29 नवंबर, 2009

अखबार(वालों) की सुपारी!


...पुलिस के हत्थे चढ़े सुपारी किलर ने खुलासा किया कि उसे हिंदी के एक जाने-माने अखबार के बिजनेस-पार्टनर को जान से मारने का काम सौंपा गया है...इस लोकप्रिय अखबार के मालिकों में जंग छिड़ी हुई थी... लेकिन ये लड़ाई सुपारी किलिंग तक पहुंच जाएगी, इस बात का किसी को जरा भी इल्म नहीं था...
हाल ही में देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी. सीबीआई ने दिल्ली में कंपनी लॉ बोर्ड के एक सदस्य को घूस लेते रंगे हाथ धर-दबोचा। सीबीआई ने बाकायदा इसके लिए एक प्रेस रिलीज भी जारी की। लेकिन प्रेस रिलीज में ना तो इस बात का खुलासा किया गया कि कंपनी लॉ बोर्ड के इन महानुभाव को क्यों गिरफ्तार किया गया है और ना ही ये बताया गया कि वे किस कंपनी के झगड़े का निबटारा करने के लिए ये घूस की रकम हड़पना चाहते थे। ये खबर ना तो शायद किसी टी.वी चैनल में चली और ना ही शायद किसी अखबार में। अगर खबर आई भी तो इतनी कि “कंपनी लॉ बोर्ड का सदस्य घूस लेते गिरफ्तार”। लेकिन मीडिया में ये बात साफ हो चुकी थी कि ये कौन से कंपनी थी। बताया जा रहा है कि ये कंपनी कोई ऐसी-वैसी नहीं थी—उत्तरी भारत के सबसे लोकप्रिय माने जाने वाला अखबार, अमर उजाला। अखबार के बिजनेस पार्टनर्स के बीच कई सालों से चलती आ रही जंग का नतीजा थी ये खबर।
अमर उजाला की नींव कई साल पहले दो दोस्तों—डोरी लाल अग्रवाल और मुरारी लाल माहेश्वरी—ने डाली थी। आगरा और बरेली से प्रकाशित होने वाली इस अखबार ने पिछले दो दशकों में हिंदी भाषी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। आज ये अखबार उत्तर भारत के डेढ़ दर्जन शहरों से प्रकाशित किया जाता है। लेकिन डोरी लाल और मुरारी लाल जी की मौत के बाद इस अखबार की बागडोर एक साथ दोनों के परिवारों को सयुंक्त रुप में आ गई। अखबार नई पीढ़ी के हाथों में आने के बाद दिन दोगुनी और रात चौगुनी तो करने लगा, लेकिन अंदर ही अंदर दोनों परिवारों के बीच शायद मन-मुटाव रहने लगा।
मेरे लिए अमर उजाला से जुड़ी खबर इसलिए भी हैरान करने वाली थी, क्योकि ये एक ऐसा अखबार है जिसे मैं पिछले करीब 25 सालों से पढ़ रहा हूं। मुझे याद है कि 1983 के क्रिकेट विश्वकप जीतने की खबर भी मैने इसी अखबार में पढ़ी थी और उसकी क्लीपिंग काट कर कई सालों तक संजोकर रखी थी—टी.वी पर 1983 विश्वकप की फाइनल की रिकॉर्डिंग देखने के बाद ही वो क्लीपिंग गायब हुई थी। आज, मीडिया में होने के चलते मेरे पास हिंदी अखबार पढ़ने के कई विकल्प है। लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी अखबारों में अगर सबसे अच्छी क्राइम रिपोर्टिंग अगर कहीं होती है तो वो है अमर उजाला। हाल ही में एमेटी यूनिवर्सिटी में एक सेमिनार के दौरान जब छात्रों ने मुझसे पूछा कि क्राइम रिपोर्टिंग के लिए कौन सा अखबार पढ़ना चाहिए, तो बिना सोचे मेरा जबाब था, अमर उजाला
खैर, ये खबर पता चलते ही कि अमर उजाला में कंपनी के बंटबारे को लेकर क्या पैतरे अपनाए जाते हैं, तो मुझे चार-पांच साल पुराना एक मामला याद आ गया। इसी तरह से उत्तर भारत के एक जाने-माने हिंदी अखबार के मालिक ने अपने बिजनेस पार्टनर की ‘सुपारी’ दी थी। उस अखबार में भी हिस्से को लेकर बंदरबाट चल रही थी।
एक दिन मैं अपने आफिस—सहारा टी.वी—में बैठा था कि एक ‘मित्र’ का फोन आया। उसने मुझे तुंरत अपने ऑफिस आने के लिए कहा। मैं तुंरत वहां पहुंच गया। उसने मेरे सामने एक सुपारी किलर का इकबालिया बयान रख दिया। बयान पढ़ते ही मैं चौंक गया। उसपर उत्तर प्रदेश के एक अखबार मालिक के दक्षिणी दिल्ली स्थित कोठी के बाहर जान से मारने का प्लान लिखा था। साथ ही लिखा था कि वो पिछले कुछ दिनों से उसकी रेकी (पीछा) कर रहा है—कहां जाता है, किससे मिलता है, इत्यादि। मेरे मित्र ने बताया कि इस हिंदी अखबार—ये भी उत्तर भारत के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबारों में से एक हैं—में कंपनी में हिस्से को लेकर लड़ाई छिड़ी हुई है। नौबत यहां तक पहुंच गई कि एक (बिजनेस) पार्टनर ने दूसरे पार्टनर की सुपारी तक दे डाली है।
सुपारी किलर के बयान में लिखा था कि उसे ये काम (जान से मारने का) मेरठ जेल में बंद एक बड़े गैंगस्टर ने दिया है। उसके इस इकबालिया बयान को पढ़कर मुझे लगा कि ये मेरा अबतक सबसे बड़ा स्कूप (खुलासा) हो सकता है—अखबारवालों की सुपारी! लेकिन ऑफिस लौटने से पहले मेंरे उस मित्र ने कई बार कुरेद-कुरेद कर मुझसे पहुंचा, “स्टोरी चलाने का दम है।” मैने जवाब दिया, क्यों नहीं...जरुर चलेगी। ये वायदा करके मैं आफिस लौट आया।
लेकिन बॉस को स्टोरी बताने से पहले, मैं खुद इस इकबालिया बयान की तस्दीक करना चाहता था। स्टोरी को क्रॉस-चैक करने में दो-तीन दिन लग गए। इसी बीच, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पूर्वी दिल्ली में दो बदमाशों का एनकाउंटर कर डाला। अगर मैं गलत नहीं हूं तो उनसे से एक बदमाश का नाम था, अशोक उर्फ बंटी। कोई बड़ा एनकाउंटर नहीं था। खबर को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई क्योंकि कुछ हफ्ते पहले ही, दिल्ली पुलिस ने हरियाणा पुलिस के साथ मिलकर इन बदमाशों के सरगना, हेमंत उर्फ सोनू को गुंड़गांव में एक (लाइव) एनकाउंटर में ढेर किया था। लिहाजा, अशोक उर्फ बंटी का एनकाउंटर आया-गया हो गया—जैसे कंपनी लॉ बोर्ड के सदस्य की गिरफ्तारी का हो गया। हां, एनकाउंटर के कई साल बाद, अशोक उर्फ बंटी अखबार की सुर्खियों में एक बार फिर तब आया, जब पता चला कि वो दिल्ली में जिस्मफरोशी के धंधे की सबसे बड़ी दलाल, सोनू पंजाबन का पति भी रहा चुका था।
कुछ दिनों बाद के बाद मैने अखबारवालों की सुपारी वाली स्टोरी पर फिर से काम करना शुरु कर दिया। इस बार मैने दिल्ली पुलिस के आला-अधिकारियों से सुपारी मामले में संपर्क किया तो पता चला कि “सुपारी किलर की बात कन्फर्म नहीं हो पाई।” मैंने उन अधिकारी से जब इसका कारण पूछा, तो उन्होने बताया कि जब मेरठ जेल में बंद उस गैंगस्टर—जिसने इस किलर को सुपारी दी थी—से पूछताछ की गई तो उसने खुलासा किया कि उसे ये सुपारी किसी और ने नहीं अशोक उर्फ बंटी ने दी थी। इससे पहले की दिल्ली पुलिस बंटी से पूछताछ कर इस मामले की तहतक पहुंच पाती, उसका एनकाउंटर हो गया। ऐसे में पुलिस का मानना था कि जब मामले का “लिंक” ही टूट गया है तो “सुपारी किलर की बात पर कैसे भरोसा कर लें।” लिहाजा, अखबारवालों की अखबारवालों के लिए सुपारी का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
यहां, ये भी बताना जरुरी है कि जैसे ही ये खबर मैने अपने बॉस को बताई, तो वे अपनी कुर्सी से उछल गए। “...अबे मरवाओगे क्या...ये खबर चलाकर...”, उनका जबाब था। लेकिन, मेरे जिद करने पर, वे इस स्टोरी को लेकर सुपर-बॉस के पास पहुंचे और फिर मुंह लटकाकर वापस आ गए। मैं समझ गया कि मेरी स्टोरी का क्या हश्र हुआ है। मेरे साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि किसी स्टोरी को इसलिए ड्राप कर दिया गया था कि उसमें एक बड़े अखबार के मालिकों की काली-करतूत का भांडाफोड़ हो जाता या फिर किसी रसूखदार की साख पर बट्टा लगा जाता। मीडिया में काम करते हुए एक क्राइम रिपोर्टर को कई बार ऐसे दौर से गुजरना पड़ता है।
एक खबर तो मुझे आजतक याद है। ये बात करीब छह साल पुरानी है। पंजाब पुलिस के एक तेजतर्रार आईजी पर तीन लोगों के अपहरण और हत्या का मामला चल रहा है—आईजी का भाई एक सीनियर आईएएस आफिसर है और उस वक्त (केन्द्रीय) गृह मंत्रालय में तैनात था। उसकी कवरेज (ना) करने के लिए तो मुझे पंजाब से ही बीच शूट से लौटना पड़ा था। बॉस का स्टोरी ना करने का फोन जो आ गया था।

2 टिप्‍पणियां:

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…

paper ki duniya ke nange satya ko aapne benakab kar diya ek baar fir.
akhbaron ke sampadak ab baniyon ke naukar ban kar rah gaye hai jo sirf dhan ugahney aur pakshpat karne ka lkshya lekar chal rahe hai,
wo din gaye jab patrakarita ek mission thi ab to bas lakeer pitee jarahi hai.
badhai ,aapko spashtvadita ke liye.
aabhar.
dr.bhoopendra jeevansandarbh.blogspot.com

बेनामी ने कहा…

आश्‍चर्य की बात है कि इस रिपोर्ट पर एक ही कमेंट आया है। लोगों को सत्‍य के सूर्य से मुंह छुपाना पसंद है। इस बात का इससे बडा और कोई उदाहरण नहीं हो सकता।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)