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Wednesday, May 14, 2008

मै मरने जा रही हूं...


सर, उस लेडी का फोन आया था। वो आत्महत्या करने की धमकी दे रही है। अपनी मौत का कसूरवार वो हमे ठहराकर जायेगी। बाकयदा सुसाईड-नोट लिख रही है हमारे नाम का... सर, मुझे डर लग रहा है... सनसनी अभी खत्म ही हुआ था कि, मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर नंबर देखा तो पता चला कि साथी रिपोर्टर का फोन है। मेरे हैलो बोलने से पहले ही वो बोल उठा। “सर बहुत गड़बड़ हो गई है।” । मैने पूछा क्या हुआ? रिपोर्टर बेहद घबराया हुआ था। “सर,वो लेडी मरने जा रही है।” मै खीज उठा! अरे हुआ क्या, ये तो कुछ बताओ ना। “सर जिसकी स्टोरी अभी हमने सनसनी में चलाई है, उसका फोन आया था। वो आत्महत्या करने की धमकी दे रही है”, साथी रिपोर्टर ने जबाब दिया। मैने हँसकर रिपोर्टर से पूछा, “फिर क्या किया जायें ?” सर आप बतायें क्या करना चाहिये। अभी तक मैने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नही लिया था-- जैसा अक्सर मै ऐसी गीदड़ भभकियों के दौरान नहीं लेता हूं। मैने उसको समझाया कि वो लेडी उसे डराने के लिये आत्महत्या की धमकी दे रही होगी। “वो नही करेगी, मै गारंटी लेता हूं”, मैने तर्जुबे के हिसाब से उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की। लेकिन साथी रिपोर्टर समझने को तैयार नही था। “सर वो मुझे कई बार फोन करके ये बात (खुदकुशी) बोल चुकी है।” मैने साथी रिपोर्टर को हौसला बंधाया और बॉस से सलाह करने की बात कहकर फोन काट दिया।

लेकिन जैसे ही मैने धमकी की बात बॉस को बताई, वो घबरा गई। उन्होने कहां कि तुमने पहले बताया होता तो हम स्टोरी में कुछ फेरबदल कर सकते थे। लेकिन अब तो कुछ नही हो सकता। मैने अपने साथी रिपोर्टर की बात तो बॉस को बता दी थी, लेकिन अभी भी ज्यादा सीरियस नही था। मैने बॉस को बताया कि वो खाली धमकी दे रही है। वो कभी भी खुदकुशी जैसा बड़ा कदम नहीं उठायेगी। लेकिन बॉस ने जबाब दिया, “अगर (खुदकुशी) कर ली तो!” फिर तो अनर्थ हो जायेगा।
इससे पहले की अनर्थ हो जाये, मैने रिपोर्टर को रात के बारह बजे ही आत्महत्या करने की धमकी देने वाली महिला के पास भेजने का आदेश जारी कर दिया। रात में ही रिपोर्टर डरता-डराता उस महिला के घर पहुंचा। उसकी बाईट (इंटरव्यू) ली और अगले दिन सुबह के न्यूज बुलेटिन में उसका पक्ष चल गया। उसके बाद से उस महिला ने फिर कभी हमारे रिपोर्टर को फोन नहीं किया।
लेकिन करीब आठ महीने बाद उस महिला का ये ड्रामा मेरे सामने तैरने लगा। कैसे

आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है। जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है।

आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है। जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है। उस दिन के बाद से यही नजरिया था मेरा उस महिला के प्रति।
जो मै आठ महीने पहले सोच रहा था, वो अब साबित हो गया है। ये है पूरी कहानी...
ब्लैकमेलर महिला का नाम है नीरजा शर्मा। दिल्ली के नरेला इलाके में रहने वाली इस महिला की उम्र है करीब पैतीस (35) साल। नीरजा के निशाने पर रहते है 40 से 50 साल की उम्र के रईस आदमी। वो पहले तो उनसे किसी ना किसी बहाने से दोस्ती गाढ़ती है और फिर उन्हे (पैसो के लिये) ब्लैकमेल करने लगती है। अगर किसी ने पैसे देने में आनाकानी की तो उसके खिलाफ छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे फर्जी मामले में फंसा देती है। इस काम में उसका साथ देते है दिल्ली पुलिस के दो एसीपी (शायद ये दोनो अब रिटार्यड) हो गये है।
नीरजा शर्मा पहली बार उस वक्त विवादो में आई थी जब एक रिटार्यड कर्नल ने एयरपोर्ट के नजदीक एक होटल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। राजधानी की एक जानी-मानी बिजली कंपनी में काम करने वाले रिटार्यड कर्नल एच एस गिल ने एक गलती कर दी थी। गलती, नीरजा शर्मा से दोस्ती की। फिर क्या था गिल साहब के हंसते-खेलते घर में मानो आग लग गई। लेकिन मरने से पहले गिल साहब ने नीरजा शर्मा और उसके एक साथी एसीपी की काली करतूतो का खुलासा कर दिया। अपने सुसाईड नोट में कर्नल ने लिखा था कि किस तरह नीरजा शर्मा अपने साथी एसीपी की मदद से उसपर शादी करने का जोर डाल रही है। मना करना पर वो उससे लाखो की रकम ऐंठ चुकी है। पैसा ना देने की सूरत में उनके घरवालो को उनकी दोस्ती की खुलासा करने की धमकी देती है। गिल साहब की आत्महत्या के बाद नीरजा और एसीपी को जेल की हवा खानी पड़ी थी। लेकिन कुछ दिन बाद दोनो जमानत पर बाहर आ गये और ब्लैकमेलिंग का धंधा फिर से शुरु कर दिया।
इस बार उनका निशाना बना नरेला इलाके का एक जाना-माना डाक्टर। नीरजा गई तो थी डाक्टर मुकेश अग्रवाल के पास अपनी कमर की हड्डी का इलाज कराने, लेकिन उन्हे अपने जॉल में फंसा लिया। फिर शुरु हो गया वही खेल जो नीरजा ने कर्नल गिल के साथ खेला था। लेकिन डाक्टर अग्रवाल उसकी चाल पहले ही भांप गया। गुस्साई नीरजा ने अपने एक (दूसरे) साथी एसीपी की मदद से डाक्टर साहब के खिलाफ बलात्कार का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया। इसके खिलाफ डाक्टर साहब ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
जब डाक्टर ने अदालत से इंसाफ की गुहार लगाई थी तभी हमने उस पर स्टोरी की थी—वैसे कर्नल की मौत पर भी चलाई थी—कैसे एक महिला (नीरजा) भोले-भाले लोगो को अपने जॉल में फंसा कर ब्लैकमेल करती है। जिस वक्त हमारा रिपोर्टर ये स्टोरी कर रहा था, उसने कई बार नीरजा का पक्ष जानने के लिये फोन किया। लेकिन उसने कैमरे पर कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया। हमने बिना उसके पक्ष के स्टोरी ऑन-एयर कर दी। फिर क्या हुआ, वो तो मै पहले ही बंया कर चुका हूं।
नीरजा के आत्महत्या की धमकी देने के अगले दिन ही उसके एक साथी एसीपी ने भी मुझे फोन पर धमकाने की कोशिश की। लेकिन वो शायद ये भूल गया था कि मुझे उसका पूरा ‘रिकार्ड’ मालूम था।

पहले जो एसीपी “देख लेने” की धमकी दे रहा था, वो गिड़गिड़ाने लगा कि आगे से उसका नाम नीरजा के साथ ना जोड़े। “ नीरज जी, मै रिटायर होने वाला हो, एक बार तो फंस चुका हो, अब दुबारा नही फंसाना चाहता... प्लीज, मेरे पर रहम कीजिये।

पहले जो एसीपी “देख लेने” की धमकी दे रहा था, वो गिड़गिड़ाने लगा कि आगे से उसका नाम नीरजा के साथ ना जोड़े। “ नीरज जी, मै रिटायर होने वाला हो, एक बार तो फंस चुका हो, अब दुबारा नही फंसाना चाहता... प्लीज, मेरे पर रहम कीजिये।” करीब पंद्रह मिनट बात करने के बाद आखिरकार एसीपी को सरेंडर करना ही पड़ गया और मिमयाते-मिमयाते उसने फोन काट दिया।
लेकिन अब अदालत के आदेश पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने नीरजा को ब्लैकमेलिंग के आरोप में एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन इस बार कुछ और चौकान्ने वाले तथ्य सामने आये है। जैसे, डाक्टर अग्रवाल और कर्नल गिल ही नीरजा का शिकार नही हुये है। उसने करीब एक दर्जन फर्जी मामले दिल्ली के अलग-अलग थानो में अलग-अलग लोगो के खिलाफ दर्ज करा रखे थे (कुछ लोग तो शायद शर्म के मारे नीरजा की सारी शर्ते मानते रहे होंगे)
अदालत के आदेश पर पुलिस ने नीरजा को तो गिरफ्तार कर लिया है लेकिन उसके साथी एसीपी अभी भी बाहर है। पुलिस की दलील है कि वो अब नीरजा का नार्को-टेस्ट कराने की जुगत में है। उसके बाद कई ऐसे राज फाश हो सकते है जिनपर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ था।
एक क्राइम रिपोर्टर के सामने कई बार ऐसी परिस्थतियां आ जाती है जब ये समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिरी सही क्या है और गलत क्या है। ऐसे में विवेक से काम लेना चाहिये। साहस कभी ना खोये। अगर किसी आरोपी का पक्ष लेना पड़े तो लेने से गुरेज ना करे। बिना साहस खोये उसके पास जाये। अगर कोई गुंडा, माफिया या फिर खाकी वर्दीवाला ही धमका रहा हो तो उससे कभी डरे ना। अगर आपकी स्टोरी ठीक है तो किसी से डरने की कोई जरुरत नही है।

Friday, April 25, 2008

...आखिरी हनीमून

शाम को दुकान बंद करके अनिल जब घर पहुंचा तो बेहद खुश दिखाई पड़ रहा था। उसने अपनी पत्नी ज्योति से हनीमून पर चलने की इच्छा जाहिर की। क्योंकि शादी के बाद दोनों हनीमून नहीं गये थे, अनिल की बात सुनते ही ज्योति की खुशी का ठिकाना ना रहा। ज्योति को लगा उसका पति सुधर गया है। शादी के करीब एक साल बाद दोनों हनीमून मनाने शिमला जा रहे थे। अनिल ने अपनी मां को बताया कि वो सभी गिले-शिकवे भूलाकर ज्योति को एक बार फिर से अपनाना चाहता है। ये कहकर अनिल और ज्योति घर से निकल गये।

लेकिन रास्ते मे अनिल ने अपना प्लान बदल दिया। उसने ज्योति को बताया कि वे शिमला के बजाय खजुराहो जा रहे है।

लेकिन रास्ते मे अनिल ने अपना प्लान बदल दिया। उसने ज्योति को बताया कि वे शिमला के बजाय खजुराहो जा रहे है। ज्योति को सुनकर हैरानी हुई, लेकिन अपने पति की इच्छा के आगे वो झुक गई।
खजुराहो जाने के लिये अनिल और ज्योति पहले झांसी पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होने झांसी रेलवे स्टेशन के करीब श्रीनाथ होटल का एक कमरा बुक कराया। अनिल ने ज्योति से नजरें बचाते हुये होटल के रजिस्टर मे अपना नाम अनिल खुराना के बजाय अनिल श्रीवास्तव लिख दिया। ज्योति का नाम भी उसने ज्योति खुराना की बजाय ज्योति श्रीवास्तव लिख दिया। अपना पता भी उसने सिरसा की बजाय हिसार लिख दिया। ज्योति इस बात से अंजान थी कि अनिल ऐसा क्यों कर रहा है। होटल मे ज्योति सिर्फ आते वक्त दिखाई दी थी। उसके बाद उसे होटल मे किसी ने नहीं देखा। लेकिन जब चौबीस घंटे बाद तक भी होटल के स्टाफ ने कमरे से किसी तरह की आहट नहीं सुनी तो उन्हें कुछ शक हुआ। होटल स्टाफ ने जैसे ही कमरा खटखटाया, अंदर से कोई आवाज नहीं आई। फिर क्या था होटल मे काम करने वाले लोगों ने दरवाजा को तोड़ डाला। जैसे ही होटल स्टाफ अंदर दाखिल हुआ कमरे में दिखाई पड़ी ज्योति की लाश। उसके हाथ पैर बंधे हुये थे।
लेकिन ज्योति का पति अनिल गायब था। थोड़ी ही देर में पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी।

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो उन्हें सामान के साथ-साथ एक उपन्यास पड़ा दिखाई दिया। उपन्यास का नाम था 'मर्डर स्पेशलिस्ट'। जांच अधिकारियों ने किताब के पन्ने पलटे तो उन्हें समझते देर ना लगी कि हत्यारा जो भी है उसने इसी उपन्यास को पढ़कर ही वारदात को अंजाम दिया है।

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो उन्हें सामान के साथ-साथ सुरेन्द्र मोहन पाठक का लिखा एक उपन्यास पड़ा दिखाई दिया। उपन्यास का नाम था 'मर्डर स्पेशलिस्ट'। जांच अधिकारियों ने किताब के पन्ने पलटे तो उन्हें समझते देर ना लगी कि हत्यारा जो भी है उसने इसी उपन्यास को पढ़कर ही वारदात को अंजाम दिया है।
वारदात के बाद से ही अनिल गायब था। पुलिस ने पहले तो हिसार के उस पते पर संपर्क किया जो रजिस्टर मे दर्ज था। लेकिन वो पता भी फर्जी निकला। अभी पुलिस लडकी की असल पहचान करने में जुटी ही थी कि होटल के करीब ऑटो-रिक्शा स्टैंड पर खड़े एक ड्राइवर ने पुलिस को अहम जानकारी दी। उसने बताया कि मरने वाले लड़की और उसका पति एक दिन पहले ही उसके ऑटो-रिक्शा से किसी दूसरे होटल से झांसी के श्रीनाथ होटल पहुंचे थे। बिना देर किये पुलिस उसी होटल में पहुंची जहां का पता ऑटो ड्राइवर ने दिया था। इस होटल के रजिस्टर मे पति-पत्नी ने अपना पता अनिल खुराना और ज्योति खुराना दिया था। दोनों ने अपना पता हरियाणा के सिरसा शहर का दिया था। पुलिस सिरसा के उसी पते पर पहुंची तो पता चला कि उस घर मे वाकई अनिल खुराना और उसकी पत्नी ज्योति खुराना रहते है। फोटो देखकर घरवालों ने ज्योति को पहचान लिया। उन्हें ये समझते देर ना लगी कि अनिल ने ही ज्योति को मौत के घाट उतारा है। लेकिन अनिल कहां है इसकी खबर ना तो उसके घरवालो को थी और ना ही ज्योति के परिवारवालो को। झांसी पुलिस भी सरगर्मी से उसे तलाश कर रही थी। लेकिन वो कहां गया किसी को पता नहीं चला। लेकिन ये बात तो तय थी कि अपनी पत्नी को मारने के बाद भी अनिल का फोन ऑन था।
घरवालों ने ज्योति की हत्या के बाद भी अनिल को वापस लाने की लाख कोशिश की। लेकिन वो फिर कभी नहीं लौटा। पहले तो अनिल को ये पता नहीं होने दिया गया कि ज्योति की मौत की खबर उन्हें लग चुकी है। लेकिन अनिल ने अपना पता नहीं बताया। उसके बाद अनिल का मोबाइल फोन लगातार बंद रहा। घरवालों ने उसके फोन पर एसएमएस भी किये। उन्हें उम्मीद थी कि जब भी उसका फोन ऑन होगा तो एसएमएस पढ़कर वो वापस लौट आयेगा। ज्योति की मौत के बाद अनिल वापस नहीं लौटा। एक साल बाद तक भी जब अनिल का कोई अता-पता नहीं चला तो झांसी अदालत ने अनिल को भगोड़ा घोषित कर दिया।
इस खूनी रिश्ते की शुरुआत हुई थी हत्या से करीब एक साल पहले। पढा़ई खत्म होने के बाद हरियाणा के रोहतक जिले की रहने वाली ज्योति अपना करियर बनाने में लगी ही थी कि सिरसा के एक परिवार ने उसका हाथ अपने बेटे के लिये मांग लिया। सिरसा का ये परिवार ज्योति की बुआ और चाचा का परिचित था। ज्योति के मना करने के बाबजूद उसके घरवालों ने उसकी शादी अनिल से तय कर दी। अनिल सिरसा में ही किताबों की एक दुकान चलाता था। जैसे ही अनिल के परिवारवाले ज्योति को देखने आये वो उसे अपने साथ ही ले गये। परिवारवाले खुश थे कि ससुरालवालों को ज्योति इतनी पसंद आई कि शादी तक का इंतजार नहीं किया।
लेकिन ये खुशी कुछ ही दिनों की थी। ससुराल जाने के कुछ दिन बाद ही ज्योति अपने मायके वापस लौट आई। उसके पति अनिल ने उसके साथ रहने से मना कर दिया था। ज्योति ने अपने परिवारवालों को बताया कि उसके पति के किसी दूसरी ल़डकी से संबध है।

ज्योति से ख़फा अनिल ने अपनी पत्नी के साथ सुहागरात तक मनाने से इंकार कर दिया था। जो ससुरालवाले उसे पंसद कर अपने घर लाये थे, वे भी अब उसे नापंसद करने लगे थे।

ज्योति से ख़फा अनिल ने अपनी पत्नी के साथ सुहागरात तक मनाने से इंकार कर दिया था। जो ससुरालवाले उसे पंसद कर अपने घर लाये थे, वे भी अब उसे नापंसद करने लगे थे। ज्योति के घरवाले परेशान थे कि जिस परिवार ने खुद लडकी का हाथ मांगा था और लड़का ज्योति जैसी लड़की पाकर फूलो नहीं समा रहा था उसे अचानक क्या हो गया है। किसी तरह उन्होंने अनिल को समझाने की कोशिश की। पंचायत के बीच-बचाब के बाद अनिल ज्योति को अपने साथ ले गया। लेकिन घरवालों को क्या मालूम था कि अनिल एक ऐसी साजिश बुन रहा है जिसकी भनक खुद उसके घरवालों तक को नहीं थी।
अपनी दुकान पर अनिल खाली समय में किताबें पढ़कर अपना वक्त गुजारता था। लेकिन जब उसकी शादी-शुदा जिंदगी मे कड़वाहट लगातार बढ़ती गई तो उसने एक किताब (‘मर्डर स्पेशलिस्ट’) पढंकर ही लिख डाली मौत की एक ऐसी स्क्रिप्ट की दो राज्यों की पुलिस आजतक उसे ढूंढ नहीं पाई हैं।

Thursday, April 24, 2008

इतिहास का इतिहास


रामायण किसने लिखी थी ? सवाल सुनकर अटपटा तो नहीं लग रहा है आपको ? लेकिन आने-वाले दिनों में इस सवाल का जबाब देना भी शायद आपको मुश्किल पड़ जायेगा। नहीं भई यहां बात शाहरुख खान के जल्द आने वाले रियेलटी शो (क्या आप पांचवी पास से तेज है!) की नहीं हो रही है। दरअसल मुद्दा ही ऐसा है। अच्छा, तो पहले, सवाल का जबाब सुनिये । ‘रामायण’ के रचयिता थे महाकवि बाल्मीकि। वैसे किसी आम आदमी से ये सवाल पूछा जाये तो वो एक और जबाब दे सकता है। वो है तुलसीदास। जी हां भारत में कुछ लोग ‘रामचरित मानस’ (जिसे तुलसीदास ने लिखा था और मूल रामायण का हिंदी अनुवाद है) और ‘रामायण’ के बीच के अंतर को ठीक से नहीं समझ पाते हैं। खैर यहां बात रियलटी शो की नहीं हो रही है, जिसके लिये इन दोनों जबाबों के बारे में आपको सोचने की ज्यादा जरुरत हो। यहां बात हो रही है रियल लाईफ की। क्यों आपको रामायण के रचयिता के बारे में माथा-पच्ची करनी पड़ सकती है।
कुछ दिनों पहले श्रीलंका सरकार के टूरिस्ट प्रतिनिधियों ने दिल्ली में एक प्रेस-कांफ्रेंस कर सबको हिला कर रख दिया। श्रीलंका यानि हमारे देश के दक्षिण में सबसे स्थित सबसे करीबी पड़ोसी देश। और जहां के रावण के बारे में आपने ‘रामायण’ या ‘रामचरित मानस’ में पढ़ा होगा या फिर सुना होगा। वहां के टूरिस्ट अधिकारी आयें तो थे अपने भारत के लोगों को अपने देश में टूरिस्ट स्पॉट की जानकारी देने, लेकिन उन्होंनें जिन टूरिस्ट स्पॉट्स की बात की उसने सभी के दिलो-दिमाग में हमारे इतिहास को तरोताजा कर दिया। वो सुनहरा इतिहास जिसे हमारे देश के ना तो इतिहासकारों ने और ना ही सरकार ने तबज्जो दी है।

श्रीलंका सरकार ने भारतवासियों को आमंत्रित किया है उन जगहों पर घूमने का जहां के बारे में रामायण और रामचरित मानस में विस्तार से लिखा है।

श्रीलंका सरकार ने भारतवासियों को आमंत्रित किया है उन जगहों पर घूमने का जहां के बारे में रामायण और रामचरित मानस में विस्तार से लिखा है।
श्रीलंका में भले ही रावण की लंका के नामों-निशान ना मिला हो (मिलते भी कैसे वो तो हनुमान जी ने जला कर राख कर दी थी), लेकिन ठीक उसी जगह पर मिली है ऐसी मिट्टी जिसका रंग काला है। भारत के जनमानस में ये बात रह-रहकर उमड़ती रही है कि हो ना हो आज का श्रीलंका ही बीते जमाने का लंका है। वही लंका, जहां का राजा था रावण। वो रावण जिसने मर्यादा पुरुषोत्तम राम की पत्नी सीता का हरण किया था। इसकी सजा़ रावण को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। उसकी सोने की लंका को राम के दूत हनुमान ने अपनी पूंछ से जला दिया था। लेकिन क्या ये बात हमारे देश के किसी भी इतिहासकार के पल्ले नहीं पड़ी।

हमारे देश के हाकिमों ने श्रीलंका में अमन-चैन कायम करने के लिये अपनी फौज तो भेज दी (इंडो-श्रीलंका पीस किपिंग फोर्स)। लेकिन क्या कभी किसी इतिहासकार को नहीं भेज सकते थे कि ये पता कर आये कि क्या वाकई रामायण में वर्णित ‘सोने की लंका’ ही आज का श्रीलंका है।

हमारे देश के हाकिमों ने श्रीलंका में अमन-चैन कायम करने के लिये अपनी फौज तो भेज दी (इंडो-श्रीलंका पीस किपिंग फोर्स)। लेकिन क्या कभी किसी इतिहासकार को नहीं भेज सकते थे कि ये पता कर आये कि क्या वाकई रामायण में वर्णित ‘सोने की लंका’ ही आज का श्रीलंका है।
क्या इतिहासकारों का काम भी टी.वी चैनल और मीडिया ही करेंगी ? आप को अगर याद ना हो ता यहां ये बताना जरुरी है कि एक निजी टी.वी चैनल नें कुछ दिन पहले ही रामायण से जुड़े़ स्थानों का पता लगाने के लिये श्रीलंका अपनी टीम भेजी थी। उसके बाद कई दिनों तक चैनल पर रामायण में वर्णित स्थानों और श्रीलंका में मिले उनके साक्ष्यों की सीरीज़ प्रसारित की गई थी। किस तरह श्रीलंका के एक पहाड़ी जंगल में दुर्लभ जड़ी-बूटियां मिलती है। वो जड़ी-बूटियां जिनसे माना जाता है कि मरे हुये व्यक्ति के शरीर में भी जान डाली जा सकती है। क्या पता कुछ दिनों बाद ये भी लोगों को बताना पड़े कि लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने के बाद हनुमान जी हिमालय से संजीवनी बूटी लाने के चक्कर में एक पूरा का पूरा पहाड़ उठा लाये थे। हो सकता है ये वही जंगल हो जिसे हनुमान जी उठाकर लाये थे। इसी तरह एक पहाड़ी पर तो हनुमानजी की परछाई साफ देखी जा सकती है। ऐसा लगता है मानों हनुमानजी आराम कर रहे हो। रामायण में भी लिखा है कि संजीवनी बूटी लाते समय एक जगह रुककर हनुमानजी ने विश्राम किया था। और भी कई ऐसे स्थान है जिन्हें देखकर लगता है कि ये वही स्थान है जिनका रामायण और रामचरित मानस में वर्णन है।
इतने साक्ष्य मिलने के बाबजूद भारत के इतिहासकारों ने श्रीलंका में शोध क्यों नहीं किया तो इस सवाल के जवाब में हमारे देश के एक जाने-माने इतिहासकार का कहना है कि रामायण के करीब तीन सौ (300) संस्करण उपलब्ध है। यानि पूरी दुनिया में सिर्फ बाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ और तुलसीदासजी द्धारा लिखी ‘रामचरित मानस’ ही नहीं है बल्कि पूरी तीन सौ किताबें है। और उन 300 किताबों में रामायण की अलग अलग कहानियां। हर किताब के अलग-अलग रचियता है (जैसे तमिल में लिखी रामायण के लेखक है कदंब), उनके द्धारा वर्णन की गई ‘कहानी’ में कई फेरबदल है, उनके वर्णित किये गये स्थान भी अलग-अलग हैं। उनका तो यहां तक मानना है कि कई रामायणों में तो सीता को राम की बहन बताया गया है। किसी में राम को हीरो के तौर पर दर्शाया गया है तो किसी में रावण को। एक में तो सीता की उत्पत्ति रावण के नाक से बताई गई थी।
ऐसे में इन इतिहासकारों की मानें तो वे बाल्मीकी और तुलसीदासजी द्वारा लिखी गई रामायणों को कैसे सच मान लें।
अब तो आपको यकीन हो गया होगा ना कि शुरुआत में मैने आपसे “रामायण किसने लिखी है?” वाला सवाल पूछा था।
वैसे मैं आपको ये बताना चाहूंगा कि जिन जाने-माने इतिहासकार की बात मैने यहां कही है वो दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास पढ़ाते है और मुझे भी (1998-2000) उनसे शिक्षा ग्रहण करने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त हो चुका है। सिविल सर्विस की तैयारी करते वक्त उनके द्वारा लिखी किताबें भी पढी थी। लेकिन उनके और उनके ‘साथी इतिहासकारों’ से मैं कई बातों पर मतभेद रखता हूं।
ये बात जरुर है कि रामायण के तीन सौ संस्करण है। लेकिन भारत के जनमानस पर सिर्फ एक ही रामायण (बाल्मीकि की 'रामायण' और उसका हिंदी अनुवाद 'रामचरित मानस') चढ़ी हुई है। वो रामायण जिसमें लिखा है... अयोध्या के राजकुमार राम, उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण को अपनी सौतेली मां कैकेयी के चलते चौदह साल का वनवास काटना पड़ा था। उसी वनवास के दौरान लंका का राजा रावण अपने पुष्पक विमान से सीता का अपहरण कर अपने देश ले जाता है। अकेले राम और लक्ष्मण की मदद करती है वानरो की एक बड़ी सेना।

एक ऐसी सेना जिसने समुद्र पर पुल बनाकर (सेतु-समुद्रम) लंका पर चढ़ाई की थी। पुल बनाकर वानर सेना ने इतिहास रचाया था। इतिहास इसलिये क्योंकि अब तो इस पुल के साक्ष्य भी मिल गये है। लेकिन उन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों से आप क्या अपेक्षा रख सकते हैं जिन्हें भारत की हर उस प्राचीन चीज से तौबा है जिससे हमारे देश के इतिहास और पूर्वजों का सिर ऊंचा हो सकता हो। उन्हें भारत की हर चीज में खोट दिखाई पड़ता है। उन्हें भारत में हर चीज (चाहे वो संस्कृति हो या फिर धर्म या फिर सभ्यता) विदेश से ‘आयात’(Import) की हुई लगती है।
रामायण की कहानी सुनने में जरुर छोटी लगती हो। लेकिन उसका सार हर हिंदुस्तानी के मन-मस्तिष्क पर साफ दिखाई पड़ता है। शायद यही वजह है कि जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा था, “ इनमें (रामायण और महाभारत) हमें वह खास हिंदुस्तानी ढंग मिलता है, जिसमें अलग-अलग सांस्कृतिक विकास के लोगों के लिये एकसाथ सामग्री प्रस्तुत की जाती है, अर्थात् ऊंचे से ऊंचे दर्जे के विद्वानों से लेकर अनपढ़ और अशिक्षित देहाती तक के लिये।

इनके द्वारा हमें प्राचीन हिंदुस्तानियों का वह गुर कुछ-कुछ समझ में आ जाता है जिससे वह एक पंचमेल और जात-पात में बंटे हुये समाज को इकठ्ठा बनाये रखने में, उनके झगड़ो को सुलझाते रहने में, उन्हें वीर-परंपरा और नैतिक रहन-सहन की समान भूमिका देने में सफल हुए हैं।

इनके द्वारा हमें प्राचीन हिंदुस्तानियों का वह गुर कुछ-कुछ समझ में आ जाता है जिससे वह एक पंचमेल और जात-पात में बंटे हुये समाज को इकठ्ठा बनाये रखने में, उनके झगड़ो को सुलझाते रहने में, उन्हें वीर-परंपरा और नैतिक रहन-सहन की समान भूमिका देने में सफल हुए हैं।” नेहरुजी आगे लिखते है, “मै हर साल खुले मैदान में होने वाले उन लोकप्रिय तमाशों में ले जाया जाता था, जहां रामायण की कथा का अभिनय (रामलीला) होता था और बहुत बड़े मजे में उसे देखने के लिये इकठ्ठा होते थे। ये सब बातें बड़े भद्दे ढंग से हुआ करती थी। लेकिन इससे कोई अंतर नही पड़ता था, क्योकि कहानी तो सभी लोगो की जानी हुई थी।”
रामायण सिर्फ एक कहानी भर नहीं है। ये हमें सिखाती है कि कैसे हमारे आदर्श होने चाहिये। हमें अपने मां-बाप, भाई-बहन और पत्नी से बर्ताव करना चाहिये। मां-बाप की आज्ञा किसी भी हाल में पूरी करनी है। अपने वचन को पूरा करने के लिये अपनी जान भी न्यौछावर कर देनी चाहिये। इंसान का जानवरों से क्या नाता है । कैसे एक वानर भी मनुष्य के लिये ना केवल अपनी जान की बाजी लगा देता है बल्कि जन्म-जन्मांतर तक उसकी दोस्ती और भक्ति के किस्से याद किये जाते हैं। कैसे एक राजा( भगवान श्रीराम), एक दलित बूढ़िया के हाथ से उसके झूठे बेर खाकर ऊंच-नीच की दीवार मिटा देता है। कैसे एक भाई (विभीषण) पाप के रास्ते चलने वाले बड़े भाई का साथ छोड़ देता है।

हमारे पूर्वजों ने भी एक बहुत बड़ी गलती की थी। वो गलती थी अपने इतिहास को पन्नों पर ना उतारने की। हमारे सभ्यता और संस्कृति (सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता) भले ही हजारों साल पुरानी हो, लेकिन हमारे पूर्वजों ने कभी भी अपने इतिहास को गंभीरता से नहीं लिया।

हमारे पूर्वजों ने भी एक बहुत बड़ी गलती की थी। वो गलती थी अपने इतिहास को पन्नों पर ना उतारने की। हमारे सभ्यता और संस्कृति (सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता) भले ही हजारों साल पुरानी हो, लेकिन हमारे पूर्वजों ने कभी भी अपने इतिहास को गंभीरता से नहीं लिया। आज भी हमारे देश में लोग इतिहास को गंभीर विषय नहीं मानते है। आज के विद्यार्थियों के लिये इतिहास एक उबाऊ विषय है। अगर आपको यकीन ना आ रहा हो तो यहां ये बात दीगर है कि हमारे देश में पहली इतिहास की किताब (‘राजतंरगिनी’, लेखक कल्हन) 12 वी सदी में लिखी गई थी, जो कश्मीर के इतिहास पर आधारित थी। इससे पहले की कोई किताब नहीं मिली है। या यूं कहें कि नष्ट हो गई होगी। इस किताब से पहले कई संरचानाऐं जरुर मिली है जैसे, कौटिल्य की ‘अर्थशास्त्र’, लेकिन इन सभी में इतिहास का नामो-निशान नहीं है। पहली बार इतिहास लेखन मध्यकालीन युग में मुगल और दूसरे बादशाहों ने अपने राजदरबारियों से शुरु कराया था। लेकिन वे कवि भी अपने राजा की प्रशंसा ज्यादा और इतिहास कम लिखते थे।

अगर सम्राट अशोक के ऐतिहासिक शिलालेख और खंभे नहीं मिलते तो शायद इस महान राजा को भी शायद ही कोई जान पाता। इन शिलालेखों पर लिखी लिपि भी एक विदेशी इतिहासकार ने ही खोजी थी।

अगर सम्राट अशोक के ऐतिहासिक शिलालेख और खंभे नहीं मिलते तो शायद इस महान राजा को भी शायद ही कोई जान पाता। इन शिलालेखों पर लिखी लिपि भी एक विदेशी इतिहासकार ने ही खोजी थी। सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई से ये तो पता चल गया है कि हमारी सभ्यता भी हजारो साल पुरानी है लेकिन उस काल के लोगों का रहन-सहन कैसा था, किस तरह का राज-तंत्र वहां काम करता था, वो किस धर्म को मानते थे, ये वो सवाल है जो आजतक एक बड़ी पहेली बने हुये है। उसका सबसे बड़ा कारण ये है कि खुदाई के दौरान मिली लिपि को इतिहासकार पढ़ने में नाकाम रहे हैं।
लेकिन शायद इसी “ऐतिहासिक भावना” की कमी का फायदा उठाकर कुछ इतिहासकार और बुद्धिजीवी हमारे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में जुटे है। खुद नेहरुजी ने लिखा है, “ यूनानियों, चीनियों और अरबवालों की तरह प्राचीन हिंदुस्तानी इतिहासकार नहीं थे। ये एक दुर्भाग्य की बात है और इसके कारण आज हमारे लिए तिथियां या काल-कम् निश्चित करना मुश्किल हो गया है। घटनाएं एक दूसरे से गुथ जाती है और बडा उलझाव पैदा हो जाता है।” इसलिए जरुरी है कि हम हर उस शख्स को मुंह-तोड़ जबाब दे जो हमारी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी आम लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश करेगा। इसलिये हर नागरिक के मन में “ऐतिहासिक भावना” की लौ जलानी जरुरी है। क्योंकि इतिहास गवाह है जिस देश या सभ्यता ने अपने अतीत को भूलाने की कोशिश की है उसका पतन निश्चित है। एक ऐसा पतन जिससे उबरने में सदियों बीत जाती है।

Sunday, April 6, 2008

जीनियस कॉल-गर्ल


जब वो दस साल की हुई तो सभी उसकी बुद्धिमानी का लोहा मानने लगे। जिस यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लोग तरस जाते है, पूरी जिंदगी निकल जाती है, उसमें उसने महज तेरह साल की ही उम्र में दाखिला ले लिया था। उस वक्त उस छोटी सी लड़की को सभी बुलाते थे, मैथमेटिक्स जीनियस (MATHMATICS GENIUS) के नाम से। लेकिन पढा़ई पूरी करने के बाद जब वो दुनिया के सामने आई तो किसी को भी यकीन करना नामुमकिन था। वो दुनिया के लिये बन चुकी थी एक ‘जीनियस’ हाईप्रोफाईल कॉल-गर्ल।
दुनिया की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटिज़ में शुमार ऑक्सफोर्ड में पढ़ना हर STUDENT का एक सपना होता है। यही सपना लेकर सोफिया नाम के उस लड़की ने भी करीब दस साल पहले इस विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया था। करीब 13 साल की उम्र में ही ऑक्सफोर्ड में दाखिला लेने वाली सोफिया सबसे कम उम्र की छात्रा थी। आप सोच रहे होंगे कि सोफिया अब एक विद्वान बन चुकी होगी। लेकिन आप को अपने कानों पर विश्वास करना मुश्किल हो जायेगा। क्योंकि सोफिया का नाम अब इंग्लैड़ की सबसे महंगी कॉल-गर्ल में शुमार हो चुका है। लोग उसे ‘शिल्पा ली’ के नाम से जानते है। इंटरेनट की एक सैक्स-साइट पर सोफिया ने जिस्मफरोशी का बाकायदा विज्ञापन दे रखा है। वेबसाइट के मुताबिक वो इंग्लैंड के सैलफोर्ड स्थित अपने फ्लैट से ये धंधा चलाती है। वेबसाइट पर पड़ी उसकी तस्वीरों को देखकर कोई भी यकीन कर सकता है कि वो पूरी तरह से वेश्यावृति के धंधे में लिप्त है।
कभी ऑक्सफोर्ड की MATHMATICS GENIUS रही सोफिया उर्फ शिल्पा ली पर अपने आप को सैक्सी एंड स्मार्ट कहलाना पसंद करती है। एक घंटे का वो अपने ग्राहको से 130 पाउंड वसूलती है। शिल्पा के मुताबिक अपने पारिवारिक वजह से वो इस सैक्स के इस गंदे धंधे में उतर गई है। शिल्पा के मुताबिक जब वो ऑक्सफोर्ड में पढ़ रही थी तो उसके पिता को दो नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण करने के चलते सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया था। इस घटना से वो अंदर से इस कदर टूट गई थी कि अपनी जिंदगी को संभालने के लिये उसने शादी भी रचाई। लेकिन कुछ ही दिनों में वो टूट गई। इन दोनों घटनाओं ने सोफियो को अंदर तक तोड़कर रख दिया। अपनी जिंदगी खुशगवार बनाने के लिये उसने जिस्मफरोशी का धंधा चुन लिया।
सोफिया उर्फ शिल्पा ली के ग्राहक भी जानते है कि वो गलत धंधे में पड़ गई है। शायद यही वजह है कि उसके एक ग्राहक ने उससे ये धंधा छोड़ने तक की गुहार लगाई है। सोफिया की वेबसाईट पर उस ग्राहक ने लिखा है “मुझे पूरा विश्वास है कि सोफिया इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि उसने जो रास्ता अख्तियार किया है वो अच्छा नहीं है। जिंदगी को फिर से शुरु करने के लिये ये अच्छा करियर नहीं है। मुझे यकीन है कि उसने जिस्मफरोशी का धंधा जिंदगी से हताश हो कर चुन लिया है।”
जो दर्द सोफिया दुनिया को नहीं बता सकी, वो उसके एक ग्राहक ने लिखा है। बिना अपनी पहचान बताये उसके ग्राहक ने लिखा है-“सोफिया को इस धंधे को बंद कर देना चाहिये। एक इंसान होने के नाते उसे एक और मौका मिलना चाहिये। सोफिया को अपना शोषण बंद कर देना चाहिये। सोफिया तुम अपने भाई-बहनों को दिखा दो कि तुम इस कांटो भरी जिंदगी से उबर सकती हो।” मलेशिया की रहने वाली सोफिया उर्फ शिल्पा ली की कहानी जिसने भी सुनी, उसने ही अपील की है कि सोफिया उर्फ शिल्पा ली इस धंधे को छोड़कर एक नई जिंदगी की शुरुआत करे।

Thursday, April 3, 2008

देशी जेम्स बांड


लाल मिर्ची को खाने में डाल दें तो स्वाद आ जाता है, ये तो पता था। लेकिन लाल मिर्ची का एक और उपयोग होता है। गुनाह की दुनिया में। आप बिल्कुल ठीक सोच रहे हैं। लाल मिर्ची का उपयोग शातिर अपराधी भी करते है। किसी की आंख में पड़ जाये तो उसे लूटना आसान है। वैसे, आजकल लड़कियां भी अपने पर्स में मिर्ची-स्प्रे रखती है। जान ही गये होंगे क्यों। अरे भई, आत्मरक्षा के लिये। लेकिन एक खास गिरोह के चोर भी इसका इस्तेमाल करते हैं। ये जानकर आप शायद हैरान रह जाएंगे। सुनिये....कैसे...
कुछ महीने पहले राजधानी दिल्ली के एक फाइव स्टार अस्पताल में लाखों की लाईफ सेविंग ड्रग्स चोरी हो गई। बताना ठीक नहीं है कौन सा। लेकिन दिल्ली में एक ही फाईव स्टार अस्पताल है, सो समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। पहली ही नजर में अस्पताल प्रशासन को लग गया कि इस वारदात में किसी कर्मचारी का ही हाथ है। ताला तोड़ा नहीं गया था। फ्रैंडली-एंट्री थी। लेकिन इतने बड़े अस्पताल में जिसमें सैकड़ो कर्मचारी काम करते हों, तो चोर को ढूंढना टेढी खीर था। प्रशासन ये भी नहीं चाहता था कि इस चोरी की जानकारी सीनियर अधिकारियों के अलावा ना तो हॉस्पिटल में काम कर रहे स्टाफ को लगे और ना ही मीडिया को। खाकी वर्दीवालों को बुलाकर भी अस्पताल अपनी फजीहत ना कराना चाहता था। वो अच्छी तरह जानते थे कि पुलिस की जॉच-पड़ताल कैसी होती है। पता चला सभी कर्मचारियों को खड़ा कर दिया एक लाईन में तो अस्पताल में मरीजों की तीमारदारी करने वाला कोई नहीं बचेगा। या फिर बुला लेंगे थाने और लॉकअप रुम में। इस सब झंझट से बचने के लिये अस्पताल प्रशासन ने न्यौता दिया एक देशी जेम्स बांड को। जेम्स बांड यानि एक प्राईवेट डिटेक्टिव।
देशी जेम्स बांड ने सबसे पहले अस्पताल के उस स्टोर का मुआयना किया जहां से दवाईयां चोरी हुई थी। चोरों ने अपने काम को अंजाम देने के बाद पूरे