17 दिसंबर, 2007

हवा-हवाई


पहली बार जब हवाई यात्रा करने का मौका मिला, तो मन बेहद खुश था। आजतक लोगों से सिर्फ सुनते आये थे कि हवाई जहाज की यात्रा बेहद आरामदायक होती है। हवाई जहाज में बैठकर आदमी अपने आप को उच्च वर्ग का समझने लगता है। हवाई यात्रा करने वाले लोग आम लोगों से एकदम अलग होते हैं—सुशील और सभ्रांत। लेकिन पिछले एक महीने में मुझे कई बार हवाई जहाज में यात्रा करने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त हुआ तो मेरे जेहन में हवाई यात्रा और उसमे यात्रा करने वालों की तस्वीर को एकदम पलट कर रख दिया।
मेरी पहली यात्रा काठमांडू की थी। मुझे गोरखपुर के रास्ते नेपाल में एंट्री करनी थी। सो चल पडे दिल्ली से गोरखपुर की फ्लाईट में। मेरे साथ जाने वाला कैमरामैन पहले भी हवाई यात्रा कर चुका था, सो कोई खासी परेशानी नही हुई। अपना ई-टिकट दिखाकर हम एयरपोर्ट के अंदर दाखिल हुये, सुरक्षा जॉच कराई और पहुंच गये बोर्डिंग-पास लेने के लिये। फ्लाईट का समय था 2.20 मिनट। बोर्डिंग-पास पर लिखा था कि “विमान उडने के बीस मिनट पहले आप बोर्डिंग पर पहुंच जाये।” जैसे ही 2 बजे, हम पहुंच गये बोर्डिंग-गेट पर। अपना टिकट दिखाया तो सुरक्षाकर्मी ने जबाब दिया कि जब हमारी एयरलाईन के लोग यहां आकर खडे हो जायेंगे, तब आप अंदर जा सकेगें-यानि तब हम प्लेन में बैठ सकेंगे। वक्त बीतता गया, घड़ी की सुई 2.20 पार कर चुकी थी। हमारी बैचेनी बढ़ने लगी। मन में ख्याल आ रहा था कि कही हमारी फ्लाईट निकल तो नहीं गई। सो एक बार फिर पहुंच सुरक्षाकर्मियो के पास। लेकिन वहां से फिर वही जबाब मिला, जो पहले मिला था। लेकिन मेरी ये समझ में नहीं आ रहा था कि जब फ्लाईट का टाईम 2.20 मिनट है तो हमे जहाज में बैठने क्यों नहीं जा रहे हैं। अबतक तो बस और ट्रैन में ही सफर किया था। वहां जरुर ऐसा होता था कि ट्रैन लेट हो गई है। बस नहीं आ रही है। लेकिन फ्लाईट भी लेट उडती है, ये तो कभी सपने में सोचा भी नहीं था। अब हमारी तरह दूसरे यात्री भी परेशान से दिखने लगे।
आखिरकार 3 बजे हमारी एयरलाईन की एयर होस्टस और दूसरा स्टाफ वहां पहुंचा। तब जाकर जान में जान आई। दरअसल इसलिये भी कि गोरखपुर से मुझे नेपाल बार्डर पार करना था और शाम के 7.30 बजे के बाद बार्डर पर आवा-जाही बंद हो जाती है। हमारी फ्लाईट उसी एयरलाईन की थी, जिस कंपनी के न्यूज चैनल में पहले काम करता था। कंपनी ने एयरलाईन बेचा था तो लगा कि बदलाव आ जायेगा। लेकिन पहले अनुभव से तो ऐसा लगा कि कंपनी बदलने से कोई खास असर नही पडा है। 2.20 की फ्लाईट और 3 बजे तक ग्राउंड स्टाफ नदारद। बस में बैठकर जहाज तक पहुंचे तो लगा कि हम इसमें बैठकर जायेंगे! वो इसलिये के हमने टी.वी में देखा था कि हवाई जहाज बहुत बडा होता है लेकिन ये तो एकदम छोटा सा प्लेन था। मैने दबी जुंबा में अपने साथी कैमरामैन से पूछा तो उसने बताया कि दरअसल गोरखपुर छोटा शहर है और वहां ज्यादा ट्रैफिक फ्लो नहीं होगा इसलिये एयरलाईन ने छोटा जहाज वहां के लिये रखा है। खैर हमें तो हवाई यात्रा करने से मतलब था, जहाज छोटा हो या बडा, क्या फर्क पडता है।
हमारी फ्लाईट का गोरखपुर पहुंचने के समय था 3.40। लेकिन 3.40 तो दिल्ली हवाई अड्डे पर ही बीत चुके थे। इतने में फ्लाईट कैप्टन ने एनाउंस किया कि हमारी फ्लाईट को सिग्नल नहीं मिल रहा है इसलिये फ्लाईट 'डिले' हो रही है। हम चुपचाप बैठे थे। कुछ मैगजीन हमारी सीट के सामने रखी थी, सो पढ़ने लगे। थोडी देर में फ्लाईट उड़ने को हुई तो मन खुश हो गया। लेकिन ये क्या फिर हमारा जहाज रुक गया। फिर तो ऐसा कई बार हुआ, थोडी दूर के लिये हमारा प्लेन चलता फिर रुक जाता। सभी यात्री बैठे-बैठे हसं रहे थे, कुछ मन ही मन बुदबुदा भी रहे थे। आखिरकार चार बजे हमारी फ्लाईट ने उड़ान भरी। तेजी से प्लेन उडा और चंद मिनटों में हम दिल्ली के ऊपर थे। शायद पहली और आखिरबार ऐसा लगा कि हम दुनिया से ‘उपर’ है—इसके अलावा मुझे कभी नहीं लगा कि हम दूसरे लोगों से अलग है। फ्लाईट में अमूमन हमारे जैसे ही लोग बैठे थे—साधारण से दिखने वाले। ऐसी ही एक फ्लाईट में मेरा साथी कैमरामैन बोला,
“सर अब तो हर कोई प्लेन से यात्रा करने लगा है। देख रहे है मुंबई से अहमदाबाद जाने के लिये भी लोगों की लाईन लगी हुई है।” मैने जबाब दिया कि आज कि समय में आदमी के पास सबकुछ है सिवाय वक्त के। अपना वक्त बचाने के लिये वो कितने भी पैसे खर्च कर सकता है। और शायद यही वजह है कि हाल ही में उड्डयन मंत्रालय ने एक विज्ञापन देकर दिल्ली और मुंबई को दुनियाभर के व्यस्तम हवाई अड्डो में से एक घोषित कर दिया है।
अभी कुछ दिन पहले ही मुंबई एयरपोर्ट पर अपनी फ्लाईट का इंतेजार कर रहे थे कि मोबाइल पर एयरलाईन कंपनी का मैसेज आया कि हमारी फ्लाईट आधा घंटा लेट हो गई है। चलो कोई बात नहीं हो जाता है—पहला अनुभव अभी भी याद था। थोडी देर में एक ओर मैसेज आया। फ्लाईट अब डेढ़ घंटा लेट हो चुकी थी। रात के ग्यारह बजे हमारी फ्लाईट थी लेकिन रात के एक बज चुके थे। मुंबई एयरपोर्ट पर यात्री दिल्ली से गोरखपुर जाने वाली फ्लाईट की तरह बिल्कुल नहीं थे। एक-एककर सभी यात्री पहुंच गये ग्राउंड अधिकारियों के पास। चुकी रात की फ्लाईट थी कुछ यात्री टल्ली होकर आये थे। फिर क्या था जब एयरलाईन अधिकारियों ने यात्रियों को बरगलना शुरु किया तो वहां जमकर हंगामा हुआ। सुरक्षाकर्मी भी चुप-चाप खड़े देख रहे थे। पास खडे मंद-मंद मुस्करा रहे थे और बुदबुदा रहे थे, “ इन एयरलाईन कंपनियों ने तो ये रोज का धंधा बना लिया है। डेली इनकी फ्लाईट लेट उडती है।” यात्री अधिकारियों पर चिल्ला रहे थे, “अबे फ्लाईट उडाई नहीं जाती तो कंपनी क्यो खोल लेते हो। जिस कंपनी की फ्लाईट थी उसकी ब्रांड एबेसेडर बालीबुड की एक जानी मानी नायिका है। फिर तो अभिनेत्री और कंपनी के एमडी तक को यात्रियों ने अपनी गालियों में नही बख्शा। थोडी ही देर में टी.वी चैनल वाले आ धमके। फिर तो एयरलाईन कंपनी का वो बैंड बजा जो मैने अगले दिन टीं.वी पर देखा।
लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्य मुझे तब हुआ जब अहमदाबाद जाते वक्त एक फ्लाईट में मैने एयर होस्टस से पानी पिलाने के लिये कहा। अब तक जितनी भी बार मैं फ्लाईट में बैठता था उसमे खानी-पीना सब मुफ्त होता था। लेकिन उस फ्लाईट में तो एयर होस्टस ने मुझे से वाकई पानी की बोतल के लिये दस रुपये मांग लिये। जब एयर होस्टस ने मुझ से कहा कि पानी के दस रुपये देने पडेंगे तो मेरे पैरो तले जमीन खिसक गई। विचार आया कि इससे अच्छा तो ट्रैन की यात्रा है। अपना प्लेटफार्म पर उतरकर पानी तो पी सकते है। धरती से हजारों मील ऊपर पानी की बरसात करने वाला बादल तो है लेकिन हमारे पीने के लिये एयर लाईन पैसा मांग रही है। ये तो हद हो गई।
अब धीरे-धीरे कर मेरे दिलो-दिमाग में हवाई यात्रा की जो सुनहरी तस्वीर बनी थी, वो धराशायी हो गई है। हवाई यात्रा अब हवा-हवाई लगती है।
जब से प्लेन में सफर करना शुरु कर दिया है तो उससे जुडी खबरें भी पढ़ने लगा हो। पहले तो सिर्फ वही खबरें पढता था जो हवाई अड्डो को उडाने की धमकी या फिर किसी चोरी से जुड़ी घटनाओं से होती थी। पिछले कुछ दिनों में पढ़ा और टी.वी पर देखा कि फंला फ्लाईट कैंसिल हो गई तो कुछ धुंध की वजह से लेट उड रही हैं। कही एयरपोर्ट पर यात्री हंगामा कर रहे हैं तो कही मार-पीट की नौबत आ गई है।
बस और ट्रैन में सफर करने वाले लोगों को अब हवाई यात्रा करने वाले से नीचा नही समझना चाहिये। अब हमारे देश में बस, ट्रैन, जुगाड, घोडा-तांगा और हवाई जहाज की यात्रा में कोई खासा फर्क नहीं है। इसलिये अब इन सबमें बैठने में अपनी तौहिन बिल्कुल मत समझना।

3 टिप्‍पणियां:

बाल किशन ने कहा…

हमे भी अबतक के अपने जीवन मे दो बार ये सौभाग्य प्राप्त हो चुका है. और देखिये कैसा संयोग है कि हमारी भी पहली हवाई यात्रा काठमांडू की ही थी.
और अनुभव भी बहुत कुछ आप जैसे ही रहे थे. लेकिन बाजी आपने मार ली. आपनी पोस्ट लिख दी और हम कमेन्ट लिख रहे है.

santosh ने कहा…

आपके इस अनुभव को पढने के बाद मुझे लगता है कि domestic flight में सफर करने से पहले इंसान मानसिक रुप से इन समस्यायों को झेलने के लिए तैयार रहे।

Ashok Kaushik ने कहा…

वाकई... हैरानी की बात है. उड़नखटोलों में ऐसी बेहूदगी होती है। समस्या ये है कि आप प्लेन में सफर के दौरान बस या ट्रेन की तरह हंगामा करके अपनी भड़ास भी नहीं निकाल सकते। इससे ज्यादा बेचारगी भला क्या होगी... मुझे आपसे हमदर्दी है।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)