20 नवंबर, 2007

फोटो खिंचवा ली क्या


दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्षा ने एक पुलिसवाले की टोपी उछाल दी। पहले दिन तो जिन टी.वी चैनल ने ये खबर चलाई तो पुलिस महकमें पर ही भारी पड गई। सभी ने छात्राओ और खासतौर से स्टूडेंट यूनियन की अध्यक्षा की वाहवाही की। सही तो है एक तो एक छात्रा दिल्ली की सडक पर एक बस की चपेट में आकर जान गवां बैठी और ऊपर से पुलिसवालो की तानें— “टी.वी में अपनी फोटो खिचवा ली”। फिर क्या था अदिति क़ॉलेज की छात्राओ ने अपना आपा खो डाला और टूटी पडी वर्दीवालो पर। पहले तो एसएचओ साहब से तूतू-मै-मैं में उनकी टोपी उडा दी। जाहिर है लडकिया पुलिसवालो के रवैये से खासी परेशान थी। एक तो पुलिस महकमा उनकी हिफाजत करने में नाकाम है। आये दिन लडके कॉलेज के बाहर लडकियो पर फब्तियां कसते रहते है। चाहकर भी लडकिया कुछ नही कर पाती। जिस छात्रा की एक्सीडेंट में मौत हुई उसके बारे में बताया जा रहा है कि एक लडका स्कूटर से उनका पीछे आ रहा था। लडकी की साथी तो किसी तरह बच गई लेकिन वो स्कूटर से बचने के चक्कर में बस के पहियो के नीचे आ गई। अपनी साथी की मौत का मातम मना रही छात्राये सडको पर उतार आई। इस बात की खबर जैसे ही मीडिया को लगी, सभी अपना ताम-झाम लेकर पहुंच गये कॉलेज के बाहर। चूंकि मामला सडको पर कहर बरपाती बसो और कॉलेज की एक छात्रा का था, लिहाजा ओबी वैन भी वहां पहुंच गई।
शुरुआत मे तो पुलिसवाले मूक दर्शक बने सबकुछ देखते रहे। लेकिन कुछ घंटे बाद जब एक-एककर मीडिया ने अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर घर वापस लौटने की तैयारी की, पुलिसवालो की जान में जान आई। उन्हे लगा लडकिया मीडिया में अपनी फोटो खीच वाने के लिये वहां इकठ्ठा हुई है। बस वही मात खा गई सबसे स्मार्ट पुलिस। जैसे ही एसएचओ साहब ने कहां की अब तो हम पर रहम कर दो अब तो मीडियावाले भी चले गये है, लडकियो का गुस्सा सातवे आसमां पर पहुंच गया। उन्हे लगा कि ये उनकी साथी छात्रा और खुद उनकी एक बडी बेईज्जती है। छात्र संघ की अध्यक्षा ने आव-देखा ना ताव एसएचओ साहब की टोपी हवा में लहरा दी।
मुझे दो साल पुराना वो वाक्या आज भी याद है जब एक एसआईनमेंट पर में राजधानी के सरस्वती विहार थाने गया था। मामला एक लडकी के अपहरण और पुलिस की लापारवाही का था। इलाके के लोगो बडी तादाद में इकठ्ठा थे। लेकिन थाने में तैनात पुलिसवाले नही चाहते थे कि लोगो की भीड कैमरे में कैद हो। फिर क्या था थाने के एसएचओ साहब सबसे आगे आकर लोगो को लताडने लगे। कहने लगे, “ कैमरे को देखकर हंगामा कर रहे हो”। इतना कहना था कि लोगो का गुस्सा थाने में तैनात पुलिसवालो पर टूट पडा। बडी मुश्किल से आला-अधिकारियो के बीच-बचाब से मामला सुलझा और पुलिस ने जल्द ही आरोपियो को भी हिरासत में ले लिया। लेकिन यहां ये बात दीगर है कि जिस एसएचओ ने ये टिप्पणी की थी, ये वही है जिसने अदिति कॉलेज के बाहर छात्राओ को मीडिया को लेकर बेइज्जत किया था। यानि दोनो मामले में एक ही एसएचओ है। या ये कहे है कि इन एसएचओ साहब को लगता है कि मीडिया के सामने ही लोग इकठ्ठा होते है या ये कहे कि हंगामा करते है। लेकिन क्या लोग थाने के बाहर या अदिति कॉलेज जैसी घटनाओ पर मीडिया में अपनी फोटो खीचवाने के लिये इकठ्ठा होते है। क्या हमारे देश में खबरिया चैनल आने से पहले कभी कोई प्रदर्शन या लोग इकठ्ठा नही होते थे। ये बात सही है कि लोगो की इकठ्ठा होने से लॉ एंड आर्डर परेशानी जरुर होती है। लेकिन उसके लिये ये कहना कि मीडिया जिम्मेदार है सरासर गलत है। दरअसल पुलिस अपनी कमियो को ढकने के लिये मीडिया को सभी बातो के लिये जिम्मेदार ठहरा देती है।
ये बात बहस का मुद्दा है और हर किसी की अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन ना तो हर टी.वी चैनल जानबूझकर लोगो को इकठठा करता है और ना ही हर आदमी एकजुटता दिखाने के लिये मीडिया के सामने आना चाहता है।
खैर अगले दिन तक टोपी उछालने के मामले में एक नया मोड आ गया है। कल तक जो मीडिया छात्र संघ की अध्यक्षा को लगे हाथ छात्रो का ‘हीरो’ माफ कीजिये हीरोइन बना दिया था वो आज इन सवाले के जबाब दे रही थी कि पुलिसवाले कि टोपी उछालना कहां तक जायज है। क्या उसने ये करके खाकी वर्दी और कानून का मखौल नही उडाया है। क्या ये एक अपराध नही है।

3 टिप्‍पणियां:

parul k ने कहा…

jo vardidhaari haanth baandhey logon ki majbuuriyon kaa mazaaq udtey dekhtey hain ,kabhi kabhi unkaa makhaaul vo bhi jaayaz baat par udaaya jaaye to neeraj ji kuch galat nahi isme

Sanjeet Tripathi ने कहा…

ठीक यही सवाल कल यह खबर देखते हुए मेरे दिमाग में आ रहा था!!

सरे-आम कोई छात्रनेता किसी पुलिस अफ़सर की टोपी ऐसे उछाल दे और उस पर कोई कारवाई नही?
आश्चर्य!!
उस अफ़सर को अपनी टिप्पणी के लिए सजा भी मिले लेकिन उस लड़की को भी सजा मिलनी ही चाहिए टोपी उछालने की!!

बेनामी ने कहा…

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)