06 जुलाई, 2008

आज रात भगवान कृष्ण आ रहें हैं


आज रात भगवान श्रीकृष्ण इस वन में आएंगे और गोपियों के साथ रास-लीला मनाएंगे। कृष्णजी के साथ राधा भी यहां आएंगी। दिन में जो ये आप वृक्ष देख रहे है, रात में ये गोपियों में तब्दील हो जायेंगे... तो क्या रात में भगवान कृष्ण की इस रास-लीला को हम भी देख सकेंगें। नहीं साहब नहीं, भूलकर भी ऐसी गलती मत कीजियेगा। जिसने भी इस वन में रात को भगवान की रास-लीला देखने की भूल की है, वो यहां से जिंदा बाहर नहीं निकला है। रात में तो ये वन बंद कर दिया जाता है। आप सिर्फ बांसुरी और घुंघरुओं की आवाज सुन सकते है।
ये कहानी नहीं हकीकत है। वृंदावन (या बृंदावन) शहर के बीचो-बीच एक ऐसा वन (वाटिका कहना ज्यादा ठीक रहेगा) है, जिसमें लोग मानतें हैं कि रात में भगवान श्रीकृष्ण यहां आते हैं और गोपियों के साथ रास-लीला रचाते हैं। ये वन यमुना नदी से भी ज्यादा दूरी पर नहीं है। इस वाटिका को लोग ‘निधि-वन’ के नाम से जानते है। बृज-भूमि में यमुना नदी के किनारे भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली (मथुरा) है, उनका गांव नंदगांव है, गोकुल है, गोवर्धन पर्वत है, ये सब जानकारी थी। लेकिन वृंदावन में एक ऐसा वन है जहां अभी भी कृष्णजी रास-लीला रचाते है सुनकर आश्चर्य जरुर हुआ। ये सब जानकारी मुझे वृंदावन जाकर ही लगी थी। दरअसल इन वनों (निधि-वन इत्यादि) के कारण ही इस छोटे से शहर का नाम वृदांवन पड़ा था।
ये तो मुझे मालूम था कि जहां ये पूज्यनीय स्थल है वहां कभी घने वन हुआ करते थे। मान्यता ये है कि यमुना नदी के किनारे इन्हीं वनों में कदंब वृक्षों पर भगवान कृष्ण राधा और दूसरी गोपियों के साथ क्रीड़ा किया करते थे। घंटो-घंटो इन्हीं वृक्षों की डाल पर बैठकर माखन-चोर कृष्ण बांसुरी बजाया करता थे और आस-पास के गांव में रहने वाली लड़कियां और महिलाएं उसकी धुन में इतनी मद-मस्त हो जाती थी कि अपना काम-काज छोड़कर वहां पहुंच जाती थी।

लेकिन ये बात मुझे वृंदावन जाकर ही पता चली कि यहां एक वन (निधि-वन) ऐसा भी है जहां माना जाता है कि रात में कृष्णजी रोज रात को यहां पहुंचते है, राधाजी से मिलते है और दूसरी गोपियों के साथ रास-लीला रचाते हैं। सुनकर अजीब जरुर लगा।
मैंने गाइड से कहा कि रात में इस वन में छिपकर क्या किसी ने रास-लीला देखी है। तो उसका जबाब सुनकर हैरानी हुई। गाइड के मुताबिक जिस किसी ने भी रात में निधि वन में रुकने की कोशिश की, वो अगली सुबह नहीं देख सका। उसकी लाश इस वन में मिलती है। उस गाइड ने उन लोगो की समाधि भी दिखाई, जो इसी वन में बनी हुई है। ये समाधियां अधिकतर साधु-संतो की है। उन संतो की जो अपने प्रिय भगवान के एक दर्शन-मात्र करना चाहते थे। मौत से पहले उन्होने दर्शन कर भी लिए हो, कौन जानता है। लेकिन लोगों की मान्यता है कि उनकी मौत भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के बाद ही होती होगी। यही वजह है कि उन सभी लोगों की समाधि इसी वन में बनाई गई है।
कहते है कि वृदांवन शहर को बसाने में निम्बार्क संप्रदाय के स्वामी हरिदास (संगीत सम्राट तानसेन के गुरु) का अहम योगदान था। लोग तो यहां तक मानते है कि हरिदास और कोई नहीं बल्कि पिछले जन्म में भगवान श्रीकृष्ण की एक गोपी, ललिता थे। 15वीं सदी में जब उनका जन्म मथुरा के करीब एक गांव में हुआ तो, वे कृष्ण भगवान और राधा की भक्ति में डूब गये। भगवान की तलाश में वो यमुना नदी के किनारे आकर रहने लगे और यहीं अपना आश्रम बना लिया। कहते हैं निधि-वन में उन्हें भी साक्षात् कृष्णजी और राधाजी के दर्शन हुये थे। भगवान ने उन्हे अपनी एक मूर्ति भी वरदान के रुप में दी थी, जो अब बांके-बिहारी मंदिर में विराजमान है। कुछ लोगों की मान्यता है कि हरिदासजी को ये मूर्ति निधि-वन की खुदाई में मिली थी। अब मेरी समझ में आ चुका था कि कैसे मिलन होता है इतिहास और मान्यता का।
बांके-बिहारी की मूर्ति देखकर हैरानी होती है। दरअसल ये मूर्ति बिल्कुल काली है। लोगों की मानें तो यमुना नदी में काली नाग को मारने के बाद कृष्णजी का रंग एकदम काला हो गया था। बांके-बिहारी मंदिर के दर्शन के दौरान मैंने देखा कि पंडित जी हर दो मिनट बाद भगवान की मूर्ति को पर्दे से ढक देते है। पता किया तो पता चला कि

एक बार बांके-बिहारी का दिल उस लड़की पर आ गया था जो मंदिर में उनके दर्शन करने पंहुची थी। पलक झपकते ही मूर्ति अपने स्थान से गायब हो गई। उसके बाद से ही पंडितो की कोशिश होती है कि भगवान की नजर किसी भी लड़की पर दो मिनट से ज्यादा ना पड़े

एक बार बांके-बिहारी का दिल उस लड़की पर आ गया था जो मंदिर में उनके दर्शन करने पंहुची थी। पलक झपकते ही मूर्ति अपने स्थान से गायब हो गई। उसके बाद से ही पंडितो की कोशिश होती है कि भगवान की नजर किसी भी लड़की पर दो मिनट से ज्यादा ना पड़े (या यूं कहें कि किसी कन्या की नजर उनकी मूर्ति पर ज्यादा देर तक ना टिके)। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी मानें तो ये सबकुछ इसलिये किया जाता है जिससे मंदिर के कंपाउंड में भीड़ ज्यादा देर तक ना रुक सके। अगर भीड़ मंदिर में ज्यादा देर रुकेंगी, तो उसे संभालना मुश्किल हो जायेगा।
वृदांवन और पूरी बृजभूमि में सैकड़ों मंदिर है। लेकिन एक अनोखी अनुभूति और जानकारी निधि वन में ही मिलेगी। तो एक बार आप भी जरुर निधि वन के दर्शन करके आईयेगा।

1 टिप्पणी:

Naresh ने कहा…

hello dear you said that lord krishna has fall in love one lady face so prist allways comedown parda but this is not realty. There is a past sotry once time Tulsi das has runout to visit on Mathura there is not found lord of Sita Ram so he diceded cantmove to parnam then lord krishna has change your snap and show Lord Sita Ram that times se every 2 minute pujari are comedown pardas becasue there are nver chage the photo naresh pandey

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)