24 अक्तूबर, 2007

एनकाउंटर का सच


“मी लार्ड मुझे कई बार बड़े-बड़े बदमाशों का एनकाउंटर करने के लिये गैलेंटरी अवार्ड और राष्ट्रपति पदक मिल चुके हैं। इसलिये मुझे सजाये मौत मत दीजिये।” कल तक जो शख्स किसी भी इंसान को मौत के मुंह में पहुंचाने से पहले एक बार भी नहीं सोचता था। और तो और मारने के बाद जरा भी अफसोस नहीं करता था, वही शख्स आज अदालत में जज के सामने अपने प्राणों की भीख मांग रहा था। कभी दिल्ली पुलिस की आंखों का तारा रह चुके क्राइम ब्रांच के एसीपी एस एस राठी और उनकी टीम के दूसरे साथियों को क्नॉट प्लेस शूटऑउट मामले में सजा सुनाई जानी थी। जज ने सभी को आखिरी बार अदालत में बोलने का मौका दिया था।
अदालत ने इस फर्जी एनकाउंटर को अंजाम देने वाले एसीपी और इंस्पेकटर सहित दस पुलिसवालो को दोषी करार देते हुये उम्र कैद की सजा सुनाई है। अगर आप जानना चाहते है कि कैसे होता है फर्जी एनकाउंटर और कैसे खाकीवर्दी पर तमगे लगाने की ललक में पुलिसवाले बुनते है फर्जी एनकाउंटर का ताना-बाना, तो ये पढ़िये...

नब्बे के दशक में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और क्राइम ब्रांच के बीच अपराधियों के एनकांउटर कर आउट ऑफ प्रोमोशन लेने की होड़ लगी हुई थी। एक एनकाउंटर स्पेशल सेल करती तो दूसरा क्राइम ब्रांच।

नब्बे के दशक में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और क्राइम ब्रांच के बीच अपराधियों के एनकांउटर कर आउट ऑफ प्रोमोशन लेने की होड़ लगी हुई थी। एक एनकाउंटर स्पेशल सेल करती तो दूसरा क्राइम ब्रांच। इसी कड़ी में एक दिन...........
31 मार्च 1997। समय दिन के 12.30। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के अधिकारी एक फोन को SURVEILLANCE पर लगा कई घंटे से सुन रहे थे। फोन नंबर था 9810071368. ये नंबर था उत्तर प्रदेश के कुख्यात सरगना मोहम्मद यासीन का। वही यासीन जिसने उत्तर प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली में भी अपने पॉव जमाने शुरु कर दिये थे। दक्षिणी दिल्ली के एक बडे बिजनेसमैन को अगवा कर फिरौती वसूलने के चलते वो दिल्ली पुलिस की नजरों में चढ़ गया था। क्राइम ब्रांच को जैसे ही खबर मिली की वो दिल्ली आने वाला है, उसके फोन को SURVEILLANCE पर रख तफ्तीश शुरु कर दी। फोन सुन रहे थे खुद क्राइम ब्रांच के तेज-तर्रार इंसपेक्टर अनिल कुमार। अनिल कुमार फोन सुन ही रहे थे कि दूसरी तरफ से आई आवाज से उनकी चेहरे पर मुस्कान आ गई। फोन पर जैसे ही बात खत्म हुई, इंसपेक्टर अनिल कुमार ने पास बैठे दो कांस्टेबल को अपने साथ चलने का आदेश दिया। इंस्पेकटर अनिल और दोनों कांस्टेबल एक गा़डी में बैठ तुंरत पटपड़गंज इलाके की ओर निकल गये। गाडी में चलते-चलते इंस्पकेटर अनिल ने एसीपी एस एस राठी को फोन कर यासीन के पटपड़गंज इलाके की मदर डेयरी पर आने की सूचना दे दी।
समय दिन के 1.00 बजे। इंस्पेकटर अनिल की गाडी मदर डेयरी के पास आकर रुक गई । गाडी में बैठे-बैठे इंस्पेकटर की नजर सड़क पर लगी हुई थी। इंस्पेकटर की आंखें तलाश रहीं थीं ब्लू एस्टीम कार को। कुछ देर बाद एक ब्लू एस्टीम कार उनकी आंखों के सामने से निकली। इंस्पेकटर ने देखा कि ब्लू एस्टीम कार के ड्राइवर की बगल वाली सीट पर मूछ-दाड़ीवाला एक शख्स बैठा है। इंस्पेकटर को यकीन हो गया कि हो ना हो यही यासीन है और गाडी चलाने वाला उसका साथी। इंस्पेकटर ने फौरन अपनी गाडी उसी ब्लू एस्टीम के पीछे लगा दी। बस वही गलती कर दी इंस्पेकटर अनिल ने। क्योकि दिल्ली में यू.पी नंबर की ब्लू एस्टीम कार यासीन की अकेली गाडी नहीं थी।
समय 2.00 बजे। ब्लू एस्टीम कार मदर डेयरी और लक्ष्मी नगर होती हुई क्नॉट प्लेस की ओर चल दी। इंस्पेकटर अनिल दूर से ही उस गाडी का पीछा करते हुये चल रहे थे और साथ-साथ ही गाडी की मूवमेंट की जानकारी एसीपी राठी को भी बताते चल रहे थे। थोडी देर में वो गाडी क्नॉट प्लेस के एक बैंक के सामने जाकर रुक गई। इंस्पेकटर अनिल ने देखा कि यासीन अपने साथी के साथ गाडी से उतर कर बैंक के अंदर दाखिल हो रहा है। कुछ देर बाद यासीन तीन-चार लोगों के साथ बैंक से निकलता है। इस बीच यासीन का पीछा कर रहे इंस्पेकटर अनिल ने एसीपी राठी को फोन कर यासीन के मूवमैंट की जानकारी दी।

वक्त दिन के 2.30 बजे। ब्लू एस्टीम कार क्नॉट प्लेस की स्टटेसमैन बिल्डिंग के सामने आकर रुकी। गाडी के रुकते ही दो गाडियों ने ब्लू एस्टीम को आगे से घेर लिया। एक गाडी में बैठे थे खुद इंस्पेकटर अनिल थे और दूसरी में क्राइम ब्रांच के दूसरे अधिकारी। ब्लू एस्टीम के पीछे थे एसीपी एस एस राठी की गाडी। इससे पहले की ब्लू एस्टीम में बैठे दोनों शख्स कुछ समझ पाते उन पर गोलियों की बौछार शुरु हो गई। गाडी चला रहे दाड़ी वाले शख्स ने जैसे ही अपनी पैंट की पिछली जेब से कुछ निकालने की कोशिश की पुलिस की गोलियां उसपर दनादन चल पड़ीं। ड्राइवर की बराबर वाली सीट पर बैठे शख्स ने जैसे ही गाड़ी से उतर कर भागने की कोशिश की, गोलियों ने उसे भी ढ़ेर कर डाला। ब्लू एस्टीम कार में आगे बैठे दोनो शख्स वही ढ़ेर हो गये। गा़डी में पिछली सीट पर बैठा एक 12 साल का लड़का भी बुरी तरह घायल हो गया था। दरअसल जैसे ही क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने गोलियां चलानी शुरु की वो सीट के नीचे छिप गया था। बाहर निकाला गया तो देखा कि वो जिंदा था। आनन-फानन में उसे अस्पताल पहुंचा गया।
क्राइम ब्रांच के अधिकारी अभी यासीन की मौत की और अपनी सफलता से फूले नहीं समां रहे थे कि एक कांस्टेबल ने एसीपी राठी के कान में कुछ कहा। ये सुनते ही एसीपी राठी के चेहरे की रंगत उड गई। दरअसल वो कांस्टेबल यासीन को पहचानता था और उसने बताया कि मारा गया शख्स ना तो यासीन है और ना ही उसका साथी।

अगर ये यासीन नहीं था तो फिर किसे भून डाला था क्राइम ब्रांच ने? पता चला कि वे दोनों हरियाणा के व्यापारी थे और बिजनेस के सिलसिले में दिल्ली आये थे।

अगर ये यासीन नहीं था तो फिर किसे भून डाला था क्राइम ब्रांच ने? पता चला कि वे दोनो हरियाणा के व्यापारी थे और बिजनेस के सिलसिले में दिल्ली आये थे।
जैसे ही दिल्ली पुलिस के आला-अधिकारियों को इस गलती का एहसास हुआ उन्होने पूरे मामले की जॉच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया। लेकिन एसीपी राठी और उनकी टीम के हत्यारे पुलिसवालों ने अदालत में अपने आप को बेकसूर साबित करने की लाख कोशिश की। लेकिन एक-एककर उनकी सारी दलीले फेल हो गई।
हरियाणा के दो बेकसूर बिजनेसमैन को अपनी गोलियो का निशाना बनाने वाले दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच के दस पुलिसवालो के खिलाफ सीबीआई ने सन् 1997 मे ही चार्जशीट फाईल दायर कर दी। अदालत के आदेश पर सभी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया---तीन साल बाद सभी को जमानत दे दी गई। लेकिन सीबीआई सभी दोषी पुलिसवालों के खिलाफ एक-एककर पुख्ता साबित इकठ्ठा कर चुकी थी कि कैसे रची थी खाकी वर्दी पहने हत्यारों ने रची थी प्रदीप गोयल और जगजीत सिंह के कत्ल की साजिश।
पहला आरोप—ब्लू एस्टीम कार में पिस्टल कहां से आई।
मुठभेड़ के बाद दिल्ली पुलिस के एसीपी एस एस राठी ने अपनी टीम को निर्दोष बताते हुई दलील दी कि उन्होने जगजीत सिंह और प्रदीप गोयल पर गोलियो की बौछार आत्मरक्षा में की थी। दोषी पुलिसवालो ने अदालत को बताया कि पहली गोली ब्लू एस्टीम कार को चला रहे शख्स ने चलाई थी। लेकिन सीबीआई ने साफ कर दिया कि ब्लू एस्टीम कार में बैठे लोगो के पास कोई पिस्टल नहीं थी। सीबीआई ने साफ कर दिया कि ITALIAN MADE 7.65 बोर की ये पिस्टल दोषी पुलिसवालों ने ही जगजीत सिंह और प्रदीप गोयल की कार में प्लांट की थी। ना केवल पिस्टल बल्कि पुलिसवालों ने गाडी में बुलेट भी प्लांट की थी। दोषी पुलिसवालों ने ब्लू एस्टीम कार पर गोली चलानी की दलील ये कहकर की पहली गोली ब्लू एस्टीम कार चला रहे जगजीत सिंह ने चलाई थी। और ये गोली क्राइम ब्रांच के कांस्टेबल संजय की उंगली में लगी थी।

सीबीआई ने जब ब्लू एस्टीम कार में मिली पिस्टल और कांस्टेबल की उंगली में लगी गोली का FORENSIC LAB में MATCH कराया तो पता चला कि दोनों ही अलग-अलग बोर की हैं।

सीबीआई ने जब ब्लू एस्टीम कार में मिली पिस्टल और कांस्टेबल की उंगली में लगी गोली का FORENSIC LAB में MATCH कराया तो पता चला कि दोनो ही अलग-अलग बोर की हैं। दरअसल ब्लू एस्टीम कार में मिली पिस्टल 7.65 बोर की थी जबकि कांस्टेबल संजय की उंगली में गोली .38 बोर की गोली लगी थी। यानि दोषी पुलिसावालों की ये दलील की जगजीत सिंह ने पहली गोली 7.65 बोर की पिस्टल से चलाई थी सरासर गलत थी। कांस्टेबल संजय के गोली किसी ओर पिस्टल से लगी थी।
दोषी पुलिसवालों की ये दलील कि पहली गोली जगजीत सिंह ने चलाई थी मौका-ए-वारदात पर खिचे गये फोटो ने नकार दिया। जिस जगह फर्जी मुठभेड हुई थी, उसके ठीक सामने था इंग्लिश न्यूजपेपर STATESMAN का दफ्तर। गोलियों की आवाज सुनकर सबसे पहले STATESMAN अखबार के फोटोग्राफर वहां पर पहुंचे थे। उन्होने मौका-ए-वारदात की एक-एक तस्वीर को अपने कैमरे में कैद कर लिया था। इन PHOTOGRAPHS को सीबीआई ने एसीपी राठी और दूसरे दोषी पुलिसवालों के खिलाफ एक पुख्ता सबूत के तौर पर पेश किया। इन फोटो में साफ था कि ब्लू एस्टीम कार के सभी शीशे टूट चुके थे लेकिन ड्राइवर साईड का शीशा एक दम सही था। यानि पुलिस की ये थ्योरी की गोली जगजीत सिहं ने चलाई थी वो सरासर गलत थी। मुठभेड के वक्त ब्लू एस्टीम कार में बैठा तरुणप्रीत भी इस वारदात का अह्म गवाह था। उसने कोर्ट में बताया कि जिस वक्त पुलिस ने उनकी गा़डी पर गोलियां चलानी शुरु की थी उस वक्त कार का एसी ऑन था। यानि कार के सभी शीशे चढे हुये थे। गोलियो की बौछार से गाडी के सभी शीशे टूट गये थे लेकिन ड्राइवर साईड का शीशा बिल्कुल ठीक था। साफ था बिना कार का शीशा नीचे किये जगजीत ने पुलिस पार्टी पर गोली कैसे चलाई।
दूसरा आरोप— कत्ल करने के लिये बरसाई थी गोलियां
पहले ब्लू एस्टीम कार में बैठे लोगों की बिना पहचान किये उनपर गोली चलाना और फिर ये सिद्ध करने के लिये गाडी में बैठे शख्स ने पहली गोली चलाई थी एक पिस्टल को प्लांट करने से साफ था कि दोषी पुलिसवाले मुठभेड से पहले ही ये तय कर आये थे कि गैंगस्टर यासीन को मौत के मुंह में पहुंचाना है। दोषी पुलिसवालो की ये दलील की यासीन पर पचास हजार रुपये का ईनाम घोषित था, भी अदालत के फैसले को ना डगमगा सकी। अदालत का मानना था कि चाहे कोई शख्स कितना भी कुख्यात अपराधी क्यों ना हो, खाकी वर्दीधारियों को उनकी 'हत्य़ा का लाईसेंस' नहीं मिला है। अदालत ने पूरे मामले में एसीपी एस एस राठी को ही फर्जी मुठभेड का मुख्य सूत्रधार करार दिया। अदालत ने एसीपी राठी की ये दलील की वो मुठभेड के बाद मौका-ए-वारदात पर पहुंचा था नकार दिया। अदालत में साफ हो गया कि जिस संजय नाम के कांस्टेबल की उंगली में गोली लगी थी वो दरअसल एसीपी राठी की गाड़ी का ड्राइवर था। क्योंकि संजय के गोली मुठभेड के दौरान लगी थी इसलिये साफ था कि संजय मुठभेड के वक्त मौजूद था और इसलिये ये भी साफ हो गया कि एसीपी राठी का ड्राइवर बिना उन्हे लिया वहां नहीं पहुंचा था बल्कि वे भी मुठभेड के वक्त वहां मौजूद थे।
तीसरा आरोप— आत्मरक्षा में नही चलाई साजिश के तहत बरसाई थी गोलियां राठी और दूसरे दोषी पुलिसवालों ने अपने आप को बचाने के लिये दलील दी कि नब्बे की दशक में आतंकवाद और बदमाशो के हौसले बुलंद थे। वे पुलिसवालों पर भी गोलियां बरसाने से नहीं चूकते थे। यही वजह थी कि क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने ब्लू एस्टीम कार में बैठे लोगों को यासीन और उसका साथी समझकर अंधा-धुंध गोलियां बरसा दी थीं। साथ ही साथ दोषी पुलिसवालों के वकील ने अमेरिका और इंग्लैड की तर्ज पर उन्हे बेकसूर साबित करने की कोशिश की। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने एक बार अपने देश के पुलिसवालों को एक निर्दोष युवक को फर्जी मुठभेड मामले में ये कहकर बरी कर दिया था कि आंतकवादियों और बदमाशों को मार गिराने में कभी-कभी ऐसी गलती हो जाती है। लेकिन सीबीआई ने साफ कर दिया कि

इंग्लैड का उदाहरण क्नॉट प्लेस शूटऑउट से इसलिये अलग है क्योंकि वहां के पुलिसवालों ने अपनी गलती का एहसास होने पर मरे हुये युवक के पास पिस्टल प्लांट नहीं किया था

इंग्लैड का उदाहरण क्नॉट प्लेस शूटऑउट से इसलिये अलग है क्योकि वहां के पुलिसवालों ने अपनी गलती का एहसास होने पर मरे हुये युवक के पास पिस्टल प्लांट नहीं किया था। दोषी पुलिसवालों ने अपने गुनाह में शामिल किया BALLISTIC EXPERT रुप सिंह को। इस मामले में BALLISTIC EXPERT रुप सिंह पर भी गाज गिरनी तय है। अदालत में साफ हो गया कि रुप सिंह ने फोरिंसक जॉच के लिये गई BULLETS में फेर-बदल किया था। यहां तक की अपनी रिपोर्ट पेश करने के बाद भी उन्होने अदालत को गुमराह करने की कोशिश की।
गुनाहगार की गवाही---ये शायद पहला ऐसा मामला था जहां जिस कुख्यात सरगना को मारने के लिये दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने साजिश रची थी वो खुद अदालत के सामने खुद इस मामले में एक गवाह बना था। उसकी गवाही ने दोषी पुलिसवालों को सजा दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
उत्तर प्रदेश के कुख्यात सरगना यासीन पर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में दो दर्जन से भी ज्यादा संगीन वारदातें थी। दिल्ली के एक बडे बिजनेसमैन का अपहरण करने के बाद से क्राइम ब्रांच उसके पीछे हाथ धो कर पड़ी थी। क्नॉट प्लेस शूट ऑउट के बाद जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया तो सीबीआई ने यासीन को गवाह के तौर पर कोर्ट में पेश कर दिया। यासीन ने अदालत को बताया कि 31 मार्च 1997 को वो अपने दोस्त हाफिज से मिलने ब्लू एस्टीम कार से पटपड़गंज जरुर पहुंचा था। लेकिन कुछ देर बाद की मुलाकात के बाद वो वहां से आनंद विहार चला गया था।
क्राइम ब्रांच के इंस्पकेटर अनिल कुमार के पास उत्तर प्रदेश के कुख्यात सरगना यासीन की दो पहचान थी। पहला ये कि वो कभी-कभी दाडी बढ़ा लेता है। दूसरा ये कि वो 31 मार्च 1997 को ब्लू एस्टीम कार से अपने दोस्त से मिलने पटपड़गंज इलाके की मदर डेयरी आयेगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। यासीन वहां आया तो जरुर लेकिन कुछ देर बाद ही वहां से आनंद विहार चला गया। बस यही मात खा गयी क्राइम ब्रांच। दरअसल उस दिन हरियाणा के बिजनेसमैन जगजीत सिंह की भी दाड़ी बढ़ी हुई थी और वो भी अपनी ब्लू एस्टीम कार में अपने दोस्त प्रदीप गोयल के साथ मदर डेयरी पहुंच गये। क्योंकि यासीन वहां से पहले ही जा चुका था, इंस्पेकटर अनिल ने ब्लू एस्टीम कार में बैठे जगजीत सिंह को यासीन समझ लिया और उनकी गाडी का पीछा करते हुये पहुंच गये क्नॉच प्लेस। वहां मौका देखकर क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने जगजीत सिंह को तो गोलियों से भूना ही उनके दोस्त प्रदीप गोयल को भी मौत की नींद सुला दिया। लेकिन किसी तरह गाडी की पिछली सीट पर बैठा दस साल का तरुणप्रीत बच गया। तरुण इस घटना का चश्मदीद गवाह था।
अदालत में गवाही देने के बाद यासीन अलीगढ मे पुलिस कस्टडी से भाग गया। लेकिन 2004 मे दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने यासीन को एक एनकाउंटर में तुगलकाबाद इलाके में मार गिराया। लेकिन मरने से पहले वो दोषी पुलिसवालो के खिलाफ गवाही दे चुका था। अदालत ने एसीपी राठी सहित दस पुलिसवालों को आईपीसी की कई धाराओ के तहत दोषी करार दिया। ये धारायें हैं.....
302—हत्या
307---जान से मारने की कोशिश (तरुणप्रीत को)
120 B---साजिश रचने
193---पिस्टल प्लांट करने
34—सभी की एक ही मंशा (सोच कर आये थे कि आज यासीन को 'टपकाना' ही है)
211---झूठे सबूत जुटाना
लेकिन क्या ये फैसला देश के दूसरे पुलिसवालों के लिये एक सबक साबित होगा। क्या वे किसी पर गोली चलाने से पहले दस बार सोचेंगे कि वो सही में अपराधी है या नहीं। लेकिन अदालत के फैसले ने एक बात ओर साफ कर दी है। वो ये कि पुलिसवालों को खाकी वर्दी किसी को भी---चाहे कितना भी कुख्यात अपराधी क्यो ना हो—मौत के घाट उतारने के 'लाईसेंस' के तौर पर नही मिली है।

2 टिप्‍पणियां:

crime ने कहा…

good explaination of police cruelity.....keep writing....

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

Aapka blog accha laga. color selection thik nahi hai. krapya layout ke liye halke colors prayog karen. padne mein suvidha hogi. hamari zamat mein shamil hone par badhai sweekaar karen.

ClickComments

जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)