09 जून, 2008

ब्लॉग के लिये टाइम नहीं मिला


काफी मसाला मिल गया है ब्लॉग के लिये। आरुषि पर तो आप ब्लॉग पर चार-पांच पोस्ट डाल सकते हैं। कई दिन बाद ऑफिस पहुंचा तो एक साथी पत्रकार की यही टिप्पणी थी। दरअसल 17 मई—जिस दिन आरुषि के नौकर हेमराज की लाश फ्लैट नंबर L-32, जलवायु विहार, सेक्टर 25, नोएडा की छत पर पड़ी मिली थी—के बाद करीब एक हफ्ते बाद मैं ऑफिस पहुंचा था। पिछले एक हफ्ते में—जो शायद अबतक बरकरार है— आरुषि मामला इतना चर्चित हो चुका था कि बच्चों तक की जुबान पर एक ही नाम था—आरुषि। नोएडा के डीपीएस स्कूल की नौवी कक्षा की छात्रा आरुषि की हत्या।
16 मई की सुबह जब ख़बर पता चली कि डीपीएस, नोएडा की छात्रा की लाश उसके घर में मिली है और वारदात के बाद से ही नौकर गायब है तो मैंने इस खबर पर एक साथी रिपोर्टर को लगा दिया। दिन-भर मेरी भी नजर इसी खबर पर थी, लेकिन चौबीस घंटे बाद ही ये वारदात अबतक की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री में तब्दील हो जायेगी, इसका अंदाजा नहीं था। आरुषि की लाश मिलने के करीब चौबीस घंटे बाद तक हर कोई—पुलिस से लेकर आम आदमी और मीडिया—तक उसके नौकर हेमराज को ही हत्यारा मान रहा था। इसका कारण ये है कि दिल्ली और आस-पास के इलाकों में आये दिन नौकरों—खासतौर से नेपाली और बांग्लादेशी—द्वारा वारदातों को अंजाम देने के चलते शक की सुई सबसे पहले उन पर ही घूमती है। आरुषि मामले में तो नोएडा पुलिस ने आनन-फानन में नौकर हेमराज पर बीस हजार रुपये का इनाम भी घोषित कर दिया। उसकी तलाश में नेपाल बार्डर तक पुलिस की एक टीम रवाना हो चुकी थी।

लेकिन अगली सुबह ये खबर इतनी बड़ी हो जायेगी, इतनी चर्चित हो जायेगी, इतनी सनसनीखेज़ बन जायेगी, इसका अंदाजा कतई नहीं था। जैसे ही खबर पता चली कि आरुषि के ‘हत्यारे’ की लाश फ्लैट की छत पर मिल गई है, एक बार तो मेरे भी पैरो तले जमीन खिसक गई। खबर की पुष्टि होते ही मै सीधा L-32 फ्लैट पहुंचा। हेमराज की लाश वहां से जा चुकी थी। लेकिन फ्लैट का बाहर से मुआयना करने के बाद जैसे ही मैं सीढ़ियों की ओर बढ़ा तो मेरे पैर ठिठक गये। फ्लैट से छत की ओर जाने वाली 17 सीढि़यों में से तीन पर खून के छीटें पड़े थे। किसी ने बताया कि इन्हीं खून के छीटों को देखकर नोएडा के रिटायर्ड डीएसपी के के गौतम छत तक पहुंचे थे और हेमराज की लाश का पता चल पाया था। लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा था कि एक दिन पहले जब नोएडा पुलिस का लावो-लश्कर फ्लैट में पहुंचा था तो क्या उन्होंने इन खून के निशानों को नहीं देखा था। खैर जैसे ही मैं फ्लैट की छत पर पहुंचा तो देखा कि वहां खून ही खून था। साथ ही वहां दर्जनो पत्रकार मौजूद थे। कैमरामैन अलग-अलग एंगिल से फोटो लेने में व्यस्त थे। लेकिन सबसे हैरानी की बात थी कि इतने संवदेनशील मामले में पुलिस का कोई भी मुलाजिम वहां मौजूद नहीं था। यहां तक की कोई फॉरेसिंक एक्सपर्ट तक मौजूद नहीं था। कैमरामैन-रिपोर्टर का जहां मन कर रहा था हाथ रख रहे थे, जहां मन कर रहा था पैर रख रहे थे। साफ था कि मौका-ए-वारदात पर मौजूद सबूत जाने-अनजाने में मिट रहे थे। फ्लैट में पता किया तो पता चला कि आरुषि के मां-बाप हरिद्वार गये हुये है। इतने में ही एक रिपोर्टर ने जबाब दिया, “इतनी जल्दी”। कल शाम ही तो आरुषि का अंतिम-संस्कार हुआ है। आज सुबह ही उसके फूल लेकर हरिद्वार चले गये मां-बाप। वो सब तो (पिंड-दान वगैरहा) दो-तीन दिन बाद होता है नीरज जी।” मैंने उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ‘फोनो-लाइव-चैट’ में व्यस्त हो गया। मुझे लगा कि अंतिम-संस्कार के कार्य तो घरवाले ही तैयार करते हैं। बड़े लोग है पंडित से पूछना उचित नहीं समझा होगा, इसलिये चले गये होंगे।
हमारे पहुंचने के बाद और जब न्यूज चैनल पर आरुषि-हेमराज की हत्या की खबर चलने लगी, तब जाकर यू.पी पुलिस नींद से जागी। उन्हें तब एहसास हुआ कि कितनी बड़ी घटना है ये। कितनी बड़ी गलती (लापरवाही) की थी उन्होंने फ्लैट से छत की ओर जाने वाली 17 सीढियां ना चढ़कर। कुछ समय बाद ही नोएडा पुलिस के आला-अधिकारी वहां पहुंच गये। दबी जुबान में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की, हर बार की तरह जल्द ही हत्यारों को पकड़ने का दावा ठोका और एक-दो खाकी-वर्दीधारियों को वहां तैनात कर चलते बने।
उसदिन के बाद से आज का दिन है (8 जून, यानि पूरे 22 दिन बाद) ब्लॉग पर कुछ लिखने का टाइम नहीं मिला। वीकली-ऑफ भी कैंसिल करने पड़ गये। अपना ब्लॉग भी ठीक से नहीं खोल पाया। आज थोडा़ टाइम मिला तो सोचा जो साथी पत्रकार ने कहा था कि मसाला मिल गया है—जैसा कि हर कोई सोच रहा है कि मीडिया (अखबारवालों सहित) को आरुषि-हेमराज हत्यकांड नहीं टीआरपी बढा़ने का मसाला मिल गया है।
लेकिन मैं यहां इसलिये नहीं लिख रहा कि कि दो (मासूम) लोग अपने जान से हाथ धो बैठे हैं। मेरे लिये ये केस कोई मसाला नहीं है। ना ही 15-16 घंटे जलवायु विहार और नोएडा (गाजियाबाद) कोर्ट में खड़ा होना मुझे अखरा है। ना ही मुझे अपना काम उबाऊ या फिर बोझ लगा। बल्कि मैं इसलिये लिख रहा हूं कि

एक क्राइम रिपोर्टर की प्रोफेशनल-जिंदगी में ऐसे केस कम ही सामने आते हैं। पुलिस और सीबीआई के साथ-साथ एक क्राइम रिपोर्टर भी अपनी इंन्वेस्टीगेशन जारी रखता है। अलग-अलग थ्योरी पर काम करता है। हर उस शख्स को संदेह की नजरों से देखता है जो इस केस से जुड़ा़ हुआ है।

एक क्राइम रिपोर्टर की प्रोफेशनल-जिंदगी में ऐसे केस कम ही सामने आते है। पुलिस और सीबीआई के साथ-साथ एक क्राइम रिपोर्टर भी अपने इंन्वेस्टीगेशन जारी रखता है। अलग-अलग थ्योरी पर काम करता है। हर उस शख्स को संदेह की नजरों से देखता है जो इस केस से जुड़ा़ हुआ है। पुलिस और देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी की जांच पर ही सवाल खड़े कैसे किये जाते है इसका अनुभव शायद ही कभी मिल पायेगा। जांच एजेंसियां कहां-कहां गलतियां कर रही हैं, उन्हें जांच करते समय किन-किन बिंदुओ पर सोचना चाहिये, ये सब वो कहीं ना कहीं एक क्राइम रिपोर्टर से भी सीखते है। जिन बिंदुओ पर मीडिया ने नोएडा पुलिस की खिंचाई की, उसपर सीबीआई ने अच्छे से गौर फरमाया। यहां तक की टी.वी चैनल्स से पहले दो दिन की वीडियो फुटेज की भी डिमांड की है सीबीआई ने।

लेकिन 22 दिन बीत जाने के बाद भी हर किसी के जेहन में एक ही सवाल दौड़ रहा है—आरुषि-हेमराज का हत्यारा कौन। क्या एक बाप अपनी बेटी को ही मौत के घाट उतार सकता है ? क्या नोएडा पुलिस ने सही कातिल को गिरफ्तार किया था ? क्या एक मां अपनी पति को बचाने का प्रयास कर रही है ? नोएडा पुलिस से जांच तो छीन ली गई लेकिन क्या सीबीआई कभी इस अनसुलझी पहेली को हल कर पायेगी। अगले ही दिन हरिद्वार जाने के पीछे तलवार दंपति का क्या मकसद था? पिंडदान करते वक्त उन्होंने अपनी बेटी की मौत का वक्त रात के दो-तीन बजे ही क्यों बताया ? L-32 फ्लैट में मौत का तांडव होता रहा लेकिन घर में मौजूद तलवार दपंति को कानों-कान खबर क्यों नहीं लगी ? क्या वाकई तलवार इतनी गहरी नींद में सो रहे थे कि उन्हे कोई चीख-पुकार सुनाई नहीं पड़ी? क्या हत्यारा, तलवार दंपति का कोई जानने वाला था? लेकिन कौन, इसका अंदाजा उन्हें भी नहीं है ? क्या हत्यारा सिर्फ हेमराज को खत्म करने के इरादे से फ्लैट में दाखिल हुआ था और आरुषि को सिर्फ इसलिये मौत की नींद सुला गया कि कहीं वो उसके उसका राज फाश ना कर दे ? क्या आरुषि, हेमराज की हत्या की चश्मदीद थी? ऐसे ही ना जाने कितने अनगिनत सवालों को पिछे बाईस दिनो से मैं, मेरे साथी पत्रकार और सीबीआई खंगाल रही है।

3 टिप्‍पणियां:

mayank ने कहा…

यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे।

Udan Tashtari ने कहा…

अपडेट करते रहें इस केस में, आभारी रहेंगे.

DONGRE तृष्णा ने कहा…

नीरज जी ,
आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं
लगातार देखता रहता हूँ ...

अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...

जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि
हत्याकांड की बात है तो ...
स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .

शायद खुलासा होने ही वाला है ...

आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की
आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...
अच्छी बात है ...

धन्यवाद

रामकृष्ण डोंगरे
http://dongretrishna.blogspot.com

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)