02 अक्तूबर, 2007

नशे का देवता

मेरा यहां (यानि ब्लॉग) अपनी जगह बनाने का मकसद सिर्फ इतना था कि टी.वी में काम करने के दौरान जो साहित्यक दुनिया से मेरा नाता टूट गया था उसके बारे में थोडा बहुत लिखने की कोशिश करुं या ये कहे कि मुझे अच्छा लगता है 'लिखना'। लिखने से मतलब अपने 'प्रोफेशन' से हटकर--ऐसा नहीं है कि मैं टी.वी में काम करते हुये नहीं लिखता हूं। बेशक लिखता हूं--कॉपी एडिटर को ज्यादा हेरफेर करने की जरुरत भी नहीं पड़ती है शायद। लेकिन सिर्फ अपराध से जुड़ी खबरों के बारे में। जो लोग ये सोचते है कि "टी.वी वालो को लिखना नहीं पडता", वो सरासर गलत है। कुछ मायनों में तो टी.वी. वालों को लिखने में ज्यादा परेशानी होती है। दरअसल टी.वी में कम समय (और शब्दों) में ज्यादा जानकारी देनी पड़ती है।
एक क्राइम रिपोर्टर होने के नाते ये मेरा फर्ज है कि 'डेस्क' को साफ-सुधरी और महत्वपूर्ण जानकारियों से भरपूर कॉपी मिले--और इस काम में बहुत हद तक कामयाब भी रहा। बरहाल जिने लोगों ने मुझे यहां पढ़ा उनका मानना है कि मै यहां पर अपराध से जुड़ी जानाकारियां भी दूं--देखा आपने जो लोग मुझे जानते है वो मुझे से सिर्फ और सिर्फ अपराध से जुड़ी खबरें ही जानना चाहते हैं। खासतौर से वो मुझसे नशे के देवता के बारे में जानना चाहते है। अब इस बात का फैसला आपको करना है कि मै "गुनाहगार" हूं या नहीं। अगर आपको याद ना हो तो मैं स्मरण करा देता हूं कि मैने अपनी जगह यहां पर इसी लिये बनाई थी कि क्या अपराध जगत से जुडी खबरों को दिखाना गुनाह है।
खैर एक बार फिर मैं नशे के देवता पर लौटता हूं।कौन है ये नशे का देवता ? ये ड्रग-लार्ड यानि नशे का देवता है दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके का रहने वाला शराफत शेख। करीब बीस साल पहले वो बिहार से दिल्ली अपने सपनों को पूरा करने की फिराक में आया था। वो एक अमीर आदमी बनना चाहता था।
लेकिन दिल्ली आने पर उसे नौकरी मिली एक ढाबे पर बर्तन मांजने की। लेकिन उसके दिलो-दिमाग में तो रईस बनने का सपना घूम रहा था। गाजियाबाद के ढाबे को छोडकर वो निजामुद्दीन के एक ढाबे पर काम करने लगा--शायद मुईनुद्दीन ढाबा। कुछ दिनों बाद ही उसने ढाबे की नौकरी छोड़कर कबाड़ी का काम शुर कर दिया। कबाड़ी का काम करते-करते वो चोरी का माल खऱीदने लगा। इस धंधे में नुकसान कम और मुनाफा ज्यादा था। यहां से उसने फिर कभी जरायम की दुनिया में पीछे मुडना नहीं सीखा। चोरी का माल खरीदते-खरीदते उसकी वास्ता पड़ा निजामुद्दीन इलाके के ड्रग्स के सौदागरों से। नशे की पुड़िया ने उसे माला-माल कर दिया। ड्रग्स के धंधे ने उसका सपना पूरा कर दिया। जल्द ही उसकी गिनती इलाके के रसूखदार लोगों मे होने लगी। उसकी निजामुद्दीन स्थित कोठी,'बिहार भवन' को देखकर लोग यही सोचते कि ऊपर वाला जब भी देता है छप्पर फांड़कर देता है। दिल्ली मे इस कोठी सहित उसकी कुल तीन घर थे। राजधानी में ही उसके दो कारो के शोरुम और दो गेस्ट हाउस थे। मुंबई में एक हीरो को बडा शोरुम था। मुंबई में उसने लग्जरी गाडियों का एक बडा जखीरा इकठ्ठा कर लिया था।
यहां पर ये बताना जरुरी है कि जब दिल्ली पुलिस को उसकी गतिविधियों की भनक लगी और उसपर शिकंजा कसना शुरु हुआ, तो शराफत मुंबई भाग गया। यहां उसकी बालीबुड में गहरी पैठ बन गई। उसके हीरो के शोरुम मे हिंदी फिल्मो की बड़ी-बड़ी हीरोईनें खऱीददारी करने आती थी। उसके कारों के जखीरों से ही बडे-बडे अभिनेताओं ने गाडियां खरीदी--लोगो की माने तो जिस कार से एक जाने-माने हीरो ने एक्सीडेटं किया था वो उसने शराफत शेख से ही खरीदी थी।
शराफत शेख का एक और सपना था। वो एक हिंदी फिल्म बनाने की फिराक में था। लेकिन ये उसका एक ऐसा सपना था जो सिर्फ एक सपना रह गया। क्योकि 2005 में वो दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़ गया। गिरफ्तारी के बाद उसकी सारी संपत्ति सील कर दी गई। दिल्ली पुलिस की माने तो ये सारी संपत्ति उसने ड्रग्स के धंधे से बनाई थी। लेकिन ये सुनकर आपको ताज्जुब होगा कि ड्रग्स के मामले में वो पहली बार 2005 मे ही पकडा गया था--उससे पहले वो दूसरे अपराधों मे जेल काटकर आया था। यहां ये बात जरुर हैरान करती है कि एक आदमी जो बीस साल से ड्रग्स के धंधे में लिप्त था---ड्रगलार्ड--और उसके बारे में पुलिस को कैसे नहीं पता चला। कही ऐसा तो नहीं कि ये सबकुछ पुलिस की सरपरस्ती मे हो रहा था। क्योंकि जब शराफत शेख गिरफ्तार हुआ था तो उसके परिवारवालों ने यही आरोप लगाया था कि जब वे लोग निजामुद्दीन थाने के पुलिसवालों को हर महीने दस लाख रुपये देते हैं तो क्यों गिरफ्तार किया गया शराफत शेख को। यानि एक बात तो तय है कि शराफत शेख की लोकल लेवल पर पुलिस से तो सॉठ-गॉठ थी ही। जब पानी सिर से ऊपर उठ गया तो दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उसे धर-दबोचा।
फिलहाल शराफत शेख जेल में है और उसकी गिरफ्तारी के बाद कभी तो उसकी पत्नी जोहरा शेख उफ चमन तो कभी उसका 18 साल का बेटा वसीम उसके 'एम्पायर' को खडा करने में जुटे हैं। लेकिन पुलिस ने इस बार शराफत शेख के परिवारवालों के खिलाफ कमर कस रखी है। हां एक बात और जो शराफत शेख के बारे में कही-सुनी जाती है कि वो दाऊद का रिश्तेदार है। लेकिन पुलिस की लाख कोशिशों के बाबजूद आजतक कोई ऐसा पुख्ता सबूत पुलिस को नहीं लगा है जिससे ये साबित हो सके कि दोनों साथ मिलकर धंधा करते थे। यानि शराफत शेख ने अपना सारा एम्पायर अपने ही बलबूते खडा किया था। कही इसीलिये तो पुलिस फाईलों मे उसे ड्रगलार्ड के नाम से संबोधन किया जाता है। खैर इस बात का जबाब खुद पुलिस के पास भी नहीं है। लेकिन यहां एक बात दीगर है कि निजामुद्दीन इलाके के लोगो के लिये शराफत किसी देवता से कम नही है।

3 टिप्‍पणियां:

vir ने कहा…

Nice to read your blog of criminal world...explore more and more...

DEO PRAKASH CHOUDHARY ने कहा…

अच्छा है आपका प्रयास। गुनाहगारों की दुनिया का अनसुना सच बदलते समाज का एक चेहरा भी है...और उस चेहरे से हर किसी को आज न तो कल सामना तो करना ही पड़ेगा।
शुभकामनाएं।

nalini ने कहा…

drug lord ki tasveer bhi honi chahie.....

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)