19 अगस्त, 2008

सूरज अस्त, नेपाल मस्त


मौज मस्ती करनी है सर... कैसी मस्ती ? वही... कौनसी वही ? लड़की वाली सर, और कौनसी... दिनभर का काम खत्म करने के बाद शाम को मै और मेरा साथी कैमरामैन काठमांडू के एक जाने-माने पांच सितारा होटल के बाहर घूमने निकले तो हमें सड़क पर एक लड़के के इन्ही सवालो से रुबरु होना पड़ा। राजदरबार के ठीक सामने वाली सड़क के किनारे ही वो लड़का हमें टकराया था। उस लड़के की बात सुनकर हमें हंसी भी आ रही थी और हैरानी भी हो रही थी। उस लड़के की उम्र महज दस साल थी। इतनी छोटी सी उम्र में ही वो जिस्मफरोशी के धंधे का दलाल बन गया था। लड़के से बात करने के बहाने मेरे साथी कैमरामैन ने उससे रेट लिस्ट भी पता कर ली। लेकिन मैने उन दोनो की बात-चीत को बीच में ही रोका और लड़के को वहां से चलता कर दिया।
पिछले छह सात-महीने में चार्ल्स शोभराज के केस के चलते मेरा काठमांडू आना-जाना कई बार हो चुका है। इन यात्राओं के दौरान मुझे नेपाल और खासतौर से काठमांडू के बारे में जाने का अच्छे से मौका मिला। काठमांडू के थामेल इलाके (दिल्ली के पहाड़गंज की तरह ये इलाका भी होटलगंज के नाम से मशहूर है) के बारे में तो थोड़ा-बहुत सुन रखा था। विदेशी सैलानियों के बीच ये इलाका खासा मशहूर है।
सैकड़ो की तादाद में होटल और उन्ही के बीच तंग गलियों में जिस्मफरोशी के अड्डे। छोटे-बड़े लड़के इन्ही गलियों में ग्राहको को तलाशते आसानी से मिल जाते है। डांस बार के नाम पर इन अड्डो में वो सबकुछ होता है जो पर्यटक यहां आने पर चाहते है। डांस बार के नाम भी ऐसे कि कोई भी उनकी और आकृषित हो जायें—कोबरा, रैन डांस, टकीला और ना जाने क्या-क्या।
हाल ही प्रकाशित एक न्यूज रिपोर्ट की माने तो अकेले काठमांडू में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा वेश्यावृति के धंधे में लिप्त है। इसका एक बड़ा कारण है नेपाल में बेरोजगारी। हर साल सैकड़ो की तादाद में नेपाली लड़कियों की भारत और दूसरे देशो में तस्करी की जाती है। रोजगार की तलाश में क्या लड़के और क्या बच्चे और बूढे भारत सिर्फ और सिर्फ नौकरी की तलाश में आते है (भारत के चर्चित आरुषि-हेमराज हत्याकांड में नेपाली नौकरो की भूमिका को कौन भूल सकता है)।

पिछले कई सालो से अस्थिरता की मार झेल रहे नेपाल में रोजमर्रा की वस्तुओं के लाले पड़ गये है। पैट्रोल पंप पर गाड़ियों की लंबी लाईन, बाजार में सब्जियों की कमी, गैस की किल्लत, सड़को पर भारी ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं ने नेपाल के आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है।

पिछले कई सालो से अस्थिरता की मार झेल रहे नेपाल में रोजमर्रा की वस्तुओं के लाले पड़ गये है। पैट्रोल पंप पर गाड़ियों की लंबी लाईन, बाजार में सब्जियों की कमी, गैस की किल्लत, सड़को पर भारी ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं ने नेपाल के आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। पिछले कई महीनो से नेपाल में अस्थाई सरकार काम कर रही है। सभी राजनैतिक पार्टियों के नेता जल्द ही सरकार बनाने का भरोसा तो दिला रहे है लेकिन आपसी सामंजस्य की वजह से ये काम टलता जा रहा है। इसका खामियाजा आम आदमी को सहना पड़ रहा है। वर्ष 2001 में राजदरबार में हुये नरसंहार (जिसमें नेपाल के सबसे चहेते राजा वीरेन्द्र का पूरा परिवार मारा गया था) के बाद से तो मानो इस हिमालय-राष्ट्र में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पहले माओवादियो का आंदोलन फिर आम चुनाव में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत ना मिलना। ऐसा लगता है कि नेपाल को ग्रहण लग गया है। माओवादी भले ही अब आंदोलन का रास्ता छोड़कर प्रचंड (नये प्रधानमंत्री) के नेतृत्व में मुख्यधारा से जुड़ गये हो लेकिन उनके द्वारा बेघर लोग अभी भी सैकड़ो की तादाद में अपनी मांगो के लिये सड़को पर मार्च करते दिख जाते है।
पिछले कुछ सालो में नेपाल के अपने पड़ोसी और कभी सबसे करीबी मित्र-राष्ट्र, भारत से रिश्तो में भी खटास आ गई है। ये बात जरुर है कि हाल ही में हुये चुनावो के बाद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद पर दो भारतीय मूल के शख्स ही चुने गये है। बाबजूद इसके, नेपाली लोगो का भारत के प्रति दृष्टिकोण में कोई सुधार नही हुआ है। इसका ताजा उदाहरण सामने तब आया जब नेपाल के उपराष्ट्रपति ने हिंदी में शपथ ली। ये बात वहां के लोगो को इतनी नागवार गुजरी की वे सड़को पर उतर आये। जगह-जगह हड़ताल और बंद घोषित कर दिया गया। लोगो का गुस्सा तभी शांत हुआ जब उपराष्ट्रपति ने नेपाल की जनता से माफी मांगी। जानकारों का तो ये भी मानना है कि नेपाल में बदहाली का एक बड़ा कारण भारत से हुये खराब रिश्ते ही है। दरअसल जब तक भारत के नेपाल से मधुर संबध थे तबतक सभी जरुरत का सामान आसानी से मिल जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। उम्मीद यही है कि प्रंचड के नेतृत्व वाली सरकार जल्द ही नेपाल की स्थिति को सुधार देगी।

इतनी खस्ता हालात के बाबजूद काठमांडू के कैसिनो (casino) को कौन भुला सकता है। हर साल हजारो की तादाद में विदेशी पर्यटक सिर्फ और सिर्फ काठमांडू के कैसिनो में मौज-मस्ती और पैसा कमाने (या लुटाने) के इरादे से ही आते है। एक ही रात में यहां के कैसिनो में लाखो-करोड़ो के वारे-न्यारे हो जाते है। एक ही ऐसी शाम को हम अपने होटल पहुंचे तो देखा की होटल के अंदर बड़ी तादाद में पुलिस बल मौजूद है। कुछ मीडियाकर्मी भी कवरेज के लिये पहुंचे हुये थे। समझते देर ना लगी कि कुछ गड़बड़ झाला है। दरअसल कैसिनो के अंदर कुछ सटोरियें मोटी रकम हार गये थे और कैसिनो के कर्मचारियों से हाथा-पाई पर उतर आये थे। कर्मचारियों से पता किया तो उन्होने बड़ी इत्मीनान से कहा, "ये तो साहब यहां रोजमर्रा की बात है। जो आदमी लाखो गवांयेगा तो गुस्सा तो आयेगा ही। फिर ऊपर से दारु का नशा।" इन कैसिनो की खास बात ये है कि यहां कस्टमर को फ्री शराब पिलाई जाती है। यानि एक हाथ में जाम और दूसरे में नेपाली रुपया और डालर। जाम पे जाम पीते जाओ और पैसा लुटाते जाओ। शराब के नशे में जितना जी चाहे उतना लुटाओ।
यहां ये बाद दीगर है कि वर्ष 2003 में जब चार्ल्स शोभराज को काठमांडू में गिरफ्तार किया गया था तो वो उस वक्त एक पांच सितारा होटल के कैसिनो में ही सट्टा लगा रहा था।
शराब से याद आया कि काठमांडू में कुछ मिले या ना मिले, शराब बहुत आसानी से मिल जाती है। देशी, विदेशी, इंडियन ब्रांड सबकुछ यहां मिल जाती है और वो भी बहुत कम दामों में। चाहे कोई डिपार्टेमेंटल स्टोर हो या फिर रेस्त्रा, मिठाई की दुकान या फिर चाय की दुकान, सब जगह दारु 'खुली' मिलती है। शराब पीने पर कोई रोक-टोक नही है। नेपाल में रहने वाले एक जानकार से पता किया तो उसने बताया कि यहां एक कहावत मशहूर है, “ सूरज अस्त, नेपाल मस्त ।”
इन सबके बाबजूद मुझे काठमांडू शहर काफी पसंद आता है। इसका कारण इस शहर का ऐतिहासिक महत्व। काठमांडू शहर तीन भागो में बांटा जा सकता है—काठमांडू शहर, भक्तापुर और पाटन। इन तीनो जगहों पर नेपाल के शासको ने ऐसी-ऐसी लकड़ी की इमारतें बनावाई जिनकी छंटा देखते ही बनती है। काठमांडू शहर के बीचो-बीच है दरबार स्कवायर और हनुमान ढोका।
मौजूदा दरबार (जिसे अब म्यूजयिम में तब्दील कर दिया गया है और जहां राजा वीरेन्द्र के पूरे परिवार का नरसंहार किया गया था) से पहले नेपाल के शासक इसी दरवार स्कावयर के महल में रहते थे। कहते है कि नेपाल के मल्लाह और शाह राजा (इन दोनो राज घरानो ने ही नेपाल में ज्यादातर समय में राज किया है) रोज शाम को इसी महल की सातवी मंजिल से खड़े होकर पूरे काठमांडू शहर का जायजा लिया करते थे। राजा देखता था कि हर घर में चूल्हा जल रहा है या नही। अगर नही तो वो खुद उस घर में जाकर पूछता था कि चूल्हा क्यो नही जल रहा है। शायद यही वजह थी कि नेपाल के राजा अपनी जनता में बहुत लोकप्रिय थे। लेकिन बकौल एक दुकानदार, "सर आज के नौजवान नेपाल की हर पुरानी चीज खत्म करने पर तुले है। वे जगह-जगह लगी राजाओ की मूर्तियो के स्थान पर आज के नेताओ की मूर्ति लगाने की कवायद में जुटे है। नेपाली लोग अपने इतिहास को संभालने में नाकाम नजर आ रहे है।" राजा के इस पुराने महल को भी अब म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है। महल सहित यहां की अधिकतर इमारतें लकड़ी की है। इन्ही में से एक काष्ठमंडप (यानि एक ही पेड़ की लकड़ी से बना दरबार)। इस ‘काष्ठमंडप’ के नाम से ही नेपाल की राजधानी का नाम काठमांडू पड़ा है। काष्ठमंडप के करीब ही है ‘कुमारी मंदिर’। दरबार स्कावायर और हनुमान ढोका में कई मंदिर है। लेकिन सभी बंद रहते है। हमारे ड्राइवर ने बताया कि ये सभी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलतें है। दशहरा के मौके पर राजा ही यहां के मंदिर के कपाट खोलते है। अगर आपने सत्तर के दशक में देव आनंद की फिल्म ‘हरे कृष्णा हरे रामा’ देखी हो तो आसानी से पता चल जायेगा कि उसकी अधिकतर शूटिंग इस शहर और यहां के मंदिरो की है। हिप्पी कलचर के अवशेष अब भी यहां देखे जा सकते है। मुझे लगता है कि चार्ल्स शोभराज भी इसी हिप्पी कलचर को तलाशता हुआ वर्ष 2003 में यहां आया था। सत्तर के दशक में चार्ल्स शोभराज भी इसी संस्कृति का एक अहम हिस्सा था। कहते है कि उसने दुनिया के कई देशो में हिप्पी स्टाईल पापुलर किया था। खैर अब यहां के इन मंदिरो और उनकी बड़ी-बड़ी सीढियों पर बड़ी तादाद में प्रेमी जोड़े बैठे दिख जायेंगे। शाम के वक्त यहां भारी भीड़ रहती है।
हनुमान ढोका और दरबार स्कवायर से मिलता-जुलता शहर है भक्तापुर। काठमांडू शहर के बाहरी हिस्से में बना ये शहर भी यूनस्को द्वारा ‘सरंक्षित इलाका’ घोषित किया जा चुका है। शहर से बाहर होने की वजह से ये बेहद खूबसूरत लगता है। भीड़ भी कम रहती है। इमारतें लगभग एक जैसी ही है। राजा का घर हो या दरबार या फिर मंदिर, सभी ठीक उसी स्टाइल में बने है जैसे हनुमान ढोका और दरबार स्कवायर में। कहते है जब यहां राजशाही थी तो तीनो शहर—काठमांडू, भक्तापुर और पाटन—के राजाओं में एक दूसरे से अच्छी इमारत बनानी की होड़ लगी रहती थी। शायद यही वजह है कि तीनों जगह की इमारतें बनाने की कला एक जैसी है। ड्राइवर ने बताया कि पाटन शहर भी ठीक वैसा ही है जैसा भक्तापुर। अगली बार काठमांडू जाना हुआ तो पाटन भी जरुर जाउंगा।

अरे हां, काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर को कैसे भुलाया जा सकता है। भगवान शिव के पांचमुखी मंदिर की भव्यता देखती ही बनती है। ये मंदिर बागमती नदी के किनारे बना है। हिंदुओ के साथ-साथ दूसरे धर्म के लोग दूर-दूर से इस मंदिर को देखने आते है। लेकिन ना तो किसी दूसरे धर्म के लोग और ना ही विदेशी इस मंदिर के परिसर में दाखिल हो सकते है। विदेशियों के लोग बागमती नदी के उसपार एक जगह बनाई गई है। वे सभी वहां से खड़े होकर इस मंदिर के दर्शन कर सकते है। इसी नदी के नाम पर नेपाल के एक सूबे का नाम बागमती है। काठमांडू इसी बागमती सूबे के अंतर्गत आता है।
काठमांडू के मंदिर देखकर मेरे कैमरामैन ने अचानक एक सवाल दाग दिया, “नीरजजी, यहां के मंदिर इतने सालो से इतने सुरक्षित क्यो है? हमारे देश के मंदिर तो एकदम खस्ताहाल में नजर आते है।” मैने जबाब दिया, “क्योकि नेपाल पर कभी भी किसी बाहरी देश ने ना तो आक्रमण किया और ना ही ये देश कभी किसी का गुलाम रहा है।” इस बात का इतिहास गवाह है।

5 टिप्‍पणियां:

vineeta ने कहा…

अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...

मुनीश ( munish ) ने कहा…

thanx for ur travelogue ! nice post!

मुनीश ( munish ) ने कहा…

thanx for ur travelogue ! nice post!

दीप चन्द्र शुक्ल ने कहा…

आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...

बेनामी ने कहा…

काठमांडू के साथ साथ पोखरा और लुम्बनी का भी जिक्र करे

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)