25 अप्रैल, 2008

...आखिरी हनीमून

शाम को दुकान बंद करके अनिल जब घर पहुंचा तो बेहद खुश दिखाई पड़ रहा था। उसने अपनी पत्नी ज्योति से हनीमून पर चलने की इच्छा जाहिर की। क्योंकि शादी के बाद दोनों हनीमून नहीं गये थे, अनिल की बात सुनते ही ज्योति की खुशी का ठिकाना ना रहा। ज्योति को लगा उसका पति सुधर गया है। शादी के करीब एक साल बाद दोनों हनीमून मनाने शिमला जा रहे थे। अनिल ने अपनी मां को बताया कि वो सभी गिले-शिकवे भूलाकर ज्योति को एक बार फिर से अपनाना चाहता है। ये कहकर अनिल और ज्योति घर से निकल गये।

लेकिन रास्ते मे अनिल ने अपना प्लान बदल दिया। उसने ज्योति को बताया कि वे शिमला के बजाय खजुराहो जा रहे हैं।

लेकिन रास्ते मे अनिल ने अपना प्लान बदल दिया। उसने ज्योति को बताया कि वे शिमला के बजाय खजुराहो जा रहे हैं। ज्योति को सुनकर हैरानी हुई, लेकिन अपने पति की इच्छा के आगे वो झुक गई।
खजुराहो जाने के लिये अनिल और ज्योति पहले झांसी पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होने झांसी रेलवे स्टेशन के करीब श्रीनाथ होटल का एक कमरा बुक कराया। अनिल ने ज्योति से नजरें बचाते हुये होटल के रजिस्टर मे अपना नाम अनिल खुराना के बजाय अनिल श्रीवास्तव लिख दिया। ज्योति का नाम भी उसने ज्योति खुराना की बजाय ज्योति श्रीवास्तव लिख दिया। अपना पता भी उसने सिरसा की बजाय हिसार लिख दिया। ज्योति इस बात से अंजान थी कि अनिल ऐसा क्यों कर रहा है। होटल मे ज्योति सिर्फ आते वक्त दिखाई दी थी। उसके बाद उसे होटल मे किसी ने नहीं देखा। लेकिन जब चौबीस घंटे बाद तक भी होटल के स्टाफ ने कमरे से किसी तरह की आहट नहीं सुनी तो उन्हें कुछ शक हुआ। होटल स्टाफ ने जैसे ही कमरा खटखटाया, अंदर से कोई आवाज नहीं आई। फिर क्या था होटल मे काम करने वाले लोगों ने दरवाजा तोड़ डाला। जैसे ही होटल स्टाफ अंदर दाखिल हुआ कमरे में दिखाई पड़ी ज्योति की लाश। उसके हाथ पैर बंधे हुये थे।
लेकिन ज्योति का पति अनिल गायब था। थोड़ी ही देर में पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी।

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो उन्हें सामान के साथ-साथ एक उपन्यास पड़ा दिखाई दिया। उपन्यास का नाम था 'मर्डर स्पेशलिस्ट'। जांच अधिकारियों ने किताब के पन्ने पलटे तो उन्हें समझते देर ना लगी कि हत्यारा जो भी है उसने इसी उपन्यास को पढ़कर ही वारदात को अंजाम दिया है।

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो उन्हें सामान के साथ-साथ सुरेन्द्र मोहन पाठक का लिखा एक उपन्यास पड़ा दिखाई दिया। उपन्यास का नाम था 'मर्डर स्पेशलिस्ट'। जांच अधिकारियों ने किताब के पन्ने पलटे तो उन्हें समझते देर ना लगी कि हत्यारा जो भी है उसने इसी उपन्यास को पढ़कर ही वारदात को अंजाम दिया है।
वारदात के बाद से ही अनिल गायब था। पुलिस ने पहले तो हिसार के उस पते पर संपर्क किया जो रजिस्टर मे दर्ज था। लेकिन वो पता भी फर्जी निकला। अभी पुलिस लडकी की असल पहचान करने में जुटी ही थी कि होटल के करीब ऑटो-रिक्शा स्टैंड पर खड़े एक ड्राइवर ने पुलिस को अहम जानकारी दी। उसने बताया कि मरने वाले लड़की और उसका पति एक दिन पहले ही उसके ऑटो-रिक्शा से किसी दूसरे होटल से झांसी के श्रीनाथ होटल पहुंचे थे। बिना देर किये पुलिस उसी होटल में पहुंची जहां का पता ऑटो ड्राइवर ने दिया था। इस होटल के रजिस्टर मे पति-पत्नी ने अपना पता अनिल खुराना और ज्योति खुराना दिया था। दोनों ने अपना पता हरियाणा के सिरसा शहर का दिया था। पुलिस सिरसा के उसी पते पर पहुंची तो पता चला कि उस घर मे वाकई अनिल खुराना और उसकी पत्नी ज्योति खुराना रहते है। फोटो देखकर घरवालों ने ज्योति को पहचान लिया। उन्हें ये समझते देर ना लगी कि अनिल ने ही ज्योति को मौत के घाट उतारा है। लेकिन अनिल कहां है इसकी खबर ना तो उसके घरवालो को थी और ना ही ज्योति के परिवारवालो को। झांसी पुलिस भी सरगर्मी से उसे तलाश कर रही थी। लेकिन वो कहां गया किसी को पता नहीं चला। लेकिन ये बात तो तय थी कि अपनी पत्नी को मारने के बाद भी अनिल का फोन ऑन था।
घरवालों ने ज्योति की हत्या के बाद भी अनिल को वापस लाने की लाख कोशिश की। लेकिन वो फिर कभी नहीं लौटा। पहले तो अनिल को ये पता नहीं होने दिया गया कि ज्योति की मौत की खबर उन्हें लग चुकी है। लेकिन अनिल ने अपना पता नहीं बताया। उसके बाद अनिल का मोबाइल फोन लगातार बंद रहा। घरवालों ने उसके फोन पर एसएमएस भी किये। उन्हें उम्मीद थी कि जब भी उसका फोन ऑन होगा तो एसएमएस पढ़कर वो वापस लौट आयेगा। ज्योति की मौत के बाद अनिल वापस नहीं लौटा। एक साल बाद तक भी जब अनिल का कोई अता-पता नहीं चला तो झांसी अदालत ने अनिल को भगोड़ा घोषित कर दिया।
इस खूनी रिश्ते की शुरुआत हुई थी हत्या से करीब एक साल पहले। पढा़ई खत्म होने के बाद हरियाणा के रोहतक जिले की रहने वाली ज्योति अपना करियर बनाने में लगी ही थी कि सिरसा के एक परिवार ने उसका हाथ अपने बेटे के लिये मांग लिया। सिरसा का ये परिवार ज्योति की बुआ और चाचा का परिचित था। ज्योति के मना करने के बाबजूद उसके घरवालों ने उसकी शादी अनिल से तय कर दी। अनिल सिरसा में ही किताबों की एक दुकान चलाता था। जैसे ही अनिल के परिवारवाले ज्योति को देखने आये वो उसे अपने साथ ही ले गये। परिवारवाले खुश थे कि ससुरालवालों को ज्योति इतनी पसंद आई कि शादी तक का इंतजार नहीं किया।
लेकिन ये खुशी कुछ ही दिनों की थी। ससुराल जाने के कुछ दिन बाद ही ज्योति अपने मायके वापस लौट आई। उसके पति अनिल ने उसके साथ रहने से मना कर दिया था। ज्योति ने अपने परिवारवालों को बताया कि उसके पति के किसी दूसरी ल़डकी से संबध है।

ज्योति से ख़फा अनिल ने अपनी पत्नी के साथ सुहागरात तक मनाने से इंकार कर दिया था। जो ससुरालवाले उसे पंसद कर अपने घर लाये थे, वे भी अब उसे नापंसद करने लगे थे।

ज्योति से ख़फा अनिल ने अपनी पत्नी के साथ सुहागरात तक मनाने से इंकार कर दिया था। जो ससुरालवाले उसे पंसद कर अपने घर लाये थे, वे भी अब उसे नापंसद करने लगे थे। ज्योति के घरवाले परेशान थे कि जिस परिवार ने खुद लडकी का हाथ मांगा था और लड़का ज्योति जैसी लड़की पाकर फूलो नहीं समा रहा था उसे अचानक क्या हो गया है। किसी तरह उन्होंने अनिल को समझाने की कोशिश की। पंचायत के बीच-बचाब के बाद अनिल ज्योति को अपने साथ ले गया। लेकिन घरवालों को क्या मालूम था कि अनिल एक ऐसी साजिश बुन रहा है जिसकी भनक खुद उसके घरवालों तक को नहीं थी।
अपनी दुकान पर अनिल खाली समय में किताबें पढ़कर अपना वक्त गुजारता था। लेकिन जब उसकी शादी-शुदा जिंदगी मे कड़वाहट लगातार बढ़ती गई तो उसने एक किताब (‘मर्डर स्पेशलिस्ट’) पढंकर ही लिख डाली मौत की एक ऐसी स्क्रिप्ट की दो राज्यों की पुलिस आजतक उसे ढूंढ नहीं पाई हैं।

2 टिप्‍पणियां:

अतुल ने कहा…

आखिर कहा गया वो.

neeraj rajput ने कहा…

उसके ना मिलने की एक और वजह हो सकती है। दरअसल, अनिल ने एक सोची समझी योजना के तहत वारदात को अंजाम दिया था। उसे पता था कि वो पकड़ा जा सकता है। इसलिये भागने से पहले वो अपने घर से अपने सभी फोटो ले जा चुका था। यहां तक की ज्योति के घर रखी शादी की फोटो भी वो गायब कर चुका था। यही वजह है कि पुलिस के पास उसकी एक ही फोटो है। वो फोटो भी करीब दस साल पुरानी है। अब पुलिस उस फोटो के आधार पर उसे कैसे पकड़े।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)