
आशुतोष गोवारिकर की बहुप्रतिक्षित फिल्म जोधा-अकबर आखिरकार रिलीज हो ही गई। फिल्म बनने से पहले ही चर्चित हो गई थी, या यूं कहें कि विवादों में पड़ गई थी। चर्चा में आने की कई वजह हैं। पहली बात तो ये कि इस फिल्म के डायरेक्टर आशुतोष है, सो चर्चित होना तो लाजिमी था। दूसरी बात ये कि इस फिल्म में एक बार फिर ‘धूम’ मचाने आ रही थी बॉलीवुड की हिट जोड़ी—ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय (बच्चन)। तीसरा ये कि मल्लिका-ए-हुस्न ऐश्वर्या कि शादी के बाद ये पहली फिल्म थी। और भी कई कारण है इस फिल्म के चर्चित होने के। जैसे ये एक ऐतिहासिक फिल्म है। हिन्दुस्तान (या ये कहे कि दुनिया) के सबसे शक्तिशाली और करिश्माई बादशाहों में से एक सम्राट अकबर की सच्ची दास्तान पर आधारित है या फिल्म...वगैरहा-वगैरहा।
लेकिन इन्ही खूबियों में ही छिपा है इस फिल्म का विवादों के पचडे में पड़ना। दरअसल, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर एक रियल लाईफ करैक्टर है। मरने के सैकडों साल बाद भी लोग उसकी धर्मनिरेपक्षता को याद करते हैं।
धर्मनिरेपक्षता ही क्यों, उसकी हिन्दुस्तान को एक धागे में पिरोकर रखने की क्षमता, महिलाओं को बराबरी का अधिकार, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी, भूमि सुधार, जैसे उसके कदम ऐसे हैं जो आनी वाली पीढ़ी, राजाओं और व्यवस्था के लिये मील के पत्थर साबित हुये।
धर्मनिरेपक्षता ही क्यों, उसकी हिन्दुस्तान को एक धागे में पिरोकर रखने की क्षमता, महिलाओं को बराबरी का अधिकार, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी, भूमि सुधार, जैसे उसके कदम ऐसे हैं जो आनी वाली पीढ़ी, राजाओं और व्यवस्था के लिये मील के पत्थर साबित हुये। भारतीय इतिहास में (चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर 21 वी सदी तक) सम्राट अशोक को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा राजा होगा जो किसी भी मायने में अकबर का मुकाबला कर सकता हो।अकबर को करीब से पढ़ने और समझने वाले लोग तो उसे देवीय शक्ति से परिपूर्ण मानते हैं। ये बात अकबर के नवरत्न या दरबारी नही बल्कि आज के जमाने के इतिहासकार तक मानते हैं। भारत के ही एक आधुनिक इतिहासकार ने अकबर पर इतनी रिर्सच की थी जितनी शायद ही किसी ने की होगी। अकबर पर लिखी उनकी किताबों को ‘आईन-ए-अकबर’ से किसी भी मायने में कम नहीं समझा जाता है। कहते हैं कि जब वो इतिहासकार मृत्युशय्या पर पड़े थे तो उन्हे आखिरी बार अकबर के दर्शन हुये थे।
अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े, वो चिल्लाने लगे कि ‘जिल्ले-ईलाही’ यानि मुगल बादशाह अकबर उन्हे लेने आये हैं। उन इतिहासकार के लिये अकबर एक इंसान नही बल्कि देवता थे।
अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े, वो चिल्लाने लगे कि ‘जिल्ले-ईलाही’ यानि मुगल बादशाह अकबर उन्हे लेने आये है। उन इतिहासकार के लिये अकबर एक इंसान नही बल्कि देवता थे। जिन लोगों ने अकबर को पढ़ा नहीं है, उन्हे ये बात हिंदी फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की तरह लगेगी। याद है ना किस तरह से इस मुंबइया फिल्म में अपने मुन्ना भाई (संजय दत्त) को गांधीजी ‘दर्शन’ देते थे।पहली बार मैने अकबर के बारे में कॉलेज में पढ़ा कि जोधाबाई, अकबर की पत्नी नही पुत्रवधु है। पढ़कर बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योंकि उससे पहले तक ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म में दिखाई गई कहानी को ही हकीकत मानते थे। लेकिन जैसे-जैसे इतिहास पढ़ते गये, ये बात समझ में आ गई कि जोधा, अकबर के बेटे जहांगीर की पत्नी थी।
पहली बार मैने अकबर के बारे में कॉलेज में पढ़ा कि जोधाबाई, अकबर की पत्नी नही पुत्रवधु है। पढकर बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योकि उससे पहले तक ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म में दिखाई गई कहानी को ही हकीकत मानते थे। लेकिन जैसे-जैसे इतिहास पढ़ते गये, ये बात समझ में आ गई कि जोधा, अकबर के बेटे जहांगीर की पत्नी थी।जब आशुतोष गोवारिकर की फिल्म जोधा-अकबर रिलीज होने वाली थी तब मुझे जरुर आश्चर्य हुआ कि एक बार जो गलती हो गई थी—मुगल-ए-आजम—के वक्त उसे क्यों दुहराया जा रहा है। उसके बाद से ही भारत के कुछ राजपूत संगठन लामबंद हो गये और उतर आये सड़कों पर। जगह-जगह विरोध-प्रर्दशन हो रहे हैं। फिल्म को कई राज्यों में रिलीज नही किया गया। मैं एक राजपूत होते हुये भी ऐसे किसी भी तरह के प्रर्दशनों का समर्थन नही करता हूं। वैसे मैं हर तरह के विरोध-प्रर्दशन और हड़ताल (बंद, चक्काजाम ,इत्यादि) के सख्त खिलाफ रहता हूं।

जानकारों का मानना है कि इस गड़बड़-झाले के पीछे फतेहपुर सीकरी के गाईड़ जिम्मेदार हैं। दरअसल फतेहपुर सीकरी (आगरा के करीब वो शहर जो कभी अकबर की राजधानी हुआ करता था) में अकबर का किला है। इस किले का एक हिस्सा जोधा-महल के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इस महल में मुगल राजाओं की हिंदु रानियां रहा करती थीं। शायद, जहांगीर की पत्नी जोधा भी इसी महल में रहती होगी और इस महल का नाम जोधा-महल पड़ गया। फिर क्या था यहां के गाईडस ने जोधा को अकबर की पत्नी बताना शुरू कर दिया।
अब बात आशुतोष गोवारिकर की फिल्म से। ये फिल्म मैने अभी तक नहीं देखी है। लेकिन प्रोमो देखकर ये जरुर लग रहा है कि इस फिल्म का नाम ‘हरका-अकबर’ होना चाहिये था। जानते हैं क्यों ?
आमेर (जयपुर) के कछवाहा राजपूत, राजा भारमल की बेटी थी हरका। मुगल सत्ता पर काबिज होने के करीब छह साल बाद (यानि 1562 में) अकबर एक बार अपने लावो-लश्कर के साथ अजमेर की दरगाह शरीफ से लौट रहा था। रास्ते में उसकी मुलाकात राजा भारमल से हुई। भारमल ने शिकायत की मेवात का मुगल हाकिम (गर्वनर) उन्हे आये-दिन परेशान करता रहता है। उनसे मनमाना चौथ वसूलता है। कहते है,
अकबर ने भारमल को अपने ही मुलाजिम से मुक्ति दिलाने के लिये दो शर्तें रखीं। पहली, राजा भारमल खुद उसके कैंप पर आकर अपनी बात (मिन्नत करे) रखे यानि नतमस्तक हो। दूसरा ये कि वो अपनी बेटी हरका की शादी उससे कर दें।
अकबर ने भारमल को अपने ही मुलाजिम से मुक्ति दिलाने के लिये दो शर्ते रखी। पहली, राजा भारमल खुद उसके कैंप पर आकर अपनी बात (मिन्नत करे) रखे। दूसरा ये कि वो अपनी बेटी हरका की शादी उससे कर दें। उस वक्त अकबर की उम्र महज़ बीस साल थी। ऐसा माना जाता है कि अकबर की हरका से पहले ही कही मुलाकात हो चुकी थी और उसकी खूबसूरती का कायल होकर दिल दे बैठा था।हरका से शादी के बाद तो अकबर ने कई राजपूत राजकुमारियों से शादी रचाई। बीकानेर के राजा की बेटी, काहन, जोधपुर की एक राजकुमारी से, एक रोहिल्ला राजकुमारी रुकमावती...। राजपूत घराने में शादी रचाने की परपंरा अकबर के बेटे सलीम उर्फ जहांगीर ने भी जारी रखी। खुद अकबर ने ही अपने बेटे सलीम की शादी जोधपुर के राजघराने की बेटी जगत गोसाई (जो असलियत में जोधाबाई का नाम था) से बड़ी धूम-धाम से कराई थी। लेकिन ऐसा नहीं है कि हिंदुस्तान में अकबर पहला मुस्लिम राजा था जिसने हिंदु लड़कियों से शादी रचाई थी। उससे पहले अलाउद्दीन खिलजी, दक्षिण के बाहमनी राजा फिरोज शाह, गुजरात के मुहम्मद शाह सहित कई मुस्लिम राजाओं ने हिंदु रानियों से विवाह किया था। लेकिन
अकबर ने हिंदु (खासतौर से राजपूत) राजघरानों में शादी को अपनी ‘राज-नीति’ बनाया था।
इन शादियों से अकबर एक बड़े साम्राज्य को एक सूत्र में बांधने में कामयाब हो पाया।
राजपूत कौम का हमेशा ध्यान रखना, क्योंकि ना तो वे (राजपूत) कभी कानून तोड़ते हैं और ना ही कभी आज्ञा का उल्लंघन करते है। वे तो सिर्फ आज्ञा का पालन करते है और अपना (वफादारी का) फर्ज निभाते हैं।
राजपूत कौम का हमेशा ध्यान रखना, क्योकि ना तो वे (राजपूत) कभी कानून तोड़ते हैं और ना ही कभी आज्ञा का उल्लंघन करते हैं। वे तो सिर्फ आज्ञा का पालन करते हैं और अपना (वफादारी का) फर्ज निभाते हैं।” गुजरात को कूच करते वक्त तो अकबर ने आमरे के राजा मान सिंह को ही आगरा (सत्ता का केंद्रबिंदु) की गद्दी का रखवाला घोषित कर दिया था। यहां तक की मान सिंह को और उनके परिवार के दूसरे सदस्यों को हरम (राजघराने की रानियों के रहने की जगह) की भी जिम्मेदारी सौंपी गई थी—जो कभी भी किसी मर्द के हवाले नहीं की जाती थी। दूर-दराज के कई विद्रोह कुचलने में भी राजपूत राजाओं ने अह्म भूमिका निभाई थी। अकबर का साम्राज्य काफी बड़ा था। इसलिये आये-दिन दूर-दराज के हाकिम अपने को स्वतंत्र घोषित कर देते थे। ऐसे में अकबर, राजपूतों के सिवाय किसी पर विश्वास नहीं कर पाता था। यहां तक की अपने बेटे सलीम पर भी वो इतना भरोसा नहीं करता था। क्योकि खुद सलीम ने भी एक बार अपने पिता के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था।राजपूत घरानो से रिश्ते बनाकर अकबर अपने प्रजा में एक सदेंश देना चाहता था। वो दिखाना चाहता था कि क्या हिंदु और क्या मुसलमान, उसके लिये सभी बराबर हैं। राजपूत राजाओं के लिये भी ये घाटे का सौदा नहीं था। अपने किलों में आराम से बिना किसी डर के रह सकते थे। यहां ये बात दीगर है कि राजस्थान में अकबर के कब्जे से पहले ये सभी राजपूत राजा आपस में लड़ते रहते थे। उनकी ताकत आपस में लड़ते-लड़ते खत्म हो गई थी। राजस्थान के मेवाड़ राज्य के महाराणा प्रताप को छोड़कर हरेक राजा अकबर के सामने नत-मस्तक हो चुका था। मुगल घराने से रिश्ता जोड़ने पर राजपूत राजाओं के बेटे और रिश्तेदारों को राजदरबार में ऊंचा ओहदा भी दिया जाता था। राजदरबार में ऊंचे ओहदे का मतलब होता था, रुतबे के साथ-साथ एक आलीशान जिंदगी और एक बड़ी सेना उसके हवाले।
खैर, मध्यकालीन से अब आधुनिक भारत की तरफ लौटते हैं। जो राजपूत संगठन जोधा-अकबर के खिलाफ विरोध-प्रर्दशन कर रहे हैं, उनका इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का विरोध तो जायज़ है लेकिन रास्ता गलत है। वैसे इतिहास पर आधारित फिल्म बनाने में यही मुश्किल सामने आती है। संतोष सीवान निर्देशित और शाहरुख खान स्टारर ‘अशोक’ में भी कई तथ्यों को सही से पेश नहीं किया गया था। लेकिन उस फिल्म को क्यों नही विरोध हुआ, ये अपने-आप में आश्चर्य की बात है। शायद इस वजह से की क्योंकि इस फिल्म में किसी जाति या धर्म के लोगो की भावनायें सीधे तौर से आहत नहीं हुई थी। ‘जोधा-अकबर’ में एक जाति-विशेष से जुड़ा मामला था। यानि अगर फिल्म का नाम ‘हरका-अकबर’ होता तो ये बबाल ही नहीं होता। लेकिन निर्माता-निर्देशक भी पैसा कमाने के लिये ही फिल्म बनाते है। उन्हे मालूम था कि लोगो के जेहन में सुपर-हिट फिल्म मुगल-ए-आजम के जोधा-अकबर समाये हुये हैं। बस उन्हे कैश करने की देरी थी। चाहे उसके लिये इतिहास के पन्नों को ही क्यों ना बदल दिया जाये।




