22 फ़रवरी, 2009

हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है


हिंदू रीतिरिवाज के मुताबिक महिलाएं अपने सुहाग के प्रतीक के रुप में सिंदूर लगाती हैं। लेकिन राजस्थान का एक इलाका ऐसा है जहां महिलाएं सिंदूर नहीं मिट्टी लगाती हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि कहने को तो ये मिट्टी पीली है लेकिन रंग इसका लाल है। ये इलाका है हल्दीघाटी का।
झीलों के शहर, उदयपुर से महज 40-45 किलोमीटर की दूरी पर है हल्दीघाटी। चारों तरफ ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और बीच में एक सूनसान घाटी। इस घाटी का नाम यहां के रंग के कारण पड़ा था। पहले इस घाटी का रंग बिल्कुल पीला था—एक दम हल्दी के सामान। लेकिन पिछले 400 सालों से ये घाटी लाल है। इसी घाटी की मिट्टी से यहां की महिलाएं अपनी मांग भरती हैं।
सन् 1576 में मुगल सम्राट अकबर और मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के बीच इसी जगह हल्दीघाटी का ऐतिहासिक (और घमासान) युद्ध हुआ था। इतिहासकारों के मुताबिक एक ही दिन में इस युद्ध में करीब 18 हजार सैनिक मारें गए थे। इस घाटी में इतना खून बहा था कि हल्दीघाटी, पीली के बजाय लाल हो गई थी। यही वजह है कि हल्दीघाटी (बाहर से) देखने में तो पीली दिखाई पड़ती है लेकिन अगर मिट्टी को थोड़ा सा खुरेचा जाए तो वो लाल दिखाई पड़ती है।

मेवाड़ राज्य के अंतर्गत ही आती है इतिहास प्रसिद्ध ये रणस्थली, यानि हल्दीघाटी। मेवाड़ राज्य का क्षेत्रफल आज के उदयपुर, चित्तौड़गढ और भीलवाड़ा जिलों तक फैला था। इतिहास में वैसे तो मेवाड़ राज्य ने कई सूरमा राजा पैदा किए, लेकिन इन सबमें अग्रणी स्थान है महाराणा प्रताप का। महाराणा प्रताप ही पूरे राजपूताना (राजस्थान) के अकेले ऐसे राजा थे जिन्होनें मुगलों की गुलामी नहीं की थी। मुगलकाल में राजस्थान दर्जनों छोटे-बड़े राज्यों (मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, आमेर आदि) में विभाजित था। मुगल सम्राट अकबर पूरे वृहत भारत का राजा बनने का सपना देखता था। उसने राजपूत घरानों से शादी करके या फिर उन्हें हराकर पूरे राजस्थान को अपने कब्जे में कर लिया था। लेकिन मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप को ये कतई बर्दाश्त नहीं था। फिर क्या था अकबर ने राजपूत सेनापति मानसिंह (जयपुर घरानें) के नेतृत्व में एक विशाल सेना मेवाड़ की और कूच कर दी। उस वक्त मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ हुआ करती थी। लेकिन युद्ध के लिये जगह चूनी गई चित्तौड़गढ़ से डेढ सौ किलोमीटर दूर हल्दीघाटी।



मुगल सेना के सामने मेवाड़ की सेना कुछ नहीं थी, लेकिन अपनी छापेमार शैली (गुरिल्ला स्टाइल) से महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिये।

मुगल सेना के सामने मेवाड़ की सेना कुछ नहीं थी, लेकिन अपनी छापेमार शैली (गुरिल्ला स्टाइल) से महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिये। लेकिन अचानक महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा, चेतक घायल हो गया। घायल अवस्था में ही चेतक पांच किलोमीटर दूर तक महाराणा प्रताप को लेकर रणभूमि से भाग निकला। जिस जगह चेतक ने अपने प्राण त्यागे, उस जगह उसकी याद में महाराणा ने एक स्मारक बनाया था—जो आज भी मौजूद है।

राजस्थान सरकार ने इस रणभूमि को पर्यटन स्थल घोषित कर रखा है। हर रोज बड़ी तादाद में लोग यहां बने म्यूजियम (महाराणा प्रताप म्यूजियम) को देखने आते हैं—हल्दीघाटी को कम लोग देखते हैं। इस म्यूजियम में हल्दीघाटी, महाराणा प्रताप की वीरता और वनवासी जीवन, चेतक की बहादुरी और छापेमार शैली (गौरिल्ला युद्ध) पर लाईट एंड साउंड शो दिखाया जाता है। इसके साथ-साथ म्यूजियम में मध्यकालीन अस्त्र-शस्त्र, अलग-अलग जातियों के वेश-भूषा और साहित्य को संजोकर रखा गया है। महाराणा प्रताप के वक्त तक मेवाड़ राज्य की राजधानी चित्तौड़गढ और कुंभलगढ़ थी। लेकिन सौगंध खाने के बाद महाराणा ने अपनी राजधानी को त्याग दिया। सौगंध थी कि जबतक वे मुगल सेना को मेवाड़ से खदेड़ नहीं देते तबतक ना तो बिस्तर पर सोएंगे और ना ही रोटी खाएंगे। मुगल सेना को आखिरकार वहां से अपना बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ा, लेकिन महाराणा प्रताप फिर कभी चित्तौड़गढ़ किले नहीं गए। उन्होंने अपनी नई राजधानी बनाई चावण्ड (उदयपुर से 50 किलोमीटर)। पूरा मेवाड़ इलाका, किलों और महलों से पटा पड़ा है और इन्हीं से जुड़ा है यहां का इतिहास।

पहले बात करते है यहां के सबसे खूबसूरत शहर उदयपुर की। वैसे तो कई झील है इस शहर में लेकिन सबसे खूबसूरत झील है पीछोला झील। उदयपुर के राजमहल (यानि सिटी पैलेस) के ठीक पीछे या यूं कहें कि महल इसी झील के किनारे बना है। पीछोला झील के बीचों-बीच दो महल और है। एक है लेक पैलेस (ताज ग्रुप का फाइव स्टार होटल) और दूसरा है जग-निवास (मंदिर)। झील और महल तो पूरे भारतवर्ष में तो क्या दुनियाभर में हैं लेकिन उदयपुर के महल और झील को लाखों की तादाद में देशी-विदेशी पर्यटक देखने आतें है क्योकि ये एक अदभुत नजारा है। हर कोई यहीं सोचता है कि झील के बीचों-बीच महल कैसे खड़े कर दिये गये। मध्यकालीन राजस्थान के वास्तुशास्त्र का ये एक नायाब तोहफा है। उदयपुर शहर को मेवाड़ के राजा उदयसिंह ने बसाया था। कहते है कि एक बार राजा उदयसिंह शिकार खेलते हुए इस झील तक पहुंच गए। ये उस काल की बात है जब मुगल और दूसरे राजपूत राजाओं की आंख में चित्तौड़गढ और कुंभलगढ़ किलें आखों की किरकिरी बने हुए थे। लगातार हो रहें आक्रमणों से दोनो किले ध्वस्त हो गए थे। उन्ही दिनों राजा उदयसिंह एक नई राजधानी बसाने की योजना बना रहे थे। शिकार की तलाश में भटकते हुये जब राजा पीछोला झील तक पहुंच गये तो देखते है कि यहां एक ऋषि मुनि धुनी लगाए बैठे है। जैसे ही राजा ने मुनिवर को प्रणाम किया, ऋषिमुनि बोल उठे, “ राजा तुम अपने राज्य की राजधानी इसी झील के किनारे बसाओ। यहां कोई तुम्हारा बांल भी बांका नहीं कर पाएगा।” कहते ही उस भविष्यवाणी के बाद ही राजा उदयसिंह ने अपनी राजधानी चित्तौड़गढ़ को छोड़कर यहां बस गए। उनके द्वारा खड़ा किया गया सिटी पैलेस अदभुत है। इस पैलेस के एक हिस्से को अब संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। महल के एक हिस्से में राजा के वंशज रहते हैं और एक बड़े हिस्से को होटल में तब्दील कर दिया गया है। इसी महल के एक हिस्से में महाराणा प्रताप का “ऐतिहासिक भाला रखा है”—कितनी सच्चाई है इस बात में कहा नहीं जा सकता।

प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने उदयपुर के महलों की सुंदरता और भव्यता को देखते हुए इन्हें “राजस्थान के विंडसर पैलेस” की संज्ञा दी है।

प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने उदयपुर के महलों की सुंदरता और भव्यता को देखते हुए इन्हें “राजस्थान के विंडसर पैलेस” की संज्ञा दी है। लेकिन उदयपुर से भी बढ़कर एक जगह और है। वो है चित्तौड़गढ़ का किला। उदयपुर से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर है “ शक्ति और भक्ति का नगर, जहां कि मिट्टी का एक-एक कण रणबांकुरों के लहू से रंगा हुआ है। कोने-कोने से सुनाई पड़ती है देश-प्रेम, स्वाभिमान, आन-बान-शान तथा मान-मर्यादा की रक्षा हेतु मिटने वाले वीर सपूतों की कहानियां। हजारों क्षत्रियों, लाखों सैनिकों और अनगिनत योद्धाओं ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये जहां जीवन का बलिदान किया। सैकड़ो हजारों राजपूत महिलाओं ने अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राणों की आहूति दी। रानी पदमिनी के जौहर, राणा सांगा के पराक्रम, हमीरहठ व गोरा-बादल के बलिदान की गाथा सुनाने वाली ऐसी वीर प्रसूता भूमि, चित्तौड़गढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग अपने नैसर्गिक सौन्दर्य एवं स्थापत्य शिल्प के कारण सदियों से जग विख्यात है।” पांच किलोमीटर से भी ज्यादा लंबे इस किले में खंण्डर हो चुके कुम्भा महल के करीब ही है मीरा मंदिर। जी हां वही मीरा, जिसने भगवान कृष्ण की भक्ति में जहर पीया तो वो भी अमृत बन गया। मेवाड़ राजघरानें की ही बहू थी मीरा और इसी किले में था उनका महल। विवाह के कुछ समय पश्चात ही मीरा के पति का निधन हो गया था। विधवा होने के बाद होने वैराग्य जीवन को अपना लिया था, जो राजपरिवार को नागवार गुजरा था। चित्तौड़गढ किले में ही दो स्तम्भ है। पहला है 122 फीट ऊंचा (नौ मंजिला) विजय स्तम्भ, जिसे राणा कुंभा ने कई राजाओं पर फतह प्राप्त करने के बाद बनवाया था। इस मीनार पर हिंदू धर्म के भगवान और सैकड़ो देवी-देवाताओं की मूर्तियां बन हुई हैं। दूसरा है कीर्ति स्तम्भ। इस स्तम्भ को मेवाड़ राज्य के एक राजा के जैन दीवान ने बनावाया था। इस मीनार को जैन दीवान साहब ने जैन धर्म के सभी तीर्थ-स्थलों की यात्रा पूरी करने के बाद खड़ा करवाया था। सत्तर फीट ऊंच लंबे इस स्तम्भ पर जैन सम्प्रदाय के भगवान दर्शायें गए हैं। यानि एक ही किले के अंदर दो धर्मो (हिंदु और जैन) का मिलन।

चित्तौड़गढ़ किले और मेवाड़ राज्य का इतिहास बिना रानी पदमिनी के अधूरा है। इसी किले के अंदर है झील के किनारें बना पदमिनी महल। कहते है कि मेवाड़ राज्य की रानी पद्मिनी बेहद खूबसूरत थी। उसकी सुंदरता के चर्चे दिल्ली तक थे। फिर क्या था दिल्ली की गद्दी पर काबिज सम्राट अलाउद्दीन खिलजी का दिल उस पर आ गया। रानी को पाने के लिये अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। कई महीनें तक युद्ध चलता रहा। आखिरकार दोनों पक्षों में संधि हुई। अलाउद्दीन इस शर्त पर अपनी सेना को वापस ले जाने के लिये तैयार हुआ कि वो एक बार पद्मिनी को देखना चाहता है। राजा रतन सिंह के सामने एक तरफ मेवाड़ की जनता थी, जो कई महीनें के युद्ध के बाद थक चुकी थी। किले के अंदर का रसद-पानी खत्म होने की कगार पर था। तो दूसरी तरफ था रानी को एक गैर-धर्म के राजा के सामने खड़ा करना—जो कि राजपूती शान के खिलाफ था। ऐसे में राजा ने एक तरीका सोच निकाला। महल में एक शीशा लगा दिया गया।

उस शीशे में अलाऊद्दीन को झील के बीचो-बीच खड़ी रानी पदमिनी का अक्स (प्रतिबिम्ब) दिखाया गया।

उस शीशे में अलाऊद्दीन को झील के बीचो-बीच खड़ी रानी पदमिनी का अक्स (प्रतिबिम्ब) दिखाया गया। ऐसे में राजा ने एक तीर से दो शिकार कर डाले। लेकिन राजपूताना के राजपूत राजा, दिल्ली के राजाओं (दिल्ली सल्तनत) की धूर्तता को ठीक से कभी नहीं पहचान पाते थे। इसका कारण शायद ये था कि राजपूत राजाओं ने युद्धभूमि में कभी—चाहे हार का सामना ही करना पड़ा—धूर्ताता का परिचय नहीं दिया था। पद्मिनी के अक्स को देखने के बाद अलाऊद्दीन ने चालाकी से उनके पति राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया। लेकिन मेवाड़ के ही एक 12 साल के वीर बालक, बादल ने अलाऊद्दीन की छावनी पर हमला बोलकर रतन सिंह को आजाद करा लिया।

ऐसी ही ढेरों रणबांकुरों की कहानियों से भरी हुई है मेवाड़ की धरती। इसी किले में ऐसी भी जगह हैं जहां सैकड़ो की तादाद में राजपूत क्षत्राणियों ने जौहर किया था। जब भी उन्हे लगा कि किले पर बाहरी राजा कब्जा कर लेगा, उससे पहले ही वे अग्नि में कूदकर अपनी जान दे देती थी। मेवाड़ के इन ऐतिहासिक स्थलों को हाल ही में मैने अपनी पत्नी के साथ करीब से देखा है। जिस मेवाड़ राज्य के साहस और वीरता की कहानियां सिर्फ पढ़ी और सुनी थी उसे देखकर मन गौरवान्वित महसूस कर रहा है।

8 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें-एक वृतांत में. आनन्द आ गया नीरज भाई. लिखते रहिये नियमित.

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

मेवाड़ के पर्यटन स्थलों के साथ एतिहासिक जानकारी देने के लिए हार्दिक धन्यवाद !

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

एक तमन्ना है हल्दीघाटी के दर्शन की . जल्द ही पूरी हो कोशिश मे हू

बेनामी ने कहा…

aapki ki di gayi etihashik jankari ke baad rajsthan dekahne ki chah or jyada ho gayi.

Shubham Kumar Chaturvedi ने कहा…

bhut hi rochak dhang se aaapne ye aalekh racha uske liye sadar sadhuvad


Shubham kumar chaturvedi

Shubham Kumar Chaturvedi ने कहा…

bhut hi rochak dhang se aaapne ye aalekh racha uske liye sadar sadhuvad


Shubham kumar chaturvedi

Kamal Paliwal ने कहा…

haldighati.blogspot.com do visit and correct If u Love Maharana Pratap. www.haldighati.com

PANKAJ ने कहा…

very good ..............
pad ker acchaa lega ......
rajasthan se mera bhot legav rha he iseliye pad ker aisa lega jese me rajesthan me hi hu

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)