हाथ में।"

यही सब मौके होते है सरकारी अफसरों को "ऊपरी कमाई" के। "कम खर्च करो और बिल लंबा-चौड़ा थमा दो विभाग के हाथ में।"
खैर जैसे-तैसे हम एक छोटे से कस्बे में (झूंझनू ही था शायद) पहुंचे। हमारी कारें एक बड़े से मंदिर के पार्किंग में रोक दी गई। काफी पुराना मंदिर था, शायद मध्यकालीन युग का। काफी भीड़ थी दर्शन करने वालों की वहां। हां, इससे पहले की आगे की कहानी बताऊं, उस कस्बे के बाहर ही डायरेक्टर साहब को दो-तीन बाबू स्वागत करने लेने के लिए खड़े थे। डायरेक्टर साहब वहां से कब खिसक लिए हमे पता ही नहीं चला। अब 40-45 साल के वे बाबू हमे आगे ले जा रहे थे। वो मंदिर सती माता का था शायद, ठीक से याद नहीं आ रहा है मुझे। मंदिर पहुंचकर हमे लगा कि शायद रास्ते में मंदिर पड़ा है तो हमे दिखाने के इरादे से यहां लाया गया है। हम उतरकर चलने लगे। लेकिन तभी वे बाबू बोले," साहब, अपना सामान तो ले लिजिए।" अब हमसब एक दूसरे का मुंह तांकने लगे। समझ आ गया था कि इसी मंदिर में ये लोग हमे ठहराने की व्यवस्था कर चुके है।
मंदिर में ठहरने की बात सुनते ही साथी पत्रकार आग-बबूला हो गए। लेकिन मैने और एक-दो साथियों ने समझाया कि चलिए एक बार अंदर चलकर देखते है कि क्या व्यवस्था की है इन लोगो ने। नीचे एक भव्य मंदिर था और ऊपर बरामदे के चारों और कमरे बने हुए थें। उन्ही कमरों में हमारे रुकने का इंतजाम किया गया था। थोड़ी देर कमरे का मुआयना करने के बाद मै और मेरा साथी (अगर गलत नही हूं तो शायद उनका नाम रंजीत जामवाल था। इंग्लिश अखबार, STATESMAN के रिपोर्टर) बिस्तर पर पसर गए। थोड़ी ही देर में सहारा अखबार के फोटोग्राफर भी आ गए। वे भी हमारे पास आकर बैठ गए। यात्रा में हम काफी थक चुके थे और उससे भी ज्यादा अपने पत्रकार बंधुओं और डायरेक्टर साहब की किच-किच की वजह से। अभी बैठकर बात कर ही रहे थे कि बाहर से कुछ शोरगुल की आवाज आने लगी। कमरे के बाहर आकर देखा तो ‘दिग्गज पत्रकारों’ का समूह फिर झगड़े के मूड में था। हमे अपने कमरे दिखाने लगे। “देखो यार, कैसे गुजरी की रात यहां, बिस्तर कितने गंदे है...बाथरुम देखो...बाल्टी तक नहीं है....पंखा बाबाआदम के जमाने का है...रात में मच्छर उठाकर ले जाएंगे।” एक बोला, बुलाओ, “उस .... को। खुद तो आराम से सरकारी गेस्ट हाउस में मजे काट रहा होगा और हमे यहां छोड़ गया।” दूसरे ने कहा,

इसकी शिकायत, मुख्यमंत्री के पीआरओ से करनी पड़ेगी। इतना सुनते ही प्रेस विभाग के बाबूओं के कान खड़े हो गए।

इसकी शिकायत, मुख्यमंत्री के पीआरओ से करनी पड़ेगी। इतना सुनते ही प्रेस विभाग के बाबूओं के कान खड़े हो गए। उन्होने चुपके से डायरेक्टर साहब को फोन किया। थोड़ी ही देर में डायरेक्टर साहब वहां पहुंच चुके थे। लेकिन तबतक सभी पत्रकार (मै और रंजीत जामवाल भी) मंदिर के अहाते से बाहर आ चुके थे—पत्रकार एकता का सवाल जो था भई।
डरते-डरते डायरेक्टर साहब ने पूछा, “अरे क्या हुआ है बंधुओं, आप सब बाहर कैसे।” सबसे सीनियर पत्रकार बोले, “ ऐसी की तैसी ..... साहब, खुद तो आप यहां से चुपचाप निकल लिए और हमें यहां मंदिर में छोड़ दिया।” अब तो डायरेक्टर साहब मिमियाने लगे, “नहीं-नहीं आपको छोड़कर नहीं गया था, मै तो डीएम साहब से कल की रैली के बारे में मीटिंग करने चला गया था...मै तो बताकर गया था कि थोड़ी देर में आ रहा हूं।” आप बताईये क्या तकलीफ है आपको। “अरे .... साहब, हम टी.वी में काम करते है, बिना टी.वी के तो हम एक घंटा भी नहीं रुक सकते। मंदिर में टी.वी की कोई व्यवस्था नहीं है। हम तो पूरी दुनिया से कट गए है।” अच्छा ये परेशानी का सबब है आप लोगो का। धीरे से कोई साथी बुदबुदाया, “ मंदिर में शराब भी तो नहीं पी सकते है।” इतना सुनते ही सब ठहाके मारकर हंसने लगे। डायरेक्टर साहब समझ गए थे कि मंदिर में ना रुकने की असली वजह क्या थी।

रा्त के दस बजे ही डायरेक्टर साहब ने अपने बाबूओं को एक “अच्छे से होटल” को ढूंढने का आदेश दे दिया। कोई भीड़ में बोल पड़ा, डायरेक्टर साहब आप अगर थोड़ी देर और हो जाते तो हम सीएम साहब के पीआरओ साहब को सबकुछ बताने वाले थे। ये सुनते ही डायरेक्टर साहब बोल उठे, अरे छोड़िए बाकी बाते, मै अभी यहां का एक शानदार हेरिटज रिसोर्ट देखकर आया हूं। सब वही चलते है। वहां राजस्थान का लोक नाच-गाना भी होता है और जो कुछ आपको चाहिए वो सबकुछ भी मिल जाएगा। ये सुनते ही सबकी बांछे खिल गई। दरअसल पत्रकारों के लिए शहर से बाहर कवरेज पर जाना किसी हॉली-डे से कम नहीं होता। काम का काम और पिकनिक का पिकनिक। हो गया ना एक पंथ दो काज।
रिसोर्ट में सभी ने जमकर शराब पी और लोक नृत्य का लुत्फ उठाया। देर रात होटल पहुंचे तो किसी ने भी कमरे में जाकर टी.वी पर न्यूज देखनी की जहमत नहीँ उठाई। राजस्थान की हेरिटज शराब पीने के बाद क्या किसी को दीन-दुनिया याद रहती है।
खैर, किसी तरह रात काटी और सुबह होते ही चल दिए रैली को कवर करने। लाखों की तादाद में भीड़ जुटी थी उस गांव के मैदान में। सोनिया गांधी ने जमकर केन्द्र में सतारुढ बीजेपी सरकार को खरी-खोटी सुनाई। मै मंद-मंद मुस्करा रहा था, अब तो स्टोरी जरुर पेज वन लगेगी। मै उस वक्त कांग्रेस के माऊथपीस अखबार, नेशनल हेराल्ड में काम जो करता था—हाल ही में ये अखबार बंद हो गया है। अरे हां इससे पहले का एक और किस्सा सुनाना भूल गया। कई किलोमीटर दूर से ही गाड़ियों का काफिला रोक दिया गया था भीड़ के चलते। अब पत्रकारों के लिए इतनी दूर चलना “शान के खिलाफ था।” थोड़ी दी दूर गए थे कि कुछ साथी पत्रकार एसपीजी के अधिकारियों से टकरा गए—सोनिया गांधी की सुरक्षा एसपीजी के हवाले है। एक बुर्जग पत्रकार ने एसपीजी के कमांडो को हडकाया, “ हमे लोकल मत समझ लेना, दिल्ली से आए है हम। एक मिनट में अक्ल ठिकाने आ जाएगी।” देख रहे है आप इनको, दिल्ली में तो एकदम भिगी बिल्ली बने रहते है यहां आकर “चौ़डे” हो रहे है। “पीआईबी पत्रकार हूं मैं, शिकायत कर दी तो लेने के देने पड़ जाएंगे। फिर पीछे-पीछे फिरोगे....”
जैसे-तैसे रैली कवर करने के लिए मैदान में पहुंचे, तो टी.वी के कुछ पत्रकार फिर बिदक गए। “कहां है....(डायेरक्टर) साहब, यहां बुलाओ उन्हे।” जैसे ही डायरेक्टर साहब प्रेस गैलरी पहुंचे, टी.वी पत्रकार बोल उठे, सर ये बताईये कि इनती दूरी पर कैमरा लगेगा तो कैमरामैन सोनिया जी को कैसे शूट (वीडियो फिल्म) करेगा। आपने छुटभैया नेताओं को तो आगे बैठा दिया और हमे यहां पीछे बैठा दिया। आपको यही सब करना था तो हमें दिल्ली से इनती दूर क्यो बुलाया। ऐसा काम तो हमारे स्ट्रिंगर (स्थानीय संवाददाता) भी कर सकते थे।
अब बारी थी रिपोर्ट फाईल करने की। टीवीवालों ने अपनी टेप सोनिया गांधी के विशेष हैलीकॉप्टर में सवार अधिकारियों को सौंप दी। दिक्कत थी हम जैसे अखबार और न्यूज एजेंसी के पत्रकारों के लिए। झूंझनु से दिल्ली पहुंचने में शाम हो सकती थी, तबतक अखबार का प्रिंट तैयार हो चुका होता है। सो डायरेक्टर साहब से कहा गया कि किसी पीसीओ पर ले चले, जहां फोन और फैक्स दोनो की व्यवस्था हो। डायरेक्टर साहब ने किसी अधिकारी से बात की और हमे ले चले गांव से थोड़ी दूर। एक आढ़ती के गोदाम नुमा ऑफिस के बाहर ले जाकर हम रोक दिया गया।

डायरेक्टर साहब के साथ चल रहे अधिकारी को देखते ही लालाजी गोदाम से निकाल आए और गदगद होकर बोले, “अहो भाग्य हमारे की तहसीलदार साहब हमारे ऑफिस पधारे है।”

डायरेक्टर साहब के साथ चल रहे अधिकारी को देखते ही लालाजी गोदाम से निकाल आए और गदगद होकर बोले, “अहो भाग्य हमारे की तहसीलदार साहब हमारे ऑफिस पधारे है।” तब जाकर हमे पता चला कि वो अधिकारी स्थानीय तहसीलदार था। तहसीलदार ने लालाजी को बताया कि ये सभी दिल्ली से आये हुए पत्रकार हैं इन सबको अपनी रिपोर्ट दफ्तर भेजनी है। ये सुनते ही लालाजी बोल उठे, “हुक्म सरकार, हमारे लायक कोई सेवा?” लालाजी, अब गांव के आस-पास ना तो कोई फोन है और ना ही फैक्स, इन्हे जल्दी थी, सो हम इन्हे यहां ले आए। अरे साहब आपने कैसी बात कर दी। ये फोन, फैक्स और ऑफिस सब आपके रहमोकरम पर ही तो चल रहा है। उसने हमसे मुखातिब होते हुए कहा, “ये तो हमारा भाग्य है कि आपकी सेवा करने का मौका मिल रहा है और इस बहाने तहसीलदार साहब भी यहां पधारे। आप मेरे फोन और फैक्स को अपने ही समझे, जहां फोन-फैक्स करना है कर लीजिए।” हम सभी ने वहां से अपनी-अपनी रिपोर्ट फाईल की। मैने अपने ऑफिस में फोन कर सारी डिटेल लिखवा दी थी। दफ्तरवालों ने बताया कि ये तो आज की फ्रंन्ट हेडलाईन है। मैने कहा कि अगर कुछ समझ में ना आए तो “एजेंसी की खबर पढ़ लेना।”
वहां से निकलने के बाद हम एक बार फिर वापस दिल्ली की और रुख कर चुके थे। देर शाम ऑफिस पहुंचा तो सबने बधाई दी कि पहली बार मेरी कोई स्टोरी अखबार की मुख्य हेडलाईन ली गई थी।

Sunday, February 22, 2009

हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है


हिंदू रीतिरिवाज के मुताबिक महिलाएं अपने सुहाग के प्रतीक के रुप में सिंदूर लगाती है। लेकिन राजस्थान का एक इलाका ऐसा है जहां महिलाएं सिंदूर नहीं मिट्टी लगाती हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि कहने को तो ये मिट्टी पीली है लेकिन रंग इसका लाल है। ये इलाका है हल्दीघाटी का। झीलों के शहर, उदयपुर से महज 40-45 किलोमीटर की दूरी पर है हल्दीघाटी। चारों तरफ ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और बीच में एक सूनसान घाटी। इस घाटी का नाम यहां के रंग के कारण पड़ा था। पहले इस घाटी का रंग बिल्कुल पीला था—एक दम हल्दी के सामान। लेकिन पिछले 400 सालों से ये घाटी लाल है। इसी घाटी की मिट्टी से यहां की महिलाएं अपनी मांग भरती है। सन् 1576 में मुगल सम्राट अकबर और मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के बीच इसी जगह हल्दीघाटी का ऐतिहासिक (और घमासान) युद्ध हुआ था। इतिहासकारों के मुताबिक एक ही दिन में इस युद्ध में करीब 18 हजार सैनिक मारें गए थे। इस घाटी में इतना खून बहा था कि
हल्दीघाटी, पीली के बजाय लाल हो गई थी। यही वजह है कि हल्दीघाटी (बाहर से) देखने में तो पीली दिखाई पड़ती है लेकिन अगर मिट्टी को थोड़ा सा खुरेचा जाए तो वो लाल दिखाई पड़ती है।
मेवाड़ राज्य के अंतर्गत ही आती है इतिहास प्रसिद्ध ये रणस्थली, यानि हल्दीघाटी। मेवाड़ राज्य का क्षेत्रफल आज के उदयपुर, चित्तौड़गढ और भीलवाड़ा जिलों तक फैला था। इतिहास में वैसे तो मेवाड़ राज्य ने कई सूरमा राजा पैदा किए, लेकिन इन सबमें अग्रणी स्थान है महाराणा प्रताप का। महाराणा प्रताप ही पूरे राजपूताना (राजस्थान) के अकेले ऐसे राजा थे जिन्होनें मुगलों की गुलामी नहीं की थी। मुगलकाल में राजस्थान दर्जनों छोटे-बड़े राज्यों (मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, आमेर आदि) में विभाजित था। मुगल सम्राट अकबर पूरे वृहत भारत का राजा बनने का सपना देखता था। उसने राजपूत घरानों से शादी करके या फिर उन्हें हराकर पूरे राजस्थान को अपने कब्जे में कर लिया था। लेकिन मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप को ये कतई बर्दाश्त नहीं था। फिर क्या था अकबर ने राजपूत सेनापति मानसिंह (जयपुर घरानें) के नेतृत्व में एक विशाल सेना मेवाड़ की और कूच कर दी। उस वक्त मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ हुआ करती थी। लेकिन युद्ध के लिये जगह चूनी गई चित्तौड़गढ़ से डेढ सौ किलोमीटर दूर हल्दीघाटी।

मुगल सेना के सामने मेवाड़ की सेना कुछ नहीं थी, लेकिन अपनी छापेमार शैली (कमांडो स्टाइल) से महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिये।

मुगल सेना के सामने मेवाड़ की सेना कुछ नहीं थी, लेकिन अपनी छापेमार शैली (कमांडो स्टाइल) से महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिये। लेकिन अचानक महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा, चेतक घायल हो गया। घायल अवस्था में ही चेतक पांच किलोमीटर दूर तक महाराणा प्रताप को लेकर रणभूमि से भाग निकला। जिस जगह चेतक ने अपने प्राण त्यागे, उस जगह उसकी याद में महाराणा ने एक स्मारक बनाया था—जो आज भी मौजूद है। राजस्थान सरकार ने इस रणभूमि को पर्यटन स्थल घोषित कर रखा है। हर रोज बड़ी तादाद में लोग यहां बने म्यूजियम (महाराणा प्रताप म्यूजियम) को देखने आते हैं—हल्दीघाटी को कम लोग देखते हैं। इस म्यूजियम में हल्दीघाटी, महाराणा प्रताप की वीरता और वनवासी जीवन, चेतक की बहादुरी और छापेमार शैली (गौरिल्ला युद्ध) पर लाईट एंड साउंड शो दिखाया जाता है। इसके साथ-साथ म्यूजियम में मध्यकालीन अस्त्र-शस्त्र, अलग-अलग जातियों के वेश-भूषा और साहित्य को संजोकर रखा गया है। महाराणा प्रताप के वक्त तक मेवाड़ राज्य की राजधानी चित्तौड़गढ और कुंभलगढ़ थी। लेकिन सौगंध खाने के बाद महाराणा ने अपनी राजधानी को त्याग दिया। सौगंध थी कि जबतक वे मुगल सेना को मेवाड़ से खदेड़ नहीं देते तबतक ना तो बिस्तर पर सोएंगे और ना ही रोटी खाएंगे। मुगल सेना को आखिरकार वहां से अपना बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ा, लेकिन महाराणा प्रताप फिर कभी चित्तौड़गढ़ किले नहीं गए। उन्होंने अपनी नई राजधानी बनाई चावण्ड (उदयपुर से 50 किलोमीटर)। पूरा मेवाड़ इलाका, किलों और महलों से पटा पड़ा है और इन्हीं से जुड़ा है यहां का इतिहास। पहले बात करते है यहां के सबसे खूबसूरत शहर उदयपुर की। वैसे तो कई झील है इस शहर में लेकिन सबसे खूबसूरत झील है पीछोला झील। उदयपुर के राजमहल (यानि सिटी पैलेस) के ठीक पीछे या यूं कहें कि महल इसी झील के किनारे बना है। पीछोला झील के बीचों-बीच दो महल और है। एक है लेक पैलेस (ताज ग्रुप का फाइव स्टार होटल) और दूसरा है जग-निवास (मंदिर)। झील और महल तो पूरे भारतवर्ष में तो क्या दुनियाभर में हैं लेकिन उदयपुर के महल और झील को लाखों की तादाद में देशी-विदेशी पर्यटक देखने आतें है क्योकि ये एक अदभुत नजारा है। हर कोई यहीं सोचता है कि झील के बीचों-बीच महल कैसे खड़े कर दिये गये। मध्यकालीन राजस्थान के वास्तुशास्त्र का ये एक नायाब तोहफा है। उदयपुर शहर को मेवाड़ के राजा उदयसिंह ने बसाया था। कहते है कि एक बार राजा उदयसिंह शिकार खेलते हुए इस झील तक पहुंच गए। ये उस काल की बात है जब मुगल और दूसरे राजपूत राजाओं की आंख में चित्तौड़गढ और कुंभलगढ़ किलें आखों की किरकिरी बने हुए थे। लगातार हो रहें आक्रमणों से दोनो किले ध्वस्त हो गए थे। उन्ही दिनों राजा उदयसिंह एक नई राजधानी बसाने की योजना बना रहे थे। शिकार की तलाश में भटकते हुये जब राजा पीछोला झील तक पहुंच गये तो देखते है कि यहां एक ऋषि मुनि धुनी लगाए बैठे है। जैसे ही राजा ने मुनिवर को प्रणाम किया, ऋषिमुनि बोल उठे, “ राजा तुम अपने राज्य की राजधानी इसी झील के किनारे बसाओ। यहां कोई तुम्हारा बांल भी बांका नहीं कर पाएगा।” कहते ही उस भविष्यवाणी के बाद ही राजा उदयसिंह ने अपनी राजधानी चित्तौड़गढ़ को छोड़कर यहां बस गए। उनके द्वारा खड़ा किया गया सिटी पैलेस अदभुत है। इस पैलेस के एक हिस्से को अब संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। महल के एक हिस्से में राजा के वंशज रहते हैं और एक बड़े हिस्से को होटल में तब्दील कर दिया गया है। इसी महल के एक हिस्से में महाराणा प्रताप का “ऐतिहासिक भाला रखा है”—कितनी सच्चाई है इस बात में कहा नहीं जा सकता।

प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने उदयपुर के महलों की सुंदरता और भव्यता को देखते हुए इन्हें “राजस्थान के विंडसर पैलेस” की संज्ञा दी है।

प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने उदयपुर के महलों की सुंदरता और भव्यता को देखते हुए इन्हें “राजस्थान के विंडसर पैलेस” की संज्ञा दी है। लेकिन उदयपुर से भी बढ़कर एक जगह और है। वो है चित्तौड़गढ़ का किला। उदयपुर से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर है “ शक्ति और भक्ति का नगर, जहां कि मिट्टी का एक-एक कण रणबांकुरों के लहू से रंगा हुआ है। कोने-कोने से सुनाई पड़ती है देश-प्रेम, स्वाभिमान, आन-बान-शान तथा मान-मर्यादा की रक्षा हेतु मिटने वाले वीर सपूतों की कहानियां। हजारों क्षत्रियों, लाखों सैनिकों और अनगिनत योद्धाओं ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये जहां जीवन का बलिदान किया। सैकड़ो हजारों राजपूत महिलाओं ने अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राणों की आहूति दी। रानी पदमिनी के जौहर, राणा सांगा के पराक्रम, हमीरहठ व गोरा-बादल के बलिदान की गाथा सुनाने वाली ऐसी वीर प्रसूता भूमि, चित्तौड़गढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग अपने नैसर्गिक सौन्दर्य एवं स्थापत्य शिल्प के कारण सदियों से जग विख्यात है।” पांच किलोमीटर से भी ज्यादा लंबे इस किले में खंण्डर हो चुके कुम्भा महल के करीब ही है मीरा मंदिर। जी हां वही मीरा, जिसने भगवान कृष्ण की भक्ति में जहर पीया तो वो भी अमृत बन गया। मेवाड़ राजघरानें की ही बहू थी मीरा और इसी किले में था उनका महल। विवाह के कुछ समय पश्चात ही मीरा के पति का निधन हो गया था। विधवा होने के बाद होने वैराग्य जीवन को अपना लिया था, जो राजपरिवार को नागवार गुजरा था। चित्तौड़गढ किले में ही दो स्तम्भ है। पहला है 122 फीट ऊंचा (नौ मंजिला) विजय स्तम्भ, जिसे राणा कुंभा ने कई राजाओं पर फतह प्राप्त करने के बाद बनवाया था। इस मीनार पर हिंदू धर्म के भगवान और सैकड़ो देवी-देवाताओं की मूर्तियां बन हुई हैं। दूसरा है कीर्ति स्तम्भ। इस स्तम्भ को मेवाड़ राज्य के एक राजा के जैन दीवान ने बनावाया था। इस मीनार को जैन दीवान साहब ने जैन धर्म के सभी तीर्थ-स्थलों की यात्रा पूरी करने के बाद खड़ा करवाया था। सत्तर फीट ऊंच लंबे इस स्तम्भ पर जैन सम्प्रदाय के भगवान दर्शायें गए हैं। यानि एक ही किले के अंदर दो धर्मो (हिंदु और जैन) का मिलन। चित्तौड़गढ़ किले और मेवाड़ राज्य का इतिहास बिना रानी पदमिनी के अधूरा है। इसी किले के अंदर है झील के किनारें बना पदमिनी महल। कहते है कि मेवाड़ राज्य की रानी पद्मिनी बेहद खूबसूरत थी। उसकी सुंदरता के चर्चे दिल्ली तक थे। फिर क्या था दिल्ली की गद्दी पर काबिज सम्राट अलाउद्दीन खिलजी का दिल उस पर आ गया। रानी को पाने के लिये अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। कई महीनें तक युद्ध चलता रहा। आखिरकार दोनों पक्षों में संधि हुई। अलाउद्दीन इस शर्त पर अपनी सेना को वापस ले जाने के लिये तैयार हुआ कि वो एक बार पद्मिनी को देखना चाहता है। राजा रतन सिंह के सामने एक तरफ मेवाड़ की जनता थी, जो कई महीनें के युद्ध के बाद थक चुकी थी। किले के अंदर का रसद-पानी खत्म होने की कगार पर था। तो दूसरी तरफ था रानी को एक गैर-धर्म के राजा के सामने खड़ा करना—जो कि राजपूती शान के खिलाफ था। ऐसे में राजा ने एक तरीका सोच निकाला। महल में एक शीशा लगा दिया गया।

उस शीशे में अलाऊद्दीन को झील के बीचो-बीच खड़ी रानी पदमिनी का अक्स (प्रतिबिम्ब) दिखाया गया।

उस शीशे में अलाऊद्दीन को झील के बीचो-बीच खड़ी रानी पदमिनी का अक्स (प्रतिबिम्ब) दिखाया गया। ऐसे में राजा ने एक तीर से दो शिकार कर डाले। लेकिन राजपूताना के राजपूत राजा, दिल्ली के राजाओं की धूर्तता को ठीक से कभी नहीं पहचान पाते थे। इसका कारण शायद ये था कि राजपूत राजाओं ने युद्धभूमि में कभी—चाहे हार का सामना ही करना पड़ा—धूर्ताता का परिचय नहीं दिया था। पद्मिनी के अक्स को देखने के बाद अलाऊद्दीन ने चालाकी से उनके पति राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया। लेकिन मेवाड़ के ही एक 12 साल के वीर बालक, बादल ने अलाऊद्दीन की छावनी पर हमला बोलकर रतन सिंह को आजाद करा लिया। ऐसी ही ढेरों रणबांकुरों की कहानियों से भरी हुई है मेवाड़ की धरती। इसी किले में ऐसी भी जगह हैं जहां सैकड़ो की तादाद में राजपूत क्षत्राणियों ने जौहर किया था। जब भी उन्हे लगा कि किले पर बाहरी राजा कब्जा कर लेगा, उससे पहले ही वे अग्नि में कूदकर अपनी जान दे देती थी। मेवाड़ के इन ऐतिहासिक स्थलों को हाल ही में मैने अपनी पत्नी के साथ करीब से देखा है। जिस मेवाड़ राज्य के साहस और वीरता की कहानियां सिर्फ पढ़ी और सुनी थी उसे देखकर मन गौरवान्वित महसूस कर रहा है।

Sunday, February 15, 2009

राजपूतों की उत्पत्ति

एक चर्चित रियलिटी शो, M.TV ROADIES में इनदिनों प्रतियोगियों को राजस्थान के प्रसिद्ध हिल स्टेशन, माउंट आबू के दर्शन कराए जा रहें हैं। या यूं कहें कि उनकी प्रतियोगिता अब वही चल रही है। अगर आपने शो देखा होगा तो आसानी समझ आ ही गया होगा कि माउंट आबू पर्यटकों को इतना लोकप्रिय क्यों है। अरावली पहाड़ियों के बीच बनी नक्खी झील, ऐतिहासिक (और अद्वितीय) दिलवाड़ा जैन मंदिर, ब्रह्मकुमारी आश्रम का हेडक्वार्टर, सन-सेट प्वाइंट (सूर्यास्त दर्शन स्थल), गुरु शिखर (राजस्थान और अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची पहाड़ी) और हनीमून प्वाइंट पर्यटकों को अपनी और अनायास ही खींच लेती है। राजस्थान-गुजरात बार्डर पर बना ये छोटा सा हिल स्टेशन इतना खूबसूरत हो सकता है ये मुझे वहां जाकर ही पता चला। कुछ दिन पहले ही मैं भी अपनी पत्नी के साथ छुट्टी मनाने माउंट आबू गया था। जितने भी पर्यटक स्थल मैने अभी बतायें हैं वो सभी मुझे वहां जाने से पहले भी पता थे। जिस हेरिटज होटल (केसर भवन पैलेस) में हम ठहरे थे वहां के जनरल-मैनेजर से मेरी जान-पहचान हो गई थी। उन्हें जैसे ही पता चला कि मैं राजपूत हूं, वे बोल उठे, “अगर आप राजपूत है तो गऊ-मुख जरुर घूम कर आईए।” मैने पूछा, वो क्या है ? जबाब देने से पहले जीएम साहब ने एक सवाल और दाग दिया कि मैं कौन सा राजपूत हूं। मैने बताया कि मै चौहान राजपूत हूं। उन्होंने बताया, “चौहान राजपूतों की उत्पत्ति गऊ(या 'गौ') मुख आश्रम में ही तो हुई थी।” जीएम साहब ने बताया कि गौ-मुख में ही महर्षि वशिष्ठ का प्राचीन आश्रम है जहां उन्होने अग्निकुल यज्ञ किया था और राजपूतों की उत्पत्ति हुई थी। उनके इतना कहते ही मेरे अंदर बसा इतिहास का छात्र जाग उठा। याद आया कि

चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब Annals and antiquities of Rajasthan में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी।

चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब Annals and Antiquities of Rajasthan में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी। 12वीं सदी में लिखी गई चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो में भी इस यज्ञ का वर्णन है। इतिहास की पढ़ाई के वक्त सब रटा था, लेकिन अब ध्यान नहीं रहा था कि अग्निकुल यज्ञ इसी जगह हुआ था। मैने उन्हें बताया कि हम वहां जरुर जायेंगे। लेकिन उन्होंने पहले ही आगाह कर दिया कि वहां ध्यान से जायेंगा, “खतरनाक जगह है।”
जिस टैक्सी ड्राइवर ने हमे पूरा माउंट आबू घूमाया था, जब मैने उससे गऊमुख(गौमुख)चलने के लिये कहा तो वो चौंक गया। बहानें बनानें लगा, “सर वहां मत जाइए... जगंली रास्ता है... कोई नहीं जाता वहां... सैकड़ों सीढ़ियां चढनी-उतरनी पड़ेंगी।” कहने लगा, वहां आदिवासी भी रहतें है, अकेला देखकर लूट लेते हैं। मैंने पूछा आदिवासी ? जी सर, वे राजाओं की अवैध संतान होती थी, जन्म के बाद उन्हे यहां छोड़ दिया जाता था। उनकी आंखे सुनहरी होती है। लेकिन हम ठान चुके थे, वही जायेंगे। आखिरकार ड्राइवर को मानना पड़ा, लेकिन बोला कि सर मैं आपको बाहर ही छोड़ दूंगा, आपके साथ आश्रम नहीं जाऊंगा। माउंट आबू शहर से तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर है वशिष्ठ आश्रम। लोग इसे गौमुख के नाम से जानते है। सामने ही बोर्ड लगा था, उसपर पूरे आश्रम का इतिहास और राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन था। जिस जगह टैक्सी ने हमें छोड़ा था वहां से हमें खाई में 750 सीढ़ियां उतरनी थी (लौटने पर इतनी ही चढ़नी थी)। कुछ कदम ही चले थे कि एक परिवार आता दिखाई दिया। हमें देखकर वो सभी मुस्करायें और कहा “हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं।” मैंने पूछा कि क्या वे सभी बीच रास्ते से ही लौट आये हैं, तो उन्होंने कहा कि इतने खतरनाक जंगली रास्ते पर अकेले जाना ठीक नहीं है। मेरी पत्नी को अब कुछ शंका होने लगी, बोली कि वहां जाना सुरक्षित है ? मैने कहा, डरो नहीं चलो। वाकई हम दोंनों के और एक नये नवेले पति-पत्नी के जोड़े के सिवा हमें रास्ते में कोई नहीं मिला। रास्ता बेहद खतरनाक था। लिखा हुआ था, "जंगली जानवरों से सावधान।" लेकिन जब हम वहां पहुंचे तो वहां का नजारा देखते ही बनाता था। बेहद शांत और रमणीक दृश्य था वहां का। आश्रम के बाहर ही एक पवित्र कुंड है। एक गाय के मुख से उस कुंड में लगातार जल गिर रहा था। उस कुंड के पास ही एक स्थानीय शख्स बैठा था। उसने बताया था कि ये पवित्र सरस्वती की धारा है और बारह महीनें जल की धारा ऐसी ही चलती रहती है। ये धारा कभी बंद नहीं हुई है। “बड़े-बड़े इंजीनियर भी आजतक इस जल का स्त्रोत्र पता नहीं कर पाए।

आश्रम के अंदर भगवान राम का मंदिर है। रामायण में बताया गया है कि इक्ष्वाकु वंश (जिसके राम वंशज थे) के गुरु महर्षि वशिष्ठ ही थे। वशिष्ठ ऋषि के पास ही नंदिनी गाय थी जिसे छीनने के लिये राजा विश्वामित्र (बाद में महर्षि) ने उनसे युद्ध किया था। महाभारत में भी जिक्र है कि नारद मुनि ने धर्मराज युधिष्ठर को अरबुदाचल पर्वत की तीर्थ-यात्रा करने का निर्देश दिया था । पुराण और शास्त्रों के मुताबिक अरबुदाचल पर्वत हिमालय का पुत्र था और महर्षि वशिष्ठ के आग्रह पर हिमालय ने अपने पुत्र को यहां भेज दिया था। शायद यही वजह है कि रेगिस्तान में भी पर्वत श्रृंखला खड़ी हो गई। बाद में इसी अरबुदाचल पर्वत को लोग आबू के नाम से जानने लगे। मध्यकालीन युग में ये जगह अगर राजाओं के लिये पवित्र तीर्थ-स्थल था तो ब्रिटिश काल में ये जगह राजस्थान के छोटे-बड़े राजाओं और अंग्रेज अफसरों के लिये गर्मियां बिताने की खास जगह। माउंट आबू में राजस्थान के हर राज-घरानें का महल है जिन्हे अब हेरिटज होटलों में तब्दील कर दिया गया है। जिस केसर भवन पैलेस में हम ठहरें थे, वो कभी सिरोही राजाओं का महल था। माउंट आबू, राजस्थान के सिरोही जिले का ही हिस्सा है। भगवान राम के मंदिर के बाहर ही है पवित्र अग्निकुंड। मंदिर और आश्रम के एक केयर-टेकर ने बताया कि इसी यज्ञकुंड से ही चार राजपूत जातियों की उत्पत्ति हुई थी। जब भारतवर्ष में चारों तरफ मार-काट मची थी, अशांति फैली हुई थी, कानून का कोई राज नहीं था, कोई चक्रवर्ती राजा नहीं बचा था, तब महर्षि वशिष्ठ नें महायज्ञ किया था। अग्नि की स्तुति करके सबसे पहले देवराज इंद्र की पूजा की। यज्ञ करते समय अग्नि में से तलवार लियें एक पराक्रमी निकला। वो परमार वंश का संस्थापक बना। उसके बाद भगवान विष्णु का आह्ववाहन किया गया तो उसमें से चौहान वंश का संस्थापक निकला। इसी तरह से भगवान शिव से सोलंकी और ब्रह्मा से प्रतिहारों की उत्पत्ति हुई।

इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी।

इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। आधुनिक इतिहासकार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल यज्ञ के बाद से तो मानते हैं लेकिन इस बात पर यकीन नहीं करते कि चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार अग्नि से उत्पन्न हुए हैं। इतिहासकार इस यज्ञ को एक तरह के शुद्धिकरण की तौर पर देखते है। पहली बात तो अगर हजारों साल पहले भगवान राम के समय में भी वशिष्ठ मुनि थे, तो वे क्या सैकड़ो साल तक वे जिंदा रहें इस यज्ञ को करने के लिये। इसका जबाब शायद ये है कि ऋषि मुनियों में गुरु-शिष्य पंरपरा चलती थी। एक ऋषि की मौत के बाद उसका एक शिष्य गुरु की गद्दी पर आसीन होता था और उसे भी अपनी गुरु की भांति वही नाम मिल जाता था। इतिहासकार, महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ को मध्ययुग के नवी-दसवी काल में देखते है। ये वो समय था जब भारत में अरबों ने आक्रमण करना शुरु कर दिया था। गुप्तवंश के राजाओं और हर्षवर्धन के बाद पूरे देश में कोई पराक्रमी राजा ना बचा था। ये वही वक्त था जब महमूद गजनी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत को लूटता हुआ पश्चिमी मुहाने पर बने प्राचीन सोमनाथ मंदिर तक पहुंच गया था। उसने वहां लूटपाट और तबाही का वो मंजर खेला था कि आज भी लोग सुनकर सिहर उठते हैं। हिंदु समाज में लोगो की रक्षा करने वाले क्षत्रियों का पतन तेजी से हो रहा था। पहले वैश्य राजा (गुप्त वंश) और फिर हुण और शक राजाओं (उन्हें नीची जाति का माना जाता था) के हाथों सत्ता चले जाने से ब्राहमण और क्षत्रिय समाज परेशान था। शायद इसका ही नतीजा था अग्निकुल यज्ञ। इस यज्ञ के बाद पूरे उत्तर भारत में चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार वंश का ही राज हो गया। प्राचीन आश्रम के द्वार पर ही मध्यकालीन युग के कुछ शिलालेख रखें हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि राजाओं ने दान स्वरुप कई गांव इसी आश्रम को दियें थें। जो मंदिर आज के स्वरुप में खड़ा है वो भी सन् 1394 में बनाया गया था। करीब दो घंटे आश्रम में बितानें के बाद जैसे ही हम बाहर निकले हमने देखा कि चार-पांच संदिग्ध लोग वहां टहल रहें थे। मैने गौर से देखा तो एक शख्स की आंख सुनहरी थी-होटल के जीएम और ड्राइवर की बात याद आ गई। मेरी पत्नी ने मुझे अलर्ट रहने का इशारा किया। वो समझ गई थी कि कुछ गड़बड़ है, उसे शायद खतरे का एहसास हो गया था (क्राइम रिपोर्टर जो है)। मुझे भी खतरें का अंदेशा तो था लेकिन मैं इसलिये चुप था कि कही मेरी पत्नी डर ना जायें। लेकिन इससे पहले कि वो चार-पांच लोग कुछ कर पाते या कुछ प्लानिंग कर पाते, मैं उनके पास पहुंच गया। पूछा, “ यही के रहने वाले हो क्या ?” ये सुनते ही वे सभी सकपका गये। कहने लगें, नहीं साहब हम गुजरात से आये है। मैने रोबदार आवाज में पूछा, “ गुजरात में कहां?” इतना कहते ही वे सभी बगलें झाकनें लगे। लेकिन हमारा काम हो गया था। मै समझ गया कि आश्रम से लौटते हुए सुनसान जंगली रास्ते पर वे अब हमें नहीं टकरायेंगे। अब मेरी समझ में आ गया था कि माउंट आबू के दर्शनीय स्थलों में गौमुख और वशिष्ठ आश्रम का नाम क्यों नहीं है। खैर, हम 750 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच चुके थे। वहां ड्राइवर खड़ा इंतजार कर रहा था। उसने पूछा, सर कोई दिक्कत तो नहीं हुई ? मैने कहा नहीं। शायद जो थोड़ी बहुत दिक्कत या परेशानी हमने झेली थी वो गौमुख के दर्शन मात्र के सामने बहुत छोटी जो थी।

Saturday, February 14, 2009

ब्रह्माण्ड का क्रूरतम मानव

अदालत ने जैसे ही अपना फैसला सुनाया, वो नरपिशाच बोल उठा, “मुझे ऑर्डर की कॉपी चाहिये।” किसी को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि मौत की सजा के ऐलान के बाद भी उसके तेवर ढीले नहीं पड़ेंगे। लेकिन अदालत में मौजूद सभी लोगों को समझ आ गया था कि अदालत ने उसे ब्रह्माण्ड का सबसे खतरनाक व्यक्ति ऐसे ही नहीं मान लिया है। कुछ घंटे पहले चली जिरह में सीबीआई के वकील ने उसे तीन ऐसी गुणों से ग्रस्त बताया था जो साइंस में आजतक देखने को नहीं मिला है। वो पैराफिलिया यानि साईको सैक्सयुल डिसऑर्डर, नैकरोफिलिया यानि शवों से शारारिक संबध की प्रवृत्ति और पीडोफीलिया (बच्चों से दुराचार) से ग्रस्त है। इस प्रकार का मामला पूरे यूनिवर्स में पहली बार देखनें को मिला है। कोई आदमी किसी एक से ग्रस्त होता है तो कोई किसी एक से। लेकिन सुरेन्द्र कोली तीनों से पीड़ित है।
निठारी कांड के दोनों दोषियों, नोएडा की डी-5 कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर और उसके नौकर सुरेन्द्र कोली, को गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने सुना दी है मौत की सजा।
फैसला सुनाते समय अदालत ने निठारी कांड को कुछ यूं बयां किया...
“...एक ओर तो मानवता, विधि की सुरक्षा कि पुकार कर रही है और दूसरी ओर एक निर्धन बालिका (निठारी की रहने वाली 14 साल की रिंपा हलधर जिसकी डी-5 कोठी में हत्या कर दी गई थी) के परिजन न्याय सम्मत न्यायालय से हवशी, गिद्धों से सुरक्षा के लिये चिल्ला रहे हैं और अपील कर रहें हैं कि उन्हें इस प्रकार के भूखे, वहशी, दरिंदो की भूख से बचाया जाए तथा यातनाओं एंव अमानवीयताओं से बचाये जाए, जो अबोध बालिकाओं को अपनी हवस का शिकार करने के लिये प्रयोग करते थे। रिंपा हलधर एक अबोध बालिका अभियुक्तगढ (पंढेर और कोली) के हाथों का शिकार बन गई है। दुखद, कारुणिक, रोंगटे खड़े करने वाली, दिल को तोड़नें वाली तथा धड़कनों को रोकने वाली तथा चेतना को भंग करने वाली तथा समाज की दुर्दशा करने वाले असुरक्षित, असहाय और निर्दोष, निर्धन, 14 वर्ष की अल्प आयु की अबोध बालिका की कहानी है। जिसको कम आयु में अभियुक्तगढ द्वारा उसे अपनी हवस का शिकार बनाया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई और यह सिलसिला यही नहीं थमा बल्कि उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर पॉलीथीन की पन्नियों में बंद कर फेंका गया और शरीर के कुछ हिस्से के मांस को पकाकर खाया भी गया। यह अपराध समाज के विरुद्व, स्त्रीत्व के विरुद्व, गरीबों के विरुद्व और संविधान के कल्पित सभी पीढ़ियों के विरुद्व अपराध है। यह सामाजिक न्याय शास्त्र की धारणा के साथ दिन-दहाड़े बलात्संग है।

यह घटना समाज पर एक कलंक है और हमारी वर्तमान पीढ़ी पर दाग है, अमानवीय और बर्बर, विकृत, राक्षसी, वीभत्स और निर्दय ढंग से किया गया है, जिससे कि समाज में तीव्र एंव घोर आक्रोश उत्पन हो गया है। अत: मामला विरल से विरल मामलों (RAREST OF THE RARE ) की कोटि में आता है

यह घटना समाज पर एक कलंक है और हमारी वर्तमान पीढी पर दाग है, अमानवीय और बर्बर, विकृत, राक्षसी, वीभत्स और निर्दय ढंग से किया गया है, जिससे कि समाज में तीव्र एंव घोर आक्रोश उत्पन हो गया है। अत: मामला विरल से विरल मामलों (RAREST OF THE RARE ) की कोटि में आता है, जिससे अभियुक्तगढ के साथ उदारता का व्यवहार करना समाज एंव विधि के न्याय संगत सिद्वान्तों से खिलवाड़ करना होगा। जिस प्रकार अभियुक्तगढ द्वारा अपराध किया गया है उन्हे गुरुतर शास्ति ही दी जानी चाहिये क्योकि भविष्य में उनके आचरण में सुधार की कोई गुजांईश प्रतीत नहीं होती...।” इसलिये अदालत दोनो को मृत्यु दंड की घोषणा करती है।
कोर्ट का ऑर्डर पढकर साफ समझ में आ जाता है कि सुरेन्द्र कोली क्यों दुनिया का सबसे क्रूर व्यक्ति है।
निठारी कांड अब से करीब दो साल पहले, दिसम्बर 2006,में दुनिया के सामने आया था।
राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर के बीचो-बीच बसा एक छोटा से गांव है निठारी। स्थानीय लोगों के साथ-साथ बड़ी तादाद में यहां मजदूर, रिक्शाचालक और निम्न आयवर्ग के लोग इस गांव में रहते है। बाहरी लोगों में अधिकतर बंगाल के रहने वाले हैं। वर्ष 2005 से ही यहां एक के बाद एक कई बच्चे गायब होने लगे। निठारी गांव को नोएडा के सेक्टर 31 से जोड़ने वाली सड़क से ही बच्चे रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो जाते। मां-बाप परेशान थे कि बच्चे आखिर कहां चले जाते है। अधिकतर बच्चे गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे, सो पुलिस भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। लाचार मां-बाप को सुना पड़ता कि उनके बच्चे कही भाग गये होंगे, चोर गिरोह के हाथ पड़े गये होंगे, या भीख मांगने वाला गिरोह उठाकर ले गया होगा... जो बच्चियां थोड़ी बड़ी होती (जैसे रिंपा हलधर, पायल वगैरहा) उनके बारे में पुलिस दलील देती कि वो अपने आशिक के साथ कहीं भाग गई होंगी।

मामलें ने तूल पकड़ा तो मीडिया में लगातार खबरें आने लगी। स्थानीय अखबारों और न्यूज चैनलों ने निठारी प्रकरण को जोर-शोर से उछाला तो तब जाकर यूपी पुलिस कुंभकर्णी नींद से जागी। मानवाअधिकार आयोग और महिला आयोग ने कान खीचें तो बच्चों के गायब होने की तफ्तीश तेज हुई, लेकिन तब तक अकेले निठारी से ही डेढ़ दर्जन बच्चे काल के गाल में समा चुके थे।
नोएडा पुलिस को तफ्तीश का कोई सिरा हाथ नहीं आ रहा था कि अचानक एक दिन पुलिस को पता चला कि 16 साल की पायल नाम की लड़की जो गायब हुई है वो मोबाइल फोन प्रयोग करती थी। फिर क्या था पुलिस ने उस मोबाइल की आईएमईआई नंबर से उसकी लोकेशन पता कि तो मालूम पड़ा कि वो डी-5 कोठी में चालू था। डी-5 निठारी को नोएडा के सेक्टर 31 से जोड़ने वाली सड़क पर ही स्थित एक आलीशान कोठी थी (अब ये कोठी वीरान पड़ी है। चौबीसो घंटे पुलिस का पहरा रहता है कोठी पर)। कोठी का मालिक था नोएडा का एक बड़ा बिजनेसमैन, मोनिंदर सिंह पंधेर। पंधेर की पत्नी चंडीगढ, और बेटा कनाडा में रहता था। कोठी की देखभाल करता था उसका नौकर सुरेन्द्र कोली। फोन की लोकेशन मिलते ही पुलिस पहुंच गई डी-5 कोठी। वैसे पुलिस पहले भी कई बार उस कोठी में पूछताछ करने पहुंची थी लेकिन हरबार खाली हाथ लौट आती थी। लेकिन लगातार पड़ रहे दबाब के चलते इस बार पुलिस ने सुरेन्द्र कोली को अपने साथ लिया और सख्ती से पूछताछ की तो उसने पायल की हत्या की बात कबूल कर ली। सुरेन्द्र ने बताया कि पायल, मोनिंदर सिंह पंधेर से मिलने कोठी आती थी। एक दिन उसने पायल के साथ जोर-जबर्दस्ती की और नाकाम होने पर उसकी गला घोटकर हत्या कर दी। हत्या करने के बाद उसकी लाश के टुकड़े कोठी के ठीक पीछे बनी एक गैलरी
में फेंक दिये हैं। पुलिस कोठी के पीछे बनी गैलरी में पहुंची तो पाया कि वहां पायल ही नहीं दर्जनो बच्चो और लड़कियों की मानव अंग और कपड़े दबे हुये है।
लेकिन यहां बात गौरतलब है कि

निठारी के पीड़ितो को जैसे ही गैलरी के रहस्य के बारे में पता चला उन्होंने सबसे पहले मीडिया को खबर की और कैमरे की मौजदूगी में मानव अंगो की बरामदगी हुई। निठारी पीड़ितो की माने तो अगर 29 दिसम्बर 2006 को वहां मीडिया नहीं पहुंची होती तो डी-5 कोठी के राज से पर्दा कभी नहीं उठा पाता।

निठारी के पीड़ितो को जैसे ही गैलरी के रहस्य के बारे में पता चला उन्होने सबसे पहले मीडिया को खबर की और कैमरे की मौजदूगी में मानव अंगो की बरामदगी हुई। निठारी पीड़ितो की माने तो अगर 29 दिसम्बर 2006 को वहां मीडिया नहीं पहुंची होती तो डी-5 कोठी के राज से पर्दा कभी नहीं उठा पाता। पुलिस पायल के हत्या का मामला दर्ज कर केस फाईल वही बंद कर देती। लेकिन मीडिया की मौजदूगी की वजह से पुलिस को अपनी जांच का दायरा बढाना पड़ा और निठारी कांड का खुलासा हुआ।
नोएडा पुलिस ने सुरेन्द्र कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर को तो गिरफ्तार कर लिया था लेकिन ये बताने में नाकाम थी कि आखिर ये दोनों हत्या किस कारण से करते थे। पुलिस मानव-अंगो की तस्करी से जोड़कर इस मामले की तफ्तीश कर रही थी। आखिरकार लोगों के आक्रोश के चलते मामले की जांच का जिम्मा देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानि सीबीआई को सौंपा गया। पांच महीने तक सीबीआई जांच करती रही और आखिरकार इस नतीजें पर पहुंची कि सुरेन्द्र कोली ही बच्चों, लड़कियों और महिलाओ को डी-5 कोठी के गेट के बाहर खड़ा होकर अंदर बुलाता था और उनसे जोर-जबर्दस्ती करता था। नाकाम होने पर उनकी बड़ी ही बेरहमी से हत्या कर देता था। लाश के टुकड़े कर उन्हें पकाता और फिर खा लेता। बाकी बची लाश के टुकड़े कर पन्नी में भरकर नालों और कोठी के पीछे बनी गैलरी में फेंक देता।
मैजिस्ट्रेट के सामने कैमरे पर दिये अपने बयान में सुरेन्द्र कोली ने बताया कि, “

जब मैडम (यानि मोनिंदर सिंह की पत्नी) घर पर नहीं होती थी तो पंधेर रोजाना कॉल-गर्ल लाता था...जितनी भी लड़की वहां आती थी मै उनके लिये खाना बनाता था, खिलाता था। उनको देख-देखकर मेरा मन भी बहक जाता था। मन करता था कि किसी को मारुं, काटूं खाओ...

जब मैडम (यानि मोनिंदर सिंह की पत्नी) घर पर नहीं होती थी तो पंधेर रोजाना कॉल-गर्ल लाता था...जितनी भी लड़की वहां आती थी मैं उनके लिये खाना बनाता था, खिलाता था। उनको देख-देखकर मेरा मन भी बहक जाता था। मन करता था कि किसी को मारुं, काटूं खाओ...”
सीबीआई के मुताबिक निठारी कांड को अंजाम अकेले कोली ने ही दिया था। मोनिंदर का दोष सिर्फ इतना था कि वो कोठी में कॉल-गर्ल लाता था। यही वजह थी कि सीबीआई ने कोली पर तो अपहरण, बलात्कार, हत्य़ा और सबूत मिटाने का चार्ज लगाया, लेकिन पंधेर पर वैश्यावृति में लिप्त होने का मामूली से आरोप लगया। इस बात से निठारी पीड़ितो के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा। उन्होने सीबीआई पर गंभीर आरोप लगा डाले। अदालत में उन्होंने अपना वकील खड़ा कर दिया। निठारी पीड़ितों के वकील, खालिद खान ने अदालत में दलील दी कि सुरेन्द्र कोली और मोनिंदर सिंह पंधेर दोनो ही बराबर के कसूरवार है, लिहाजा दोनों पर हत्या और बलात्कार का मुकदमा चलना चाहिये। कोर्ट ने खालिद खान की दलीलों को मंजूरी दे दी।
करीब दो साल बाद अदालत ने मोनिंदर और कोली को बराबर का दोषी ठहराया और सुना दिया मौत का ऐलान।
ये शायद पहला ऐसा मामला होगा कि जब अदालत ने सीबीआई की जांच को दरकिनार करते हुए अपनी जांच के आधार पर मोनिंदर को दोषी करार दिया है। जांच में सीबीआई ने लाख दलील दी थी कि मोनिंदर का कोई कसूर नहीं है। जिस वक्त रिंपा हलधर और बाकी बच्चो और लड़कियों हत्या की हई थी उस वक्त वो नोएडा तो क्या देश में ही नहीं था। उसके पासपोर्ट तक को अदालत के पटल पर रखा गया। लेकिन

अपने फैसले मे अदालत ने सीबीआई की फटकार लगाते हुये कहा कि जांच एजेंसी को ये साबित करने की जरुरत नहीं है कि पंधेर नोएडा में नहीं था। ये काम आरोपी का है कि वो खुद साबित करे कि वारदात के वक्त वो मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था।

अपने फैसले मे अदालत ने सीबीआई की फटकार लगाते हुये कहा कि जांच एजेंसी को ये साबित करने की जरुरत नहीं है कि पंधेर नोएडा में नहीं था। ये काम आरोपी का है कि वो खुद साबित करे कि वारदात के वक्त वो मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था। लेकिन पंधेर की पत्नी के सिवा ऐसा कोई स्वतंत्र गवाह नहीं मिला जो ये कह सके कि रिंपा हलधर की हत्या के वक्त पंधेर आस्ट्रेलिया में था। अदालत ने ये भी माना कि ऐसा कैसे संभव है कि कोठी में रहते हुये एक के बाद एक 19 लोगों की हत्या कर दी गई और मालिक को पता ही ना चले। साथ ही साथ लाशों की दुर्गंध भी क्या पंधेर को नहीं आती थी। खुद अदालत ने माना है कि एकाध केस में तो ऐसा भी देखने को आया है कि पंधेर की मौजूदगी में ही कोली ने किसी मासूम की हत्या कोठी में की है। साथ ही साथ पंधेर इस बात से पूरी तरफ वाकिफ था कि पायल का मोबाइल फोन कोली प्रयोग कर रहा है। क्या पंधेर ने कोली से कभी नहीं पूछा कि उसपर पायल का फोन कहां से आया है। ये सारे सबूत पंधेर के खिलाफ साबित हुये और उसे भी अपने नौकर की तरह मौत की सजा का ऐलान झेलना पड़ा।
सजा सुनाये जाने के बाद पंधेर ने अपने बेटे से ये भी कहा कि वो हाईकोर्ट में अपील ना करे, “ वो मर जाना चाहता है। ” लेकिन दुनिया का सबसे क्रूरतम व्यक्ति (सुरेन्द्र कोली) जीना चाहता है। फैसला आते ही उसने कोर्ट स्टाफ से कहा, उसे फैसले की कॉपी चाहिये। जब तक आर्डर की कॉपी नहीं मिलेगी वो अदालत से बाहर नहीं जाएगा। कोर्ट स्टाफ ने समझाया कि ऑर्डर की कॉपी उसके वकील को मिल जायेगी। तब जाकर वो अदालत से बाहर जाने (जेल जाने) के लिये तैयार हुआ।

Sunday, February 1, 2009

GANDHI'S FORAY INTO JOURNALISM


Much has been written on Mahatma Gandhi’s political, social and economic ideas, his role in India’s struggle for independence and upliftment of the weaker sections. But one aspect of his life that has remained untraversed is his foray into journalism.

Gandhiji was born in a period of colonialism and imperial rule. His experiences in South Africa and India changed his meek personality (who felt fear in sleeping in a dark room and was a stammer) “into a great orator and the leader of the Indian national movement.” The half-naked fakir became the most dreaded man for the English masters under the sun.
The leader of the freedom struggle as he had turned this elite movement into a mass-movement. And for this, he used press as a toll “to establish closeness with his countrymen.”
What Gandhi wrote is evident from the four newspapers he edited—Indian Opinion (1903-1914), Young India (1919-1933), Navjivan (started in 1919), Harijan (1933-1948)-apart from his books including autobiography (My Experiments with truth) and Hind Swaraj. About 75per cent of the contents of his newspapers came from his pen only.

Till 19 years of age, Gandhi never had the opportunity to read newspapers. It was after reaching England, he became a reader of the newspapers-“a window to the world.” Even after becoming the barrister in the initial years, he was a shy person, hesitant of speaking even in court. As ideas were evolving in his mind, they needed a vent to overflow to the outside world. Writings thus become a ‘vent’ for Gandhi. Once he started writing, his pen didn’t stop till his death in 1948.
Gandhi never wrote anything only for creating an impression and carefully avoided exaggeration. “His aim was to serve truth, to educate people and to be useful to his country. Like every other activity, he ever took in hand, he took this one also very seriously—not merely the external discipline, code and technique of journalism but the spirit of vocation”, wrote K. Kriplani, his biographer.
If Gandhi wrote on as complex objects as political freedom, liberty, swaraj, satyagraha, non-violence, truth, he also wrote on simple and day-to-day activities of people like vegetarian diets, cleanliness and family-planning besides social and economic reforms.
“The sole aim of journalism”, according to Mahatma was “service”. A newspaper shouldn’t be used as a means of earning or living, he wrote, further adding , “When newspapers are made an instrument of earning not one’s livelihood but also of making profits, it leads to a number of evils.”
The objective of newspaper, according to him (in Hind Swaraj) was to “understand the popular feelings and gave expressions to them; to arouse among the people certain desirable sentiments; and to express the popular defect.” Newspapers, to him, were primarily to educate people, and to apprise them of current trends in the history of the world.”

Press had played an important role in the freedom struggle of the country. As noted historian Bipin Chandra wrote in his classic account India’s Struggle for Independence (Penguin, 1966): “Nearly all political controversies of the day were conducted through the press. It also played the institutional role of opposition to the British government. Almost every act and every policy of the government was subjected to sharp criticisms, in many cases with great care and vast learning back up. “Oppose, oppose, and oppose ”was the motto of the Indian press.”
It was, thus, the newspapers which had to bear the brunt of crucial rules and restrictions (Press laws) of the British rule. Even the newspapers of the Gandhi had to face this ‘heat’. But he was for “free press”. He resisted all kinds of rules, restrictions, registration and censorship. For, these restrictions were bound to affect the objectivity and news to the readers. “Free speech, free association and free press”, according to Gandhi was “almost the whole Swaraj.”
It was for these reasons that he wanted “fearless editors.” He wanted them “to be patient and seek for truth only.” That editor should be free, fair and objective, without any bias and prejudice.”
The press, the fourth estate, for him was a power. A means of bringing bloodless and peaceful revolution in the society. A power which can awake millions of Indians form terror deep slumber against the mighty and cruel British empire.
He wrote: The Press is called the fourth estate. It is definitively a power but to misuse that power is criminal. I am journalist myself and would appeal to fellow journalists to realize their responsibility and to carry on their work with no idea other than that of upholding the truth.
More than 50 years have passed since Gandhiji wrote his ideas and philosophies including that on the nature and role of press. The question arises whether the press in India is carrying forward the ideas of the Father of the Nation.
Barring some (objective) newspapers and magazines, many are biased—politically, ideologically, commercially or otherwise. The ratio of advertisement in comparison to news (contents) has increased in the last 10 years or so—the result of liberlisation and globalization. The newspapers have become a commodity, sold like other consumer goods. Readers are lured by quizzes, competitions, coupons, jam bola, scratch and win, whereby products from stereo to car are gifted to the “lucky” readers. Readers are again targeted by publishing sensational news. Even the newspapers, in the birth of which Gandhi was instrumental are behind in the “race of attracting readers—by price-war or otherwise—Gandhi’s view that India lives in rural areas has largely been forgotten.
There are few ideas of Gandhiji, however, which have been kept alive by almost the whole of Indian press. First among them is freedom of press. Recently when Indian government came out with the controversial ordinance POTO (now POTA) which if implemented could have hit the journalists below the belt, the whole of the domestic press resisted the ordinance tooth and nail. The government, under pressure deleted the controversial section 3 (8) of the ordinance which dealt with journalists.
However, business-oriented the press could have become, it is still not considered as just another industry.
(By Neeraj Rajput, National Herald, 30 January, 2003)

Tuesday, November 25, 2008

कॉल-गर्ल से रुबरु

दिल्ली की सबसे बड़ी जिस्मफरोशी की दलाल माने जाने वाली सोनू पंजाबन से अदालत में मुलाकात हुई। कुछ साल पहले तक एक कॉल-गर्ल के रुप में काम करने वाली सोनू पंजाबन अब इस धंधे की एक बड़ी दलाल बन गई है। अदालत में पेशी के दौरान चलते-चलते मैने सोनू पंजाबन की ‘सीक्रेट डायरी’ के कुछ पन्ने खंगाल डाले। उसने जो कुछ अपने बारे में, अपने धंधे के बारे में, और पुलिस के आरोपो के बारे में बताया, वो यहां लिख रहा हूं...


नीरज राजपूत- सोनू ये बताओ, दिल्ली पुलिस का आरोप है कि तुम दिल्ली की सबसे बड़ी दलाल (जिस्मफरोशी की) हो। कितनी सच्चाई है इसमें...

सोनू पंजाबन-कुछ नहीं...झूठ बोल रहें हैं...

नीरज राजपूत-सोनू ये बताओ, पुलिस का कहना है कि तुम्हारे गैंगस्टर्स से काफी रिश्ते रहें हैं...शादी की है आपने..

सोनू पंजाबन-नहीं ऐसा कुछ नही है। शादी हुई थी लेकिन EXPIRE (मौत) हो गये थे मेरे हस्बैंड (पति)।

नीरज राजपूत-कौन थे आपके पति?

सोनू पंजाबन-विजय (गैंगस्टर विजय, जिसकी पुलिस के हाथो मुठभेड़ में मौत हो गई थी।)

नीरज राजपूत- हेमंत सोनू से आपके क्या संबध थे?

सोनू पंजाबन- FRIEND (दोस्त) थे वो मेरे।

नीरज राजपूत-...और दीपक ?

सोनू पंजाबन- नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है सब झूठ है।

नीरज राजपूत-आपके साथ जो दलाल पकड़े गये थे वो कौन थे?

सोनू पंजाबन- वो मेरे घर में बर्थ-डे था, तो वैसे आये थे वो।

नीरज राजपूत-और जो लड़कियां पकड़ी गई थी, कॉल-गर्ल थी बाहर से आई थी...

सोनू पंजाबन-कॉल-गर्ल नही है बर्थ-डे पर आई थी उस रात को। उन्होने (पुलिस ने) वैसे ही रेड (छापा) कर दी घर पर। झूठ है सब।

नीरज राजपूत-तो जो पुलिस का कहना है कि दिल्ली के जिस्मफरोशी की सबसे बड़ी दलाल तुम हो वो गलत है ?

सोनू पंजाबन-बिल्कुल गलत है, बदमाशों से मेरा लिंक (रिश्ता) करके मेरा नाम बढ़ा दिया है...ऐसा कुछ नहीं है।

नीरज राजपूत-अच्छा ये बताईये पुलिस का कहना है कि आप लड़कियों को सैलरी देती है उसमें कितनी सच्चाई है?

सोनू पंजाबन-झूठ बोल रहे हैं। लड़कियां कुछ नहीं बोल रही हैं। ये (पुलिस) अपने आप बना रही है।