14 अक्तूबर, 2007

अफसरशाही और पत्रकारिता







एक लंबे अरसे के बाद कोई किताब खरीदी थी। कॉलेज के जमाने से ही इस किताब को पढ़ने का मन था। लेकिन कभी मौका नहीं मिला। ये किताब मेरी इस लिये भी पसंदीदा था क्योंकि इसमें देश की बाबूगिरी को काफी करीब से दिखाया गया है। किताब का नाम है ENGLISH,AUGUST। लेखक भी एक बाबू, माफ कीजिये, एक आईएएस अधिकारी, उपमन्यु चैटर्जी हैं। कॉलेज के समय से मेरी भी तमन्ना था कि आईएएस अधिकारी नहीं तो कम से कम एक आईपीएस अधिकारी तो बनना ही है। मेरे घरवाले भी चाहते थे कि मैं एक आईएएस अधिकारी बनूं—जैसा कि यू.पी, बिहार के अधिकतर मीडिल क्लास मॉ-बाप चाहते हैं। लेकिन अफसोस कि मैं कभी सिविल सर्विसेज का एग्जाम क्लीयर नहीं कर पाया और पहुंच गया मीडिया में—जैसा अक्सर सिविल सर्विसेज को क्लीयर करने में नाकाम रहे नौजवान करते हैं। मैने दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला भी इसी वजह से लिया था--एम.ए (हिस्ट्री) भी चलता रहेगा और साथ में किसी कोचिंग इंस्टटीयूट में तैयारी भी करता रहूंगा। बस, इसीलिये ENGLISH, AUGUST पढ़ना चाहता था। वैसे ये मेरा दुर्भाग्य ही—या सौभाग्य—रहा कि आईएएस नही बन पाया। वैसे मेहनत बहुत की थी और तैयारी भी पूरी हो चुकी थी लेकिन फाईनली नही हो पाया। खैर, इस रविवार में अपनी पत्नी क साथ शॉपिंग मॉल घूमने निकल गया। गाडी पार्किंग पर खड़ी करने के बाद हम सबसे पहले पहुंचे सागर रत्ना रेस्त्रा में-ये मेरी पत्नी का पसंदीदा रेस्त्रा में से एक है। साऊथ इंडियन खाना खाने के बाद हम थोड़ी देर शॉपिंग करने लगे।
इसी बीच मेरी नज़र पडी एक बुक-शॉप पर। काफी दिनों से कोई किताब नहीं पढ़ी थी।


शॉप पर पहुंचने पर मैने डिमांड की हाल में ही चर्चित रही एक रॉ अधिकारी द्धारा लिखी गई एक किताब। लेकिन वो तो नही मिली फिर मैने एक-दो किताब का नाम लिया। लेकिन वहां कोई भी ऐसी किताब नहीं थी जो मुझे चाहिये थी, सो मैने ENGLISH,AUGUST लाने के लिये सेल्समैन को बोला। शुक्र था वो किताब शॉप पर मौजूद थी।
किताब को पढा तो एक मुफ्फसिल शहर और उसके सरकारी ढांचे की जानकारी पता चली। लेकिन जैसे-जैसे किताब पढ रहा था वैसे-वैसे एक ख्याल मन में आ रहा था कि अच्छा ही हुआ कि मैं एक बाबू—माफ करना, सरकारी अधिकारी-- नहीं बना। कुछ मामले में पहले-पहल जब अखबार में नौकरी की शुरुआत की थी तो तब जरुर लगता था कि मैं सिविल ऑफिसर क्यों नहीं बन पाया। लोकतंत्र (हमारे देश जैसे) में सिविल अधिकारी हो या फिर आईपीएस अधिकारी उनकी हाथ में 'पॉवर' होती है। खासतौर से एक जिले में इन अधिकारियों के पास बेइंतहा ताकत होती है। यही वजह है कि लोग इनके दरबार में आकर नत-मस्तक होते है। चाहे कितना ही हम “LPG—LIBERLISATION, PRIVATISATION AND GLOBALISATION” कि बात करलें लेकिन सरकारी अधिकारियों पर अभी भी बहुत पॉवर है। यही वजह है कि नौजवान इन नौकरियों की तरफ दौड़ते है। वैसे बुरा भी नहीं है क्योंकि “THEY ARE THE PEOPLE WHO MOVE THE THINGS.” लेकिन एक कहावत है “POWER CORRUPTS.” बस यही मात खा जाती है हमारी अफसरशाही।

लेकिन जैसे-जैसे मैने अखबार में अपने कदम जमाने शुरु किये मुझे एहसास होने लगा कि कलम की ताकत क्या होती है। क्यो मैं एक सरकारी अधिकारी से कई लाख गुना अच्छी नौकरी कर रहा हूं—सिर्फ एक ही चींज का अफसोस होता था वो भी ज्यादा नही, पैसे का। अखबार में सैलरी अच्छी नहीं मिलती थी। लेकिन जैसे-जैसे मैने वहां रिपोर्टिंग—स्कूप और इनवेस्टीगेटिव—करनी शुरु की मुझे एहसास हो गया कि एक अच्छे और बढिया रिपोर्टर के सामने एक आईएएस और आईपीएस भी पानी भरते हैं। अखबार में मैने कई ऐसी स्टोरिज की जिसे पढ़कर लोग हिल जाते थे—वो बात और है कि मैं जिस अखबार में काम करता था उसकी सर्कियुलेशन ज्यादा नहीं थी। लेकिन ऑफिसयल सर्किल में वो अखबार जरुर पढ़ा जाता था। साथ-ही-साथ दूसरे अखबारों के दफ्तरों में भी पढ़ा जाता था। कई बार मुझे पता चला कि जो-जो स्टोरीज मैने की, उस पर पुलिस कमिश्नर ने जॉच बैठाई—दरअसल सभी नेशनल डेली में छपी खबरों को पुलिस कमिश्नर के सामने रखा जाता है। अगर पुलिस कमिश्नर को लगता है कि अखबार में छपी खबर में जरा भी सच्चाई है तो वो तुरंत उस पर अवश्यक कारवाई के आदेश दे देता है।
उसके बाद टी.वी में आ गया तो जरा भी मलाल नहीं रहा कि मैं एक आईएएस या आईपीएस क्यों नहीं बना। जिस तरह से पढ़ने को मिलता है कि इन अधिकारियों को एक अनपढ़ और जाहिल नेता भी अपने इशारों पर नचा लेता है उससे तो कही ज्यादा अच्छा है कि मै पढ़े-लिखे और सभ्य लोगों के साथ काम करता हूं—मीडिया में अभी भी ऐसे ही लोगों की तूती बोलती है। टी.वी का इम्पैकट भी अखबार से ज्यादा होता है।
पहली नौकरी एक प्रोडक्शन हाउस में थी—जिसका जल्द ही एक न्यूज चैनल आने वाला है और मेरी पत्नी इसी कंपनी में काम करती है। वहां देश के एक बडे न्यूज चैनल के क्राइम प्रोग्राम में काम करने का मौका मिला। वहां रहकर ऐसी स्टोरीज की बडे अधिकारियों के पसीने छूट जाते। एक बार तो उत्तराखंड की एक डबल मर्डर की मिस्ट्री की स्टोरी ऑन-एयर की तो आईजी साहब का फोन आ गया कि हमें इस "केस को सुलझाने में तुम्हारी मदद चाहिये।" उस दिन एहसास हुआ कि एक पत्रकार अगर UNBIASED रिपोर्टिंग करे तो वो देश और समाज का कितना हित कर सकता है।
क्राइम रिपोर्टर काम सिर्फ इतना नहीं है कि वो जो अपराध घट रहा है उसे लाकर टी.वी पर पटक दे। अगर पुलिस जानबूझकर किसी केस को सुलझा नहीं रही हो तो ऐसे में एक रिपोर्टर का फर्ज है कि दूध का दूध और पानी का पानी करे। कई बार पुलिस महकमें के आला-अधिकारियों को किसी केस का पता भी नहीं होता है और उसके मुलाजिम (माताहत अधिकारी) आरोपियों से मिल जाते हैं। मेरे सामने ना जाने कितने ऐसे मामले आये हैं जहां एसपी या डीसीपी को पता ही नहीं होता है कि उसके जिले के पुलिसवाले क्या मनमानी कर रहें हैं। हमारे (मीडिया) दखल देने के बाद ही आला-अधिकारियों ने मामले में हकीकत सामने लाना का वादा किया और इंसाफ भी हुआ।
रिर्पोटिंग करते वक्त ये भी ध्यान रखना चाहिये कि जरुरी नहीं है कि जो पुलिस कह रही है वो सौ फीसदी सच है। ना जाने कितने मामलों मे तो पुलिस केस को जल्द से जल्द सुलझाने के चक्कर में किसी बेकसूर को ही जेल की हवा खिला देती है। मुझे याद है कि बहुचर्चित सफदजंग बलात्कार मामले में पुलिस ने एक बेकसूर इंसान को महिला के बलात्कार के आरोप में जेल भेज दिया। पुलिस के आला-अधिकारियों ने बाकयदा प्रेस कॉफ्रेंस कर ढिंढोरा पीटा कि उन्होने 72 घंटे के अंदर मुजिरम को पकड लिया। लेकिन मुजरिम से प्रेस की बात नहीं कराई। मुझे शुरुआत से ही शक था कि गलत आदमी को पकडा गया है। सो मैं लग गया उस पीड़ित महिला को ढूढंने, जिसका बलात्कार हुआ था—घटना के बाद से ही वो पुलिस के कब्जे में थी। लेकिन जैसे ही पुलिस को लगा कि मामला ठंडा पड गया है पुलिस ने महिला को छोड़ दिया। फिर क्या था मैं पहुंच गया उसी पीड़ित महिला के पास। उसने जो बताया वो बेहद चौकान्ने वाला था। महिला ने साफ कर दिया कि पुलिस ने गलत आदमी को पकड़ा था और उस पर जोर डाला था कि वो लिख कर दे कि वही असली गुनाहगार है। महिला के हमारे चैनल पर ये बयान देते ही हड़कंप मच गया। पुलिस मुख्यालय तक हिल गया। आनन-फानन में पुलिस कमिश्नर ने मामले की जॉच क्राइम ब्रांच को सौंप दी। करीब दो साल बाद अदालत ने उस बेगुनाह को बाईज्जत बरी कर दिया और पुलिस को जमकर फटकार लगाई।
टी.वी में काम करते हुये मुझे समझ आ गया कि अगर एक आईएएस (या आईपीएस) “MOVE THE THINGS” तो एक रिपोर्टर “MAKE THE THINGS MOVE.” साथ ही साथ वो इस बात का भी ध्यान रखता है कि “THAT THINGS DO MOVE.”

8 टिप्‍पणियां:

vinod ने कहा…

Sir,padh kar bahut achha laga, pehli bar IAS na banne ka koi malal nahi ho rha hai aur pehli bar hi crime reporting ki ahmiyat ka yehsas bhi ho rha hai warna sab to yehi kaha karte ki kuchh nahi kar paye to crime reporter ban gaye. Sir plz keep writing so that we will make the things move.

nalini ने कहा…

crime reporting me sacchai k lie apko salute.sahi crime reporting yahi hai jo ias aur ips ko sahi kaam karne ya phir victims ko insaaf dilane k lie raasta dikhae. aur aap jaise reporter ki sacchai dekh k ias aur ips jhukten hain. nahi toh news channel me kaam ka pressur kahen ya phir police k samne apni image banane k chakkar me kuch crime reporters itne gir jate hain ki apni yani kalam ki power ka ehsaas hi nahi rahta...

vir ने कहा…

Yeah aapbiti aur sargarbhit anubhav padhaar acha laga.Padhne par aisa lag raha tha ki na jane kitna kuch kah jane ki chah bhari padi hai aur sabd hi ek seema bankar samne khadi hai. Lekin sawal aur jabab ke is daur mein ek baat phir bhi khulkar samne aati hai ki kisi bhi profession mein imandari aur apni jimmebari hi sabse upar hai. Anyatha patrakarita ke isi daur mein 'Live India' ke Prakash Singh aur T N Sheshan, Rao, Kiran Bedi, Lingdoh jaise afsars bhi maujud hain.

crime ने कहा…

hii

crime ने कहा…

congratulate 4 making a wonderful site... apk hi ilake se..

kishan ने कहा…

अफसरशाही और पत्रकारिता पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मेरी आपसे सहारा में मुलाकात है। लखनऊ का रहने वाला हूं। मैने भी स्टार में इंटरव्यू दिया था पर परिणाम आशानुकूल नहीं रहा। पर कोई बात नही। आपकी क्राइम स्टोरी पढ़ने का एक अलग मजा आता है।

Rajiv ने कहा…

I read your thought about the officerism and journalism.it is very good comment on the above mentioned topics.this comment it's seem to very realistic to your heart or you feel from very near to eyes.obiviously, you have to pointed out on the very big issue to our social structure.it seems to the whole systems r collapsed from your comments upon the corrupt social system.sir, can i know about, how it resolve that problem.it's a very big issue . have any solution upon the collapsed system?if you have any, then you can publish on the net.we have to need the reform in present system.how many people think about you,i realy appriciate your thought and views upon the officerism and journalism.only on medium, is the journalism to rectify or resolve the present situation,it is very big and realistic topic upon the above mentioned topic.
thank you sir keep it up and enjoy.
Regards,
Rajiv kumar

Rajiv ने कहा…
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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)