09 मार्च, 2008

पुलिस की जांच और कई राज़


गोवा पुलिस को आखिरकार मानना ही पड़ा कि 15 साल की ब्रिटिश लड़की स्कारलेट ईडन केइलिंग की मौत स्वाभाविक नहीं बल्कि हत्या है। स्कारलेट की मां ने अपनी बेटी की लाश को देखते ही बता दिया था कि उसकी बेटी की मौत समुद्र में डूबने से नहीं हुई है। स्कारलेट की लाश के फोटो देखकर ये बात कोई भी समझ सकता है कि मरने से पहले उसके साथ जोर-जबरदस्ती हुई थी। उसके पूरे शरीर पर चोट के निशान है—एक दो नहीं पूरे पचास निशान। लेकिन ना तो गोवा पुलिस को और ना ही उसका पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर को ये सब दिखाई दिया। यही वजह थी कि गोवा पुलिस शुरुआत से ही इस मौत को एक ‘एक्सीडेंट’ मानकर चल रही थी।


स्कारलेट की मां ने पहले दिन से ही चीख-चीखकर कहा था कि उसकी बेटी की हत्या की गई है। मीडिया में भी मामले ने तूल पकड़ा तो पुलिस ने स्कारेलट की लाश का दुबारा पोस्टमार्टम कराया गया। तीन डॉक्टरो के पैनल ने साफ कर दिया कि स्कारलेट की हत्या की गई है। गोवा पुलिस ने अब इस मामले में हत्या की एफआईआर दर्ज कर ली है और तफ्तीश शुरु कर दी है। यानि

पिछले एक साल में गोवा में ये चौथी वारदात है जिसमें किसी ब्रिटिश नागरिक की मौत संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई है।

पिछले एक साल में गोवा में ये चौथी वारदात है जिसमें किसी ब्रिटिश नागरिक की मौत संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई है।
लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि गोवा पुलिस स्कारलेट की मौत को स्वाभाविक मान कर क्यों चल रही थी। क्या इसे चंद पुलिसवालों की महज लापरवाही मानकर टाल देना चाहिये। क्या पुलिसवालों के साथ-साथ पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर को भी दोषी नहीं मानना चाहिये। कहीं ऐसा तो नहीं कि पुलिस और डॉक्टर की सांठ-गांठ हो गयी थी। क्यों ? ये सिर्फ उसी परिस्थिति में हो सकता है अगर स्कारलेट का हत्यारा कोई रसूखदार शख्स है। लेकिन ये संभावना इसलिये कम लगती है क्योंकि अभी तक पुलिस ने किसी भी आरोपी को राउंडअप नहीं किया है।
या फिर ये हो सकता है कि

पुलिस चाहती है कि गोवा जैसे पर्यटक स्थल में हत्या जैसे संगीन वारदात को छिपा कर रखा जाये।

पुलिस चाहती है कि गोवा जैसे पर्यटक स्थल में हत्या जैसे संगीन वारदात को छिपा कर रखा जाये। एक कम उम्र की महिला टूरिस्ट की हत्या से गोवा की छवि खराब होने का खतरा रहता है। अगर ऐसा था तो भी पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में है। क्योंकि अगर वो हत्यारों को छोड़तें हैं तो वे (आरोपी) और भी निडर हो जायेंगे और ज्यादा बेखौफ होकर गोवा में आने वाले देशी और विदेशी पर्यटकों के साथ अपराध करेंगे। वैसे ये संभावना भी मुझे कम ही लगती है कि पुलिस गोवा की छवि बचाने के लिए मामले को हत्या का करार नहीं दे रहे थे।
मुझे जो ज्यादा संभावना ज्यादा लगती है वो ये है कि पुलिस हत्या की तफ्तीश के पचड़े में नही पड़ना चाहती है। पुलिस से मतलब पूरा गोवा पुलिस का डिपार्टमेंट नहीं बल्कि वो खाकीवर्दी वाले है जिन्हें स्कारलेट की मौत की वजह पता करने के लिये लगाया गया होगा। वैसे ये बात गोवा पुलिस ही नहीं हर राज्य की पुलिस के लिये सटीक बैठती है।

जब भी कोई मौत रहस्यमयी परिस्थितियों में होती है पुलिस उसे ‘नेचुरल’ या फिर आत्महत्या मानकर केस फाईल बंद करने में जुट जाती है।

जब भी कोई मौत रहस्यमयी परिस्थितियों में होती है पुलिस उसे ‘नेचुरल’ या फिर आत्महत्या मानकर केस फाईल बंद करने में जुट जाती है। पुलिस ऐसी किसी भी मौत को हत्या मानकर नहीं चलती जबतक उनके पास कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं लगता। हर खाकी वर्दीधारी हत्या की तफ्तीश करने से बचता है। मेरा पिछला आधे दशक का क्राइम रिपोर्टिंग का इतिहास (या अनुभव) तो यही कहता है। अगर किसी की लाश पंखे से लटकी मिलेगी तो पुलिस उसे पहली ही नजर में आत्महत्या मानकर फाइल बंद कर देगी या फिर पूरी कोशिश करेगी कि कोई इस मौत पर सवाल ना खड़ा करे। अगर नदी, नहर या किसी झील में कोई लाश मिलेगी तो बिना तफ्तीश किये उसे एक्सीडेंटल या फिर आत्महत्या मान लेती है। एक बात जो शायद कम ही लोगो को मालूम होती है वो ये कि नदी या नहर के किनारे वाले थाने के कुछ मुलाजिम तो इस ड्यूटी में तैनात होते है कि अगर कोई लाश बह कर उनके परिक्षेत्र में आती है तो वो उसे डंडे या फिर लकड़ी के सहारे ‘आगे बहा (बढा) दे’।
गोवा और दूसरे दूर-दराज के इलाको में पुलिस की यही ‘सोच’ होती है। बस आराम से ‘कटती रहे’ कोई ‘झंझट’ वाला केस ना आ जाये। वैसे दिल्ली—क्राइम ब्रांच, स्पेशल सेल—और दूसरे मैट्रोपोलिटन की पुलिस या फिर यू.पी की एसटीएफ को छोड़ दे तो पुलिस को हत्या और अपहरण जैसे संगीन वारदातो की तफ्तीश करने की कोई खास ट्रेनिंग नहीं दी जाती। जैसे ही उनके पास कोई हाई-प्रोफाईल या फिर पेंचीदा केस आ जाता है उनके हाथ-पॉव फूल जाते हैं।
गोवा का ही एक बहुत चर्चित केस आजतक अधर में लटका हुआ है। वाक्या 1999 का है। दिल्ली का एक नया-नवेला जोड़ा हनीमून मनाने गोवा गया था। पति-पत्नी की लाश गोवा के समुद्र-तट पर पड़ी मिलती है। पुलिस ने पहली नजर में मान लिया कि मौत समुद्र में डूबने से हुई है। लेकिन जब ऑटोपसी (पोस्टमार्टम) रिपोर्ट आई तो दोनों के फेफड़ों में भारी मात्रा में रेत मिला। साफ था कि दोनो को जबर्दस्ती समुद्र में डुबोया गया था।

पुलिस की तफ्तीश सिफर रही तो हनीमून जोड़े के परिवारवालो ने खुद ही हत्यारों को ढूंढने की कवायद शुरु कर दी।

पुलिस की तफ्तीश सिफर रही तो हनीमून जोड़े के परिवारवालो ने खुद ही हत्यारों को ढूंढने की कवायद शुरु कर दी। परिवार की कोशिशो से आरोपी पकड़े भी गये, लेकिन अदालत में सभी बरी हो गये। सवाल खड़ा हुआ कि क्या पकड़े गये आरोपी वाकई हत्यारे थे। अगर नहीं थे तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार क्यों किया। अगर परिवारवालो की कोशिशो से सही हत्यारे पकड़े गये थे तो पुलिस ने उनके खिलाफ पुख्ता सबूत क्यों नहीं इकट्ठा किये। अगर पुख्ता सबूत इकठ्ठे किये होते तो वे कभी भी अदालत से बरी नहीं हो पाते।
अब जब गोवा पुलिस ने स्कारलेट की हत्या के मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है, तो अब उनके माथे पर लगा दाग तभी हट सकता है जब उसको मौत की घाट उठाने वाले जल्द से जल्द सलाखों के पीछे हो।

1 टिप्पणी:

abhinav upadhyaya ने कहा…

आलेख सही है..पुलिस किसी भी हाई प्रोफाइल हत्या का मामला सामने आते ही पहला प्रयास करती है मौत को एक्सीडेंट बनाने का या फिर यदि आत्महत्या का मामला बन सकता है तब तो फिर क्या बात है..ना तो बडे अधिकारियों का डंडा और ना दी मीडिया के सवाल।मौजा ही मौजा।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)