16 फ़रवरी, 2009

राजपूतों की उत्पत्ति

एक चर्चित रियलिटी शो, M.TV ROADIES में इनदिनों प्रतियोगियों को राजस्थान के प्रसिद्ध हिल स्टेशन, माउंट आबू के दर्शन कराए जा रहें हैं। या यूं कहें कि उनकी प्रतियोगिता अब वही चल रही है। अगर आपने शो देखा होगा तो आसानी समझ आ ही गया होगा कि माउंट आबू पर्यटकों को इतना लोकप्रिय क्यों है। अरावली पहाड़ियों के बीच बनी नक्खी झील, ऐतिहासिक (और अद्वितीय) दिलवाड़ा जैन मंदिर, ब्रह्मकुमारी आश्रम का हेडक्वार्टर, सन-सेट प्वाइंट (सूर्यास्त दर्शन स्थल), गुरु शिखर (राजस्थान और अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची पहाड़ी) और हनीमून प्वाइंट पर्यटकों को अपनी और अनायास ही खींच लेती है। राजस्थान-गुजरात बार्डर पर बना ये छोटा सा हिल स्टेशन इतना खूबसूरत हो सकता है ये मुझे वहां जाकर ही पता चला। कुछ दिन पहले ही मैं भी अपनी पत्नी के साथ छुट्टी मनाने माउंट आबू गया था। जितने भी पर्यटक स्थल मैने अभी बतायें हैं वो सभी मुझे वहां जाने से पहले भी पता थे। जिस हेरिटज होटल (केसर भवन पैलेस) में हम ठहरे थे वहां के जनरल-मैनेजर से मेरी जान-पहचान हो गई थी। उन्हें जैसे ही पता चला कि मैं राजपूत हूं, वे बोल उठे, “अगर आप राजपूत है तो गऊ-मुख जरुर घूम कर आईए।” मैने पूछा, वो क्या है ? जबाब देने से पहले जीएम साहब ने एक सवाल और दाग दिया कि मैं कौन सा राजपूत हूं। मैने बताया कि मै चौहान राजपूत हूं। उन्होंने बताया, “चौहान राजपूतों की उत्पत्ति गऊ(या 'गौ') मुख आश्रम में ही तो हुई थी।” जीएम साहब ने बताया कि गौ-मुख में ही महर्षि वशिष्ठ का प्राचीन आश्रम है जहां उन्होने अग्निकुल यज्ञ किया था और राजपूतों की उत्पत्ति हुई थी। उनके इतना कहते ही मेरे अंदर बसा इतिहास का छात्र जाग उठा। याद आया कि

चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब Annals and antiquities of Rajasthan में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी।

चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब Annals and Antiquities of Rajasthan में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी। 12वीं सदी में लिखी गई चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो में भी इस यज्ञ का वर्णन है। इतिहास की पढ़ाई के वक्त सब रटा था, लेकिन अब ध्यान नहीं रहा था कि अग्निकुल यज्ञ इसी जगह हुआ था। मैने उन्हें बताया कि हम वहां जरुर जायेंगे। लेकिन उन्होंने पहले ही आगाह कर दिया कि वहां ध्यान से जायेंगा, “खतरनाक जगह है।”
जिस टैक्सी ड्राइवर ने हमे पूरा माउंट आबू घूमाया था, जब मैने उससे गऊमुख(गौमुख)चलने के लिये कहा तो वो चौंक गया। बहानें बनानें लगा, “सर वहां मत जाइए... जगंली रास्ता है... कोई नहीं जाता वहां... सैकड़ों सीढ़ियां चढनी-उतरनी पड़ेंगी।” कहने लगा, वहां आदिवासी भी रहतें है, अकेला देखकर लूट लेते हैं। मैंने पूछा आदिवासी ? जी सर, वे राजाओं की अवैध संतान होती थी, जन्म के बाद उन्हे यहां छोड़ दिया जाता था। उनकी आंखे सुनहरी होती है। लेकिन हम ठान चुके थे, वही जायेंगे। आखिरकार ड्राइवर को मानना पड़ा, लेकिन बोला कि सर मैं आपको बाहर ही छोड़ दूंगा, आपके साथ आश्रम नहीं जाऊंगा। माउंट आबू शहर से तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर है वशिष्ठ आश्रम। लोग इसे गौमुख के नाम से जानते है। सामने ही बोर्ड लगा था, उसपर पूरे आश्रम का इतिहास और राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन था। जिस जगह टैक्सी ने हमें छोड़ा था वहां से हमें खाई में 750 सीढ़ियां उतरनी थी (लौटने पर इतनी ही चढ़नी थी)। कुछ कदम ही चले थे कि एक परिवार आता दिखाई दिया। हमें देखकर वो सभी मुस्करायें और कहा “हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं।” मैंने पूछा कि क्या वे सभी बीच रास्ते से ही लौट आये हैं, तो उन्होंने कहा कि इतने खतरनाक जंगली रास्ते पर अकेले जाना ठीक नहीं है। मेरी पत्नी को अब कुछ शंका होने लगी, बोली कि वहां जाना सुरक्षित है ? मैने कहा, डरो नहीं चलो। वाकई हम दोंनों के और एक नये नवेले पति-पत्नी के जोड़े के सिवा हमें रास्ते में कोई नहीं मिला। रास्ता बेहद खतरनाक था। लिखा हुआ था, "जंगली जानवरों से सावधान।" लेकिन जब हम वहां पहुंचे तो वहां का नजारा देखते ही बनाता था। बेहद शांत और रमणीक दृश्य था वहां का। आश्रम के बाहर ही एक पवित्र कुंड है। एक गाय के मुख से उस कुंड में लगातार जल गिर रहा था। उस कुंड के पास ही एक स्थानीय शख्स बैठा था। उसने बताया था कि ये पवित्र सरस्वती की धारा है और बारह महीनें जल की धारा ऐसी ही चलती रहती है। ये धारा कभी बंद नहीं हुई है। “बड़े-बड़े इंजीनियर भी आजतक इस जल का स्त्रोत्र पता नहीं कर पाए।

आश्रम के अंदर भगवान राम का मंदिर है। रामायण में बताया गया है कि इक्ष्वाकु वंश (जिसके राम वंशज थे) के गुरु महर्षि वशिष्ठ ही थे। वशिष्ठ ऋषि के पास ही नंदिनी गाय थी जिसे छीनने के लिये राजा विश्वामित्र (बाद में महर्षि) ने उनसे युद्ध किया था। महाभारत में भी जिक्र है कि नारद मुनि ने धर्मराज युधिष्ठर को अरबुदाचल पर्वत की तीर्थ-यात्रा करने का निर्देश दिया था । पुराण और शास्त्रों के मुताबिक अरबुदाचल पर्वत हिमालय का पुत्र था और महर्षि वशिष्ठ के आग्रह पर हिमालय ने अपने पुत्र को यहां भेज दिया था। शायद यही वजह है कि रेगिस्तान में भी पर्वत श्रृंखला खड़ी हो गई। बाद में इसी अरबुदाचल पर्वत को लोग आबू के नाम से जानने लगे। मध्यकालीन युग में ये जगह अगर राजाओं के लिये पवित्र तीर्थ-स्थल था तो ब्रिटिश काल में ये जगह राजस्थान के छोटे-बड़े राजाओं और अंग्रेज अफसरों के लिये गर्मियां बिताने की खास जगह। माउंट आबू में राजस्थान के हर राज-घरानें का महल है जिन्हे अब हेरिटज होटलों में तब्दील कर दिया गया है। जिस केसर भवन पैलेस में हम ठहरें थे, वो कभी सिरोही राजाओं का महल था। माउंट आबू, राजस्थान के सिरोही जिले का ही हिस्सा है। भगवान राम के मंदिर के बाहर ही है पवित्र अग्निकुंड। मंदिर और आश्रम के एक केयर-टेकर ने बताया कि इसी यज्ञकुंड से ही चार राजपूत जातियों की उत्पत्ति हुई थी। जब भारतवर्ष में चारों तरफ मार-काट मची थी, अशांति फैली हुई थी, कानून का कोई राज नहीं था, कोई चक्रवर्ती राजा नहीं बचा था, तब महर्षि वशिष्ठ नें महायज्ञ किया था। अग्नि की स्तुति करके सबसे पहले देवराज इंद्र की पूजा की। यज्ञ करते समय अग्नि में से तलवार लियें एक पराक्रमी निकला। वो परमार वंश का संस्थापक बना। उसके बाद भगवान विष्णु का आह्ववाहन किया गया तो उसमें से चौहान वंश का संस्थापक निकला। इसी तरह से भगवान शिव से सोलंकी और ब्रह्मा से प्रतिहारों की उत्पत्ति हुई।

इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी।

इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। आधुनिक इतिहासकार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल यज्ञ के बाद से तो मानते हैं लेकिन इस बात पर यकीन नहीं करते कि चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार अग्नि से उत्पन्न हुए हैं। इतिहासकार इस यज्ञ को एक तरह के शुद्धिकरण की तौर पर देखते है। पहली बात तो अगर हजारों साल पहले भगवान राम के समय में भी वशिष्ठ मुनि थे, तो वे क्या सैकड़ो साल तक वे जिंदा रहें इस यज्ञ को करने के लिये। इसका जबाब शायद ये है कि ऋषि मुनियों में गुरु-शिष्य पंरपरा चलती थी। एक ऋषि की मौत के बाद उसका एक शिष्य गुरु की गद्दी पर आसीन होता था और उसे भी अपनी गुरु की भांति वही नाम मिल जाता था। इतिहासकार, महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ को मध्ययुग के नवी-दसवी काल में देखते है। ये वो समय था जब भारत में अरबों ने आक्रमण करना शुरु कर दिया था। गुप्तवंश के राजाओं और हर्षवर्धन के बाद पूरे देश में कोई पराक्रमी राजा ना बचा था। ये वही वक्त था जब महमूद गजनी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत को लूटता हुआ पश्चिमी मुहाने पर बने प्राचीन सोमनाथ मंदिर तक पहुंच गया था। उसने वहां लूटपाट और तबाही का वो मंजर खेला था कि आज भी लोग सुनकर सिहर उठते हैं। हिंदु समाज में लोगो की रक्षा करने वाले क्षत्रियों का पतन तेजी से हो रहा था। पहले वैश्य राजा (गुप्त वंश) और फिर हुण और शक राजाओं (उन्हें नीची जाति का माना जाता था) के हाथों सत्ता चले जाने से ब्राहमण और क्षत्रिय समाज परेशान था। शायद इसका ही नतीजा था अग्निकुल यज्ञ। इस यज्ञ के बाद पूरे उत्तर भारत में चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार वंश का ही राज हो गया। प्राचीन आश्रम के द्वार पर ही मध्यकालीन युग के कुछ शिलालेख रखें हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि राजाओं ने दान स्वरुप कई गांव इसी आश्रम को दियें थें। जो मंदिर आज के स्वरुप में खड़ा है वो भी सन् 1394 में बनाया गया था। करीब दो घंटे आश्रम में बितानें के बाद जैसे ही हम बाहर निकले हमने देखा कि चार-पांच संदिग्ध लोग वहां टहल रहें थे। मैने गौर से देखा तो एक शख्स की आंख सुनहरी थी-होटल के जीएम और ड्राइवर की बात याद आ गई। मेरी पत्नी ने मुझे अलर्ट रहने का इशारा किया। वो समझ गई थी कि कुछ गड़बड़ है, उसे शायद खतरे का एहसास हो गया था (क्राइम रिपोर्टर जो है)। मुझे भी खतरें का अंदेशा तो था लेकिन मैं इसलिये चुप था कि कही मेरी पत्नी डर ना जायें। लेकिन इससे पहले कि वो चार-पांच लोग कुछ कर पाते या कुछ प्लानिंग कर पाते, मैं उनके पास पहुंच गया। पूछा, “ यही के रहने वाले हो क्या ?” ये सुनते ही वे सभी सकपका गये। कहने लगें, नहीं साहब हम गुजरात से आये है। मैने रोबदार आवाज में पूछा, “ गुजरात में कहां?” इतना कहते ही वे सभी बगलें झाकनें लगे। लेकिन हमारा काम हो गया था। मै समझ गया कि आश्रम से लौटते हुए सुनसान जंगली रास्ते पर वे अब हमें नहीं टकरायेंगे। अब मेरी समझ में आ गया था कि माउंट आबू के दर्शनीय स्थलों में गौमुख और वशिष्ठ आश्रम का नाम क्यों नहीं है। खैर, हम 750 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच चुके थे। वहां ड्राइवर खड़ा इंतजार कर रहा था। उसने पूछा, सर कोई दिक्कत तो नहीं हुई ? मैने कहा नहीं। शायद जो थोड़ी बहुत दिक्कत या परेशानी हमने झेली थी वो गौमुख के दर्शन मात्र के सामने बहुत छोटी जो थी।

13 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

मन प्रसन्न करा दिया आपने!

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

ऑफिस जाने की जल्दी हो रही है इसलिए लेख सरसरी तौर पर ही पढ़ा है ! बुकमार्क कर लिया है शाम को फुर्सत में पढ़कर कमेन्ट करूँगा |

अल्पना वर्मा ने कहा…

bahut silselwar dhang se aap ne yah vivran diya hai.kafi kuchh samjh aa gaya.picture bhi manbhavan hain.
dhnywaad.

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

सुबह जल्दबाजी में आपका ये लेख नही पढ़ पाया था | बहुत अच्छी जानकारी दी आपने,मेरा भी दो बार माउंट आबू जाना हुआ था लेकिन इस स्थान के बारे में पता ही नही चला इसलिए न जाने का मलाल ही रह गया | दूसरी बार तो एक स्थानीय व्यक्ति भी साथ थे लेकिन उन्होंने ने भी इस स्थान का जिक्र नही किया वरना जरुर जाते |

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

राजपूतो का इतिहास पढ़ कर आनन्द आया या कहे गर्व महसूस हुआ . अग्निवंशी हो आप इसलिए अपने उदगम तक पहुच गये . कभी और वंशो पर भी रौशनी डालिए

इत्तफाक..... .......... ने कहा…

mai is par aek khabr kar chuka hun dhrm ke liye aaj tak par "raam ka gurkul" ..

Sanjeev Kumar Singh ने कहा…

राजपूत का इतिहास पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई. हम भी प्रतिहार राजपूत है इसलिए हमें तो बहुत ही ज्यादा ठीक लगा भविष्य में हम वह जायेंगे. इतनी अच्छी जानकारी के लिए कोटि-२ धन्यवाद

Sanjeev Kumar Singh ने कहा…

राजपूत का इतिहास पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई. हम भी प्रतिहार राजपूत है इसलिए हमें तो बहुत ही ज्यादा ठीक लगा भविष्य में हम वह जायेंगे. इतनी अच्छी जानकारी के लिए कोटि-२ धन्यवाद

संजीव कुमार सिंह

Narpat Singh Dahiya ने कहा…

jaha tak mera manna hai achacha likha hai

Suresh ने कहा…

क्‍या परमार ह‍ि अब पवार कहलाते हैं पवार वशं के बारे में भी लिखें।

Suresh ने कहा…

क्‍या परमार ह‍ि अब पवार कहलातें है पवार वशं के बारे में भी लिखें ।

govind singh parmar ने कहा…

सुरेश जी परमार का अपभ्रंश पंवार है इसलिए परमार और पंवार एक ही है |

Kishan Rajput ने कहा…

sir,
mera name kishan singh solanki he. muje aesab pata tha lekin me is prakar likh nahi sakata hu is liye kaya me ap ki post ko facebook me shere kar shakta hu ....

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)