08 फ़रवरी, 2008

अखबार ने पहुंचाया सलाखों के पीछे


किडनी किंग डा. अमित उर्फ संतोष राउत नेपाल में गिरफ्तार हो चुका है। लेकिन वो जितने नाटकीय अंदाज में फरार हो हुआ था उतने ही फिल्मी अंदाज में उसकी गिरफ्तारी हुई है। वैसे डा. अमित उर्फ संतोष राउत के लिये हिंदी फिल्मे और फिल्मी अंदाज कोई नही बात नहीं है। नब्बे के दशक के शुरुआती सालों में संतोष ने कई बी-ग्रेड फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया था। माना तो ये भी जा रहा है कि डा.अमित अभी भी फिल्मो में पैसा लगाता है। बताने को तो डा. अमित के बारे में इतना है—

किडनी के काले कारोबार से कमाई करोडो की संपत्ति, विदेशी बैंक एकाउंटस वीवीआईपी लोगो से संबध, अंडरवर्ल्ड से रिश्ते

किडनी के काले कारोबार से कमाई करोडो की संपत्ति, विदेशी बैंक एकाउंटस वीवीआईपी लोगो से संबध, अंडरवर्ल्ड से रिश्ते —कि खुद उसकी जिंदगी पर एक फिल्म बन जाये। मुझे याद है कि नब्बे के दशक में ही मिथुन चक्रवर्ती की ‘रावणराज’ नाम की फिल्म आई थी, उसमें मुख्य विलेन विदेशियों से किडनी का सौदा करने वाला एक डाक्टर ही था। ये महज एक इत्तेफाक है या कुछ और की ये फिल्म डा. अमित उर्फ संतोष राउत के सबसे पहली बार किडनी रैकेट के भांडाफोड में गिरफ्तारी के कुछ महीने बाद ही रिलीज हुई थी। लेकिन इस फिल्म में ‘डा. डैन ’ या ‘डा. हॉरर’ के बारे में पूरी तरह नही बताया गया था। या ये कहें कि उस वक्त किडनी किंग का रैकेट इतना बडा नही था जो आज की तारीख में है।

बात किडनी कुमार की गिरफ्तारी की....काठमांडू से करीब डेढ सौ किलोमीटर दूर चितवन नेशनल पार्क के वाइल्ड लाइफ रिर्सोट के कमरा नंबर 6 में सुबह के करीब सात बजे वेटर चाय लेकर पहुंचता है। कमरे के अंदर दो लोग मौजूद थे। एक बेड पर आराम कर रहा था और दूसरा ( ये डा. अमित था...उसने चेहरे पर काला चश्मा और सिर पर कैप लगाई हुई है) सोफे पर बैठकर आराम फरमा रहा था। वेटर के अंदर दाखिल होते ही सोफे पर बैठे शख्स ने उससे नेपाल के अंग्रेजी अखबार लाने को कहा। वेटर दो अखबार लेकर जैसे ही कमरे में पहुंचा उसने देखा कि सोफे पर बैठा शख्स अखबार से कुछ काट रहा है। जैसे ही उसने दो अखबार सोफे पर बैठे शख्स को दिये, वो आग-बूबला हो उठा। उसने वेटर को कई अखबार लाने का आदेश दिया। वेटर को लगा कि ये शख्स इतने अखबार क्यो मंगा रहा है। लेकिन वो इस बार कई अंग्रेजी अखबार लेकर कमरे में पहुंचता है। सिर पर कैप और काला चश्मा लगाये वो शख्स सभी अखबारो को उलट-पलट करने लगा। वेटर को लग रहा था कि जैसे वो कुछ खास खबर को अखबारो में ढूंढ रहा था। जैसे ही उसे वो खबर हाथ लगी वो फिर से कैची से अखबार की कतरन काटने लगा।

अखबार काटते-काटते वो वेटर से पूछता भी जा रहा था, “केवल टी.वी पर हिंदी न्यूज चैनल भी आते हैं क्या।”

अखबार काटते-काटते वो वेटर से पूछता भी जा रहा था, “केवल टी.वी पर हिंदी न्यूज चैनल भी आते हैं क्या।” कैप लगाये कस्टमर की बात सुनकर वेटर कमरे से बाहर आ गया। लेकिन रह-रहकर उसे इस शख्स का चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगता था। बाहर आकर उसने एक अखबार में छपी एक फोटो देखी तो वो चौक गया। वो अभी कुछ सोच ही रहा था कि कमरा नंबर छह में मौजूद एक शख्स ने होटल की लॉबी में रिस्पशेनिस्ट को फोन कर कमरे में रखे अखबारों को ले जाने के लिये कहा। वेटर कमरे से अखबार लेकर आया तो वो ये देखकर चौंक गया कि अखबारो से कई कतरनी निकाली गई थी। उसने ये अखबार रिस्पशेनिस्ट को लाकर दिखाये। बिना देर किये होटल स्टाफ ने पुलिस को फोन घूमा दिया। थोडी ही देर में पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी। होटल की लॉबी में पहुंचकर पुलिस ने रिशेपसनिस्ट को एक फोटो दिखाया। रिस्पशेनिस्ट ने कमरा नंबर छह की और इशारा कर दिया। बिना देर किये पुलिस धडधडाती हुई रिसोर्ट के कमरे नंबर छह में दाखिल हो चुकी थी। अंदर सिर्फ कैप लगाये शख्स बैठा था। वो भी लग रहा था कि भागने की फिराक में था। उसका साथी वहां से नदारद था। लेकिन कमरे में मौजूद शख्स को पुलिस पहचान चुकी थी। वो था दुनिया का मोस्ट वांटेड डाक्टर जिसकी तलाश दुनियाभर की पुलिस को थी। डा. अमित उर्फ संतोष राउत नेपाल पुलिस की गिरफ्त में था।
दरअसल, जब इंटरपोल किडनी किंग को सरगर्मी से तलाश कर रही थी और दुनियाभर की मीडिया—खासतौर से भारत—उसके खिलाफ अखबार में और टी.वी पर पल-पल की खबरे प्रसारित कर रही थी तो वो नेपाल के होटलों में बैठकर अपनी खबरों को पढ़ता था। पढ़ने के साथ-साथ उन खबरों की कतरने भी निकाल लेता था।
लेकिन

जैसे ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया उसने कमरे में रखी करोड़ो की विदेशी करेंसी में से बीस लाख रुपये पुलिस को बतौर रिश्वत के तौर पर पेश कर दिये।

जैसे ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया उसने कमरे में रखी करोड़ो की विदेशी करेंसी में से बीस लाख रुपये पुलिस को बतौर रिश्वत के तौर पर पेश कर दिये। डा. अमित भूल चुका था कि ये फिल्म नहीं असल जिंदगी की हकीकत है। पुलिस किडनी किंग की चाल में फंसनी वाली नही थी। कुछ ही घंटो बाद पूरी दुनिया को पता चल चुका था कि अबतक के सबसे बडे किडनी रैकेट—जिसके तार भारत और नेपाल के साथ-साथ अमेरिका, इंग्लैंड, ग्रीस, कनाडा और सऊदी अरब जैसे अमीर देशो तक जुडे थे—का सरगना डा. अमित गिरफ्तार हो चुका है।

2 टिप्‍पणियां:

संजय तिवारी ने कहा…

बहुत अच्छा विवरण.
आपका लिखना बताता है कि आप क्राईम की ही स्टोरी लिखते रहे हैं. एक सुझाव यह है कि अपने ही लिखे को एक बार खुद से पढ़ लेना चाहिए. इस पूरी स्टोरी में कहीं-कहीं एकाध शब्द छूट गया है जिससे वाक्य बदमजा हो जाता है.

वैसे मैं खुद भी अपना लिखा दोबारा नहीं पढ़ता लेकिन अब धीरे-धीरे आदत डाल रहा हूं. बहुत अच्छा विवरण.

REX ने कहा…

अच्छी जानकारी दी आपने। शुक्रिया।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)