
सर, उस लेडी का फोन आया था। वो आत्महत्या करने की धमकी दे रही है। अपनी मौत का कसूरवार वो हमे ठहराकर जायेगी। बाकयदा सुसाईड-नोट लिख रही है हमारे नाम का... सर, मुझे डर लग रहा है... सनसनी अभी खत्म ही हुआ था कि, मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर नंबर देखा तो पता चला कि साथी रिपोर्टर का फोन है। मेरे हैलो बोलने से पहले ही वो बोल उठा। “सर बहुत गड़बड़ हो गई है।” । मैने पूछा क्या हुआ? रिपोर्टर बेहद घबराया हुआ था। “सर,वो लेडी मरने जा रही है।” मै खीज उठा! अरे हुआ क्या, ये तो कुछ बताओ ना। “सर जिसकी स्टोरी अभी हमने सनसनी में चलाई है, उसका फोन आया था। वो आत्महत्या करने की धमकी दे रही है”, साथी रिपोर्टर ने जबाब दिया। मैने हँसकर रिपोर्टर से पूछा, “फिर क्या किया जायें ?” सर आप बतायें क्या करना चाहिये। अभी तक मैने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नही लिया था-- जैसा अक्सर मै ऐसी गीदड़ भभकियों के दौरान नहीं लेता हूं। मैने उसको समझाया कि वो लेडी उसे डराने के लिये आत्महत्या की धमकी दे रही होगी। “वो नही करेगी, मै गारंटी लेता हूं”, मैने तर्जुबे के हिसाब से उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की। लेकिन साथी रिपोर्टर समझने को तैयार नही था। “सर वो मुझे कई बार फोन करके ये बात (खुदकुशी) बोल चुकी है।” मैने साथी रिपोर्टर को हौसला बंधाया और बॉस से सलाह करने की बात कहकर फोन काट दिया। 
लेकिन जैसे ही मैने धमकी की बात बॉस को बताई, वो घबरा गई। उन्होने कहां कि तुमने पहले बताया होता तो हम स्टोरी में कुछ फेरबदल कर सकते थे। लेकिन अब तो कुछ नही हो सकता। मैने अपने साथी रिपोर्टर की बात तो बॉस को बता दी थी, लेकिन अभी भी ज्यादा सीरियस नही था। मैने बॉस को बताया कि वो खाली धमकी दे रही है। वो कभी भी खुदकुशी जैसा बड़ा कदम नहीं उठायेगी। लेकिन बॉस ने जबाब दिया, “अगर (खुदकुशी) कर ली तो!” फिर तो अनर्थ हो जायेगा।
इससे पहले की अनर्थ हो जाये, मैने रिपोर्टर को रात के बारह बजे ही आत्महत्या करने की धमकी देने वाली महिला के पास भेजने का आदेश जारी कर दिया। रात में ही रिपोर्टर डरता-डराता उस महिला के घर पहुंचा। उसकी बाईट (इंटरव्यू) ली और अगले दिन सुबह के न्यूज बुलेटिन में उसका पक्ष चल गया। उसके बाद से उस महिला ने फिर कभी हमारे रिपोर्टर को फोन नहीं किया।
लेकिन करीब आठ महीने बाद उस महिला का ये ड्रामा मेरे सामने तैरने लगा। कैसे
आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है। जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है।
आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है। जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है। उस दिन के बाद से यही नजरिया था मेरा उस महिला के प्रति।जो मै आठ महीने पहले सोच रहा था, वो अब साबित हो गया है। ये है पूरी कहानी...
ब्लैकमेलर महिला का नाम है नीरजा शर्मा। दिल्ली के नरेला इलाके में रहने वाली इस महिला की उम्र है करीब पैतीस (35) साल। नीरजा के निशाने पर रहते है 40 से 50 साल की उम्र के रईस आदमी। वो पहले तो उनसे किसी ना किसी बहाने से दोस्ती गाढ़ती है और फिर उन्हे (पैसो के लिये) ब्लैकमेल करने लगती है। अगर किसी ने पैसे देने में आनाकानी की तो उसके खिलाफ छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे फर्जी मामले में फंसा देती है। इस काम में उसका साथ देते है दिल्ली पुलिस के दो एसीपी (शायद ये दोनो अब रिटार्यड) हो गये है।
नीरजा शर्मा पहली बार उस वक्त विवादो में आई थी जब एक रिटार्यड कर्नल ने एयरपोर्ट के नजदीक एक होटल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। राजधानी की एक जानी-मानी बिजली कंपनी में काम करने वाले रिटार्यड कर्नल एच एस गिल ने एक गलती कर दी थी। गलती, नीरजा शर्मा से दोस्ती की। फिर क्या था गिल साहब के हंसते-खेलते घर में मानो आग लग गई। लेकिन मरने से पहले गिल साहब ने नीरजा शर्मा और उसके एक साथी एसीपी की काली करतूतो का खुलासा कर दिया। अपने सुसाईड नोट में कर्नल ने लिखा था कि किस तरह नीरजा शर्मा अपने साथी एसीपी की मदद से उसपर शादी करने का जोर डाल रही है। मना करना पर वो उससे लाखो की रकम ऐंठ चुकी है। पैसा ना देने की सूरत में उनके घरवालो को उनकी दोस्ती की खुलासा करने की धमकी देती है। गिल साहब की आत्महत्या के बाद नीरजा और एसीपी को जेल की हवा खानी पड़ी थी। लेकिन कुछ दिन बाद दोनो जमानत पर बाहर आ गये और ब्लैकमेलिंग का धंधा फिर से शुरु कर दिया।
इस बार उनका निशाना बना नरेला इलाके का एक जाना-माना डाक्टर। नीरजा गई तो थी डाक्टर मुकेश अग्रवाल के पास अपनी कमर की हड्डी का इलाज कराने, लेकिन उन्हे अपने जॉल में फंसा लिया। फिर शुरु हो गया वही खेल जो नीरजा ने कर्नल गिल के साथ खेला था। लेकिन डाक्टर अग्रवाल उसकी चाल पहले ही भांप गया। गुस्साई नीरजा ने अपने एक (दूसरे) साथी एसीपी की मदद से डाक्टर साहब के खिलाफ बलात्कार का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया। इसके खिलाफ डाक्टर साहब ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
जब डाक्टर ने अदालत से इंसाफ की गुहार लगाई थी तभी हमने उस पर स्टोरी की थी—वैसे कर्नल की मौत पर भी चलाई थी—कैसे एक महिला (नीरजा) भोले-भाले लोगो को अपने जॉल में फंसा कर ब्लैकमेल करती है। जिस वक्त हमारा रिपोर्टर ये स्टोरी कर रहा था, उसने कई बार नीरजा का पक्ष जानने के लिये फोन किया। लेकिन उसने कैमरे पर कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया। हमने बिना उसके पक्ष के स्टोरी ऑन-एयर कर दी। फिर क्या हुआ, वो तो मै पहले ही बंया कर चुका हूं।
नीरजा के आत्महत्या की धमकी देने के अगले दिन ही उसके एक साथी एसीपी ने भी मुझे फोन पर धमकाने की कोशिश की। लेकिन वो शायद ये भूल गया था कि मुझे उसका पूरा ‘रिकार्ड’ मालूम था।
पहले जो एसीपी “देख लेने” की धमकी दे रहा था, वो गिड़गिड़ाने लगा कि आगे से उसका नाम नीरजा के साथ ना जोड़े। “ नीरज जी, मै रिटायर होने वाला हो, एक बार तो फंस चुका हो, अब दुबारा नही फंसाना चाहता... प्लीज, मेरे पर रहम कीजिये।
पहले जो एसीपी “देख लेने” की धमकी दे रहा था, वो गिड़गिड़ाने लगा कि आगे से उसका नाम नीरजा के साथ ना जोड़े। “ नीरज जी, मै रिटायर होने वाला हो, एक बार तो फंस चुका हो, अब दुबारा नही फंसाना चाहता... प्लीज, मेरे पर रहम कीजिये।” करीब पंद्रह मिनट बात करने के बाद आखिरकार एसीपी को सरेंडर करना ही पड़ गया और मिमयाते-मिमयाते उसने फोन काट दिया।लेकिन अब अदालत के आदेश पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने नीरजा को ब्लैकमेलिंग के आरोप में एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन इस बार कुछ और चौकान्ने वाले तथ्य सामने आये है। जैसे, डाक्टर अग्रवाल और कर्नल गिल ही नीरजा का शिकार नही हुये है। उसने करीब एक दर्जन फर्जी मामले दिल्ली के अलग-अलग थानो में अलग-अलग लोगो के खिलाफ दर्ज करा रखे थे (कुछ लोग तो शायद शर्म के मारे नीरजा की सारी शर्ते मानते रहे होंगे)
अदालत के आदेश पर पुलिस ने नीरजा को तो गिरफ्तार कर लिया है लेकिन उसके साथी एसीपी अभी भी बाहर है। पुलिस की दलील है कि वो अब नीरजा का नार्को-टेस्ट कराने की जुगत में है। उसके बाद कई ऐसे राज फाश हो सकते है जिनपर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ था।
एक क्राइम रिपोर्टर के सामने कई बार ऐसी परिस्थतियां आ जाती है जब ये समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिरी सही क्या है और गलत क्या है। ऐसे में विवेक से काम लेना चाहिये। साहस कभी ना खोये। अगर किसी आरोपी का पक्ष लेना पड़े तो लेने से गुरेज ना करे। बिना साहस खोये उसके पास जाये। अगर कोई गुंडा, माफिया या फिर खाकी वर्दीवाला ही धमका रहा हो तो उससे कभी डरे ना। अगर आपकी स्टोरी ठीक है तो किसी से डरने की कोई जरुरत नही है।








