11 अक्तूबर, 2008

आरटीआई वाला हत्यारा


तिहाड़ जेल में बंद एक बलात्कारी, सूचना के अधिकार (यानि आरटीआई) को हथियार बनाकर दिल्ली पुलिस की खाट खड़ी करनी की तैयारी में जुटा था। वो अपने आप को बेगुनाह साबित करने के लिये एक आम शहरी की ही तरह राजधानी दिल्ली के कश्मीरी गेट थाने से आरटीआई के तहत एक जानकारी इकठ्ठा करना चाहता था। लेकिन जबतक उसे सूचना प्राप्त होती, वो बलात्कारी के साथ-साथ बन गया तीन बेकसूर लोगों का हत्यारा।
तिहाड़ जेल में बंद था राजधानी के मोतिया खान इलाके का एक प्रॉपर्टी डीलर के के सेठ। इल्ज़ाम था एक मासूम लड़की की अस्मत लूटने का। इस गुनाह में अपने पति की सहभागी बनने वाली के के सेठ की पत्नी, उषा को भी जेल भेजा गया था। लिहाजा दोनों पति पत्नी जेल की सलाखों के पीछे ही थे कि एक दिन के के सेठ अखबार के पन्ने पलट रहा था कि उसकी नजर एक इश्तेहारे-शोरे-गोगा (अपील) पर पड़ी। कश्मीरी गेट थाने ने अखबार में एक अज्ञात महिला की लाश की पहचान के लिये जनता से मदद मांगी थी। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक उस महिला के हाथ पर ‘वजीरो’ लिखा था। यानि महिला का नाम (वजीरो) तो पुलिस को पता था लेकिन उसके अलावा पुलिस को उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उसकी लाश कुछ दिनों पहले कश्मीरी गेट बस अड्डे के पास एक बक्से में पड़ी मिली थी। तब से ही पुलिस उस महिला की पहचान और उसके कातिल को तलाश कर रही थी।

जेल में बंद के के सेठ ने जैसे ही पुलिस के विज्ञापन को पढ़ा, वो बलात्कार के मामले में खुद को बेगुनाह साबित करने में जुट गया। के के सेठ ने पुलिस से आरटीआई के तहत मामले की तफ्तीश के बारे में पता करने की कोशिश की।

जेल में बंद के के सेठ ने जैसे ही पुलिस के विज्ञापन को पढ़ा, कि बलात्कार के मामले में खुद को बेगुनाह साबित करने में जुट गया। के के सेठ ने पुलिस से आरटीआई के तहत मामले की तफ्तीश के बारे में पता करने की कोशिश की। पहली बार तो पुलिस ने उसकी अपील ये कहते हुये खारिज कर दी कि वजीरो नाम की महिला के हत्यारों का कोई अता-पता नहीं चला है। लेकिन के के सेठ कहां चुप बैठने वाला था। उसके कुछ महीनों बाद एक बार फिर आईटीआई लगा दी पुलिस के आला-अधिकारियों के दरबार में। इस बार पुलिस ने के के सेठ से पूछताछ करने का मन बनाया। सो पहुंच गये तिहाड़ जेल कि भई उसे इस अज्ञात लाश की तफ्तीश में इतनी दिलचस्पी क्यों है ? के के सेठ ने बताया कि जिस वजीरो नाम की महिला की लाश कश्मीरी गेट इलाके में पड़ी मिली है, उसी की बेटी के बलात्कार के इल्जाम में ही वो जेल में हवा खा रहा है। उसने बताया कि जिस शख्स ने वजीरो की हत्या की है उसी ने वजीरो की बेटी की आबरु लूटी है। उसने अपने बेगुनाह होने की दलील भी पुलिस के सामने रख दी। इस खुलासे के बाद तो मानों पुलिस को वजीरो की हत्या की तफ्तीश में दिशा मिलती दिखाई पड़ी।
पुलिस अब वजीरो की बेटी की तलाश में जुट गई। पता चला कि वजीरो की बेटी इनदिनों अपने पति के साथ हरियाणा के रेवाड़ी शहर में रहती है। वजीरो की बेटी ने जो कुछ बताया, उसके आधार पर पुलिस ने कड़ी से कड़ी मिलानी शुरु कर दी।
पूरा मामला शीशे की तरह साफ हो चुका था। पुलिस ने जिस शख्स की मदद से वजीरो की हत्या का मामला खोल दिया था वही था कत्ल का असल हत्यारा यानि कि के के सेठ। पुलिस ने वजीरो और उसके दो मासूम बेटो की हत्या के आरोप में भी के के सेठ को गिरफ्तार कर लिया। पूरा मामला कुछ यूं था...
राजधानी के सीलमपुर इलाके में वजीरो नाम की एक गरीब महिला अपने नाबालिग बेटी और दो बेटों के साथ रहती थी। पेट भरने के लिये चारो बंग्लासाहिब गुरुद्वारे जाते थे। एक रोज उनकी मुलाकात प्रॉपर्टी डीलर के के सेठ और उनकी पत्नी उषा से हुई। दोनों ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में वजीरो को फंसा लिया और अपने घर ले आए। एक दिन वजीरो की बेटी सो कर उठी तो उसने पाया कि उसकी मां और दोनो भाई घर पर नहीं हैं।

लड़की ने अपनी मां और भाईयों के बारे में के के सेठ और उषा से पता किया, तो दोनों ने बताया कि वजीरो ने उसे 75 हजार रुपये में बेच दिया है।

लड़की ने अपनी मां और भाईयों के बारे में के के सेठ और उषा से पता किया, तो दोनों ने बताया कि वजीरो ने उसे 75 हजार रुपये में बेच दिया है। और मां और भाई उसे छोड़कर वहां से चले गए हैं। इसके बाद तो मानों वजीरो की बेटी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। के के सेठ उससे जबर्दस्ती करता। लेकिन एक दिन वजीरो की बेटी किसी तरह उसके चंगुल से भाग खड़ी हुई और पुलिस को पूरा मामला बताया। पुलिस ने के के सेठ और उसकी पत्नी उषा को बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस के मुताबिक, के के सेठ ने अपनी हवस की आग बुझाने से पहले वजीरो और उसके दो मासूम बेटों का भी कत्ल कर दिया था। दोनों बच्चों की लाश को उसने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ट्रैक पर फेंक दी थी। वजीरो की लाश को उसने बक्से में बंद कर कश्मीरी गेट बस अड्डे पर फेंक दी थी। उसके बाद के के सेठ ने वजीरो की बेटी को बेचने की झूठी कहानी सुना दी।
जब पुलिस ने वजीरो की लाश के बारे में अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कराया, तो के के सेठ अपनी बेगुनाही साबित करने पर जुट गया। वो पुलिस को ये मानने के लिये मजबूर करने लगा कि वजीरो का कातिल वही है जिसने उसकी बेटी का बलात्कार किया है। वजीरो की बेटी ने उसे गलत फंसाया है। यानि वजीरो की बेटी की इज्जत उसने नहीं लूटी है। लेकिन पुलिस की कड़ी पूछताछ में के के सेठ टूट गया और अपना गुनाह कबूल कर लिया।
दिल्ली पुलिस भी मानती है कि अगर के के सेठ ने आरटीआई नहीं लगाई होती तो उन्हें वजीरो और उसके दो मासूम बेटों के हत्यारे का कभी पता नहीं चलता। यानि आरटीआई आम लोगों के लिये ही कारगार साबित नहीं हुई है पुलिस को भी एक मामले की गुत्थी सुलाझाने में एक अहम सुराग के तौर पर साबित हुई है।

1 टिप्पणी:

Sachin Agarwal ने कहा…

A very interesting post on RTI.

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)