22 फ़रवरी, 2008

जोधा-अकबर नही हरका-अकबर


आशुतोष गोवारिकर की बहुप्रतिक्षित फिल्म जोधा-अकबर आखिरकार रिलीज हो ही गई। फिल्म बनने से पहले ही चर्चित हो गई थी, या यूं कहें कि विवादों में पड़ गई थी। चर्चा में आने की कई वजह हैं। पहली बात तो ये कि इस फिल्म के डायरेक्टर आशुतोष है, सो चर्चित होना तो लाजिमी था। दूसरी बात ये कि इस फिल्म में एक बार फिर ‘धूम’ मचाने आ रही थी बॉलीवुड की हिट जोड़ी—ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय (बच्चन)। तीसरा ये कि मल्लिका-ए-हुस्न ऐश्वर्या कि शादी के बाद ये पहली फिल्म थी। और भी कई कारण है इस फिल्म के चर्चित होने के। जैसे ये एक ऐतिहासिक फिल्म है। हिन्दुस्तान (या ये कहे कि दुनिया) के सबसे शक्तिशाली और करिश्माई बादशाहों में से एक सम्राट अकबर की सच्ची दास्तान पर आधारित है या फिल्म...वगैरहा-वगैरहा।
लेकिन इन्ही खूबियों में ही छिपा है इस फिल्म का विवादों के पचडे में पड़ना। दरअसल, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर एक रियल लाईफ करैक्टर है। मरने के सैकडों साल बाद भी लोग उसकी धर्मनिरेपक्षता को याद करते हैं।

धर्मनिरेपक्षता ही क्यों, उसकी हिन्दुस्तान को एक धागे में पिरोकर रखने की क्षमता, महिलाओं को बराबरी का अधिकार, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी, भूमि सुधार, जैसे उसके कदम ऐसे हैं जो आनी वाली पीढ़ी, राजाओं और व्यवस्था के लिये मील के पत्थर साबित हुये।

धर्मनिरेपक्षता ही क्यों, उसकी हिन्दुस्तान को एक धागे में पिरोकर रखने की क्षमता, महिलाओं को बराबरी का अधिकार, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी, भूमि सुधार, जैसे उसके कदम ऐसे हैं जो आनी वाली पीढ़ी, राजाओं और व्यवस्था के लिये मील के पत्थर साबित हुये। भारतीय इतिहास में (चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर 21 वी सदी तक) सम्राट अशोक को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा राजा होगा जो किसी भी मायने में अकबर का मुकाबला कर सकता हो।
अकबर को करीब से पढ़ने और समझने वाले लोग तो उसे देवीय शक्ति से परिपूर्ण मानते हैं। ये बात अकबर के नवरत्न या दरबारी नही बल्कि आज के जमाने के इतिहासकार तक मानते हैं। भारत के ही एक आधुनिक इतिहासकार ने अकबर पर इतनी रिर्सच की थी जितनी शायद ही किसी ने की होगी। अकबर पर लिखी उनकी किताबों को ‘आईन-ए-अकबर’ से किसी भी मायने में कम नहीं समझा जाता है। कहते हैं कि जब वो इतिहासकार मृत्युशय्या पर पड़े थे तो उन्हे आखिरी बार अकबर के दर्शन हुये थे।

अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े, वो चिल्लाने लगे कि ‘जिल्ले-ईलाही’ यानि मुगल बादशाह अकबर उन्हे लेने आये हैं। उन इतिहासकार के लिये अकबर एक इंसान नही बल्कि देवता थे।

अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े, वो चिल्लाने लगे कि ‘जिल्ले-ईलाही’ यानि मुगल बादशाह अकबर उन्हे लेने आये है। उन इतिहासकार के लिये अकबर एक इंसान नही बल्कि देवता थे। जिन लोगों ने अकबर को पढ़ा नहीं है, उन्हे ये बात हिंदी फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की तरह लगेगी। याद है ना किस तरह से इस मुंबइया फिल्म में अपने मुन्ना भाई (संजय दत्त) को गांधीजी ‘दर्शन’ देते थे।

पहली बार मैने अकबर के बारे में कॉलेज में पढ़ा कि जोधाबाई, अकबर की पत्नी नही पुत्रवधु है। पढ़कर बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योंकि उससे पहले तक ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म में दिखाई गई कहानी को ही हकीकत मानते थे। लेकिन जैसे-जैसे इतिहास पढ़ते गये, ये बात समझ में आ गई कि जोधा, अकबर के बेटे जहांगीर की पत्नी थी।

पहली बार मैने अकबर के बारे में कॉलेज में पढ़ा कि जोधाबाई, अकबर की पत्नी नही पुत्रवधु है। पढकर बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योकि उससे पहले तक ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म में दिखाई गई कहानी को ही हकीकत मानते थे। लेकिन जैसे-जैसे इतिहास पढ़ते गये, ये बात समझ में आ गई कि जोधा, अकबर के बेटे जहांगीर की पत्नी थी।
जब आशुतोष गोवारिकर की फिल्म जोधा-अकबर रिलीज होने वाली थी तब मुझे जरुर आश्चर्य हुआ कि एक बार जो गलती हो गई थी—मुगल-ए-आजम—के वक्त उसे क्यों दुहराया जा रहा है। उसके बाद से ही भारत के कुछ राजपूत संगठन लामबंद हो गये और उतर आये सड़कों पर। जगह-जगह विरोध-प्रर्दशन हो रहे हैं। फिल्म को कई राज्यों में रिलीज नही किया गया। मैं एक राजपूत होते हुये भी ऐसे किसी भी तरह के प्रर्दशनों का समर्थन नही करता हूं। वैसे मैं हर तरह के विरोध-प्रर्दशन और हड़ताल (बंद, चक्काजाम ,इत्यादि) के सख्त खिलाफ रहता हूं।



जानकारों का मानना है कि इस गड़बड़-झाले के पीछे फतेहपुर सीकरी के गाईड़ जिम्मेदार हैं। दरअसल फतेहपुर सीकरी (आगरा के करीब वो शहर जो कभी अकबर की राजधानी हुआ करता था) में अकबर का किला है। इस किले का एक हिस्सा जोधा-महल के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इस महल में मुगल राजाओं की हिंदु रानियां रहा करती थीं। शायद, जहांगीर की पत्नी जोधा भी इसी महल में रहती होगी और इस महल का नाम जोधा-महल पड़ गया। फिर क्या था यहां के गाईडस ने जोधा को अकबर की पत्नी बताना शुरू कर दिया।
अब बात आशुतोष गोवारिकर की फिल्म से। ये फिल्म मैने अभी तक नहीं देखी है। लेकिन प्रोमो देखकर ये जरुर लग रहा है कि इस फिल्म का नाम ‘हरका-अकबर’ होना चाहिये था। जानते हैं क्यों ?
आमेर (जयपुर) के कछवाहा राजपूत, राजा भारमल की बेटी थी हरका। मुगल सत्ता पर काबिज होने के करीब छह साल बाद (यानि 1562 में) अकबर एक बार अपने लावो-लश्कर के साथ अजमेर की दरगाह शरीफ से लौट रहा था। रास्ते में उसकी मुलाकात राजा भारमल से हुई। भारमल ने शिकायत की मेवात का मुगल हाकिम (गर्वनर) उन्हे आये-दिन परेशान करता रहता है। उनसे मनमाना चौथ वसूलता है। कहते है,

अकबर ने भारमल को अपने ही मुलाजिम से मुक्ति दिलाने के लिये दो शर्तें रखीं। पहली, राजा भारमल खुद उसके कैंप पर आकर अपनी बात (मिन्नत करे) रखे यानि नतमस्तक हो। दूसरा ये कि वो अपनी बेटी हरका की शादी उससे कर दें।

अकबर ने भारमल को अपने ही मुलाजिम से मुक्ति दिलाने के लिये दो शर्ते रखी। पहली, राजा भारमल खुद उसके कैंप पर आकर अपनी बात (मिन्नत करे) रखे। दूसरा ये कि वो अपनी बेटी हरका की शादी उससे कर दें। उस वक्त अकबर की उम्र महज़ बीस साल थी। ऐसा माना जाता है कि अकबर की हरका से पहले ही कही मुलाकात हो चुकी थी और उसकी खूबसूरती का कायल होकर दिल दे बैठा था।
हरका से शादी के बाद तो अकबर ने कई राजपूत राजकुमारियों से शादी रचाई। बीकानेर के राजा की बेटी, काहन, जोधपुर की एक राजकुमारी से, एक रोहिल्ला राजकुमारी रुकमावती...। राजपूत घराने में शादी रचाने की परपंरा अकबर के बेटे सलीम उर्फ जहांगीर ने भी जारी रखी। खुद अकबर ने ही अपने बेटे सलीम की शादी जोधपुर के राजघराने की बेटी जगत गोसाई (जो असलियत में जोधाबाई का नाम था) से बड़ी धूम-धाम से कराई थी। लेकिन ऐसा नहीं है कि हिंदुस्तान में अकबर पहला मुस्लिम राजा था जिसने हिंदु लड़कियों से शादी रचाई थी। उससे पहले अलाउद्दीन खिलजी, दक्षिण के बाहमनी राजा फिरोज शाह, गुजरात के मुहम्मद शाह सहित कई मुस्लिम राजाओं ने हिंदु रानियों से विवाह किया था। लेकिन

अकबर ने हिंदु (खासतौर से राजपूत) राजघरानों में शादी को अपनी ‘राज-नीति’ बनाया था।
इन शादियों से अकबर एक बड़े साम्राज्य को एक सूत्र में बांधने में कामयाब हो पाया।

अकबर ने हिंदु (खासतौर से राजपूत) राजघराने में शादी को अपनी ‘राज-नीति’ बनाया था। इन शादियों से अकबर एक बड़े साम्राज्य को एक सूत्र में बांधने में कामयाब हो पाया। इन शादियों से अकबर एक बड़े साम्राज्य को एक सूत्र में बांधने में कामयाब हो पाया। शादी करने से एक तो इन राजपूत राजाओं से रिश्ते बन जाते थे, यानि उनके विद्रोह की संभावना लगभग ना के बराबर हो जाती थी। राजस्थान के छोटे-छोटे राजपूत राजा दिल्ली (या आगरा) के उन राजाओ को मुंह तोड़ जबाब देते थे जो उनकी सरजमीं की तरफ आंख उठाकर देखने की जुर्रुत करते थे। दूसरा ये कि राजपूत अपनी वफादारी के लिये जाने जाते थे। आड़े वक्त में वही अकबर का साथ देते थे। मरते वक्त अकबर के अब्बा, हुंमायू ने उसे हिंदुस्तान में राज करने का मूल-मंत्र दिया था। उसने अकबर को सीख दी थी कि, “

राजपूत कौम का हमेशा ध्यान रखना, क्योंकि ना तो वे (राजपूत) कभी कानून तोड़ते हैं और ना ही कभी आज्ञा का उल्लंघन करते है। वे तो सिर्फ आज्ञा का पालन करते है और अपना (वफादारी का) फर्ज निभाते हैं।

राजपूत कौम का हमेशा ध्यान रखना, क्योकि ना तो वे (राजपूत) कभी कानून तोड़ते हैं और ना ही कभी आज्ञा का उल्लंघन करते हैं। वे तो सिर्फ आज्ञा का पालन करते हैं और अपना (वफादारी का) फर्ज निभाते हैं।” गुजरात को कूच करते वक्त तो अकबर ने आमरे के राजा मान सिंह को ही आगरा (सत्ता का केंद्रबिंदु) की गद्दी का रखवाला घोषित कर दिया था। यहां तक की मान सिंह को और उनके परिवार के दूसरे सदस्यों को हरम (राजघराने की रानियों के रहने की जगह) की भी जिम्मेदारी सौंपी गई थी—जो कभी भी किसी मर्द के हवाले नहीं की जाती थी। दूर-दराज के कई विद्रोह कुचलने में भी राजपूत राजाओं ने अह्म भूमिका निभाई थी। अकबर का साम्राज्य काफी बड़ा था। इसलिये आये-दिन दूर-दराज के हाकिम अपने को स्वतंत्र घोषित कर देते थे। ऐसे में अकबर, राजपूतों के सिवाय किसी पर विश्वास नहीं कर पाता था। यहां तक की अपने बेटे सलीम पर भी वो इतना भरोसा नहीं करता था। क्योकि खुद सलीम ने भी एक बार अपने पिता के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था।
राजपूत घरानो से रिश्ते बनाकर अकबर अपने प्रजा में एक सदेंश देना चाहता था। वो दिखाना चाहता था कि क्या हिंदु और क्या मुसलमान, उसके लिये सभी बराबर हैं। राजपूत राजाओं के लिये भी ये घाटे का सौदा नहीं था। अपने किलों में आराम से बिना किसी डर के रह सकते थे। यहां ये बात दीगर है कि राजस्थान में अकबर के कब्जे से पहले ये सभी राजपूत राजा आपस में लड़ते रहते थे। उनकी ताकत आपस में लड़ते-लड़ते खत्म हो गई थी। राजस्थान के मेवाड़ राज्य के महाराणा प्रताप को छोड़कर हरेक राजा अकबर के सामने नत-मस्तक हो चुका था। मुगल घराने से रिश्ता जोड़ने पर राजपूत राजाओं के बेटे और रिश्तेदारों को राजदरबार में ऊंचा ओहदा भी दिया जाता था। राजदरबार में ऊंचे ओहदे का मतलब होता था, रुतबे के साथ-साथ एक आलीशान जिंदगी और एक बड़ी सेना उसके हवाले।
खैर, मध्यकालीन से अब आधुनिक भारत की तरफ लौटते हैं। जो राजपूत संगठन जोधा-अकबर के खिलाफ विरोध-प्रर्दशन कर रहे हैं, उनका इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का विरोध तो जायज़ है लेकिन रास्ता गलत है। वैसे इतिहास पर आधारित फिल्म बनाने में यही मुश्किल सामने आती है। संतोष सीवान निर्देशित और शाहरुख खान स्टारर ‘अशोक’ में भी कई तथ्यों को सही से पेश नहीं किया गया था। लेकिन उस फिल्म को क्यों नही विरोध हुआ, ये अपने-आप में आश्चर्य की बात है। शायद इस वजह से की क्योंकि इस फिल्म में किसी जाति या धर्म के लोगो की भावनायें सीधे तौर से आहत नहीं हुई थी। ‘जोधा-अकबर’ में एक जाति-विशेष से जुड़ा मामला था। यानि अगर फिल्म का नाम ‘हरका-अकबर’ होता तो ये बबाल ही नहीं होता। लेकिन निर्माता-निर्देशक भी पैसा कमाने के लिये ही फिल्म बनाते है। उन्हे मालूम था कि लोगो के जेहन में सुपर-हिट फिल्म मुगल-ए-आजम के जोधा-अकबर समाये हुये हैं। बस उन्हे कैश करने की देरी थी। चाहे उसके लिये इतिहास के पन्नों को ही क्यों ना बदल दिया जाये।

6 टिप्‍पणियां:

nalini ने कहा…

आपको ब्लॉग पर क्राइम से अलग इतिहास के बारे में पढकर अच्छा लगा।

crime ने कहा…

आसानी से इतिहास के पन्नों पर रोशनी डाली है और आपने बिल्कुल सही कहा कि निर्माता निर्देशक जानते हैं कि उन्हें अपनी फिल्म हिट कैसे करानी है अब वो चाहे इतिहास को तोडमरोड़ कर पेश करने से हो या फिर फिल्म के खिलाफ लिए बवाल मचाने से हो।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बहुत सही!!
जानकारी से भरी है आपकी यह पोस्ट!
शुक्रिया!

abhinav ने कहा…

जब सारे के सारे न्यूज चैनल उनकी टी.आर.पी.गेन करने के लिए खली,राखी सावंत और नच बलिए को न्यूज टैनलों पर घंटो दिखा रहे हैं तो ये भी ठीक ही रही कि आपका एक आर्टिकल क्राइम से हटकर भी पढने को मिला...टेस्ट मे चेंज अच्छा लगा..क्राइम रिपोर्टर इतिहास पर भी अच्छा लिख सकता है।

Ashok Kaushik ने कहा…

नीरज जी, जिसे हम इतिहास कहते हैं उसके बारे में जिसने भी जो भी लिखा,वो उसने खुद लिखा या लिखवाया गया... ये सवाल काफी अहम है। उसकी विश्वसनीयता का पैमाना ना आपके पास है ना हमारे पास। वर्ना आप ही बताइए एक ही कालखंड में अकबर भी महान हो गया और मेवाड़ के लड़ाके महाराणा प्रताप भी... भला कैसे... मैं आज तक नहीं समझ पाया। अगर अकबर सचमुच महान था, तो पानीपत में उससे लोहा लेने वाले महाराजाधिराज हेमचंद्र (हेमू) को क्या कहें...आप सही कहते हैं फिल्मवालों को सचमुच किसी तथ्य से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें तो कहानी में मोहब्बत का मसाला चाहिए( भले ही वो विषयवस्तु पर रिसर्च के लाख दावे क्यों ना करे). लिहाजा इस बहस में पड़ने की बजाय किसी आम मुंबइया फिल्म की तरह जोधा-अकबर का भी मजा लीजिए... नाम पर ऐतराज है तो उसे बंटी और बबली मान लीजिए या फिर.. बंसी और बिरजू....

REX ने कहा…

लिखा तो अच्छा है, लेकिन जनाब आपको बिंदी से इतनी चिढ़ क्यों है। वक्त मिले तो जरूर बताइएगा।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)