19 दिसंबर, 2007

झूठ के प्रयोग


THE STORY OF MY EXPERIMENTS WITH TRUTH. सत्य के प्रयोग... गांधी जी की ये आत्मकथा उनकी जिंदगी से जुड़ी सबसे अहम एतिहासिक दस्तावेज है। गांधीजी की लिखी ये किताब शायद आपने भी पढ़ी होगी। लेकिन पोरबंदर के चंद लोगों ने प्रशासन की मिलीभगत से गांधीजी से जुड़े सच को झूठ में तब्दील कर दिया है। गांधीजी ने जो कहा उसे गलत करार दिया—गुजरात का वही पोरबंदर शहर जहां गांधीजी का जन्म हुआ था और पहली नौकरी भी वही की एक कपंनी में की थी। उनके ही हाथों लिखी उनकी आत्मकथा को बदल दिया। एक फरेब जो गांधीजी के साथ किया गया। एक छल जो करोड़ों हिंदुस्तानियों के साथ किया गया। ऐसा धोखा जिसका पता अबतक किसी को नहीं था। गांधीजी की लिखी आत्मकथा को बदलकर नापाक कोशिश की गई समंदर में समा चुके एक बेशकीमती विरासत को हथियाने की।
पोरबंदर पोर्ट पर अभी भी दिखता है समंदर में डूबा एक जहाज। जहाज का नाम है एस एस खेडीव। ये वही जहाज है जिससे महात्मा गांधी एक बार साउथ अफ्रीका से हिंदुस्तान लौटे थे। मिश्र में बने इस जहाज को कभी ब्रिटेन की महारानी ने खरीदने की कोशिश की थी। इस बेशकीमती जहाज से जुड़ी है महात्मा गाधी की जिंदगी की वो हकीकत जिसे इतिहास से हटाने की कोशिश की गई। करोड़ों के मुनाफे के लिए गांधी के नाम पर किया गया सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा।
इंगलैंड से वकालत की पढ़ाई के बाद लौटे, तो गाधी जी इसी पोरबंदर शहर में बस गए। पेशे से वकील मोहनदास करमचंद गांधी को पोरबंदर की ही एक नामी-गिरामी शिपिंग कंपनी, दादा अब्दुल्ला कंपनी, में नौकरी मिल गई। सवारी और मालवाहक जहाज चलाने वाली इस कंपनी के कर्ताधर्ता खुद अब्दुल्लाह हाजी आदम झावेरी—जिन्हें प्यार से लोग दादा अब्दुल्लाह बुलाते थे और उनके नाम पर ही कंपनी का नाम था---और उनके छोटे भाई अब्दुल हाजी आदम झावेरी। दादा अब्दुल्ला कंपनी में गांधी जी केस मुकदमे का काम देखा करते थे। दादा अब्दुल्ला कंपनी के एक केस की पैरवी के लिए ही पहली बार गांधीजी दक्षिण अफ्रीका गए। इस बात का जिक्र गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में भी किया है।
गांधीजी ने अपनी किताब में पोरबंदर की शिपिंग कंपनी के मालिक अबदुल्ल हाजी आदम जावेरी का जिक्र तो किया है, दक्षिण अफ्रीका के महान नेता नेल्सन मंडेला और फातीमा मीर की किताब में भी अब्दुल हाजी आदम जावेरी और गांधीजी के संबंधों का जिक्र है।
पोरंबदर की शिपिंग कंपनी के मालिक अब्दुल हाजी आदम झावेरी (और दादा अब्दुल्लाह) गांधी जी के विचार और दक्षिण अफ्रिका में उनके अहिंसक आंदोलन से बेहद प्रभावित थे. इतना ही नहीं, उन्होने दक्षिण अफ्रिका में रंगभेद के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। एक समय नेटाल कांग्रेस के अध्यक्ष दादा अब्दुल्ला थे और सचिव महात्मा गांधी। हिंदुस्तानियों की इन तमाम हरकतों पर ब्रिटिश हुकूमत की नजर थी। शिपिंग कंपनी के मालिक अंग्रेजों की आंखों में खटकने लगे और फिर उन्होने इस कंपनी को बर्बाद करने की ठान ली। कंपनी के चार जहाजों को समंदर में डूबो दिया गया। उन्ही में एक था सबसे कीमती जहाज एस एस खेडीव।

एक सौ दस साल पहले पोरबंदर के समुद्रतट पर एक जहाज को डूबो दिया गया। लेकिन जहाज के मालिक का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। ऐसा नाम जिसका जिक्र गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में भी किया। इतिहास एक बार फिर हमारे सामने खड़ा है क्योकि करोड़ों रूपये के लालच में गुनहगारों ने की है इतिहास बदलने की नाकाम कोशिश। दरअसल स्थानीय लोगों की माने तो इस डूबे हुये जहाज की कीमत आज के समय में भी करोड़ो की है।
तमिलनाडु के मदुरै शहर में रहने वाले अब्दुल करीम झावेरी इस मामले में पिछले कई सालो से अदालतो में एक लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। अब्दुल करीम झावेरी उन्ही अब्दु्ल हाजी आदम झावेरी के परपौत्र हैं जो अब्दुल्ला शिपिंग कंपनी के मालिक थे। गांधी जी के नजदीकी स्वतंत्रता सेनानी थे। अब्दुल करीम झावेरी ने अपने परदादा से जुड़ी कई चीजों को सहेज कर रखा है। लेकिन तकरीबन दस साल पहले जब उन्हें पता चला कि दादा अब्दुल्ला कंपनी के समंदर में डूबे एस एस खेडीव जहाज पर कोई और दावा कर रहा है तो वे हैरान रह गए। करीम जावेरी के मुताबिक 1992 में पोरंबदर क्लेक्टर ऑफिस ने एस एस खेडिव जहाज को उसके असली मालिक सौंपने के लिए एक विज्ञापन निकलवाया । चूंकि अब्दुल करीम जावेरी मदुरै में रहते थे इसलिए उन्हें विज्ञापन की भनक तक नहीं लगी.जब पता चला तो बहुत देर हो चुकी थी। पोरंबद के क्लेक्टर ऑफिस ने एस एस खेडीव जहाज को शहर के ही एक शख्स, हबीब अबूबाकर सूर्या के नाम कर दिया।
अब्दुल करीम जावेरी के मुताबिक एस एस खेडिव को पाने के लिए बड़ी सफाई से एक साजिश रची गई और इस साजिश को अंजाम देने के लिए 1988 में जिला क्लेक्टर के दफ्तर में ये दावा किया कि दादा अब्दुल्ला कंपनी के मालिक उसके परदादा है। दावा सच है या नहीं, इसकी छानबीन का जिम्मा सौपा गया पोरबंदर के तहसीलदार को। तहसीलदार की रिपोर्ट में पाया गया कि हबीब अबूबाकर सूर्या का दावा झूठा है। इसके बावजूद 22 जनवरी 1992 को पोरबंदर के जिला कलेक्टर ने एक नया आदेश जारी किया। आदेश के मुताबिक चूंकि हबीब अबूबाकर सूर्या के परदादा हाजी दादा हाजी हबीब सूर्या ही दादा अब्दुल्ला कंपनी के मालिक हैं, इसलिए एस एस खेडिव जहाज पर मालिकाना हक उनके ही परपोते हबीब अबूबाकर सूर्या का होगा।

अब्दुल करीम झावेरी के मुताबिक हबीब अबूबाकर सूर्या ने फर्जीवाड़े को पुख्ता करने के लिए गांधीजी की आत्मकथा को भी बदलने की साजिश रची। क्योंकि गांधी जी आत्मकथा माई एक्सीपेरीमेंट विद ट्रूथ में दादा अब्दुल्ला कंपनी के मालिक अब्दु्ल हाजी आदम झावेरी का जिक्र था।
हबीब अबूबाकर सूर्या ने जिला कलेक्टर को गांधीजी की आत्मकथा की वो प्रति सौंपी जिसमें दादा अब्दुल्ला कंपनी का जिक्र ही नहीं था। उसने आत्मकथा के उस हिस्से को किताब से ही गायब कर दिया। ये हेराफेरी गुजराती में लिखी गई गांधीजी की एक दूसरी किताब, अक्षरधे, में भी की गई।
लंबी जद्दोजहद के बाद अब्दुल करीम झावेरी की अपील पर पोरबंदर जिला अदालत में सुनवाई हुई तो सारा सच सामने आ गया। अदालत ने पाया कि हबीब अबूबाकर सूर्या नाम के शख्स ने फर्जीवाड़ा किया है। फर्जीवाड़ा पोरबंदर समुद्रतट पर डूबे करोड़ों के उस जहाज को पाने के लिए किया गया था।
लेकिन पोरबंदर के जिला कलेक्टर ने तीन साल बाद भी जिला अदालत के फैसले की तामील नहीं की। इस बीच अब्दुल करीम झावेरी ने मामले को लेकर हाइकोर्ट में अपील की। हैरानी की बात है कि हबीब अबूबाकर सूर्या ने एक बार भी फर्जीवाड़े का सहारा लिया. उसने हाइकोर्ट में फर्जी हलफनामा पेश किया। कोर्ट को जब ये पता चला तो गुजरात पुलिस को उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा गया। पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज करली लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की। सूत्रों की माने तो इस पूरे मामले में हबीब अबूबाकर सूर्या तक महज एक मोहरा भर है। इसके पीछे काम कर रहा है गुजरात के ही एक कद्दावर नेता और पूर्व एम.पी का। उनका साथ दे रहे है कुछ सरकारी अफसर।

सारा फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद भी हबीब अबूबाकर सूर्या एस एस खेडिव जहाज पर दावे कर रहा है. जबकि पोरबंदर के सरकारी अफसर कार्रवाई की बात तो दूर तो दूर इस मामले पर ज्यादा बोलने से भी बचते हैं। पोरबंदर के मौजूदा जिला क्लेक्टर दबी जबान से ये कबूल करते हैं कि मामले में चूक हुई है।
सवाल सिर्फ एस एस खेडिव जहाज का नहीं। सवाल ये भी नहीं है कि जहाज कितना बेशकीमती है..सवाल है तो सिर्फ एक बड़े गुनाह का। जिसे अंजाम देने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल किया गया। पोरबंदर कोर्ट ने तो अपना फैसला सुना दिया है..और अब गुजरात हाइकोर्ट के फैसले का है इंतजार..जब गांधी के गुनहगारों को मिलेगी सज़ा।

4 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

अफसोसजनक!!
उम्मीद है अदालत कड़ी से कड़ी सजा देगी।

बाल किशन ने कहा…

शर्मनाक और निंदनीय घटनाक्रम है ये.
इसपर रौशनी डालने के लिए आप बधाई के पात्र है.
मेरी दुआ है कि न्याय हो लेकिन जल्दी.

Ashok Kaushik ने कहा…

किसी ने एकदम सही कहा है-- देते हैं भगवान को धोखा, इंसान को क्या छोड़ेंगे... अफसोस, शरीफों के चोले में छुपे ऐसे शातिर लोग अब भी हैं। या यूं कहें...
गांधी तेरे देस में,
शैतान घूमते हैं
साधू के भेष में...

राजीव जैन Rajeev Jain ने कहा…

राष्‍टपिता के साथ ऐसा हुआ
अपन की संपत्ति का तो राम ही मालिक।
पता नहीं अपने पोते को तो कुछ मिल पाएगा कि नहीं।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)