30 नवंबर, 2007

एक था छोटू


मैं न्यूजरुम में बैठा कि खबर आई कि वसंत कुंज में एक दिन पहले जिस युवक की रहस्यमय परिस्थितियो में मौत हुई थी उसके 14 साल के नौकर ने आत्महत्या कर ली है। पहली बार तो यकीन नही हुआ। लेकिन क्रॉस-चैक किया तो खबर सौ फीसदी सच साबित हुई। मैं दौडकर न्यूज ब्रेक कराने के लिये दौडा। इस बीच में खबर की भी खबर ले रहा था। पता चला कि 14 साल के छोटू ने इस लिये आत्महत्या की क्योकि वो अपने मालिक वरुण से बेइंतेहा लगाव रखता था। ना केवल छोटू बल्कि वरुण भी छोटू को अपना छोटा भाई मानता था।
करीब पॉच-छह साल पहले वरुण के प्रोपट्री डीलर पिता छोटू को सफदरजंग अस्पताल के बाहर से लेकर आये थे। नागालैंड का रहने वाला छोटू अपने घर के माहौल से त्रस्त होकर एक बेहतर जिंदगी की तलाश में राजधानी दिल्ली भाग आया था। लेकिन दूसरे छोटूओ की तरह उसकी जिंदगी भी एक ढाबे तक रहकर सीमित होकर रह जाती अगर वरुण के पिता उसे अपने घर ना ले आते। घर आने के बाद से वरुण ने कभी छोटू को ये एहसास नही होने दिया कि वो घर का नौकर है। वो एक फैमिली-मेम्बर की तरह परिवार में रहने लगा।
सबकुछ घर-परिवार में ठीक चल रहा था कि बुधवार की शाम वरुण के गोली लगने की खबर आई। थोडी देर बाद पता चला कि वरुण ने अस्पताल में दम तोड दिया है। परिवार के लोग, रिश्तेदार, दोस्त, पुलिस और मीडिया इसी कोशिश में लगी थी कि वरुण के मौत की हकीकत पता चल सके। दरअसल, गोली लगने के वक्त वरुण अपने साथियो के साथ डिस्को-थेक जाने की तैयारी कर रहा था लेकिन वसतं-कुंज की एक मार्केट में सभी दोस्त रुके और उसके बाद खबर आई कि वरुण के गोली लग गई है। वरुण के दोस्तो ने बताया कि उनके ही एक साथी के पास पिस्टल थी। वरुण जब उसकी पिस्टल देख रहा था तभी गोली चली और वरुण के सीने को छलनी करती हुई पार हो गई। जिस दोस्त की वो पिस्टल थी वो मौका-ए-वारदात से फरार हो गया। दोस्त के फरार होने से पूरा मामला एक हादसे से कुछ ज्यादा लगने लगा। पुलिस और मीडिया अपने-अपने तरह से मामले को फॉलो कर रहे थे। वरुण के घरवाले बेहद सदमे थे। लेकिन वरुण की मौत से सबसे ज्यादा धक्का लगा था छोटू को। वो वरुण की फोटो एलबम लिये रो रहा था।
चूकि वरुण के पिता का पृतिक घर वसंत-कुंज से कुछ ही दूरी पर मकसूदपुर गॉव में था , लिहाजा पूरा परिवार छोटू को वहां छोडकर गॉव के घर जाकर अतिंम-संस्कार की तैयारी करने लगे। इसी बीच किसी ने खबर की छोटू ने वसंत-कुंज वाले घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। जिस वक्त पुलिस और मीडियाकर्मी वहां पहुंचे, छोटू की लाश घर के अंदर टंगी हुई था। कमरे में वरुण की फोटो बिखरी पडी थी, एक तरफ उसकी एलबम पडी थी। खुद छोटू के हाथ मे वरुण की फोटो थी।
मैने न्यूज तो ब्रेक कर दी। लेकिन एक बात बार-बार जेहन में कौंध रही थी कि क्या वाकई कोई ऐसा नौकर भी आज की दुनिया में है जो अपने मालिक की मौत के गम में खुद भी जान दे सकता है। दिल्ली और दूसरे मैट्रो शहरो में आये दिन ऐसी खबरे आती रहती है जहां नौकर ने अपने मालिक/मालिकन को पैसे के लालच में या उनसे तंग आकर मौत के घाट उतार दिया हो। जिस इलाके में वरुण और छोटू की मौत का मामला सामने आया है वहां से कुछ दूरी पर ही दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे नौकर को गिरफ्तार किया जिसने चंद पैसो के लालच में अपनी मालिकन का गला घोट दिय़ा। अपनी मालकिन को मरा समझकर वो घर का सारा सामान बटोरकर फरार हो गया। लेकिन मालकिन की किस्मत अच्छी थी कि वो किसी तरह बच गई और अपने नौकर की करतूत का खुलासा कर दिया। ऐसे में वरुण और छोटू की कहानी हमेशा-हमेशा के लिये याद रखी जायेगी।
जो लोग ये समझते है कि दिल्ली जैसे बडे शहरो में मालिक नौकरो को अपनी पैर की जूती समझते है उनसे बुरा व्यवहार करते है, मारते-पीटते है, आज के बाद नही कह सकेंगे। साथ ही साथ जो सिर्फ और सिर्फ ये समझते है कि बडे शहरो में नौकरो से सावधान रहना चाहिये। वो कभी भी खाने में नशीला पदार्थ मिलाकर घर के सदस्यो को बेहोश कर सारा सामान लूटकर फरार हो जायेंगे। शायद गलत है।
शायद यही वजह थी कि शाम में जब हमने वरुण और छोटू की स्टोरी को ऑन-एयर किया तो हमने उसका टाईटल दिया, “एक गोली दो मौत”। गोली तो सिर्फ वरुण के दोस्त की पिस्टल से एक ही चली थी लेकिन उससे मौत जरुर दो हुई है—वरुण और छोटू की। HATS OFF TO BOTH, VARUN AND CHHOTU. मालिक-नौकर की एक नई मिसाल पैदा करने के लिये।

4 टिप्‍पणियां:

आशीष महर्षि ने कहा…

यह काफी विस्मय की बात हैं..लेकिन वाकई में ऐसे रिश्ते भी होंते है.>? यह अपने आप में इस समाज के लिए के मिसाल हैं

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

कमाल की स्‍टोरी है और आपके शीर्षक चयन का भी जवाब नहीं ।

मिहिरभोज ने कहा…

हृदयस्पर्शी

Sanjeet Tripathi ने कहा…

टची!!!
हेडिंग वाकई बहुत बढ़िया रही!!

ClickComments

जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)