06 नवंबर, 2007

बॉस कौन है

कुछ दिन पहले की बात है कि दिन-भर शूट से लौटने के बाद अभी अपनी सीट पर आकर बैठा ही था और एपीसोड का रन-आर्डर देख ही रहा था—ये देखने के लिये की आज दिल्ली और एनसीआर की कितनी स्टोरी जा रही है—कि देवजी ने मुस्कराते हुये कहा, “बधाई हो, पॉप्लुर हो रहे हो।” मैं उनके इस छोटे से व्यंग से समझ गया उनका इशारा किस और था। “इटली में भी पढे जा रहे हो।” दरअसल देवजी बहुत कम बोलते है। शायद लिखते जो ज्य़ादा है—वो हमारे क्राइम प्रोग्राम के सीनियर प्रोडियूसर तो है ही साथ-साथ ही एक अच्छे चित्रकार के साथ ही लेखक भी है। इटली का नाम सुनते ही मैने अपना ब्लाग खोल लिया। सच में किसी ने मेरे ब्लाग को इटली में हिट किया था। लेकिन देवजी ने इसलिये ये बात कही थी क्योकि इटली वो देश है जहां से शायद अपराध की दुनिया की सबसे ताकतवर शब्द---‘माफिया’— का जन्म हुआ था।
लेकिन आज सुबह जब ये खबर आई कि इटली का सबसे बडा माफिया पकडा गया है तो उसके बारे में जाने की इच्छा हुई..................... इटली के सिसली प्रोविंस की राजधानी पॉलेरमो जब नींद की आगोश में थी तो शहर के एक छोर पर मची हुई थी हलचल। सायरन बजाती पुलिस की गाड़ियां तेजी से मुख्यालय की ओर बढ़ रही। उन गाड़ी में बैठे हुए थे कुछ नकाबपोश पुलिसवाले और उन पुलिस वालों के बीच बैठा हुआ था डॉन का डॉन। जिसे पूरी दुनिया पिकोलो के नाम से जानती थी।और जिसके बारे में कहा जाता था डॉन कभी सलाखों के पीछे नजर नहीं आएगा। पूरी दुनिया उस डॉन को सैल्वाटोर लो पिकोलो के नाम से जानती थी। इटली के सिसली का रहने वाला 65 साल का ये शख्स दुनिया भर की पुलिस को 14 सालों से चकमा दे रहा था। सैल्वाटोर लो पिकोलो की कहानी किसी फिल्मी डॉन से कुछ कम नहीं। दुनिया के इस कुख्यात शख्स ने इटली में गुनाह का एक ऐसा साम्राज्य खड़ा हो गया, जिसने पुलिस की नींद हराम कर दी। पिकोलो हत्यारा था। अदालत ने इसे सुनाई थी उम्रकैद की सजा। लेकिन, सजा तो तब मिलती, जब ये पकड़ा जाता। बेहद चालाक, शातिर और खतरनाक ये शख्स पुलिस के हाथ नहीं आ रहा था। और एक दिन खुफिया पुलिस की रिपोर्ट आई कि सैल्वाटोर लो पिकोलो बनने वाला है डॉन का डॉन...और उसी दिन पकड़ा गया पिकोलो। सैल्वाटोर लो पिकोलो की गिरफ्तारी बेहद नाटकीय अंदाज में हुई। सिसिलियन माफिया पर बनी फिल्म गॉडफादर की तरह इलाके के तमाम माफिया पालेरमो में जमा हुए थे माफिया संगठन कोसा नोस्ट्रा के प्रमुख की ताजपोशी में। कोसा नोस्ट्रा सिसली के माफिया का सर्वोच्च संगठन है और इसका बॉस डॉन का डॉन माना जाता है। लेकिन पिकोलो अपराध की दुनिया में अपनी जड़े इतनी गहरी नही जमा पाया जितनी उसके बॉस बर्नार्डो प्रोवेन्जैनो ने जमाई थी। अपराध जगत में लोग उसे BOSS OF BOSSES के नाम से पुकारते थे। बर्नार्डो (यानि ‘ट्रैक्टर’) करीब चालीस साल तक इटली का बेताज बादशाह था। या ये कहे कि वो ही असल मायने में माफिया या डॉन कहलाने का हकदार था। 1963 से लेकर अप्रैल 2006 तक—जब वो पुलिस के हत्थे चढा था---बर्नार्डो ने इटली में जबरन वसूली, अपहरण, सार्वजिनक ठेके, पाईरेसी और ड्रग्स के धंधे से होने वाली करीब 127 बिलियन डॉलर के साम्राज्य पर कब्जा रखा। माना जाता है कि बर्नार्डो इतने दिनो तक इसलिये कभी पुलिस के हत्थे नही चढ पाया क्योकि वो कभी मोबाइल या फोन का इस्तेमाल नही करता था। वो अपने गुर्गो को संदेश टाईपराईटर से लिखे गये पत्रो के जरिये ही देता था--- बर्नार्डो कभी अपनी हैंडराईटिंग में भी नही लिखता था क्योकि उसे डर था कि पुलिस उसकी हैंडराईटिंग पहचान सकती है। सालो तक इटली पुलिस के जांबाज जासूस बर्नार्डो के घर पर नजर रखे रहे। इस घर में बर्नार्डो की पत्नी और बच्चे रहते थे। करीब दो किलोमीटर की दूरी से पुलिसवाले दूरबीन की सहायता से उसके घर पर नजर रखते थे। एक दिन उन्होने देखा कि घर के अंदर से एक पैकेट ड्राइवर लेकर निकला है। फिर क्या था इटली पुलिस उसके पीछे लग गई। करीब आधा दर्जन घरो और फार्म हाउस के चक्कर लगाकर वो ड्राइवर र्कोलोन शहर—जहां बर्नार्डो का बेस था—से कुछ किलोमीटर दूर एक गॉव पहुंच गया। वहां वो ड्राइवर जैसे ही एक भेंड चराने वाले के घर में घुसा पुलिस भी उसकी पीछे घुस गई। घर के अंदर दाखिल होते ही पुलिस की कई सालो की तलाश खत्म हो गई थी। अंदर बैठा था खुद बर्नार्डो प्रोवेन्जैनो। अप्रैल 2006 में बर्नार्डो प्रोवेन्जैनो के पकड़े जाने के बाद कोसा नोस्ट्रा के बॉस का पद खाली हुआ था और इसका अहम दावेदार था पिकोलो। दरअसल पिकोला के बारे में कहा जाता है कि पहली बार उसने इटली के माफिया के तार अमेरिका के माफिया से जोड दिये थे। पिकोलो का तजुर्बा, पुलिस को चकमा देने का उसका अंदाज और उसके अंदर का शातिर बदमाश दूसरे सभी माफिया बॉस पर भारी था।..लेकिन पिकोलो की ताजपोशी हो पाती.. पुलिस की स्पेशल टीम स्वाट को लग गई इसकी भनक। तड़के स्वाट के जवानों ने मार दिया माफिया सम्मिट में छापा। लेकिन आप इसे महज इत्तेफाक कहेंगे या कुछ ओर की जिस दिन एंटी माफिया बिजनेसमैन ‘पिजो’ यानि जबरन वसूली के खिलाफ सडको पर उतरने वाला था उसी दिन वो पकडा गया। माना जा रहा है कि इटली के माफिया ने पिजो को इस कदर बढा दिया था कि देश के बिजनेसमैन परेशान हो गये थे। उनका दबाब लगातार पुलिस पर पड रहा था और पकडा गया माफिया डॉन पिकोलो। साथ ही साथ ही पकड़ा गया उसका बेटा सांड्रो, जो 1998 से पुलिस को चकमा दे रहा था। सैंडो को भी उम्र कैद की सजा हो चुकी है। डॉन पिकोलो पकड़ा गया। पूरी दुनिया इस खबर से खुश है। डॉन को उसके किए की सजा भी मिलेगी...लेकिन उसने इटली में गुनाह का जो साम्राज्य खड़ा कर दिया है..उसे खत्म कर पाना फिलहाल पुलिस के लिए मुश्किल है।

4 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

दिलचस्प!!

पहली बार आया शायद मै आपके ब्लॉग पर। पढ़कर लगा कि वाकई क्राईम बीट वाले का ब्लॉग है!!
अच्छा लगा!!
शुक्रिया!!

prabhakar ने कहा…

अब तो हमेश पढ़ना पड़ेगा

crime ने कहा…

hi neeraj g, once again i want 2 congratulate u for making a different blog. criminal... blog.
jinka talluk crime se nahi hai vo bhi apk blog k zarie crime ki dunia ki deshi aur videshi khabron ko jan sakte hai.lekin esa suna ja raha hai ki apka 'bach k rehna'column real criminal padh k bachne k tarik seekh rahe hain.

vir ने कहा…

GOOD TO READ THE STORY BEYONDS THE BOUNDARIES.

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)