24 अप्रैल, 2008

इतिहास का इतिहास


रामायण किसने लिखी थी ? सवाल सुनकर अटपटा तो नहीं लग रहा है आपको ? लेकिन आने-वाले दिनों में इस सवाल का जबाब देना भी शायद आपको मुश्किल पड़ जायेगा। नहीं भई यहां बात शाहरुख खान के जल्द आने वाले रियेलटी शो (क्या आप पांचवी पास से तेज है!) की नहीं हो रही है। दरअसल मुद्दा ही ऐसा है। अच्छा, तो पहले, सवाल का जबाब सुनिये । ‘रामायण’ के रचयिता थे महाकवि बाल्मीकि। वैसे किसी आम आदमी से ये सवाल पूछा जाये तो वो एक और जबाब दे सकता है। वो है तुलसीदास। जी हां भारत में कुछ लोग ‘रामचरित मानस’ (जिसे तुलसीदास ने लिखा था और मूल रामायण का हिंदी अनुवाद है) और ‘रामायण’ के बीच के अंतर को ठीक से नहीं समझ पाते हैं। खैर यहां बात रियलटी शो की नहीं हो रही है, जिसके लिये इन दोनों जबाबों के बारे में आपको सोचने की ज्यादा जरुरत हो। यहां बात हो रही है रियल लाईफ की। क्यों आपको रामायण के रचयिता के बारे में माथा-पच्ची करनी पड़ सकती है।
कुछ दिनों पहले श्रीलंका सरकार के टूरिस्ट प्रतिनिधियों ने दिल्ली में एक प्रेस-कांफ्रेंस कर सबको हिला कर रख दिया। श्रीलंका यानि हमारे देश के दक्षिण में सबसे स्थित सबसे करीबी पड़ोसी देश। और जहां के रावण के बारे में आपने ‘रामायण’ या ‘रामचरित मानस’ में पढ़ा होगा या फिर सुना होगा। वहां के टूरिस्ट अधिकारी आयें तो थे अपने भारत के लोगों को अपने देश में टूरिस्ट स्पॉट की जानकारी देने, लेकिन उन्होंनें जिन टूरिस्ट स्पॉट्स की बात की उसने सभी के दिलो-दिमाग में हमारे इतिहास को तरोताजा कर दिया। वो सुनहरा इतिहास जिसे हमारे देश के ना तो इतिहासकारों ने और ना ही सरकार ने तबज्जो दी है।

श्रीलंका सरकार ने भारतवासियों को आमंत्रित किया है उन जगहों पर घूमने का जहां के बारे में रामायण और रामचरित मानस में विस्तार से लिखा है।

श्रीलंका सरकार ने भारतवासियों को आमंत्रित किया है उन जगहों पर घूमने का जहां के बारे में रामायण और रामचरित मानस में विस्तार से लिखा है।
श्रीलंका में भले ही रावण की लंका के नामों-निशान ना मिला हो (मिलते भी कैसे वो तो हनुमान जी ने जला कर राख कर दी थी), लेकिन ठीक उसी जगह पर मिली है ऐसी मिट्टी जिसका रंग काला है। भारत के जनमानस में ये बात रह-रहकर उमड़ती रही है कि हो ना हो आज का श्रीलंका ही बीते जमाने का लंका है। वही लंका, जहां का राजा था रावण। वो रावण जिसने मर्यादा पुरुषोत्तम राम की पत्नी सीता का हरण किया था। इसकी सजा़ रावण को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। उसकी सोने की लंका को राम के दूत हनुमान ने अपनी पूंछ से जला दिया था। लेकिन क्या ये बात हमारे देश के किसी भी इतिहासकार के पल्ले नहीं पड़ी।

हमारे देश के हाकिमों ने श्रीलंका में अमन-चैन कायम करने के लिये अपनी फौज तो भेज दी (इंडो-श्रीलंका पीस किपिंग फोर्स)। लेकिन क्या कभी किसी इतिहासकार को नहीं भेज सकते थे कि ये पता कर आये कि क्या वाकई रामायण में वर्णित ‘सोने की लंका’ ही आज का श्रीलंका है।

हमारे देश के हाकिमों ने श्रीलंका में अमन-चैन कायम करने के लिये अपनी फौज तो भेज दी (इंडो-श्रीलंका पीस किपिंग फोर्स)। लेकिन क्या कभी किसी इतिहासकार को नहीं भेज सकते थे कि ये पता कर आये कि क्या वाकई रामायण में वर्णित ‘सोने की लंका’ ही आज का श्रीलंका है।
क्या इतिहासकारों का काम भी टी.वी चैनल और मीडिया ही करेंगी ? आप को अगर याद ना हो ता यहां ये बताना जरुरी है कि एक निजी टी.वी चैनल नें कुछ दिन पहले ही रामायण से जुड़े़ स्थानों का पता लगाने के लिये श्रीलंका अपनी टीम भेजी थी। उसके बाद कई दिनों तक चैनल पर रामायण में वर्णित स्थानों और श्रीलंका में मिले उनके साक्ष्यों की सीरीज़ प्रसारित की गई थी। किस तरह श्रीलंका के एक पहाड़ी जंगल में दुर्लभ जड़ी-बूटियां मिलती है। वो जड़ी-बूटियां जिनसे माना जाता है कि मरे हुये व्यक्ति के शरीर में भी जान डाली जा सकती है। क्या पता कुछ दिनों बाद ये भी लोगों को बताना पड़े कि लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने के बाद हनुमान जी हिमालय से संजीवनी बूटी लाने के चक्कर में एक पूरा का पूरा पहाड़ उठा लाये थे। हो सकता है ये वही जंगल हो जिसे हनुमान जी उठाकर लाये थे। इसी तरह एक पहाड़ी पर तो हनुमानजी की परछाई साफ देखी जा सकती है। ऐसा लगता है मानों हनुमानजी आराम कर रहे हो। रामायण में भी लिखा है कि संजीवनी बूटी लाते समय एक जगह रुककर हनुमानजी ने विश्राम किया था। और भी कई ऐसे स्थान है जिन्हें देखकर लगता है कि ये वही स्थान है जिनका रामायण और रामचरित मानस में वर्णन है।
इतने साक्ष्य मिलने के बाबजूद भारत के इतिहासकारों ने श्रीलंका में शोध क्यों नहीं किया तो इस सवाल के जवाब में हमारे देश के एक जाने-माने इतिहासकार का कहना है कि रामायण के करीब तीन सौ (300) संस्करण उपलब्ध है। यानि पूरी दुनिया में सिर्फ बाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ और तुलसीदासजी द्धारा लिखी ‘रामचरित मानस’ ही नहीं है बल्कि पूरी तीन सौ किताबें है। और उन 300 किताबों में रामायण की अलग अलग कहानियां। हर किताब के अलग-अलग रचियता है (जैसे तमिल में लिखी रामायण के लेखक है कदंब), उनके द्धारा वर्णन की गई ‘कहानी’ में कई फेरबदल है, उनके वर्णित किये गये स्थान भी अलग-अलग हैं। उनका तो यहां तक मानना है कि कई रामायणों में तो सीता को राम की बहन बताया गया है। किसी में राम को हीरो के तौर पर दर्शाया गया है तो किसी में रावण को। एक में तो सीता की उत्पत्ति रावण के नाक से बताई गई थी।
ऐसे में इन इतिहासकारों की मानें तो वे बाल्मीकी और तुलसीदासजी द्वारा लिखी गई रामायणों को कैसे सच मान लें।
अब तो आपको यकीन हो गया होगा ना कि शुरुआत में मैने आपसे “रामायण किसने लिखी है?” वाला सवाल पूछा था।
वैसे मैं आपको ये बताना चाहूंगा कि जिन जाने-माने इतिहासकार की बात मैने यहां कही है वो दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास पढ़ाते है और मुझे भी (1998-2000) उनसे शिक्षा ग्रहण करने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त हो चुका है। सिविल सर्विस की तैयारी करते वक्त उनके द्वारा लिखी किताबें भी पढी थी। लेकिन उनके और उनके ‘साथी इतिहासकारों’ से मैं कई बातों पर मतभेद रखता हूं।
ये बात जरुर है कि रामायण के तीन सौ संस्करण है। लेकिन भारत के जनमानस पर सिर्फ एक ही रामायण (बाल्मीकि की 'रामायण' और उसका हिंदी अनुवाद 'रामचरित मानस') चढ़ी हुई है। वो रामायण जिसमें लिखा है... अयोध्या के राजकुमार राम, उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण को अपनी सौतेली मां कैकेयी के चलते चौदह साल का वनवास काटना पड़ा था। उसी वनवास के दौरान लंका का राजा रावण अपने पुष्पक विमान से सीता का अपहरण कर अपने देश ले जाता है। अकेले राम और लक्ष्मण की मदद करती है वानरो की एक बड़ी सेना।

एक ऐसी सेना जिसने समुद्र पर पुल बनाकर (सेतु-समुद्रम) लंका पर चढ़ाई की थी। पुल बनाकर वानर सेना ने इतिहास रचाया था। इतिहास इसलिये क्योंकि अब तो इस पुल के साक्ष्य भी मिल गये है। लेकिन उन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों से आप क्या अपेक्षा रख सकते हैं जिन्हें भारत की हर उस प्राचीन चीज से तौबा है जिससे हमारे देश के इतिहास और पूर्वजों का सिर ऊंचा हो सकता हो। उन्हें भारत की हर चीज में खोट दिखाई पड़ता है। उन्हें भारत में हर चीज (चाहे वो संस्कृति हो या फिर धर्म या फिर सभ्यता) विदेश से ‘आयात’(Import) की हुई लगती है।
रामायण की कहानी सुनने में जरुर छोटी लगती हो। लेकिन उसका सार हर हिंदुस्तानी के मन-मस्तिष्क पर साफ दिखाई पड़ता है। शायद यही वजह है कि जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा था, “ इनमें (रामायण और महाभारत) हमें वह खास हिंदुस्तानी ढंग मिलता है, जिसमें अलग-अलग सांस्कृतिक विकास के लोगों के लिये एकसाथ सामग्री प्रस्तुत की जाती है, अर्थात् ऊंचे से ऊंचे दर्जे के विद्वानों से लेकर अनपढ़ और अशिक्षित देहाती तक के लिये।

इनके द्वारा हमें प्राचीन हिंदुस्तानियों का वह गुर कुछ-कुछ समझ में आ जाता है जिससे वह एक पंचमेल और जात-पात में बंटे हुये समाज को इकठ्ठा बनाये रखने में, उनके झगड़ो को सुलझाते रहने में, उन्हें वीर-परंपरा और नैतिक रहन-सहन की समान भूमिका देने में सफल हुए हैं।

इनके द्वारा हमें प्राचीन हिंदुस्तानियों का वह गुर कुछ-कुछ समझ में आ जाता है जिससे वह एक पंचमेल और जात-पात में बंटे हुये समाज को इकठ्ठा बनाये रखने में, उनके झगड़ो को सुलझाते रहने में, उन्हें वीर-परंपरा और नैतिक रहन-सहन की समान भूमिका देने में सफल हुए हैं।” नेहरुजी आगे लिखते है, “मै हर साल खुले मैदान में होने वाले उन लोकप्रिय तमाशों में ले जाया जाता था, जहां रामायण की कथा का अभिनय (रामलीला) होता था और बहुत बड़े मजे में उसे देखने के लिये इकठ्ठा होते थे। ये सब बातें बड़े भद्दे ढंग से हुआ करती थी। लेकिन इससे कोई अंतर नही पड़ता था, क्योकि कहानी तो सभी लोगो की जानी हुई थी।”
रामायण सिर्फ एक कहानी भर नहीं है। ये हमें सिखाती है कि कैसे हमारे आदर्श होने चाहिये। हमें अपने मां-बाप, भाई-बहन और पत्नी से बर्ताव करना चाहिये। मां-बाप की आज्ञा किसी भी हाल में पूरी करनी है। अपने वचन को पूरा करने के लिये अपनी जान भी न्यौछावर कर देनी चाहिये। इंसान का जानवरों से क्या नाता है । कैसे एक वानर भी मनुष्य के लिये ना केवल अपनी जान की बाजी लगा देता है बल्कि जन्म-जन्मांतर तक उसकी दोस्ती और भक्ति के किस्से याद किये जाते हैं। कैसे एक राजा( भगवान श्रीराम), एक दलित बूढ़िया के हाथ से उसके झूठे बेर खाकर ऊंच-नीच की दीवार मिटा देता है। कैसे एक भाई (विभीषण) पाप के रास्ते चलने वाले बड़े भाई का साथ छोड़ देता है।

हमारे पूर्वजों ने भी एक बहुत बड़ी गलती की थी। वो गलती थी अपने इतिहास को पन्नों पर ना उतारने की। हमारे सभ्यता और संस्कृति (सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता) भले ही हजारों साल पुरानी हो, लेकिन हमारे पूर्वजों ने कभी भी अपने इतिहास को गंभीरता से नहीं लिया।

हमारे पूर्वजों ने भी एक बहुत बड़ी गलती की थी। वो गलती थी अपने इतिहास को पन्नों पर ना उतारने की। हमारे सभ्यता और संस्कृति (सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता) भले ही हजारों साल पुरानी हो, लेकिन हमारे पूर्वजों ने कभी भी अपने इतिहास को गंभीरता से नहीं लिया। आज भी हमारे देश में लोग इतिहास को गंभीर विषय नहीं मानते है। आज के विद्यार्थियों के लिये इतिहास एक उबाऊ विषय है। अगर आपको यकीन ना आ रहा हो तो यहां ये बात दीगर है कि हमारे देश में पहली इतिहास की किताब (‘राजतंरगिनी’, लेखक कल्हन) 12 वी सदी में लिखी गई थी, जो कश्मीर के इतिहास पर आधारित थी। इससे पहले की कोई किताब नहीं मिली है। या यूं कहें कि नष्ट हो गई होगी। इस किताब से पहले कई संरचानाऐं जरुर मिली है जैसे, कौटिल्य की ‘अर्थशास्त्र’, लेकिन इन सभी में इतिहास का नामो-निशान नहीं है। पहली बार इतिहास लेखन मध्यकालीन युग में मुगल और दूसरे बादशाहों ने अपने राजदरबारियों से शुरु कराया था। लेकिन वे कवि भी अपने राजा की प्रशंसा ज्यादा और इतिहास कम लिखते थे।

अगर सम्राट अशोक के ऐतिहासिक शिलालेख और खंभे नहीं मिलते तो शायद इस महान राजा को भी शायद ही कोई जान पाता। इन शिलालेखों पर लिखी लिपि भी एक विदेशी इतिहासकार ने ही खोजी थी।

अगर सम्राट अशोक के ऐतिहासिक शिलालेख और खंभे नहीं मिलते तो शायद इस महान राजा को भी शायद ही कोई जान पाता। इन शिलालेखों पर लिखी लिपि भी एक विदेशी इतिहासकार ने ही खोजी थी। सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई से ये तो पता चल गया है कि हमारी सभ्यता भी हजारो साल पुरानी है लेकिन उस काल के लोगों का रहन-सहन कैसा था, किस तरह का राज-तंत्र वहां काम करता था, वो किस धर्म को मानते थे, ये वो सवाल है जो आजतक एक बड़ी पहेली बने हुये है। उसका सबसे बड़ा कारण ये है कि खुदाई के दौरान मिली लिपि को इतिहासकार पढ़ने में नाकाम रहे हैं।
लेकिन शायद इसी “ऐतिहासिक भावना” की कमी का फायदा उठाकर कुछ इतिहासकार और बुद्धिजीवी हमारे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में जुटे है। खुद नेहरुजी ने लिखा है, “ यूनानियों, चीनियों और अरबवालों की तरह प्राचीन हिंदुस्तानी इतिहासकार नहीं थे। ये एक दुर्भाग्य की बात है और इसके कारण आज हमारे लिए तिथियां या काल-कम् निश्चित करना मुश्किल हो गया है। घटनाएं एक दूसरे से गुथ जाती है और बडा उलझाव पैदा हो जाता है।” इसलिए जरुरी है कि हम हर उस शख्स को मुंह-तोड़ जबाब दे जो हमारी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी आम लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश करेगा। इसलिये हर नागरिक के मन में “ऐतिहासिक भावना” की लौ जलानी जरुरी है। क्योंकि इतिहास गवाह है जिस देश या सभ्यता ने अपने अतीत को भूलाने की कोशिश की है उसका पतन निश्चित है। एक ऐसा पतन जिससे उबरने में सदियों बीत जाती है।

3 टिप्‍पणियां:

अतुल ने कहा…

इतिहास में साबित हो जाए इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है.

अनूप शुक्ल ने कहा…

अच्छा लिखा है!

vir ने कहा…

It was really nice to read this important article "इतिहास का इतिहास". It is quite interesting that you have again diverted your writing towards history subject from crime matters.

But, I was really wondering that how some certain facts like this...

'श्रीलंका में भले ही रावण की लंका के नामों-निशान ना मिला हो (मिलते भी कैसे वो तो हनुमान जी ने जला कर राख कर दी थी), लेकिन ठीक उसी जगह पर मिली है ऐसी मिट्टी जिसका रंग काला है।'

'हो सकता है ये वही जंगल हो जिसे हनुमान जी उठाकर लाये थे। इसी तरह एक पहाड़ी पर तो हनुमानजी की परछाई साफ देखी जा सकती है। ऐसा लगता है मानों हनुमानजी आराम कर रहे हो। रामायण में भी लिखा है कि संजीवनी बूटी लाते समय एक जगह रुककर हनुमानजी ने विश्राम किया था। और भी कई ऐसे स्थान है जिन्हें देखकर लगता है कि ये वही स्थान है जिनका रामायण और रामचरित मानस में वर्णन है।'

'क्योंकि अब तो इस पुल के साक्ष्य भी मिल गये है।'

How come these facts are not haunting to historians!

I will try to bring this issue at right platform at my level. I hope as a responsible journalist you should also move forward.

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)