24 अगस्त, 2008

रॉ सेक्स स्कैंडल



“तुम तो अभी हसीन हो, जवां हो। तुम्हारे चेहरे पर कितना नूर है। अपने लिये कोई आदमी क्यों नहीं ढूंढ लेती, जो तुम्हे खुश रख सके। या एक काम करो तुम रात को मेरे पास होटल में आ जाना। एक रात मेरे साथ होटल में बिताने के मैं तुम्हें तीस हजार रुपये दूंगा।”
ये बात-चीत है हमारे देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी, रॉ के दो अधिकारियों के बीच की। लेकिन ये कोई जासूसी भाषा नहीं है। बल्कि ये शब्द कहे हैं रॉ के एक सीनियर अधिकारी ने अपने साथ काम करने वाली महिला अधिकारी से। ये गंभीर आरोप लगाए हैं खुद उसी महिला अधिकारी ने। जबसे ये बातचीत सार्वजनिक हुई है, सबसे बड़ी गुप्तचर एजेंसी में चल रहे सेक्स स्कैंडल का पर्दाफाश हो गया है। ऐसा कम ही होता है कि रॉ जैसी खुफिया एजेंसी के अंदर चल रहे गड़बड़ झाले का लोगों को पता चले सके। लेकिन रॉ ट्रैनिग इंस्टीटयूट की डायरेक्टर निशा प्रिया भाटिया ने जबसे ये खुलासा किया है गुप्तचर एजेंसी के मुंह पर तो मानों कालिख पुत गई है।
रॉ यानि RESARCH AND ANALYSIS WING (RAW) , सीधे तौर से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के अंतर्गत काम करने वाली खुफिया एजेंसी है। इसका काम है दूसरे देशों की जासूसी करना--यानि खुफिया जानकारी इकठ्ठा करना। जिस तरह अमेरिका की सीआईए है और ब्रिटेन की एमआई-6, इस्रायल की मोसाद और पूर्व सोवियत संघ की केजीबी, वैसे ही भारत की सीक्रेट सर्विस एजेंसी है रॉ

अगर आप जेम्स बांड (एमआई-6 एजेंट 007) की फिल्में देखते हैं तो बस समझ लीजिये रॉ के अधिकारी भी बहुत कुछ वैसा ही काम करते है। भारत में रॉ के जासूसो पर बनी फिल्में गिनी-चुनी ही है। जैसे धर्मेन्द्र की आंखें, देव आन्नद की प्रेम-पुजारी, सन्नी देओल की हीरो-लव स्टोरी ऑफ ए स्पाई और 16 दिसम्बर

अगर आप जेम्स बांड (एमआई-6 एजेंट 007) की फिल्में देखते है तो बस समझ लीजिये रॉ के अधिकारी भी बहुत कुछ वैसा ही काम करते है। भारत में रॉ के जासूसों पर बनी फिल्में गिनी-चुनी ही है। जैसे धर्मेन्द्र की आंखें, देव आन्नद की प्रेम-पुजारी, सन्नी देओल की हीरो-लव स्टोरी ऑफ ए स्पाई और 16 दिसम्बर । वैसे यहां ये बात दीगर है कि रॉ के काम-काज करने के तरीके से लेकर उसके हेडक्वार्टर और उसमें काम करने वाले जासूसों के बारे में लोगों को कम ही पता चलता है। उससे जुड़ी घटनायें (विवाद) कम ही सार्वजनिक होते हैं। लेकिन निशा भाटिया स्कैंडल से रॉ की काफी छीछालेदर हुई है। आम लोगों तक को पता चल गया कि रॉ का हेडक्वार्टर दिल्ली के लोदी कॉलोनी इलाके में है और उसके चीफ हैं ए के चतुर्वेदी।

आरोप है कि चालीस साल की तलाकशुदा महिला अधिकारी, निशा प्रिया भाटिया को उनके महकमें के एक सीनियर ऑफिसर ने अपने साथ होटल में रात बिताने का ऑफर किया था। इसकी शिकायत जब निशा ने अपने चीफ ए के चतुर्वेदी से की तो उन्होने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। निशा का आरोप है कि चतुर्वेदी साहब तक ने उनसे अश्लील बातें कर डाली। निशा ने पीएमओ से शिकायत की। लेकिन

जब इंसाफ मिलता नहीं दिखा तो हारकर निशा ने पीएमओ यानि साउथ ब्लॉक के अंदर जहर खाकर अपनी जान देनी चाही। पीएमओ में आत्महत्या की कोशिश से प्रधानमंत्री कार्यालय तक हिल कर रह गया।

जब इंसाफ मिलता नहीं दिखा तो हारकर निशा ने पीएमओ यानि साउथ ब्लॉक के अंदर जहर खाकर अपनी जान देनी चाही। पीएमओ में आत्महत्या की कोशिश से प्रधानमंत्री कार्यालय तक हिल कर रह गया। फिर क्या था...मीडिया तक बात पहुंच गई। अंतर्राष्ट्रीय अखबारो तक में ये मामला सुर्खियों में छा गया है। निशा ने मीडिया के सामने अपने विभाग का काला चिठ्ठा खोल कर रख दिया। जिस महकमें में मीडिया (प्रेस) से बात करने तक पर सजा मिलती है, उसके अंदर चल रहे यौन शोषण के मामले ने तूल पकड़ लिया। चतुर्वेदी साहब को जबाब देना भारी पड़ रहा है। पहले दिन तो पीएमओ ने बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी कि
निशा की दिमागी हालत ठीक नहीं है और उनकी शिकायत पर एक जांच कमेटी बिठाई गई थी लेकिन खुद निशा ने जांच में सहयोग नहीं दिया।
अब इसका बात का जबाब किसी के पास नहीं है कि दिमागी तौर से बीमार एक महिला को रॉ ट्रैनिंग इस्टीटयूट का डायरेक्टर कैसे बना दिया गया। इस घटना के दो दिन बाद ही निशा का तबादला गुड़गांव ट्रेनिग सेंटर से हेडक्वार्टर में कर दिया गया। निशा को ये बात नागवार गुजरी कि जिन अधिकारियों के खिलाफ उन्होंने शिकायत की अब उन्हीं के साथ एक ही छत के नीचे वो कैसे काम कर सकतीं है। अब निशा ने ऑफिस जाना बंद कर दिया है।
निशा का ये भी आरोप है कि जब उसने ए के चतुर्वेदी और एक अन्य अधिकारी के खिलाफ पुलिस मे (यौन शोषण) की शिकायत करानी चाही तो पुलिस अधिकारियों ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया। साफ है जिस हेडक्वार्टर के अंदर कोई पुलिसवाला भी नहीं जा सकता उसके चीफ के खिलाफ कोई पुलिसवाला कैसे पंगा ले सकता है। हारकर अब निशा भाटिया अदालत का दरवाजा खटखटाने का विचार बना रही है।
सवाल ये खड़ा होता है कि रॉ जैसी गुप्तचर एजेंसी में ये सब क्या हो रहा है? गोपनीयता के नाम पर वहां महिला जासूसों को क्या इसी तरह प्रताड़ित होना पड़ता है? क्या यही वजह है कि हमारे देश के जासूस आतंकवाद और दूसरी समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुंच पा रहें हैं। क्या यही वजह है कि दूसरे देश के जासूस हमारे देश में आकर आराम से खुफिया जानकारी चुरा कर ले जाते है और रॉ को पता तक नहीं चलता है। क्या इस देश में कोई रॉ जैसी खुफिया एजेंसियों से कोई सवाल-जबाब नहीं कर सकता है। प्रधानमंत्री क्यो इस मामलें पर चुप्पी साधें हुये है।
लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब रॉ विवादों में रही है। करीब दस साल पहले रॉ के एक अधिकारी की उनके नोएडा स्थित फ्लैट में हुई रहस्यमय मौत की गुत्थी आजतक नहीं सुलझी है। बताते है कि ललित मोहन अपने घर में अकेले थे और सिगेरट पी रहे थे। कुछ देर बाद उनके बाथरुम से धुआं उठता दिखाई दिया। पुलिस मौके पर पहुंची तो देखा कि ललित मोहन की जली हुई लाश बाथरुम में पड़ी है।
खुद जिस रॉ हेडक्वार्टर में बिना इजाजत के परिंदा भी पर नहीं मार सकता है उसके अंदर करीब पांच साल पहले लिफ्ट में फंस कर एक सीनियर अधिकारी, विपिन हांडा की मौत हो गई थी। गौरतलब है कि विपिन हांडा मौत से दो महीने पहले ही पाकिस्तान सरकार के विरोध के चलते इस्लामाबाद स्थित हाई कमिशन (दूतावास) से वापस बुलाये गये थे।

रॉ अधिकारी रबिन्द्र कुमार को कौन भुला सकता है। वे तो बाकयदा रॉ में रहते हुये अमेरिका के लिये जासूसी करते थे। जैसे ही ये खबर विभाग को लगी और पुलिस उन्हें पकड़ पाती, वर्ष 2004 में वे विदेश भाग गये।

रॉ अधिकारी रबिन्द्र कुमार को कौन भुला सकता है। वे तो बाकयदा रॉ में रहते हुये अमेरिका के लिये जासूसी करते थे। जैसे ही ये खबर विभाग को लगी और इसे पहले की पुलिस उन्हे पकड़ पाती, वर्ष 2004 में वे विदेश भाग गये। खबर है कि वे इनदिनों अमेरिका के सरकारी मेहमान बन गये है। हद तो तब हो गई जब एक बांग्लादेशी अपनी पहचान (दीवान चंद मलिक) छिपाकर दस सालों तक रॉ के लिये काम करता रहा। हमारी खुफिया एजेंसी को उसकी असलियत तब पता चली जब वो कुछ महत्वपूर्ण और गोपनीय दस्तावेज लेकर बांग्लादेश भाग गया। दीवान चंद मलिक के खिलाफ दिल्ली के लोदी कालोनी थाने में मामला दर्ज है और उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया है।
इन सब कारनामों के बाबजूद रॉ को पसंद नहीं है कि कोई उनके बारे में बात करे या लिखे। यही वजह थी कि वर्ष 2007 में जब एक पूर्व रॉ अधिकारी, मेजर जनरल (रिटायर्ड) वी के सिंह ने रॉ पर किताब (India's External Intelligence: Secrets of Research and Analysis Wing R&AW) लिख डाली तो बवाल मच गया। उनके घर पर सीबीआई की रेड डाली गई। उनके किताब जब्त कर ली गई। वी के सिंह पर OFFICIAL SECRET ACT के तहत मामला दर्ज कर दिया गया।
निशा भाटिया स्कैंडल ने रॉ की साख पर बट्टा लगा दिया है जिसे धो पाने में हमारे देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी को एक लंबा वक्त लग सकता है। जरुरत है देश के जासूसों का मनोबन ऊंचा रखने की। क्योंकि जिस दिन हमारे देश के जासूसों का मनोबल गिरा तो समझो देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। हमारा देश को तो पहले से ही आंतकवाद और सीमापार घुसपैठ से दो-चार होना पड़ा रहा है। ऐसे में खुफिया एजेंसियां बजाय इन विवादों में पड़ने के अपना काम ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और एकाग्रता से करे। और हां किसी महिला (खासतौर से तलाकशुदा) की इज्जत से खिलवाड़ बिल्कुल ना करे।

6 टिप्‍पणियां:

राजेश कुमार ने कहा…

नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है।

sushant jha ने कहा…

good article...

विचार ने कहा…

कम से कम जासूसी में तो सेक्स जैसी बातों की कोई अहमियत नहीं होनी चाहिए, इसे जासूसी का महा हथियार माना जाता है. सेना और गुप्तचर विभागों की नैतिकता सिविलियन सोसाइटी से काफी अलग होती है. अगर एक जासूस मौका आने पर बेशर्म नहीं बन सकता तो वो कुछ भी नहीं कर सकता. ओढी हुई नैतिकता का सेना और गुप्तचर सेवाओ में कोई काम नहीं.

मछुआरा बनना है पर मछलियों की गंध अच्छी नहीं लगती................... यू नो, आई हेट फिश स्टिंक! बट आई डू वांट टू वर्क ऑन अ फिशिंग वेसल.

अब इनके लिए सुगन्धित मछलियाँ पानी में छोड़ी जायें. इतनी ही नैतिकता का ख्याल था तो जासूसी जैसी अनैतिक सेवा में क्यों आयीं जहाँ छोटा सा काम निकलवाने के लिए कई विश्वासघात, हत्याएं और भी न जाने की क्या पाप करने पड़ते हैं. और फ़िर एक अनुभवी और नैतिक महिला के लिए कोर्पोरेट दुनिया के दरवाजे हर समय खुले हैं.

बेनामी ने कहा…

कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं है
जरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों...
आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का

दीप चन्द्र शुक्ल ने कहा…

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं है.. जरा तबीयत से इक पत्थर तो उछालो यारों.. क्या बात है आप खुद ही कहते हैं कि रॉ के बारे में किसी को कोई जानकारी नही है.. उसके अंदर कोई परिंदा पर भी नहीं मार सकता... और खुद ही उसकी तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग के जरिए आम कर रहे हैं..बढ़िया है..बहुत ही बढ़िया तरीका है किसी की बखिया उधेड़ने का.. खैर आपने बढ़िया लिखा है इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है।

नारदमुनि ने कहा…

bahs jari rahe

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)