
सरकार बनने का किसी क्राइम रिपोर्टर के खुश होने से क्या वास्ता हो सकता है? बिल्कुल है! दिल्ली के क्राइम रिपोर्टर तो पिछले एक महीने से सरकार बनने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। जब से चुनावों की घोषणा हुई थी और सरकार बनने से लेकर तक, क्राइम रिपोर्टर यही सोच रहे थे कि किसी की भी सरकार बने-चाहे वो कांग्रेस की हो या फिर बीजेपी की- बस जल्द से जल्द बन जानी चाहिए। इसलिए नहीं कि सरकार उनके लिए कोई पैकेज की घोषणा करने वाली है। जानने चाहेंगे क्यो ?
दरअसल चुनावों के घोषणा होने के चंद रोज बाद ही दिल्ली पुलिस ने आदेश जारी कर दिया कि कोई भी पुलिस अधिकारी तब तक प्रेस कांफ्रेंस नहीं करेगा, जबतक की सरकार का गठन ना हो जाए और प्रधानमंत्री सहित कैबिनट के मंत्री शपथ ग्रहण ना कर ले। ये आदेश दिल्ली पुलिस ने चुनाव सहिंता लागू होने के कुछ रोज बाद किया था। ये बात आजतक साफ नहीं हो पाई है कि क्या वाकई चुनाव आयोग ने दिल्ली पुलिस को ऐसा करने का आदेश दिया था या फिर गृह मंत्रालय ने। लेकिन दिल्ली पुलिस ने अपनी जुबां पर ताला लगा लिया। अब जबकि मंत्रिमंडल ने शपथ ग्रहण कर ली है तो पुलिस अधिकारियों पर प्रेस कांफ्रेंस ना करने का आदेश भी खत्म ही समझ लीजिए।

अगर आपको याद ना रहा हो तो यहां ये बात दीगर है कि इलेक्शन के घोषणा से पहले तक दिल्ली पुलिस की डीसीपी तो क्या, खुद पुलिस महकमें के मुखिया यानि कमिश्नर साहब तक को गृह मंत्रालय ने (अनौपचारिक) आदेश दे रखा था कि राजधानी की कानून-व्यवस्था पर हर पंद्रह दिन पर अपना पक्ष रखा जाएं। ये आदेश तब दिया गया था जब दिल्ली एक के बाद एक वारदात से दहल कर रह गई थी। पहले बाइकर्स गैंग के सरगना बंटी और फिर सत्ते गैंग ने लोगों को जीना मुहाल कर दिया था। मीडिया में दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे थे। हालांकि पुलिस का दावा था कि आंकड़ो पर गौर किया जाए तो राजधानी में क्राइम कम हो रहा है लेकिन किसी ने पुलिस के दावा पर पूरी तरह यकीन नहीं किया। हारकर गृह मंत्रालय को दखल देना पड़ा और पुलिस कमिश्नर को मीडिया के सामने आना पड़ा। ये वही कमिश्नर है जिनके दिल्ली पुलिस के मुखिया बनने के बाद कुछ सीनियर अधिकारी कहते सुने गए थे कि “ सीपी (कमिश्नर ऑफ पुलिस को महकमें मे इसी निक-नेम से जाना जाता है) साहब ने हमें मीडिया की खबरों पर ज्यादा गौर ना करने का मशवरा दिया है।” लेकिन कुछ दिनों बाद ही कमिश्नर साहब को अपनी सोच बदलनी पड़ गई।
खैर, सरकार बनने का क्राइम रिपोर्टर के खुश होने से क्या ताल्लुक। बिल्कुल ताल्लुक है। मुझे याद है कि करीब पांच-छह साल पहले मैं मध्य-प्रदेश के टूर पर गया था। वहां मैने कई लुटेरों की बस्तियों पर पुलिस के साथ मिलकर लाइव रेड की थी। उसी दौरान मेरी मुलाकात वहां के एक डीआईजी साहब से हुई। इंटरव्यू खत्म होने के बाद डीआईजी साहब बातों ही बातों में कहने लगे कि अगर हम ना हो तो आपका काम बंद हो जाएं। “ हम इंटरव्यू देते है तो आप की खबर पूरी होती है। वरना अधूरी ही रह जाएंगी।” मेरा जबाब था डीआईजी साहब, आप बिल्कुल ठीक फरमा रहे है। दरअसल आप जिस महकमें और पद पर बैठे है वो सरकार ने आपको दिया है। हम आप से इसलिए किसी भी खबर पर इंटरव्यू (बाइट या पक्ष) लेने आते है क्योंकि आप सरकार के नुमाइंदे है। आप जो बोलेंगे वो हमे मानना पड़ेगा।
क्राइम की जितनी खबरें टी.वी या अखबार में दिखाई पड़ती हैं उसमे से कम से कम बीस से तीस प्रतिशत वे होती है जो किसी भी क्राइम रिपोर्टर को पुलिस महकमें से मिलती है। वो माध्यम है प्रेस कांफ्रेंस के जरिए। पुलिस किसी चोर-उचक्के या गिरहकट (माफ कीजिए पॉकेटमार) को पकड़ती है और बड़ी शान से प्रेस कांफ्रेस करती है और उसमें उन आरोपियों के बारे में ऐसा कोई शगुफा छोड़ देगी कि वो खबर टी.वी या अखबार में दिखाई दे ही जाती है। कभी बताएगी कि ये चोर, अपनी गर्लफ्रेंड के गिफ्ट के लिए चोरी करता था... ये पढ़ा-लिखा चोर है, मंदी के मारे नौकरी नहीं मिली तो लूटपाट करने लगा। फलां आरोपी, मोटरसाइकिल की चोरियां महज अपने शौक के लिए करता था, बाइक का पैट्रोल खत्म होने पर उसे वहीं फेंक कर दूसरी मोटरसाइकिल चोरी कर लेता था। कभी बताया जाएगा कि ये अपनी बहन की शादी के लिए चोरी के पैसे से दहेज इकठ्ठा कर रहा था । ये सब पुलिसवाले के मुंह से निकला नहीं कि बस बन गई हेडलाईन। कभी-कभी अच्छी प्रेस कांफ्रेंस भी होती है। जैसे, किसी नामी-गिरामी बदमाश (बंटी, सत्ते इत्यादि) के एनकाउंटर के बाद या फिर किसी आंतकवादी को ढेर करने के बाद (जैसे बटला हाउस एनकाउंटर)। अब जब ये प्रेस कांफ्रेंस ही बंद हो जाएंगी तो क्राइम रिपोर्टर तो उदास हो ही जाएगां ना। एनकाउंटर होगा कैसे, सभी पुलिसवाले तो इलेक्शन डयूटी पर तैनात है। बदमाश भी नेताओं के चुनाव प्रचार में जुट जाते है इलेक्शन के दौरान। आप यकीन करें या ना करें, लेकिन ये हकीकत है कि चुनाव के दौरान क्राइम ग्राफ नीचे आ जाता है।
अब जब ये प्रेस कांफ्रेंस ही बंद हो जाएंगी तो क्राइम रिपोर्टर तो उदास हो ही जाएगां ना। एनकाउंटर होगा कैसे, सभी पुलिसवाले तो इलेक्शन डयूटी पर तैनात है। बदमाश भी नेताओं के चुनाव प्रचार में जुट जाते है इलेक्शन के दौरान। आप यकीन करें या ना करें, लेकिन ये हकीकत है कि चुनाव के दौरान क्राइम ग्राफ नीचे आ जाता है।क्राइम रिपोर्टिंग में बीस ये तीस प्रतिशत वे खबरें होती है जो ब्रेकिंग होती है। जैसे किसी बुजर्ग दंपत्ति की उनके ही नौकर ने लूटपाट के इरादे से हत्या कर दी। या फिर जैसे किसी बैंक में दिन-दहाड़े लूट हो गई। किसी लड़की को उसके प्रेमी ने प्यार में तकरार के बाद बीच सड़क में चाकू से गोद डाला। दो जिंदा महिलाएं ऑटो में जलकर खाक।
लेकिन अगर खबर कुछ ऐसी हुई जैसे, बैंक से पैसे निकालकर बाहर निकल रहे व्यापारी को हथियारों की नोंक पर लूटा तो शायद ऐसी खबर के चलने का चांस कम होता है। ऐसे में, ऑफिस वाले कहेंगे, अरे यार कोई स्टोरी नहीं दे रहे हो आजकल। क्राइम रिपोर्टर मन ही मन बुदबुदाता है, “इलेक्शन के दौरान चलेगी कोई स्टोरी, जो बोल रहे हो स्टोरी नहीं दे रहे हो।” जी हां, इलेक्शन टाइम में क्राइम की खबरों को कम ही तरजीह दी जाती है। जबतक की कोई बहुत बड़ी ब्रेकिंग खबर ना हो अपराध और अपराध से जुड़ी टी.वी और अखबार से गायब रहती है।टी.वी के क्राइम रिपोर्टर की करीब दस-बीस प्रतिशत खबरें वे होती है जो बहुत शानदार होती है, लेकिन ऑफिस से फोन आता है, खबर में किसी पुलिस अधिकारी की बाइट जरुरी है। “लोचा हो सकता है इस स्टोरी में बॉस, इसलिए ऑफिशियल बाइट के बिना नहीं चलेगी ये स्टोरी।” यानि तीस प्रतिशित खबरें प्रेस कांफ्रेस से मारी गई और बीस प्रतिशित बिना पुलिस की बाइट की। और अगर कोई बड़ी ब्रैकिंग नहीं हुई पंद्रह-बीस दिन तो बाकी कितनी प्रतिशत खबरें बची। मात्र बीस प्रतिशत।
ये बीस प्रतिशत वे खबरें होती है जो किसी भी क्राइम रिपोर्टर की अपनी होती है। ना तो वे कोई ब्रेकिंग न्यूज का हिस्सा होती है और ना ही पुलिस की प्रेस कांफ्रेंस की। जैसे, जब हाल ही में दो महिलाएं ऑटो में जिंदा जलकर खाक हो गई तो पुलिस ने बिना तफ्तीश किए दावा किया कि शॉट-सर्किट की वजह से आग लगने के कारण दोनों महिलाओं की मौत हुई है। ये वारदात रात को हुई थी। खबर सनसनीखेज थी, लिहाजा मैं सुबह होते ही उस इलाके के थाने पर पहुंच गया जहां ये वारदात हुई थी। थाने का गेट पुलिसवालों ने बंद कर रख था मीडियाकर्मियों के लिए। साफ था कि मामले में कुछ पेंच है। मेरे साथ बाकी चैनल के रिपोर्टर भी खड़े थे। इतने में एक पुलिसवाला दो महिलाओं और एक छोटे बच्चे के साथ वहां पहुंचे। पुलिसवाला उन महिलाओं में से एक को अंदर ले गया। इतने में हमने दूसरी महिला से बातचीत शुरु कर दी। बातों ही बातों में उसने बताया कि जिस महिला को पुलिसवाला थाने के अंदर ले गया था वो भी वारदात के वक्त ऑटो में मौजूद थी। लेकिन वो किसी तरह जान बचाकर भाग निकली थी। उस महिला ने बताया कि मौत के मुंह से निकल कर आने वाली वो महिला उसकी बेटी है और उसके साथ छोटा बच्चा उसका नाती है। महिला ने खुलासा किया कि ऑटो में आग अपने आप नहीं लगी बल्कि उसकी बेटी ने उसे बताया था कि किसी आदमी ने ज्वलनशील पदार्थ ऑटो पर डालकर आग लगा दी थी। इस बयान के बाद तो मानों पुलिस की जांच पर ही सवाल खड़े हो गए। आला-अधिकारी कैमरे पर तो कुछ नहीं बोले, लेकिन ये बात मान ली कि तीसरी महिला भी ऑटो में मौजूद थी। इससे पहले तक दिल्ली पुलिस दो महिलाओं के ही ऑटो में होने का दावा कर रही थी। यानि पुलिस की जांच में झोल था। ये होती है किसी भी क्राइम रिपोर्टर की अपनी स्टोरी। अगर इस तरह कि खबर यदा-कदा भी क्राइम रिपोर्टर के हाथ लग जाएं तो बल्ले-बल्ले।
अब मैं मध्य-प्रदेश के उन्ही डीआईजी साहब की बात पर एक बार फिर से लौटता हूं कि “हमारी (पुलिस की) वजह से ही तुम खबरें कर पाते हो।” बिल्कुल ठीक कहा था डीआईजी साहब ने। लेकिन ऐसी खबरों का क्या, जैसा मैने अभी ऑटो मे तीसरी महिला के बारे में जिक्र किया है। कोई भी क्राइम रिपोर्टर, किसी प्रेस कांफ्रेंस की खबर के कारण नहीं जाना जाता है। वो जाना जाता है ऐसी ही किसी स्कूप ( एक्सक्लूसिव खबर) के लिए। मुझे अब भी याद है कि वर्ष 2005 में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में एक महिला की दिन-दहाडे़ अस्पताल परिसर में ही आबरु लूट ली गई थी। दिल्ली में लगातार बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही थी तिस पर अस्पताल में बलात्कार से पुलिस महकमें की नींद हराम हो गई। महिला संगठनों के साथ-साथ सरकार ने भी पुलिस पर उंगलियां उठानी शुरु कर दी। आनन-फानन में पुलिस ने दो दिन बाद ही एक शख्स को पकड़ा और दावा किया कि उसी ने अस्पताल में महिला की इज्जत लूटी है। लेकिन पुलिस ने ना तो आरोपी से मीडिया को बात करने दिया और ना ही महिला से। मीडिया को महिला का पता तक नहीं बताया गया। महिला और उसके पति को एक गुप्त स्थान पर भेज दिया गया। लेकिन किसी तरह मैने उस पीड़ित महिला और पति का ढूंढ निकाला। मैने दोनों से बात की तो उन्होने साफ कर दिया कि पुलिस ने जिस आरोपी को पकड़ा है वो कोई और है। इतना सुनते ही मै भौचक्का रह गय़ा। मैने फौरन सहारा टी.वी (उस वक्त मैं वहां क्राइम रिपोर्टिंग करता था) में अपनी सीनियर्स को इस खुलासे की जानकारी दी। फिर क्या था मैने महिला का इंटरव्यू सहारा टी.वी पर चला दिया। इंटरव्यू चलते ही हड़कंप मच गया। मामले की जांच तुंरत क्राइम ब्रांच के हवाले कर दी गई। एक साल बाद अदालत ने उस निर्दोष व्यक्ति को बाइज्जत बरी कर दिया। वो बात और है कि दिल्ली पुलिस अभी तक असली आरोपी को पकड़ने में नाकाम रही है। लेकिन एक बेगुनाह बच गया। बस
कहने का तात्पर्य ये है कि जो पुलिस बोलती है हम उसे तोते की तरह नहीं रटते है। क्राइम रिपोर्टर अपने विवेक से काम करता है। वो तो अपने सूत्रों और इंवेस्टीगेटीव स्किल (कौशल) से किसी भी मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करता है।
कहने का तात्पर्य ये है कि जो पुलिस बोलती है हम उसे तोते की तरह नहीं रटते है। क्राइम रिपोर्टर अपने विवेक से काम करता है। वो तो अपने सूत्रों और इन्वेस्टिगेटिव स्किल (कौशल) से किसी भी मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करता है। कोशिश करता है कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। डीआईजी साहब को मैने उस वक्त भी यही जबाब दिया था कि माना सभी खबरें आप से मिलती है, लेकिन उन मामलों को क्या जो सिर्फ और सिर्फ एक क्राइम रिपोर्टर की होती है। तब फिर कोई पुलिस अधिकारी दूध में पानी मिलाने से पहले सौ बार सोचेगा जरुर।याद है ना किस तरह यू.पी पुलिस के एक आला-अधिकारी ने आरुषि हत्याकांड में प्रेस कांफ्रेंस कर एक छात्रा, नौकर और उसके पिता पर कीचड़ उछालने की कोशिश की थी। लेकिन उस प्रेस कांफ्रेस में मौजूद कम ही क्राइम रिपोर्टर को उन आईजी साहब के दावे पर यकीन था। नतीजा, आईजी साहब की छुट्टी हो गई और बाकी सब इतिहास बन चुका है।

इतिहास इसलिए कि इन चुनावों के दौरान ही आरुषि हत्याकांड की पहली बरसी बीत गई और एक्का-दुक्का टी.वी या अखबार को छोड़ दे तो इस सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री से जुड़ी कोई खबर नहीं दिखाई दी। ये बात जरुर है कि सीबीआई की एक टीम दिन-रात इस मामले की जांच में अभी भी जुटी है। उम्मीद करते है कि जल्द ही देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री के राज से पर्दा उठ पाएं। अगर क्राइम रिपोर्टर ना होते तो शायद नोएडा पुलिस और फिर सीबीआई इस मामलें को किसी भी तरह सुलझा लेती और आरुषि के साथ इंसाफ नहीं हुआ होता। इंसाफ तो खैर अभी भी नहीं हुआ है लेकिन अगर गलत लोग पकड़े जाते तो हमारी कानून-व्यवस्था और समाज के साथ एक खिलवाड़ होता, जो किसी सभ्य समाज में कतई मंजूर नहीं है। मैने खुद कई बार पुलिस अधिकारियों को कहते सुना है कि अगर मीडिया ना हो तो हम इस मर्डर मिस्ट्री को चुटकियों में सुलझा लेंगे। यानि प्रेस के उस सिंद्वात को क्राइम रिपोर्टर पूरी तरह से मानता है जिसमें मीडिया को समाज का ‘वॉच-डॉग’ माना जाता है।
समझ गए ना एक क्राइम रिपोर्टर की इस समाज में कितनी अहमियत है। वो सिर्फ सनसनीखेज खबरें परोसता ही नहीं, सैकड़ो-हजारों पीड़ित लोगों का रहनुमा भी होता है।
शायद ही कोई सा दिन ऐसा बीतता होगा जब उसपर किसी पुलिस के सताएं, तो कभी बदमाशों के सताएं लोगों के इंसाफ की आस में फोन ना आते हो। सभी सरकारी दफ्तरों, मंत्रियों और संतरियों के दरवाजों से थक-हारकर आदमी क्राइम रिपोर्टर को ही इंसाफ की आखिरी उम्मीद मानता है।
शायद ही कोई सा दिन ऐसा बीतता होगा जब उसपर किसी पुलिस के सताएं, तो कभी बदमाशों के सताएं लोगों के इंसाफ की आस में फोन ना आते हो। सभी सरकारी दफ्तरों, मंत्रियों और संतरियों के दरवाजों से थक-हारकर आदमी क्राइम रिपोर्टर को ही इंसाफ की आखिरी उम्मीद मानता है। कई बार तो अदालतों में सालों से लटके पड़े मामले भी तभी जोर पकड़ते है जब क्राइम रिपोर्टर उनका खुलासा करता है।खैर, अब जब सरकार बन गई है तो सभी तरह के क्राइम की खबरें आपको देखने, सुनने और पढ़ने को मिलेगी। पुलिस के ‘दावों’ वाली भी, उनके दावों के झोलवाली भी, ब्रेकिंग न्यूज भी और स्कूप भी...































