26 जुलाई, 2009

आर्मी कभी मत ज्वाइन करना



“आर्मी में सिर्फ नौजवानों की ही मौत होती है, बड़े अफसर तो अपने ऑफिस और टेंट में बैठकर कम उम्र के जवानों और अधिकारियों को बलि का बकरा बनाते है।” ट्रेन में मेरे साथ सफर कर रहे अधेढ़ उम्र के एक अंकलजी बोलते जा रहे थे और मैं उनकी बातों पर मंद-मंद मुस्कारा रहा था। कोच में बैठा हर कोई हम दोनों के बीच हो रही चर्चा सुन रहा था। “तुम बिन बुलाए मौत को दावत क्यों दे रहे हो ?” अंकलजी, एक सांस में बोलते ही जा रहे थे, “अरे करगिल में एक के बाद एक जवानों की मौत हो रही है और तुम फिर भी आर्मी ज्वाइन करने के लिए इंटरव्यू देने जा रहे हो।”
ये वाक्या अब से ठीक दस साल पहले का है। मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी (हिंदु कॉलेज) से एम.ए की पढ़ाई कर रहा था। मैने सीडीएस यानि कम्बाइंट डिफेंस सर्विस का एग्जाम दिया और क्लीयर कर लिया था। उसी के सिलसिले में इंटरव्यू के लिए कर्नाटक एक्सप्रेस से बैंगलोर जा रहा था। ये उसी समय की बात है जब कश्मीर में करगिल युद्ध चल रहा था। रोज, एक ना एक लेफ्टीनेंट या कैप्टन की मौत की खबर लगातार मीडिया पर आ रही थी।

कारगिल युद्ध, भारतीय मीडिया के लिए ठीक वैसा ही था, जैसा ईराक का युद्ध पश्चिमी मीडिया के लिए था।

कारगिल युद्ध, भारतीय मीडिया के लिए ठीक वैसा ही था, जैसा ईराक का युद्ध पश्चिमी मीडिया के लिए था। जैसे ही मेरी इंटरव्यू कॉल आई, मैने तैयारी शुरु कर दी। तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गया। मेरे बड़े भाई और भाभी स्टेशन पर छोड़ने आए। जैसे ही हम स्टेशन पहुंचे तो वहां बेहद भीड़ थी। लोगों की इतनी बड़ी तादाद देखकर लगा कि आज कुछ ज्यादा ही लोग दिल्ली से बाहर जा रहे है। लेकिन जैसे ही स्टेशन में दाखिल हुए तो पता चला कि कुछ घंटे पहले ही मथुरा के पास एक बड़ा ट्रेन हादसा हो गया है। इसके चलते उस रुट पर जाने वाली सभी ट्रेन रद्द कर दी गई हैं। इन गाड़ियों में कर्नाटक एक्सप्रेस भी शामिल थी। मैने स्टेशन स्थित एमसीओ (आर्मी मूवमेंट ऑफिस) से संपर्क स्थापित किया, तो उन्होने सलाह दी कि तुरंत ही बैंगलोर स्थित ऑफिस में इस बात की इत्तिला कर दूं कि ट्रैन रद्द हो गई है। वो इंटरव्यू की आगे की तारीख दे देंगे। ऐसा ही हुआ, दस दिन बाद की तारीख मिल गई थी।

मैं एक बार फिर सबसे सम्मानित नौकरी में शामिल होने के लिये बैंगलोर की ट्रैन में सफर करने के लिए बैठ चुका था। ट्रेन दिल्ली से निकली ही थी कि अंकलजी (जिन का जिक्र ऊपर किया है) से बात-चीत शुरु हो गई। बातों ही बातों में मैने उन्हे बता दिया कि मैं सेना में इंटरव्यू के लिए बैंगलोर जा रहा हूं। इतना सुनते ही वे मुझ पर आग-बबूला हो गए। अंग्रेजी में बोलें, “ तुम इतना गलत कदम कैसे उठा सकते हो। तुम्हारें घरवालों ने तुम्हे रोका क्यों नहीं।”
अब बोलने की मेरी बारी थी। “नहीं सर, आप ये कैसे कह सकते है...

अगर हर देशवासी की सोच ऐसी होगी तो हमारी सीमाओं की रखवाली कौन करेगा ? इस देश की रक्षा कौन करेगा ?

अगर हर देशवासी की सोच ऐसी होगी तो हमारी सीमाओं की रखवाली कौन करेगा ? इस देश की रक्षा कौन करेगा ?” मैं अंकलजी की बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता था। उस वक्त देश पर मर-मिटने की तमन्ना थी, देश के लिए कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश थी (वैसे आज भी वैसी ही है)। क्या करना है ये नहीं पता था। बस एक जुनून था कि देश की सेवा बेहतर तरीके से करनी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था अच्छी शिक्षा हासिल करने के लिए। तमन्ना थी आईएएस अफसर बनने की। लेकिन इसी बीच सीडीएस का एग्जाम आया तो फार्म भर दिया। सोचा आर्मी भी देश-सेवा करने का एक बेहतर विकल्प है। उन्हीं दिनों करगिल वॉर छिड़ गया। सो, आर्मी का क्रेज और भी बढ़ गया। मेरे परिवार ने भी इसके लिए मेरा पूरा सपोर्ट किया।

बड़े अधिकारियों का काम होता है रणनीति तैयार करना और अपने मातहत अधिकारियों को दिशा-निर्देश देना। उस रणनीति को अंजाम देना ग्राउंड अधिकारियों का ही काम होता है। ये सिर्फ नियम सिर्फ आर्मी में ही नहीं लागू होता, बल्कि सभी फील्ड में लगभग ऐसा ही होता है-इसलिए, आज भी मैं ट्रेनवाले अंकल जी की बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि युद्ध में कम उम्र के अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया जाता है।
लेकिन, जैसे अंकलजी की हाय मेरे इंटरव्यू पर लग गई थी। आगरा पहुंचते-पहुंचते मुझे ध्यान आया कि मैं अपने स्कूल और कॉलेज सर्टीफिकेट लाना भूल गया हूं। आगरा पहुंचते ही मैने बैंगलोर हेडक्वार्टर में फोन कर सारी वस्तुस्थिति से अवगत कराया। लेकिन वहां से जबाब आया कि बिना सर्टीफिकेट के इंटरव्यू नहीं दे सकते है। वैसे भी मुझे दूसरी बार मौका दिया गया था। हारकर मैं आगरा स्टेशन पर ही उतर गया। बेहद मायूसी छा रही थी। लड़खड़ाते कदमों से अपना सामान लेकर मैं दिल्ली आ रही ट्रेन में सवार हो गया।
उसके बाद से यदा-कदा ही मैं घटना को याद करता हूं। एम.ए खत्म होते ही पत्रकारिता का कोर्स किया और बन गए पत्रकार। आज करगिल युद्ध के दस साल पूरे होने पर ये घटना अचानक याद आ गई। दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस (जहां मैने पढ़ाई की थी) में तीन दिन पहले हिंमाशु सभरवाल के दोस्त और एकाउंटेट परविन्द्र सिंह की हत्या कर दी गई थी। उसी के कवरेज के लिए आज वहीं गया हुआ था। तभी एयरफोर्स हेडक्वार्टर से फोन आया, "सर, करगिल वॉर पर जो आपके यहां कवरेज चल रही है, उसमें एयरफोर्स का जरा भी जिक्र नहीं है।” आज करगिल युद्ध की दसवी सालगिरह थी। सो सभी चैनल पर लाइव कवरेज चल रहा था। एयरपोर्स अधिकारी ने एक के बाद एक कई फोन किए, “नीरज जी, बस

थोड़ा सा एयरफोर्स की भूमिका को भी हाइलाईट करा दीजिए...करगिल युद्ध में एयरफोर्स की अहम भूमिका थी।

थोड़ा सा एयरफोर्स की भूमिका को भी हाइलाईट करा दीजिए...करगिल युद्ध में एयरफोर्स की अहम भूमिका थी।” वाकई करगिल युद्ध में सेना के 'आपरेशन विजय' के सपोर्ट में एयरफोर्स ने भी 'ऑपरेशन सेफ सागर' लांच किया था। करगिल युद्ध की दसवी वर्षगांठ पर भी एयरफोर्स ने अपने फाइटर प्लेनस के जरिए जौहर दिखाया और साथ ही सीमा पार के दुश्मनों को चेतावनी भी दी कि अगर फिर कभी हमारी सरजमीं पर घुसपैठ करने की गुस्ताखी की तो ठीक वैसा ही मुंहतोड़ जबाब दिया जायेगा, जैसा दस साल पहले दिया था।
आज, मुझे लग रहा है कि भले ही मैं आज सेना का हिस्सा नहीं हूं, लेकिन किसी ना किसी तरह से मैं भी करगिल युद्ध से जुड़ा हूं। भले ही युद्ध में हिस्सा ना लिया हो, भले ही सीमाओं की रखवाली ना कर रहा हूं, लेकिन चाहे वो सेना हो, नौसेना हो या फिर वायुसेना, अगर उनके वीर सपूतों की गाथा और अदम्य साहस की कहानी हम (मीडिया) सुना रहे है तो हम भी उसका एक हिस्सा ही तो बन जाते हैं।
जय हिंद !

6 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

jai hind bandhu, aap na jude ho lekin jude hi hain!

सतीश पंचम ने कहा…

रोचक संस्मरण।

वैसे अब भी ट्रेन वाले अंकल की तरह कई लोग हैं जो आर्मी में होने को बुरा मानते हैं। ये मानसिकता हाल फिलहाल में बनी है। देश आजाद होते ही आर्मी मे जाने को बुरा नहीं माना जाता था बल्कि गर्व की बात मानी जाती थी। लेकिन समय के साथ साथ सेना में भी कुछ बुराईयां घर कर गई जो सभी क्षेत्रों में पहले से थीं या सब ओर धीरे धीरे फैल रही थीं।
इस बात से सहमत कि जब सभी लोग उन अंकल की तरह सोचने लगेंगे तो देश की रक्षा कौन करेगा।

गौतम राजरिशी ने कहा…

अच्छा लगा नीरज जी आपकी भावनाओं को जानकर...काश कि हर कोई आप जैसा सोच पाये अपनी सेना को लेकर...

manoj atlas ने कहा…

सर आपके हर लेख में-- आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है-- जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए है पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रेन वाले अंकल जी की बात है उसपर आपका जवाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है।

मधुकर राजपूत ने कहा…

बहुत खूब मंदारिनी तक पहुंच रहे हो भैया। कोई अनुवादक हायर किया है कि गूगल ही सेवा प्रदाता है?

jo.Birendra ने कहा…

hame bahoot achha laga

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)