15 मई, 2008

मै मरने जा रही हूं...


सर, उस लेडी का फोन आया था। वो आत्महत्या करने की धमकी दे रही है। अपनी मौत का कसूरवार वो हमे ठहराकर जायेगी। बाकयदा सुसाईड-नोट लिख रही है हमारे नाम का... सर, मुझे डर लग रहा है... सनसनी अभी खत्म ही हुआ था कि, मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर नंबर देखा तो पता चला कि साथी रिपोर्टर का फोन है। मेरे हैलो बोलने से पहले ही वो बोल उठा। “सर बहुत गड़बड़ हो गई है।” । मैने पूछा क्या हुआ? रिपोर्टर बेहद घबराया हुआ था। “सर,वो लेडी मरने जा रही है।” मै खीज उठा! अरे हुआ क्या, ये तो कुछ बताओ ना। “सर जिसकी स्टोरी अभी हमने सनसनी में चलाई है, उसका फोन आया था। वो आत्महत्या करने की धमकी दे रही है”, साथी रिपोर्टर ने जबाब दिया। मैने हँसकर रिपोर्टर से पूछा, “फिर क्या किया जायें ?” सर आप बतायें क्या करना चाहिये। अभी तक मैने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नही लिया था-- जैसा अक्सर मै ऐसी गीदड़ भभकियों के दौरान नहीं लेता हूं। मैने उसको समझाया कि वो लेडी उसे डराने के लिये आत्महत्या की धमकी दे रही होगी। “वो नही करेगी, मै गारंटी लेता हूं”, मैने तर्जुबे के हिसाब से उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की। लेकिन साथी रिपोर्टर समझने को तैयार नही था। “सर वो मुझे कई बार फोन करके ये बात (खुदकुशी) बोल चुकी है।” मैने साथी रिपोर्टर को हौसला बंधाया और बॉस से सलाह करने की बात कहकर फोन काट दिया।

लेकिन जैसे ही मैने धमकी की बात बॉस को बताई, वो घबरा गई। उन्होने कहां कि तुमने पहले बताया होता तो हम स्टोरी में कुछ फेरबदल कर सकते थे। लेकिन अब तो कुछ नही हो सकता। मैने अपने साथी रिपोर्टर की बात तो बॉस को बता दी थी, लेकिन अभी भी ज्यादा सीरियस नही था। मैने बॉस को बताया कि वो खाली धमकी दे रही है। वो कभी भी खुदकुशी जैसा बड़ा कदम नहीं उठायेगी। लेकिन बॉस ने जबाब दिया, “अगर (खुदकुशी) कर ली तो!” फिर तो अनर्थ हो जायेगा।
इससे पहले की अनर्थ हो जाये, मैने रिपोर्टर को रात के बारह बजे ही आत्महत्या करने की धमकी देने वाली महिला के पास भेजने का आदेश जारी कर दिया। रात में ही रिपोर्टर डरता-डराता उस महिला के घर पहुंचा। उसकी बाईट (इंटरव्यू) ली और अगले दिन सुबह के न्यूज बुलेटिन में उसका पक्ष चल गया। उसके बाद से उस महिला ने फिर कभी हमारे रिपोर्टर को फोन नहीं किया।
लेकिन करीब आठ महीने बाद उस महिला का ये ड्रामा मेरे सामने तैरने लगा। कैसे

आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है। जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है।

आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है। जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है। उस दिन के बाद से यही नजरिया था मेरा उस महिला के प्रति।
जो मै आठ महीने पहले सोच रहा था, वो अब साबित हो गया है। ये है पूरी कहानी...
ब्लैकमेलर महिला का नाम है नीरजा शर्मा। दिल्ली के नरेला इलाके में रहने वाली इस महिला की उम्र है करीब पैतीस (35) साल। नीरजा के निशाने पर रहते है 40 से 50 साल की उम्र के रईस आदमी। वो पहले तो उनसे किसी ना किसी बहाने से दोस्ती गाढ़ती है और फिर उन्हे (पैसो के लिये) ब्लैकमेल करने लगती है। अगर किसी ने पैसे देने में आनाकानी की तो उसके खिलाफ छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे फर्जी मामले में फंसा देती है। इस काम में उसका साथ देते है दिल्ली पुलिस के दो एसीपी (शायद ये दोनो अब रिटार्यड) हो गये है।
नीरजा शर्मा पहली बार उस वक्त विवादो में आई थी जब एक रिटार्यड कर्नल ने एयरपोर्ट के नजदीक एक होटल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। राजधानी की एक जानी-मानी बिजली कंपनी में काम करने वाले रिटार्यड कर्नल एच एस गिल ने एक गलती कर दी थी। गलती, नीरजा शर्मा से दोस्ती की। फिर क्या था गिल साहब के हंसते-खेलते घर में मानो आग लग गई। लेकिन मरने से पहले गिल साहब ने नीरजा शर्मा और उसके एक साथी एसीपी की काली करतूतो का खुलासा कर दिया। अपने सुसाईड नोट में कर्नल ने लिखा था कि किस तरह नीरजा शर्मा अपने साथी एसीपी की मदद से उसपर शादी करने का जोर डाल रही है। मना करना पर वो उससे लाखो की रकम ऐंठ चुकी है। पैसा ना देने की सूरत में उनके घरवालो को उनकी दोस्ती की खुलासा करने की धमकी देती है। गिल साहब की आत्महत्या के बाद नीरजा और एसीपी को जेल की हवा खानी पड़ी थी। लेकिन कुछ दिन बाद दोनो जमानत पर बाहर आ गये और ब्लैकमेलिंग का धंधा फिर से शुरु कर दिया।
इस बार उनका निशाना बना नरेला इलाके का एक जाना-माना डाक्टर। नीरजा गई तो थी डाक्टर मुकेश अग्रवाल के पास अपनी कमर की हड्डी का इलाज कराने, लेकिन उन्हे अपने जॉल में फंसा लिया। फिर शुरु हो गया वही खेल जो नीरजा ने कर्नल गिल के साथ खेला था। लेकिन डाक्टर अग्रवाल उसकी चाल पहले ही भांप गया। गुस्साई नीरजा ने अपने एक (दूसरे) साथी एसीपी की मदद से डाक्टर साहब के खिलाफ बलात्कार का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया। इसके खिलाफ डाक्टर साहब ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
जब डाक्टर ने अदालत से इंसाफ की गुहार लगाई थी तभी हमने उस पर स्टोरी की थी—वैसे कर्नल की मौत पर भी चलाई थी—कैसे एक महिला (नीरजा) भोले-भाले लोगो को अपने जॉल में फंसा कर ब्लैकमेल करती है। जिस वक्त हमारा रिपोर्टर ये स्टोरी कर रहा था, उसने कई बार नीरजा का पक्ष जानने के लिये फोन किया। लेकिन उसने कैमरे पर कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया। हमने बिना उसके पक्ष के स्टोरी ऑन-एयर कर दी। फिर क्या हुआ, वो तो मै पहले ही बंया कर चुका हूं।
नीरजा के आत्महत्या की धमकी देने के अगले दिन ही उसके एक साथी एसीपी ने भी मुझे फोन पर धमकाने की कोशिश की। लेकिन वो शायद ये भूल गया था कि मुझे उसका पूरा ‘रिकार्ड’ मालूम था।

पहले जो एसीपी “देख लेने” की धमकी दे रहा था, वो गिड़गिड़ाने लगा कि आगे से उसका नाम नीरजा के साथ ना जोड़े। “ नीरज जी, मै रिटायर होने वाला हूं, एक बार तो फंस चुका हूं, अब दुबारा नही फंसाना चाहता... प्लीज, मेरे पर रहम कीजिये।

पहले जो एसीपी “देख लेने” की धमकी दे रहा था, वो गिड़गिड़ाने लगा कि आगे से उसका नाम नीरजा के साथ ना जोड़े। “ नीरज जी, मै रिटायर होने वाला हूं, एक बार तो फंस चुका हूं, अब दुबारा नही फंसाना चाहता... प्लीज, मेरे पर रहम कीजिये।” करीब पंद्रह मिनट बात करने के बाद आखिरकार एसीपी को सरेंडर करना ही पड़ गया और मिमयाते-मिमयाते उसने फोन काट दिया।
लेकिन अब अदालत के आदेश पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने नीरजा को ब्लैकमेलिंग के आरोप में एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन इस बार कुछ और चौकान्ने वाले तथ्य सामने आये है। जैसे, डाक्टर अग्रवाल और कर्नल गिल ही नीरजा का शिकार नही हुये है। उसने करीब एक दर्जन फर्जी मामले दिल्ली के अलग-अलग थानो में अलग-अलग लोगो के खिलाफ दर्ज करा रखे थे (कुछ लोग तो शायद शर्म के मारे नीरजा की सारी शर्ते मानते रहे होंगे)
अदालत के आदेश पर पुलिस ने नीरजा को तो गिरफ्तार कर लिया है लेकिन उसके साथी एसीपी अभी भी बाहर है। पुलिस की दलील है कि वो अब नीरजा का नार्को-टेस्ट कराने की जुगत में है। उसके बाद कई ऐसे राज फाश हो सकते है जिनपर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ था।
एक क्राइम रिपोर्टर के सामने कई बार ऐसी परिस्थतियां आ जाती है जब ये समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिरी सही क्या है और गलत क्या है। ऐसे में विवेक से काम लेना चाहिये। साहस कभी ना खोये। अगर किसी आरोपी का पक्ष लेना पड़े तो लेने से गुरेज ना करे। बिना साहस खोये उसके पास जाये। अगर कोई गुंडा, माफिया या फिर खाकी वर्दीवाला ही धमका रहा हो तो उससे कभी डरे ना। अगर आपकी स्टोरी ठीक है तो किसी से डरने की कोई जरुरत नही है।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)