09 अक्तूबर, 2007

मौत की गलियां


दिनभर धूप का पर्वत काटा
शाम हुई तो पीने निकले,
जिन गलियों में मौत बिछी थी
उन गलियों में जीने निकले।

ये पंक्तियां किसने लिखी नहीं मालूम। किसी ने कहा निदा फाजली की है तो किसी ने कहा दुष्यंत कुमार ने। खैर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि किसने लिखा। लेकिन एक शाम मैं शूट से लौटा--जैसा अक्सर एक क्राइम रिपोर्टर दिनभर अपराध की खबरों का पीछा करते हुये लौटता है। मैने देखा कि एक साथी रिपोर्टर मुंह लटकाये घूम रहा है। मैने उससे पूछा, " तुम्हारी तो आज स्टोरी जा रही है फिर मुंह लटकाये क्यों घूम रहे हो।" स्टोरी से यहां मतलब किसी कहानी-किस्से से नही बल्कि उस खबर से था जो वो आज दिल्ली से सटे एक शहर से करके लौटा था--किसी भी चैनल के न्यूजरुम में खबर को स्टोरी ही कहा जाता है।
दरअसल काफी देर से मै उसे देख रहा था कि वो मेरे इर्द-गिर्द टहल रहा था और कुछ कहने वाला था लेकिन मौका नहीं मिल रहा था। दरअसल मेरे साथी रिपोर्टर शाम को अपना दुखड़ा मेरे से ही रोते है-- माफ करना अपनी शिकायतें मुझे ही बताते है। चाहे एसाईनमेंट वाले बिना बात के हड़काये या फिर डेस्क के लोग उनकी स्टोरी को 'हल्के' में ले रहे हो। खैर जो उसने मुझे बताया उसे सुनकर मै जोर से हसां। लेकिन बाद में उसपर काफी देर तक सोचता रहा।
साथी रिपोर्टर ने बताया कि प्रोडियूसर साहब ने स्टोरी से उसकी पीसटू हटा दी है। मैने उसे समझया कि अभी उसके करियर की शुरुआत है, उसका ध्यान अच्छी स्टोरी करने में होना चाहिये ना कि पीसटू। अगर स्टोरी अच्छी होगी तो शायद ही कोई ऐसा प्रोडियूसर होगा जो स्टोरी से रिपोर्टर का पीसटू हटा देगा। स्टोरी चाहे कितनी भी रिपोर्टर की हो लेकिन प्रोडियूसर अपने प्रोग्राम में जान डालने के लिये रिपोर्टर की पीसटू लगायेगा ही।
लेकिन जो बात अब मेरा साथी रिपोर्टर बताने वाला था वो वाकई मेरे अंदर तक छू गई। उसने बताया कि प्रोडियूसर ने उसकी पीसटू इसलिये हटा दी थी क्योकि उसके " चेहरे पर पसीना था और शेव बढ़ी हुई थी।" वो बोलता जा रहा था और मैं खड़ा-खड़ा मुस्करा रहा था। लेकिन अचानक उसने ऐसी बात कही कि मेरी हसीं पर ही रोक लग गई। वो बोला "सर, वहां डबल मर्डर हुआ था। वहां इतनी भीड़ जमा थी, पुलिस और मीडियावाले अलग थे। वहां क्या मैं किसी से कहता कि यार मुझे पानी दे दो मुंह धोना है। दोनों लाशों के सामने खड़े होकर पीसटू करनी है।"

वाकई क्राइम रिपोर्टर के लिये किसी भी खबर का पीछा करते हुये खासतौर से सनसनीखेज और संवदेनशील--जैसी अभी मेरे साथी रिपोर्टर ने बताई--कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। एक तो पुलिस और पीड़ित परिवार से ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकठ्ठी करनी पड़ती है। फिर अगर ऑफिस पहुंचने पर ये पता चल जाये कि दूसरे चैनल के पास ज्यादा जानकारी है तो और भी मुसीबत है। फिर तो पूरा न्यूजरुम तुम्हारे ऊपर चील-गिद्द की तरह टूट पड़ेगा। उसके साथ-साथ एसाईनमेट वाले शूट करते वक्त ही आपको लगातार फोन कर 'तंग करते रहेंगे कि कितना शूट हुआ है कितना बचा है, ऑफिस कबतक लौटोगे।' एसाईमेंट वाले दरअसल डेस्क वालो का शिकार होते है। क्योंकि उन्हे खबर को जल्द से जल्द चलाना है तो उन्हे जल्द से जल्द स्पॉट (मौका-ए-वारदात) के विजयुल चाहिये होते है। इन सब दबाब में काम करता है एक क्राइम रिपोर्टर।
इसके साथ-साथ एक और मुश्किल से गुजरना पडता है रिपोर्टर को 'फील्ड' में। वो है उसके साथी। यानि कैंमरामैन और गाड़ी का ड्राइवर। कैमरामैन जल्द से जल्द ऑफिस भागने की तैयारी में रहता है। जबकि रिपोर्टर चाहता है कि वो स्पॉट से सबसे बाद में जाना चाहता है--पुलिस से भी बाद में कि कही कोई ऐसा सुराग हाथ ना लग जाये जो पुलिस की आंखो से बचा रह गया हो।
ऐसे में मेरे साथी रिपोर्टर ने सवाल सही उठाया था। "हम किसी क्राइम की खबरों को कवर करते वक्त ये ध्यान ऱखे कि कैसे इस वारदात को अंजाम दिया गया, किसने दिया, इसके पीछे कातिलों का मकसद क्या था, पुलिस की तफ्तीश किस दिशा में जा रही है, या फिर ये ध्यान रखे कि पीसटू करते वक्त मैं कैसा लग रहा हूं, कहां पीसटू करनी है?" वो आगे बोला, " मै तो सिर्फ ये ध्यान रखता हूं कि कवरेज करते वक्त पीड़ित परिवार के लोगों की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे।"
उसकी बात से मुझे दो किस्से हमेशा ध्यान रहते है। अपराध की खबरों को कवर करते वक्त क्राइम रिपोर्टर को ये दोनो किस्से गांठ की तरह हमेशा बांधकर रखने चाहिये।
पहला करीब तीन-चार साल पुराना है। दिल्ली के रोहिणी इलाके में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की बड़े ही बेरहमी से गला रेंत कर हत्या कर दी गई थी। इनमे से एक करीब 55 साल की महिला थी, एक उनका बेटा और तीसरा उनका पांच साल का पोता था। वारदात शाम के करीब आठ बजे सामने आई थी। चैनल्स के लिये प्राइम टाईम था और मामला मिडिल क्लास फैमली का था। सो 'तान दिया' सभी चैनल्स ने इस स्टोरी को। हम भी वहां पहुचें। देखा सारा माहौल गमगीन था। भारी संख्या में पुलिसबल तैनात था। अधिकतर चैनल्स की ओबी वैन छतरी खोलें तैनात थीं। यहां तक की अखबार के रिपोर्टर भी शाम के आठ बजे कवर करने आये थे--अखबार के रिपोर्टर अधिकतर ऑफिस में बैठे-बैठे फोन पर ही सारी डिटेल इकठ्ठी कर लेते है।

मैं भी एक प्रत्यक्षदर्शी से बात कर जानकारी ले ही रहा था कि एक बड़े जोर से हसंने की आवाज मेरे कानों में पड़ी। हम दोनों ने ही उधर देखा। एक महिला रिपोर्टर मौका-ए-वारदात से कुछ दूरी पर ही अपने मोबाइल फोन पर किसी से बड़े जोर-जोर से बात कर हसं रही थी। वहां मौजूद लोग और पुलिसवाले उसे लगातार देख रहे थे और अनसुना कर रहे थे। थोड़ी ही देर में मैने देखा कि पीड़ित परिवार के रिश्तेदार और पास-पडोसी उस महिला रिपोर्टर पर भड़क पड़े। दरअसल महिला रिपोर्टर का 'चैट' होना वाला था। और अपने चैट को 'लाईव' बनाने के लिये वो पीड़ित परिवार को लाईव बात करने के लिये न्यौता देने लगी थी। लेकिन उसका न्यौता इसतरह का था कि लग रहा था कि वो किसी पेज-थ्री पार्टी के लिये उन्हे बुला रही हो।
अब तो वहां मौजूद सभी लोग मीडिया को कोसने लगे। " यहां किसी के घर मातम चल रहा है और ये हमारा मजाक उड़ाने के लिये हमारी फोटो खीच रहे है।" सभी मीडियाकर्मियों ने वहां से खिसकना ही बेहतर समझा। मैं जिस प्रत्यक्षदर्शी से बात कर रहा था वो भी वहां से निकल गया। मेरी बाईट बीच में ही रह गई।

दूसरा किस्सा है करीब एक साल पुराना। दिल्ली की ही व्यस्त रिंग रोड पर पंजाबी बाग क्लब के सामने तीन लोगों को ताबड़तोड़ गोलियों से भून दिया गया था। इनमे से एक प्रेमी जोड़ा था जो किसी मंदिर में शादी रचाने जा रहा था और तीसरा उनका साथी था। बाद मे पता चला कि लडकी के घरवाले इस शादी के खिलाफ थे और उन्होने हमला बोला था। जैसे ही मुझे घटना के बारे में पता चला मैं तुरंत वहां के लिये कूच कर गया। दरअसल उस वक्त मैं धौला-कुंआ से गुजर रहा था। सो मुझे स्पॉट तक पहुंचने में मुश्किल से 15 मिनट लगे। पुलिस के पहुंचने के कुछ मिनटों बाद ही मै भी वहां पहुंच गया। फोरिंसक टीम भी मौके पर नहीं पहुंची थी तबतक। मैने कैमरामैन से कहा कि वो शॉटस बनाने शुरु करे। वो विजयुल ले ही रहा था कि मेरी नजर अचनाक उस पर पडी और मै चिल्लाया, "नहीं गाडी के शीशे पर हाथ नहीं लगाना।" इतने में एक पुलिसवाला भी वहां पहुंचा और गुजारिश करने लगा, "भाईसाहब हमारी नौकरी क्यों लेने के चक्कर में हो।" कैमरामैन को समझ नहीं आ रहा था ऐसा उसने क्या कर दिया था। मैने उसे समझाया, "अभी फोरिंसक टीम नहीं आई है, उसके आने के बाद वो गाड़ी से फिंगर-प्रिंट उठायेंगे।"
ये बाते एक रिपोर्टर और कैमरामैन को ध्यान रखनी चाहिये कि वो स्पॉट कवरेज करते वक्त किसी भी तरह से पुलिस की तफ्तीश में बाधा ना बने--वैसे अब पुलिसवाले हर किसी वारदात को कवर करते समय यही सोचते है कि मीडिया उनकी जॉच में बाधा बन रही है।
खैर रही बात मेरे साथी रिपोर्टर की तो क्राइम रिपोर्टिंग करते वक्त ये दोनो बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिये कि हम किसी की भावनाओ को ठेंस तो नही पहुंचा रहे। दूसरा पुलिस की तफ्तीश तो बाधित नहीं हो रही है।
तीसरी बात और। वो है रिपोर्टर की पीसटू से संबधिंत। यहां वो कहावत कही ना कही सटीक बैठती है कि 'जो दिखता है वही बिकता है।' रिपोर्टर टी.वी पर ऑन-एयर होता है। इसलिये जरुरी है को वो हमेशा शेव बनाकर ही फील्ड में जाये। लाईनिंग शर्ट कभी ना पहने। अगर हो सके तो मौका-ए-वारदात पर ही पीसटू करे--लाश बैकग्राउंड में ना हो ध्यान रहे। और अगर वो पीसटू करने में समर्थ ना हो तो वहां से थोड़ी दूरी पर या फिर थाने या अस्पताल (या मोर्चरी) पर कर दे।
वैसे ये सब बातें बोलने में अच्छी लगती हैं। असल जिंदगी में निभाना मुश्किल। अब मुझे ही लीजिये। मै कई बार लाईनिंग शर्ट में ही पीसटू कर देता हूं और कभी-कभी हल्की-हल्की शेव भी बढ़ी होती है।
इन सब के बीच कड़ी धूप, धूल-धक्कड़ और डेडलाईन में करनी पड़ती है क्राइम रिपोर्टिंग और फिर उन्ही कत्ल, लूटपाट और डकैती की खबरों पर हम अपनी पीसटू दिखाकर या देखकर अपना करियर बनाते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

VIDYUT MAURYA ने कहा…

Dear Rajput,
read your story. It is a very practical explanation of a crime reporter. useful to media students.

varun ने कहा…

Dear Sir,
I read your story and suggestions. As i m also in this field. It is really informatic and helpful to me. These suggestion wl help me to groom myself.

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)