16 मार्च, 2008

CLIENT NO. 9


न्यूयार्क के गर्वनर इलियट स्पिट्जर को शायद ही अब कोई उनके नाम से जानना चाहेगा। या ये कहें कि उनका नया नाम इतना मसालेदार है कि पुराना नाम सुनना अच्छा नहीं लगता। स्पिट्जर का नया नाम है CLIENT NO.9 (क्लाइंट नं. 9)। जानते है क्यों ? दरअसल ये वही गर्वनर है जो हाल ही में अमेरिका के चर्चित सेक्स स्कैंडल के अहम किरदार है। लेकिन स्पिट्जर के इस सेक्स स्कैंडल से जुड़े होने से नये नाम का क्या ताल्लुक हो सकता है। अगर अभी भी नहीं समझ आया तो पूरे वाक्ये को विस्तार से जानना जरुरी है। दरअसल न्यूयार्क के गर्वनर स्पिटजर रंगीन-मिजाज शख्स है। वो हर हफ्ते एक नई कॉल-गर्ल के साथ अपनी छुट्टी बिताना पसंद करते थे। लेकिन इस काम के लिये—कॉल गर्ल को बुलाने—के लिये स्पिट्जर अपने किसी सहयोगी की मदद नहीं लेते थे। वो इसके लिये अपने लैपटॉप की मदद लेते थे। इंटरनेट पर जिस्मफरोशी का धंधा करने वाले क्लब से ही वो संपर्क साधते थे। इससे फायदा ये रहता था कि ना तो उनके किसी करीबी को इस बात की भनक लग पाती थी और ना ही क्लब को ये पता लग पाता था कि उनका क्लाइंट कौन है। क्लब अपने क्लाइंट को एक इंटरनेट पर ही एक नंबर दे देता था। कॉल-गर्ल की सर्विस के लिये क्लाइंट क्लब को क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ऑन-लाईन ही पैसा भेज देते थे।

करीब एक हफ्ते पहले स्पिट्जर ने इंटरनेट पर ही कॉल-गर्ल मुहैया कराने वाले एक EMPERORS CLUB VIP (एंपरर्स वीआईपी क्लब) से संपर्क साधा। स्पिटजर ने इंटरनेट पर ही पांच फिट पांच इंच लंबी और करीब 100 पाउंड वजन की कॉल-गर्ल की डिमांड की। इसके लिये उन्होंने क्लब को बाकायदा एक मोटी रकम भी दी। क्लब ने उन्हें नंबर दिया ‘नौ’, यानि CLIENT NO. 9। डील के मुताबिक क्लब ने उन्हें बीस साल की एक स्मार्ट कॉल-गर्ल भेज दी। नाम था एलेक्जेंड्रा डयूप्रे उर्फ क्रिस्टल। कॉल गर्ल का असली नाम एलेक्जेंड्रा था और क्लब में वो क्रिस्टल के नाम से चर्चित थी। न्यूयार्क के एक महंगे अपार्टेमेंट में रहने वाली क्रिस्टल अपने साथ रात गुजारने की एक मोटी रकम वसूलती थी। क्रिस्टल गर्वनर साहब से मिली और—ये कहने की जरुरत नहीं कि उनके बीच क्या हुआ—फिर दोनों एक दूसरे को हमेशा-हमेशा के लिये भूल गये। लेकिन

अमेरिका में एक ऊंची शख्सियत रखने वाले स्पिट्जर को इस बात का इल्म नहीं था कि बिग-बॉस उनका पीछा कर रहा है।

अमेरिका में एक ऊंची शख्सियत रखने वाले स्पिट्जर को इस बात का इल्म नहीं था कि बिग-बॉस उनका पीछा कर रहा है।
अमेरिका की इंटेलिजेंस एजेंसी स्पिट्जर से काफी दिनो से नजर रखे हुये थी। देश में हाल ही में राष्ट्रपति के चुनाव भी होने वाले है। कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि इस सैक्स स्कैंडल का खुलासा एक खास इरादे से किया गया है। दरअसल, स्पिट्जर, हिलेरी क्लिंटन की डैमोक्रेटिक पार्टी के चुनिंदा नुमाइंदो में से एक है। स्कैंडल के भांडाफोड़ होने से हिलेरी क्लिंटन को एक करारा झटका लग सकता है। ये तो खैर राजनीति की बात हो सकती है, लेकिन गवर्नर साहब इस बात से नहीं मुकर सकते कि उन्होने EMPERORS VIP CLUB की सुविधा ली थी और क्रिस्टल के साथ एक रात बिताई थी।
वैसे इस बात को साबित करने के लिये अमेरिका की खुफिया एजेसिंयो के पसीने छूट गये। आखिरकार वे क्रिस्टल उर्फ एलेक्जेंड्रा डयूप्रे तक पहुंच ही गये और उसकी गवाही ने साफ कर दिया कि गवर्नर साहब अक्सर कॉल-गर्ल्स से मिलते रहते थे। वैसे

अमेरिकी इतिहास के लिये सैक्स स्कैंडल कोई नई बात नहीं है। याद है ना बिल क्लिंटन-मोनिका लेविंस्की प्रकरण।

अमेरिकी इतिहास के लिये सैक्स स्कैंडल कोई नई बात नहीं है। याद है ना बिल क्लिंटन-मोनिका लेविंस्की प्रकरण। खुद स्पिट्जर भी समलैंगिक शादी के पुरजोर समर्थक है। अब इस ‘समर्थन’ से क्या मतलब निकाला जाये, कोई नहीं जानता।
खैर अब तो लोग स्पिट्जर साहब को CLIENT NO. 9 से ही जानेंगे—या यूं कहें कि शायद भूल ही जायेंगे—क्योकि उन्होने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन इस स्कैंडल से एलेक्जेंड्रा डयूप्रे उर्फ क्रिस्टल फेमस हो गई है। आये-दिन उसके इंटरव्यू टी.वी और अखबार में छप रहे है। सुनने में तो ये भी आया है कि इन इंटरव्यू के लिये भी वो एक अच्छी-खासी रकम वसूल रही है। उसकी वेबसाइट पर लाखों लोगों ने हिट किया। अगर आप अब उसकी वेबसाइट पर जाना चाहेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी। क्योकि उसकी साइट पर वायरस आ गया है। जिस तरह गवर्नर स्पिट्जर के राजनैतिक करियर को वायरस लग गया है।

2 टिप्‍पणियां:

abhinav upadhyaya ने कहा…

आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम।

अनूप शुक्ल ने कहा…

अच्छी पोस्ट है लेकिन लिखे बहुत दिन हो गये। नयी लिखो जी।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)