29 जुलाई, 2008

चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत


पिछले हफ्ते मेरी मुलाकात चार्ल्स शोभराज से काठमांडू जेल में हुई। खबर थी कि जेल के अंदर दुनिया के सबसे खतरनाक अपराधी से एक करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी गई है। लेकिन चार्ल्स शोभराज तो चार्ल्स शोभराज ठहरा, सो साफ मना कर दिया किसी भी रंगदारी देने को। लेकिन रंगदारो को मालूम था कि चार्ल्स को अपनी जान की फ्रिक तो है नहीं। क्योंकि इन दिनो चार्ल्स की जान तो कही और बसी हुई है। जी हां, उन्होनें चार्ल्स की मंगेतर निहिता बिस्वास को धमकी देनी शुरु कर दी। बस उसके बाद से ही चार्ल्स की जान पर बन आई है।
दिन था बुधवार...तारीख थी 23 जुलाई... जगह...काठमांडू सेंट्रल जेल...मुलाकाती नंबर था 26... बीस मिनट हुई इस खास-बातचीत में चार्ल्स ने अपने दिल के कई राज़ खोल दिये। इस दौरान चार्ल्स की मंगतेर निहिता और उसका इंटरप्रेटर भी मौजूद था। चार्ल्स ने मेरे से अंग्रेजी में बातचीत की। इस इंटरव्यू के दौरान जेल स्टाफ भी मौजूद था।

बातचीत में चार्ल्स शोभराज पहले की तरह यंग और डायनैमिक (चुस्त-दुरस्त) दिखाई पड़ा। कही से भी देखने में ये नहीं लगता है कि पिछले तीस सालों में उसने अधिकतर समय जेल में ही बिताया है--पिछले पांच साल से वो काठमांडू की जेल में बंद है।

बातचीत में चार्ल्स शोभराज पहले की तरह यंग और डायनैमिक (चुस्त-दुरस्त) दिखाई पड़ा। कही से भी देखने में ये नही लगता है कि पिछले तीस सालों में उसने अधिकतर समय जेल में ही बिताया है--पिछले पांच साल से वो काठमांडू की जेल में बंद है। एक और खास बात उससे बात करने में ये नजर आई कि वो ना तो जेल प्रशासने से डरता है और ना ही जेल में सक्रिय माफिया से। लेकिन वो चिंतित है अपनी महबूबा निहिता और उसके परिवार के लिये। जेल में चार्ल्स ने जैसे ही निहिता को देखा, उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। निहिता को देखते ही उसने कहां... HOW ARE YOU MY DARLING? HOW IS YOUR MOTHER? यानि कैसी हो मेरी महबूबा। तुम्हारी मां कैसी हैं... निहिता ने धीरे से कहां... “सब ठीक है।” इसके बाद शुरु हुई मेरे से बातचीत।

नीरज राजपूत--- मैं नीरज राजपूत हूं। स्टार न्यूज, दिल्ली से।
चार्ल्स शोभराज--- (खुशी से) ओह हो स्टार। GREAT ( बढिया)... मैने जेल में तुम्हारा प्रोग्राम देखा था जिसमें निहिता से बातचीत दिखाई गई थी।
नीरज राजपूत --- जेल में तुम कैसे हो।
चार्ल्स शोभराज--- मै बढिया हूं।
नीरज राजपूत --- निहिता से मंगनी पर आप खुश हैं।
चार्ल्स शोभराज—

निहिता से मंगनी मेरी जिंदगी का यादगार लम्हा है। मै बहुत बढ़िया महसूस कर रहा हूं। लेकिन निहिता और उसके परिवार के लिये मैं चिंतित हूं... निहिता ने धमकियों के बारे में आपको बताया होगा।

निहिता से मंगनी मेरी जिंदगी का यादगार लम्हा है। मै बहुत बढिया महसूस कर रहा हूं। लेकिन मैं निहिता और उसके परिवार के लिये चिंतित हूं... निहिता ने धमकियों के बारे में आपको बताया होगा।
नीरज राजपूत —हां... तो क्या आपको भी धमकी मिल रही है।
चार्ल्स शोभराज—बिल्कुल... जेल में मेरी जान को खतरा है। मुझे यहां कुछ भी हो सकता है। लेकिन मै निहिता के लिये चिंतित हो। तुम तो शायद अच्छी तरह जानते होंगे कि चार्ल्स किसी से नहीं डरता।
नीरज राजपूत --- तुमने इन धमकियों के बारे में जेल प्रशासन से शिकायत की है ?
चार्ल्स शोभराज--- यहां ये एक बड़ी समस्या है। मुझे जेलर से नही मिलने दिया जाता। ना ही जेलर यहां हमसे जेल में मिलने आता है। उसे यहां पर एक साल हो गया है लेकिन वो कभी कैदियों से नहीं मिलता। यहां पर कैदियों का एक गैंग है जो इस जेल को संचालित कर रहा है। जो भी शिकायत मैं जेल प्रशासन को लिखता हूं, वो पहले इसी गैंग के पास पहुंचती है। यही वजह है कि मेरी शिकायत कभी भी सही आदमी तक नहीं पहुंच पाती।
नीरज राजपूत --- सुप्रीम कोर्ट में तुम्हारी हत्या के मामले में भी सुनवाई चल रही है। कितना यकीन है कि आप छूट जायेंगे।
चार्ल्स शोभराज—मै जल्द से जल्द जेल से बाहर आना चाहता हूं। (खुशी से) जब से निहिता मेरी जिंदगी में आई है, तब से और भी जल्दी निकलना चाहता हूं।
नीरज राजपूत --- क्या आप अभी भी ये मानते हो कि 1975 में तुम नेपाल नही आये थे।
चार्ल्स शोभराज--- बिल्कुल... मैं 1975 में नेपाल नही आया था। मैने कोई मर्डर नही किया है।
नीरज राजपूत --- उन लैटरर्स का क्या है जो आपने "LIFE AND CRIME OF CHARLES SHOBRAJ" किताब के लेखक को दिये थे। उसमें तो आपने खुद कबूल किया था कि 1975 मे नेपाल आये थे।
चार्ल्स शोभराज--- तुम LIFE AND CRIME OF CHARLES SHOBRAJ और SERPENT किताब को गौर से पढ़ना। कही भी ये नहीं लिखा है कि चार्ल्स 1975 में नेपाल आया था। जो कुछ भी किताब में लिखा है वो सबकुछ पुलिस के हवाले से लिखा गया है। “ POLICE HAS SAID….”
नीरज राजपूत ---लेकिन निचली अदालत ने तुम्हारे खिलाफ फैसला सुनाया था।
चार्ल्स शोभराज---इसीलिये तो मैने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है। पुलिस और सरकारी वकील के पास मेरे खिलाफ कोई भी सबूत नहीं है। सबूत के नाम पर सिर्फ उनके पास सिर्फ भारत के एक न्यूज-पैपर (नवभारत टाईम्स, 13 जुलाई 1976) की किलिपिंग (कतरनें) हैं जो 1976 में छपी थीं। उस अखबार में छपा था कि दिल्ली में एक ऐसा गैंग पकड़ा गया है जिसने अफगानिस्तान, थाईलैंड, टर्की, ग्रीस और नेपाल में कई पर्यटकों की हत्या की है। इस अखबार की कतरन के अलावा नेपाल पुलिस के पास मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है।
स्टार न्यूज--- सुप्रीम कोर्ट में 10 अगस्त को अगली सुनवाई है ना।
चार्ल्स शोभराज--- हां... और मुझे लगता है कि 10 या फिर 12 अगस्त तक सबकुछ पूरा हो जायेगा।
नीरज राजपूत --- तुम्हारा मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना देगी।
चार्ल्स शोभराज--- हां... क्योकि अदालत में बहस पूरी हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को साफ मना कर दिया है कि अब वो अदालत में कोई और सबूत ना पेश करे। पिछली सुनवाई में सरकारी वकील अदालत में पासपोर्ट थ्योरी ले आये थे। लेकिन अदालत ने उन्ही परमिशन नहीं दी।

हर बार पुलिस कभी किसी फर्जी कागजात को सामने ले आती है कभी कुछ। (कागजात दिखाते हुये) इन होटल के पेपरर्स को देखो। ये सब फर्जी हैं। आप खुद देख लीजिये कि पुलिस ने कैसे इन पेपरर्स को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है।

हर बार पुलिस कभी किसी फर्जी कागजात को सामने ले आती है कभी कुछ। (कागजात दिखाते हुये) इन होटल के पेपरर्स को देखो। ये सब फर्जी हैं। आप खुद देख लीजिये कि पुलिस ने कैसे इन पेपरर्स को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। निहिता ने ये पेपरर्स आपके स्टार न्यूज पर दिखाये भी थे।

(इस बीच जेल स्टाफ चार्ल्स को बातचीत खत्म करने का आदेश देता है)
जेल स्टाफ---चलिये अंदर चलियें। आपकी मुलाकात का वक्त खत्म हो गया है।
चार्ल्स शोभराज--- (एक मुलाकाती की तरफ इशारा करते हुये)... ये महिला हमारे से पहले से (जेल में बंद) अपने रिश्तेदार से बातचीत कर रही है। फिर तुम मुझे कैसे बोल सकते हो बातचीत खत्म करने के लिये।
जेल स्टाफ---ठीक है थोडी देर और कर लीजिये बात।
चार्ल्स शोभराज--- (स्टार न्यूज से बातचीत में) यहां पर मुलाकात का वक्त 20 मिनट है। लेकिन जब से मेरी मंगनी निहिता से हुई है, ये मुझे पांच-सात मिनट से ज्यादा नहीं मिलने देते। बाकी कैदी यहां एक-एक दो-दो घंटे तक मुलाकात कर सकते हैं। लेकिन मुझे नहीं करने देते।
निहिता--- ( मेरे से) आज आप हमारे साथ आये हो इसलिये हमे बीस मिनट मिलने दिया है नहीं तो हमे जल्दी भगा देते हैं। ये सब हमारी मंगनी के बाद से शुऱु हुआ है।
जेल स्टाफ--- मिलने का टाईम खत्म हो गया है।
चार्ल्स शोभराज--- अभी तक मैं पत्रकार से मुलाकात कर रहा था। अब मैं अपने घरवालों से बात करुंगा।
निहिता--- बिल्कुल
जेल स्टाफ--- नही-नही टाईम खत्म हो गया है। चार्ल्स अब तुम अंदर चलो।
निहिता--- ओके...अब हम जा रहे है।
चार्ल्स शोभराज--- BYE-BYE… BYE निहिता।
(मुलाकात खत्म होते ही निहिता की आंख छलक पड़ती है)

4 टिप्‍पणियां:

संदीप सिंह ने कहा…

नीरज जी काफी अच्छा साछात्कार है , लिखते रहिये मेरी शुभकामनाये आप के साथ है http://singhkharikhari.blogspot.com/

नीरज गोस्वामी ने कहा…

चार्ल्स का नया पक्ष भी देखा सुना...लिखते रहिये.
नीरज

बाल किशन ने कहा…

काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.
अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर.

Udan Tashtari ने कहा…

रोचक साक्षात्कार.

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)