27 दिसंबर, 2007

मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो


“हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ”…
मिर्जा असादुल्लाह खान गालिब...ये वो नाम है जिसे पूरी दुनिया मिर्जा गालिब के नाम से जानती है। उर्दु शायरी का उनसे नायाब हीरा शायद ही कोई और होगा। उनकी इस शायरी के साथ सैकड़ों ऐसी शायरी हैं जिन्हे लोग आजतक याद करते हैं। खुद मिर्जा गालिब की उर्दु शायरी पर अनगिनत रिसर्च हो चुकी है और अब भी हो रही है।
आज, यानि मिर्जा गालिब की 211वी जन्मतिथि (27 दिसम्बर 1797) है, ये सभी जानते है। लेकिन मिर्जा गालिब की जिंदगी का एक हिस्सा ऐसा भी है जो कम ही लोगों को मालूम है।
मिर्जा गालिब के समय में अंग्रेजों ने दिल्ली पर अपना राज जमा लिया था लेकिन पुलिस व्यवस्था अभी भी मुगल कालीन थी। राजधानी दिल्ली में कोतवाल की ही हुकुमत चलती थी। उसका डंडा जिधर भी घूमता लोग डर के मारे अपने-अपने घरों में दुबक जाते थे। खुद मिर्जा गालिब भी मुगल सल्तनत के आखिरी राजकवि थे। आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर उनके ही समकालीन थे। लेकिन जिस तरह से अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर से दिल्ली की गद्दी छीन ली थी, उनके साथ मिर्जा गालिब सहित कई राजकवियों की नौकरी भी खत्म हो गई थी। मिर्जा उन-दिनों पुरानी दिल्ली के बल्लीमारन इलाके में रहते थे—उनकी इस हवेली को अब म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है। नौकरी छुटने के बाद मिर्जा की शानौ-शौकत कम हो गई। क्योंकि
मिर्जा नबाबी खानदान से ताल्लुक रखते थे और मुगल दरबार में उंचे ओहदे पर थे इसलिये उन्हे अपनी अय्याशियों पर लगाम लगाना बेहद मुश्किल था।
ये बात दीगर है कि मिर्जा की हवेलियों में आये-दिन पार्टियों हुआ करती थीं। जाम से जाम टकराते और शेरो-शायरी का लंबा दौर चलता। जानकार बताते है कि मिर्जा को कोठो पर जाने का भी शौक था। कई वेश्यायें उनकी अच्छी दोस्त थी। लेकिन दिल्ली के कोतवाल को मिर्जा की ये रंग-रेलियां नागवार गुजरती थीं। वो उन्हे शांति भंग करने के आरोप में जेल में डाल देता। ये बात आजतक साफ नहीं हो पाई है कि क्या वाकई मिर्जा शांति भंग करते थे या फिर उनका कोतवाल से छत्तीस का आंकडा था।
उस वक्त कोतवाली वहां हुआ करती थी जहां आजकल शीशगंज गुरद्वारा है।
कोतवाली के ठीक पीछे ही जेल हुआ करती थी, जहां कैदियों को रखा जाता था। अब इस जगह शीशगंज गुरुद्धारे की पार्किंग है। मिर्जा को कई रातें इसी जेल में काटनी पडी थीं।
इसी जेल में औरंगजेब के आदेश पर सिखों के नवे गुरु, गुरु तेगबहादुर का शीश कलम कर दिया गया था। उनकी कुर्बानी को याद करते हुये बाद में सरकार ने कोतवाली को यहां से शिफ्ट कर नई जगह पहुंचा दिया और कोतवाली (और जेल) की जगह शीशगंज गुरुद्वारा बना दिया गया। गुरुद्वारे के ठीक सामने है भाई मति दास चौक। भाई मति दास गुरु तेगबहादुर के शिष्य थे। औरंगजेब ने उन्हे भी मुस्लिम धर्म ना अपनाने के इल्जाम में मौत के घाट उतार दिया था।
खैर, मिर्जा गालिब का कोतवाली में आना-जाना लगा रहता था। लेकिन एक बार जब कोतवाल ने मिर्जा गालिब को उनके एक अपराध के लिये मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, तो अंग्रेज मजिस्ट्रैट आग-बूबला हो गये।
मजिस्ट्रैट साहब का तर्क था कि क्या कोतवाल को पूरी दिल्ली में गिरफ्तार करने के लिये कोई नहीं मिलता है जो हरबार वो मिर्जा को लाकर अदालत में पेश कर देता है।
यहां पर कई इतिहासकार मानते है कि कोतवाल मिर्जा को जबरदस्ती फंसाता था—अगर कोई ये सोचता है कि आज की मार्डन पुलिस ही भोले-भाले लोगो को फंसा देती है तो ये जान लीजिये कि ये परंपरा बहुत पुरानी है। दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर डा. के के पॉल ने अपनी ‘कॉफी-बुक में इस किस्से का जिक्र किया है। वैसे इतिहासकार इस बात से इंकार नहीं करते है कि मिर्जा को पीने-पिलाने का शौक नहीं था।

मिर्जा गालिब की यात्रा केवल कोतवाली तक ही सीमित नहीं थी। उन्हे कोर्ट-कचहरी का भी शौक था। शायद इसलिये कि अंग्रेज सरकार ने उनकी पुश्तैनी और मुगल सल्तनत से मिली जमीन-जायदाद जब्त कर ली थी। अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिये वो कलकत्ता तक हो कर आये थे—उन दिनो भारत में अंग्रेज हुकुमत का हेड ऑफिस और सुप्रीम कोर्ट वहीं था। उन दिनों बताते हैं कि दिल्ली से कलकत्ता पहुंचने में करीब तीन महीने लगते थे। लंबी कानूनी लडाई से मिर्जा गालिब बुरी तरह टूट गये थे। उनकी जो भी बची हुई धन-दौलत थी वो सब खत्म हो चुकी थी। लेकिन घर में रंग-रेलियां और जाम से जाम टकराने के दौर कम नहीं हुए। नतीजा ये हुआ कि घर में आये-दिन कलह रहने लगी। घर मे लड़ाई-झगड़ा रोजमर्रा की बात हो गई। यही वजह है कि अपनी उम्र के आखिरी पडाव में मिर्जा पूरी तरह टूट चुके थे---गुलजार निर्देशित टी.वी सीरियल अगर आपने देखा हो तो इसका अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है।
इन कठिन परिस्थितियों में भी उन्होने अपनी शेरो-शायरी जारी रखी। और शायद यही वजह है कि उनकी शायरी में वो दर्द है जो वही बंया कर सकता है जिसने इतने दुख-दर्द करीब से महसूस किये हों।
लेकिन इन कठिन परिस्थितियों में भी उन्होने अपनी शेरो-शायरी जारी रखी। और शायद यही वजह है कि उनकी शायरी में वो दर्द है जो वही लिख सकता है जिसने इतने दुख-दर्द करीब से महसूस किये हों।
“फिर खुला है दर-ए-अदालत-ए-नाज़, गर्म बाज़ार-ए-फ़ौजदारी है।
 हो रहा है जहाँ में अँधेर, ज़ुल्फ़ की फिर सरिश्तादारी है। 
फिर दिया पारा-ए-जिगर ने सवाल, एक फ़रियाद-ओ-आह-ओ-ज़ारी है। फिर हुए हैं गवाह-ए-इश्क़ तलब, अश्क़बारी का हुक्मज़ारी है। 
दिल-ओ-मिज़श्माँ का जो मुक़दमा था, आज फिर उस की रूबक़ारी है। 
बेख़ूदी बेसबब नहीं 'ग़ालिब', कुछ तो है जिस की पर्दादारी है।”

7 टिप्‍पणियां:

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद.

महर्षि ने कहा…

नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक।

vir ने कहा…

बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लोग को एक अलग रंग देने से अछा लगा.

बेनामी ने कहा…

hi achchha hai dost....yaar niraj tumhara number nahi hai mere paas...remember i m franklin ...

Neeraj Rajput ने कहा…

franklin, my number is on my blog (right hand side in 'Crime Reporting' section). But no problem, my mobile number is09811974757..... call me on this number....

Satish Bahl ने कहा…

कुछ ऐसा लगा ,जैसे मैं गालिब के दौर में ही हुँ,और सारा वाक्या मेरी आँखों के सामने ही हुआ है।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)