15 फ़रवरी, 2009

ब्रह्माण्ड का क्रूरतम मानव

अदालत ने जैसे ही अपना फैसला सुनाया, वो नरपिशाच बोल उठा, “मुझे ऑर्डर की कॉपी चाहिये।” किसी को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि मौत की सजा के ऐलान के बाद भी उसके तेवर ढीले नहीं पड़ेंगे। लेकिन अदालत में मौजूद सभी लोगों को समझ आ गया था कि अदालत ने उसे ब्रह्माण्ड का सबसे खतरनाक व्यक्ति ऐसे ही नहीं मान लिया है। कुछ घंटे पहले चली जिरह में सीबीआई के वकील ने उसे तीन ऐसी गुणों से ग्रस्त बताया था जो साइंस में आजतक देखने को नहीं मिला है। वो पैराफिलिया यानि साईको सैक्सयुल डिसऑर्डर, नैकरोफिलिया यानि शवों से शारारिक संबध की प्रवृत्ति और पीडोफीलिया (बच्चों से दुराचार) से ग्रस्त है। इस प्रकार का मामला पूरे यूनिवर्स में पहली बार देखनें को मिला है। कोई आदमी किसी एक से ग्रस्त होता है तो कोई किसी एक से। लेकिन सुरेन्द्र कोली तीनों से पीड़ित है।
निठारी कांड के दोनों दोषियों, नोएडा की डी-5 कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर और उसके नौकर सुरेन्द्र कोली, को गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने सुना दी है मौत की सजा।
फैसला सुनाते समय अदालत ने निठारी कांड को कुछ यूं बयां किया...
“...एक ओर तो मानवता, विधि की सुरक्षा कि पुकार कर रही है और दूसरी ओर एक निर्धन बालिका (निठारी की रहने वाली 14 साल की रिंपा हलधर जिसकी डी-5 कोठी में हत्या कर दी गई थी) के परिजन न्याय सम्मत न्यायालय से हवशी, गिद्धों से सुरक्षा के लिये चिल्ला रहे हैं और अपील कर रहें हैं कि उन्हें इस प्रकार के भूखे, वहशी, दरिंदो की भूख से बचाया जाए तथा यातनाओं एंव अमानवीयताओं से बचाये जाए, जो अबोध बालिकाओं को अपनी हवस का शिकार करने के लिये प्रयोग करते थे। रिंपा हलधर एक अबोध बालिका अभियुक्तगढ (पंढेर और कोली) के हाथों का शिकार बन गई है। दुखद, कारुणिक, रोंगटे खड़े करने वाली, दिल को तोड़नें वाली तथा धड़कनों को रोकने वाली तथा चेतना को भंग करने वाली तथा समाज की दुर्दशा करने वाले असुरक्षित, असहाय और निर्दोष, निर्धन, 14 वर्ष की अल्प आयु की अबोध बालिका की कहानी है। जिसको कम आयु में अभियुक्तगढ द्वारा उसे अपनी हवस का शिकार बनाया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई और यह सिलसिला यही नहीं थमा बल्कि उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर पॉलीथीन की पन्नियों में बंद कर फेंका गया और शरीर के कुछ हिस्से के मांस को पकाकर खाया भी गया। यह अपराध समाज के विरुद्व, स्त्रीत्व के विरुद्व, गरीबों के विरुद्व और संविधान के कल्पित सभी पीढ़ियों के विरुद्व अपराध है। यह सामाजिक न्याय शास्त्र की धारणा के साथ दिन-दहाड़े बलात्संग है।

यह घटना समाज पर एक कलंक है और हमारी वर्तमान पीढ़ी पर दाग है, अमानवीय और बर्बर, विकृत, राक्षसी, वीभत्स और निर्दय ढंग से किया गया है, जिससे कि समाज में तीव्र एंव घोर आक्रोश उत्पन हो गया है। अत: मामला विरल से विरल मामलों (RAREST OF THE RARE ) की कोटि में आता है

यह घटना समाज पर एक कलंक है और हमारी वर्तमान पीढी पर दाग है, अमानवीय और बर्बर, विकृत, राक्षसी, वीभत्स और निर्दय ढंग से किया गया है, जिससे कि समाज में तीव्र एंव घोर आक्रोश उत्पन हो गया है। अत: मामला विरल से विरल मामलों (RAREST OF THE RARE ) की कोटि में आता है, जिससे अभियुक्तगढ के साथ उदारता का व्यवहार करना समाज एंव विधि के न्याय संगत सिद्वान्तों से खिलवाड़ करना होगा। जिस प्रकार अभियुक्तगढ द्वारा अपराध किया गया है उन्हे गुरुतर शास्ति ही दी जानी चाहिये क्योकि भविष्य में उनके आचरण में सुधार की कोई गुजांईश प्रतीत नहीं होती...।” इसलिये अदालत दोनो को मृत्यु दंड की घोषणा करती है।
कोर्ट का ऑर्डर पढकर साफ समझ में आ जाता है कि सुरेन्द्र कोली क्यों दुनिया का सबसे क्रूर व्यक्ति है।
निठारी कांड अब से करीब दो साल पहले, दिसम्बर 2006,में दुनिया के सामने आया था।
राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर के बीचो-बीच बसा एक छोटा से गांव है निठारी। स्थानीय लोगों के साथ-साथ बड़ी तादाद में यहां मजदूर, रिक्शाचालक और निम्न आयवर्ग के लोग इस गांव में रहते है। बाहरी लोगों में अधिकतर बंगाल के रहने वाले हैं। वर्ष 2005 से ही यहां एक के बाद एक कई बच्चे गायब होने लगे। निठारी गांव को नोएडा के सेक्टर 31 से जोड़ने वाली सड़क से ही बच्चे रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो जाते। मां-बाप परेशान थे कि बच्चे आखिर कहां चले जाते है। अधिकतर बच्चे गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे, सो पुलिस भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। लाचार मां-बाप को सुना पड़ता कि उनके बच्चे कही भाग गये होंगे, चोर गिरोह के हाथ पड़े गये होंगे, या भीख मांगने वाला गिरोह उठाकर ले गया होगा... जो बच्चियां थोड़ी बड़ी होती (जैसे रिंपा हलधर, पायल वगैरहा) उनके बारे में पुलिस दलील देती कि वो अपने आशिक के साथ कहीं भाग गई होंगी।

मामलें ने तूल पकड़ा तो मीडिया में लगातार खबरें आने लगी। स्थानीय अखबारों और न्यूज चैनलों ने निठारी प्रकरण को जोर-शोर से उछाला तो तब जाकर यूपी पुलिस कुंभकर्णी नींद से जागी। मानवाअधिकार आयोग और महिला आयोग ने कान खीचें तो बच्चों के गायब होने की तफ्तीश तेज हुई, लेकिन तब तक अकेले निठारी से ही डेढ़ दर्जन बच्चे काल के गाल में समा चुके थे।
नोएडा पुलिस को तफ्तीश का कोई सिरा हाथ नहीं आ रहा था कि अचानक एक दिन पुलिस को पता चला कि 16 साल की पायल नाम की लड़की जो गायब हुई है वो मोबाइल फोन प्रयोग करती थी। फिर क्या था पुलिस ने उस मोबाइल की आईएमईआई नंबर से उसकी लोकेशन पता कि तो मालूम पड़ा कि वो डी-5 कोठी में चालू था। डी-5 निठारी को नोएडा के सेक्टर 31 से जोड़ने वाली सड़क पर ही स्थित एक आलीशान कोठी थी (अब ये कोठी वीरान पड़ी है। चौबीसो घंटे पुलिस का पहरा रहता है कोठी पर)। कोठी का मालिक था नोएडा का एक बड़ा बिजनेसमैन, मोनिंदर सिंह पंधेर। पंधेर की पत्नी चंडीगढ, और बेटा कनाडा में रहता था। कोठी की देखभाल करता था उसका नौकर सुरेन्द्र कोली। फोन की लोकेशन मिलते ही पुलिस पहुंच गई डी-5 कोठी। वैसे पुलिस पहले भी कई बार उस कोठी में पूछताछ करने पहुंची थी लेकिन हरबार खाली हाथ लौट आती थी। लेकिन लगातार पड़ रहे दबाब के चलते इस बार पुलिस ने सुरेन्द्र कोली को अपने साथ लिया और सख्ती से पूछताछ की तो उसने पायल की हत्या की बात कबूल कर ली। सुरेन्द्र ने बताया कि पायल, मोनिंदर सिंह पंधेर से मिलने कोठी आती थी। एक दिन उसने पायल के साथ जोर-जबर्दस्ती की और नाकाम होने पर उसकी गला घोटकर हत्या कर दी। हत्या करने के बाद उसकी लाश के टुकड़े कोठी के ठीक पीछे बनी एक गैलरी
में फेंक दिये हैं। पुलिस कोठी के पीछे बनी गैलरी में पहुंची तो पाया कि वहां पायल ही नहीं दर्जनो बच्चो और लड़कियों की मानव अंग और कपड़े दबे हुये है।
लेकिन यहां बात गौरतलब है कि

निठारी के पीड़ितो को जैसे ही गैलरी के रहस्य के बारे में पता चला उन्होंने सबसे पहले मीडिया को खबर की और कैमरे की मौजदूगी में मानव अंगो की बरामदगी हुई। निठारी पीड़ितो की माने तो अगर 29 दिसम्बर 2006 को वहां मीडिया नहीं पहुंची होती तो डी-5 कोठी के राज से पर्दा कभी नहीं उठा पाता।

निठारी के पीड़ितो को जैसे ही गैलरी के रहस्य के बारे में पता चला उन्होने सबसे पहले मीडिया को खबर की और कैमरे की मौजदूगी में मानव अंगो की बरामदगी हुई। निठारी पीड़ितो की माने तो अगर 29 दिसम्बर 2006 को वहां मीडिया नहीं पहुंची होती तो डी-5 कोठी के राज से पर्दा कभी नहीं उठा पाता। पुलिस पायल के हत्या का मामला दर्ज कर केस फाईल वही बंद कर देती। लेकिन मीडिया की मौजदूगी की वजह से पुलिस को अपनी जांच का दायरा बढाना पड़ा और निठारी कांड का खुलासा हुआ।
नोएडा पुलिस ने सुरेन्द्र कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर को तो गिरफ्तार कर लिया था लेकिन ये बताने में नाकाम थी कि आखिर ये दोनों हत्या किस कारण से करते थे। पुलिस मानव-अंगो की तस्करी से जोड़कर इस मामले की तफ्तीश कर रही थी। आखिरकार लोगों के आक्रोश के चलते मामले की जांच का जिम्मा देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानि सीबीआई को सौंपा गया। पांच महीने तक सीबीआई जांच करती रही और आखिरकार इस नतीजें पर पहुंची कि सुरेन्द्र कोली ही बच्चों, लड़कियों और महिलाओ को डी-5 कोठी के गेट के बाहर खड़ा होकर अंदर बुलाता था और उनसे जोर-जबर्दस्ती करता था। नाकाम होने पर उनकी बड़ी ही बेरहमी से हत्या कर देता था। लाश के टुकड़े कर उन्हें पकाता और फिर खा लेता। बाकी बची लाश के टुकड़े कर पन्नी में भरकर नालों और कोठी के पीछे बनी गैलरी में फेंक देता।
मैजिस्ट्रेट के सामने कैमरे पर दिये अपने बयान में सुरेन्द्र कोली ने बताया कि, “

जब मैडम (यानि मोनिंदर सिंह की पत्नी) घर पर नहीं होती थी तो पंधेर रोजाना कॉल-गर्ल लाता था...जितनी भी लड़की वहां आती थी मै उनके लिये खाना बनाता था, खिलाता था। उनको देख-देखकर मेरा मन भी बहक जाता था। मन करता था कि किसी को मारुं, काटूं खाओ...

जब मैडम (यानि मोनिंदर सिंह की पत्नी) घर पर नहीं होती थी तो पंधेर रोजाना कॉल-गर्ल लाता था...जितनी भी लड़की वहां आती थी मैं उनके लिये खाना बनाता था, खिलाता था। उनको देख-देखकर मेरा मन भी बहक जाता था। मन करता था कि किसी को मारुं, काटूं खाओ...”
सीबीआई के मुताबिक निठारी कांड को अंजाम अकेले कोली ने ही दिया था। मोनिंदर का दोष सिर्फ इतना था कि वो कोठी में कॉल-गर्ल लाता था। यही वजह थी कि सीबीआई ने कोली पर तो अपहरण, बलात्कार, हत्य़ा और सबूत मिटाने का चार्ज लगाया, लेकिन पंधेर पर वैश्यावृति में लिप्त होने का मामूली से आरोप लगया। इस बात से निठारी पीड़ितो के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा। उन्होने सीबीआई पर गंभीर आरोप लगा डाले। अदालत में उन्होंने अपना वकील खड़ा कर दिया। निठारी पीड़ितों के वकील, खालिद खान ने अदालत में दलील दी कि सुरेन्द्र कोली और मोनिंदर सिंह पंधेर दोनो ही बराबर के कसूरवार है, लिहाजा दोनों पर हत्या और बलात्कार का मुकदमा चलना चाहिये। कोर्ट ने खालिद खान की दलीलों को मंजूरी दे दी।
करीब दो साल बाद अदालत ने मोनिंदर और कोली को बराबर का दोषी ठहराया और सुना दिया मौत का ऐलान।
ये शायद पहला ऐसा मामला होगा कि जब अदालत ने सीबीआई की जांच को दरकिनार करते हुए अपनी जांच के आधार पर मोनिंदर को दोषी करार दिया है। जांच में सीबीआई ने लाख दलील दी थी कि मोनिंदर का कोई कसूर नहीं है। जिस वक्त रिंपा हलधर और बाकी बच्चो और लड़कियों हत्या की हई थी उस वक्त वो नोएडा तो क्या देश में ही नहीं था। उसके पासपोर्ट तक को अदालत के पटल पर रखा गया। लेकिन

अपने फैसले मे अदालत ने सीबीआई की फटकार लगाते हुये कहा कि जांच एजेंसी को ये साबित करने की जरुरत नहीं है कि पंधेर नोएडा में नहीं था। ये काम आरोपी का है कि वो खुद साबित करे कि वारदात के वक्त वो मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था।

अपने फैसले मे अदालत ने सीबीआई की फटकार लगाते हुये कहा कि जांच एजेंसी को ये साबित करने की जरुरत नहीं है कि पंधेर नोएडा में नहीं था। ये काम आरोपी का है कि वो खुद साबित करे कि वारदात के वक्त वो मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था। लेकिन पंधेर की पत्नी के सिवा ऐसा कोई स्वतंत्र गवाह नहीं मिला जो ये कह सके कि रिंपा हलधर की हत्या के वक्त पंधेर आस्ट्रेलिया में था। अदालत ने ये भी माना कि ऐसा कैसे संभव है कि कोठी में रहते हुये एक के बाद एक 19 लोगों की हत्या कर दी गई और मालिक को पता ही ना चले। साथ ही साथ लाशों की दुर्गंध भी क्या पंधेर को नहीं आती थी। खुद अदालत ने माना है कि एकाध केस में तो ऐसा भी देखने को आया है कि पंधेर की मौजूदगी में ही कोली ने किसी मासूम की हत्या कोठी में की है। साथ ही साथ पंधेर इस बात से पूरी तरफ वाकिफ था कि पायल का मोबाइल फोन कोली प्रयोग कर रहा है। क्या पंधेर ने कोली से कभी नहीं पूछा कि उसपर पायल का फोन कहां से आया है। ये सारे सबूत पंधेर के खिलाफ साबित हुये और उसे भी अपने नौकर की तरह मौत की सजा का ऐलान झेलना पड़ा।
सजा सुनाये जाने के बाद पंधेर ने अपने बेटे से ये भी कहा कि वो हाईकोर्ट में अपील ना करे, “ वो मर जाना चाहता है। ” लेकिन दुनिया का सबसे क्रूरतम व्यक्ति (सुरेन्द्र कोली) जीना चाहता है। फैसला आते ही उसने कोर्ट स्टाफ से कहा, उसे फैसले की कॉपी चाहिये। जब तक आर्डर की कॉपी नहीं मिलेगी वो अदालत से बाहर नहीं जाएगा। कोर्ट स्टाफ ने समझाया कि ऑर्डर की कॉपी उसके वकील को मिल जायेगी। तब जाकर वो अदालत से बाहर जाने (जेल जाने) के लिये तैयार हुआ।

6 टिप्‍पणियां:

सुजीत कुमार ने कहा…

neeraj bhai aapne adalat ke phaisle ko parah aur aap es khabar ko shuru se cover karte rahe ho, isleye aapke writeup me aapki pakar dikh rahi hai.aur bilkul sahi ki ye brahamand ka sabse kruratam manav hai, shayad inke liye ye saj kam hai.agar esse bhi koi bari saza hoti to wo milni chahiye thi.

Udan Tashtari ने कहा…

वाकई, कोली ब्रह्माण्ड का क्रूरतम मानव साबित हुआ. आभार इस विस्तृत रिपोर्ट के लिए.

Mired Mirage ने कहा…

जब भी अदालतें जल्दी निर्णय देती हैं तो उसका लाभ यह होता है कि लोग अपराध व उसकी सजा को अच्छे से जोड़कर देख पाते हैं। यदि यही निर्णय १० साल बाद दिया जाता तो मामला लोगों के स्मृति पटल से निकल चुका होता।
घुघूती बासूती

संदीप शर्मा Sandeep sharma ने कहा…

पंधेर और कोली के बारे में खुछ जानकारी तो थी, पर आपकी रिपोर्ट वाकई सनसनीखेज है... उन दोनों के लिए मौत की सज़ा कम है...

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

क्षमा चाह्ता हूँ. मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूँ. इनसे भी ज़्यादा क्रूर नरपिशाच हैं दुनिया में. वे जो इन्हें संरक्षण देते हैं और जो इनके टुकडों पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के मानवाधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने वाले आतंकियों के मानवाधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ़ राजनेता ही नहीं हैं, कायपालिका, न्यायपालिका और यहाँ तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

इतने स्पष्ट केस में भी सीबीआई और पुलिस द्वारा द्वारा सक्षम और अजेय मुकद्दमा न बनाने के प्रयासों के बीच यह निर्णय एक सुखद मोड़ है. देखें आगे क्या होता है?

ClickComments

जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)