23 नवंबर, 2008

सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल-गर्ल


पुलिस-वैन से उतरने के अंदाज से ही लगता था कि वो कोई आम लड़की नहीं है। दर्जनों पुलिसवालों की कस्टडी में वो उतरी तो चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। बल्कि बड़े रौब के साथ वैन से उतरकर चली तो मीडिया और वकीलों का जमावड़ा देखकर वो मुस्कुरा रही थी। अखबार और टी.वी चैनल के कैमरे जब उसकी एक झलक लेने के लिये बेताब थे तो वो पुलिसवालों से कहती सुनाई दी, “क्या कर रहे हैं ये ?” दर्जनों कैमरे, पत्रकारों, वकीलों और पुलिसवालों की मौजूदगी में उसे अदालत में पेश किया गया तो हर किसी की जुबान पर उसकी ही चर्चा थी। “अरे भाई साहब, क्या वाकई ये लड़की दिल्ली का सबसे बड़ा कॉल-गर्ल रैकेट चलाती है,” एक वकील ने पूछा। दूसरे ने कहा, आजकल इसका किससे ‘लफड़ा’ चल रहा है? सुना है चार-चार बदमाशों से इसने शादी की थी।
करीब एक साल पहले जब सोनू पंजाबन नाम की उस कॉल गर्ल को अपनी तीन साथियों के साथ प्रीत विहार इलाके से पकड़ा गया था तो उसका चेहरा ढका हुआ था। लेकिन इस बार (21 नबंबर 2008) जब उसे राजधानी दिल्ली के पॉश साकेत इलाके से गिरफ्तार किया गया और बाद में अदालत में पेश किया गया तो उसे छोड़कर बाकी सभी लड़कियों का चेहरा ढका हुआ था।
साफ था अब सोनू पंजाबन कॉल-गर्ल मात्र नहीं थी। अब वो बन गई है जिस्मफरोशी के धंधे की एक बड़ी दलाल (कहना गलत ना होगा कि, सबसे बड़ी दलाल)। बड़ी दलाल इस मायने में क्योकिं उसके साथ दस और दलाल गिरफ्तार किये गये हैं। सोनू पंजाबन को मिलाकर कुल पंद्रह लोग (चार कॉल-गर्ल और दस दलाल)।

दिल्ली पुलिस की मानें तो ये दस दलाल अब सोनू पंजाबन के लिये काम करते थे। यानि अब वो बन गई है “दलालों की दलाल”।

दिल्ली पुलिस की मानें तो ये दस दलाल अब सोनू पंजाबन के लिये काम करते थे। यानि अब वो बन गई है “दलालों की दलाल”। एक साल में इतनी तरक्की शायद ही किसी धंधे में हो। और वो भी 30 साल की एक लड़की को। सुनकर हैरानी जरुर होती है।
हरियाणा के रोहतक जिले की रहने वाली गीता अरोड़ा नाम की ये लड़की कभी जिस्मफरोशी और गुनाह की दुनिया की इतनी बड़ी खिलाड़ी बन जाएगी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। लेकिन ये हकीकत है। करीब पांच साल पहले गीता अरोड़ा का नाम उस वक्त सामने आया था, जब दिल्ली के एक व्यापारी की लाश उसकी ही गाड़ी में रोहतक के बहादुरगढ़ इलाके में पड़ी मिली थी। जांच में पाया गया कि उस व्यापारी को एक कॉल-गर्ल ने ही बहादुरगढ़ बुलाया था। लेकिन पुलिसिया जांच में वो खूबसूरत बाला आसानी से पाक साफ निकल गई। कहते है कि वो कॉल-गर्ल कोई और नहीं खुद गीता अरोड़ा थी। उसके बाद से गीता गुमनामी की जिंदगी बीता रही थी। इसी बीच उसकी दोस्ती रोहतक के एक बदमाश विजय से उसकी हो गई। कहते हैं कि दोनों ने शादी भी कर ली थी। लेकिन बदकिस्मती से विजय जल्द ही यूपी पुलिस के हाथों मारा गया। इसके बाद गीता की दोस्ती हुई दिल्ली-हरियाणा के एक बदमाश दीपक से। दीपक और उसका भाई हेमंत दिल्ली और आस-पास के इलाकों में कार चोरी करते थे। लेकिन कार चोरी करते-करते वे दोनों कब एक कुख्यात गैंग के सरगना बन गये किसी को कानों-कान खबर नहीं लगी। पुलिस पीछे पड़ी तो दीपक असम भाग गया, लेकिन एक मुठभेड़ में वो भी वहीं ढ़ेर हो गया।
दीपक के छोटे भाई, हेमंत सोनू को जब ये पता चला कि उसके भाई की मुखबरी दिल्ली के ही दो भाईयों ने की थी, तो उसने दिन-दहाड़े दोनों भाईयों का कत्ल कर दिया। इस दोहरे हत्याकांड के बाद तो हेमंत सोनू दिल्ली के गुनाह की दुनिया का बेताज बादशाह बन गया। इसके साथ-साथ हेमंत ने अपने भाई की महबूबा गीता अरोड़ा को भी अपना लिया। कुछ लोग तो यहां तक मानते है कि हेमंत ने गीता से शादी रचा ली थी (हालांकि जब गीता से पकड़े जाने पर ये सवाल पूछा गया तो वो इस बात से साफ मुकर गई) हेमंत के साथ गीता भी दिल्ली आ गई। यहां

हेमंत के संरक्षण में गीता का जिस्मफरोशी का धंधा चल निकला। अब गोरी चमड़ी के इस धंधे में लोग उसे सोनू पंजाबन (‘सोनू’, हेमंत सोनू की वजह से और ‘पंजाबन’ उसकी जाति, अरोड़ा की वजह से) बुलाने लगे।

हेमंत के संरक्षण में गीता का जिस्मफरोशी का धंधा चल निकला। अब गोरी चमड़ी के इस धंधे में लोग उसे सोनू पंजाबन (‘सोनू’, हेमंत सोनू की वजह से और ‘पंजाबन’ उसकी जाति, अरोड़ा की वजह से) बुलाने लगे। पहले दीपक और अब हेमंत सोनू से नजदीकियों के चलते सोनू पंजाबन धीरे-धीरे गुनाह की दल-दल में भी फंसती जा रही थी। उसने दिल्ली में सक्रिय जिस्मफरोशों के बड़े दलालों (कंवलजीत, अंकित धीर, रितिका ठाकुर) को किनारे लगाना शुरु कर दिया। कुछ दलालों (जैसे बॉबी हिजड़ा) को उसने अपने खेमें मे शामिल कर लिया।
सोनू पंजाबन ने अब लड़कियों को अपने यहां काम पर रख लिया। इन लड़कियों को वो ग्राहक के पैसो में हिस्सा नहीं देती थी, बल्कि उन्हें एक मुश्त सैलेरी देती थी। यूं कहे तो

उसके काम करने का तरीका बिल्कुल कॉर्पोरेट स्टाइल तो था ही उसने इस धंधे को एक तरह से संगठित अपराध (ORGANISED CRIME) की शक्ल दे दी थी।

उसके काम करने का तरीका बिल्कुल कॉर्पोरेट स्टाइल तो था ही उसने इस धंधे को एक तरह से संगठित अपराध (ORGANISED CRIME) की शक्ल दे दी थी। उसके धंधे में लड़कियों साथ-साथ लड़के भी नौकरी पर रख लिया। हर किसी का काम बंटा हुआ था। कोई लड़कियों को एस्कार्ट करता था, तो कोई उनका ड्राइवर बनकर उन्हे बड़े-बड़े ग्राहकों के पास छोड़कर आता था। सोनू का बिजनेस चल निकला। पुलिस के मुताबिक वो एक ग्राहक से एक रात के पांच हजार से लेकर पचास हजार तक वसूलती है।
सोनू अपने धंधे को बढ़ा ही रही थी कि अचानक हेमंत सोनू को वर्ष 2006 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गुड़गांव में बड़े ही नाटकीय अंदाज में ढेर कर दिया। हेमंत के मारे जाने के बाद सोनू पंजाबन ने उसके ही गैंग के दूसरे सदस्य (और अब मुखिया) अशोक उर्फ बंटी का हाथ थाम लिया। लेकिन इसे इत्तेफाक कहेंगे या कुछ और कि दो महीने बाद ही बंटी में राजधानी के दिलशाद गार्डन इलाके में पुलिस के हत्थे मुठभेड़ में मारा गया।
एक के बाद एक सोनू पंजाबन के चार बदमाश दोस्त मारे जा चुके थे। अब तो हर किसी की जुबान पर यही चर्चा थी कि सोनू पंजाबन ही इन चारों बदमाशों के मारे जाने की वजह बनी है। दिल्ली पुलिस में ये बात जोरों पर थी कि इन सभी बदमाशों की मुखबरी सोनू पंजाबन ने ही की थी। लेकिन क्यों?
कुछ लोगों की माने तो सोनू ये सब दो कारणों से करती थी। पहला, बदमाशों के मारे जाने के बाद उनकी लाखों की बेनामी संपत्ति की मालकिन खुद सोनू पंजाबन बन जाती थी। इस वक्त सोनू पंजाबन के नेब सराय, गीता कालोनी और कुछ दूसरे इलाकों में फ्लैट है। दूसरी वजह ये कि बदमाशों की मुखबरी कर वो पुलिस से हाथ मिलाना चाहती थी। खैर हकीकत जो भी हो सोनू पंजाबन की बदमाशों से दोस्ती और उनके पुलिस के हाथों मारे जाने के चलते लोग उसे ‘विष-कन्या’ का खिताब देने से भी नही चूकें।

2 टिप्‍पणियां:

वर्षा ने कहा…

सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज़ क्यों कर दिया गया है, क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए।

KANISHKA KASHYAP ने कहा…

There are two things, i would love to mention here!
1/ There was a man, intutive, inventive and ingenuous.. he was clever enough in his gaunere. he belonged to a far off remote area, completel untouched from urban life style.once there clicked a idea to him... it was about desingning a vehicle somewhat similar to bicycle.. . he worked day in day out , before he succeeded designing one such rural model. where a rope was working as chain and bamboo sticks as spikes etc.
someone suggested him to visit nearbycity and show his invention to urban people. he managed to carry himself to the town with bycycle on his back. when he reached the market.. a man recieved him with a motorcycle...

hope u understand the theme.

2. the options you have proposed to pick out means almost same.
what about if i suggest it rubbish.

ClickComments

जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)