26 जनवरी, 2010

खाकी में इंसान या भेड़िया ?


“दिल्ली में पुलिस को ‘ठुल्ला’ कहकर पुकारा जाता है ! यह शब्द सम्भवत: निठल्ला से बना है...पुलिस, अपराधियों से मिली होती है या पुलिस ही अपराध करवाती हैं...पुलिस सब बदमाशों को जानती है...वो चाहे तो मिनटों में चोरों-डकैतों को पकड़ सकती है... पुलिस के बारे में ढेर सारे किस्से-कहानियां प्रचलित होते हैं—जिनमें से कुछ सत्य होते हैं तो कुछ एकदम मिथ्या...”
चलो कम से कम एक पुलिस अधिकारी तो है, जो ये मानता है कि इन सब कहानियों में “कुछ सत्य” होती हैं। आजतक मुझे जितने भी पुलिस अधिकारी (निचले और ऊपर दोनों के) मिलें, उनमें से अधिकतर यही मानते है कि इस तरह की बाते सिर्फ और सिर्फ आम शहरी के मन की कोरी कल्पना है। वे तो यहां तक मानते है कि हकीकत में खाकी वर्दीवाले कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और बहादुर होते है...अपनी जान हथेली पर लेकर दिन-रात जीते हैं।
दरअसल, ये सभी बातें---ठुल्ला, पुलिस –अपराधियों का गठजोड़, आदि—हाल ही में प्रकाशित हुई एक ऐसी किताब का हिस्सा है जिसका लेखक खुद एक सीनियर पुलिस अधिकारी है। करीब बीस साल से यूपी और उत्तराखंड में पुलिसिया नौकरी बजा लेने के बाद आईपीएस अधिकारी, अशोक कुमार इन दिनों सीआरपीएफ में आईजी के पद पर तैनात है। किताब का नाम है, ‘खाकी में इंसान’। हाल ही में इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद सुपरकॉप किरन बेदी ने दिल्ली में रिलीज किया।
अपने बीस साल के पुलिसिया अनुभव को अशोक कुमार ने करीब 150 पन्नों की इस किताब में उतारने की कोशिश की है। किताब में कहानियों के जरिए, अशोक कुमार ने समाज को बताने की कोशिश की है कि हम पुलिस को भले ही कितना भ्रष्ट, अमानवीय और बर्बर समझें, लेकिन अभी भी कुछ पुलिस अधिकारी ऐसे भी है जो लीक से हटकर सोचते हैं। उनके मन में अभी भी गरीब, असहाय और दलितों को इंसाफ दिलाने की एक हठ है। उसके लिए चाहे अपने ही महकमें की “गलती उजागर” होती हो।
खुद अशोक कुमार के शब्दों में कहें तो “इस किताब का उद्देश्य मेरे द्वारा किए गए कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना नहीं है—इसका उद्देश्य तो ये दिखाता है कि कैसे हर समस्या को मानवीय दृष्टिकोण से देखा व समझा जा सकता है।” वे आगे लिखते है, “ इस किताब में कुछ वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियों के जरिए यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि अच्छी पुलिस व्यवस्था से सचमुच गरीब और असहाय लोगों की जिंदगी में फर्क लाया जा सकता है।” हरियाणा के ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखने वाले अशोक कुमार आई.आई.टी, दिल्ली के पास-आउट है। पिछले कई सालों से मैं खुद अशोक कुमार को पर्सनली और प्रोफेशनली जानता हूं। कई साल पहले एक स्टोरी (सनसनी, स्टार न्यूज में दिखाई गई थी) के सिलसिले में मेरी उनसे मुलाकात देहरादून में हुई थी। दरअसल, उन्होने एक नामी गैंगस्टर को एनकाउंट में ढेर किया था। उसी दौरान मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। इस कहानी को भी उन्होने किताब का हिस्सा बनाया है। वाकई उस बदमाश ने उत्तराखंड के लोगों का जीना दूभर कर रखा था। लेकिन एक महिला की सूझबूझ के चलते ही पुलिस उस तक पहुंच पाई थी।
अशोक कुमार ने इस किताब के जरिए अपने उन साथी पुलिस अधिकारियों पर गुस्सा उतार डाला, जो ये समझते है कि आईपीएस तो “पावर, पैसा और स्टेटस” पाने का एक आसान तरीका है। उन्होंने, आईपीएस अधिकारियों को दी जाने वाली ट्रेनिंग पर सवाल खड़े कर डाले। “(पुलिस) अकादमी में हमें खाने-पीने, पहनने के साहबी तौर-तरीके सिखाये गए। कांटे और छुरी का कैसे प्रयोग होना है, चम्मच को कैसे रखा जाना है, मेज पर कैसे बैठना है आदि-आदि...। इस ट्रेनिंग में कहीं-न-कहीं ब्रिटिश सामंतवादी व्यवस्था की झलक दिखाई देती थी।” लेकिन मेरा अबतक का क्राइम (या पुलिसिया) रिर्पोटिंग का अनुभव तो ये बताता है कि ट्रेनिंग से लेकर पुलिसिंग तक में ब्रिटिशराज की बू आती है।
काश, सभी पुलिस अधिकारी अशोक कुमार की तरह सोचते तो हमारे समाज में कोई रुचिका, जेसिका, नीतिश कटारा केस ना होता। कोर्ट को हर मामले में बढ़ चढ़कर पुलिस को फटकार ना लगानी पड़ती। पुलिस का कर्तव्य क्या है, ये बताने की ना तो अदालत को जरुरत होती और ना ही मीडिया को।
अगर, पुलिस ‘माई-बाप संस्कृति’ और ‘जीप व डाकबंगला संस्कृति’ से ऊपर उठ पाती तो गरीब और असहाय लोगों को इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें ना खानी पड़ती। पॉकेट मारे जाने की एफआईआर दर्ज कराने के लिए एक आम इंसान को थाने के चक्कर ना काटना पड़ते...और ना ही गुंडे-बदमाश गली-मुहल्लों और बाजार में लड़कियों और महिलाओं को फब्तियां कसते दिखाई पड़ते। किसी मजबूर इंसान को अपने बेटे या भाई की हत्या के मामले में थानों और पुलिस अधिकारियों की चौखट पर ऐड़ियां ना रगड़नी पड़ती। ट्रैफिक पुलिस के ‘ठुल्ले’ सड़कों पर यातायात व्यवस्था कायम रखने में ज्यादा व्यस्त होतें बजाए ट्रैफिक सिग्नल का उल्लंघन करने पर अपनी जेबें गरम करतें। थानों तक में पीड़ित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना आए-दिन सुनने में आती रहती हैं। निचले स्तर के अधिकारियों के साथ-साथ सीनियर अधिकारियों तक की खाकी वर्दी के दागदार होने के किस्से आम हो चुके हैं। तब शायद लगता है कि खाकी में इंसान नहीं भेड़िये हैं।
गणतंत्र दिवस के मौके पर कई टी.वी चैनल ने पुलिसिया तंत्र की पोल खोल कर रख दी है। राजधानी दिल्ली से फरार हुए तीन खूंखार पाकिस्तानी आंतकवादियों तक की तस्वीरों को भी खाकी वर्दीवालें ठीक से नहीं पहचान पातें। जब आंतकियों को ही नहीं पहचान पाएंगे तो उन्हे पकड़ेंगे क्या खाक--अब समझ आया क्यों दिल्ली में पुलिसवाले को 'ठुल्ला' पुकारा जाता है। जब खाकी वर्दीवाले को ये तक नहीं पता होगा कि वो जिस गणतंत्र दिवस की परेड की सुरक्षा व्यवस्था में लगाया गया है उसे क्यों मनाया जाता है तो उसके लिए एक ‘गणतंत्र’ में आम शहरी के क्या अधिकार है कभी समझ पाएंगा। वो तो हर बात में यही कहेगा कि “मैं कुछ नहीं बता सकता, वो तो मेरे अधिकारी ही बताएंगे कि गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है।”
ऐसे में जरुरत है कि हर उस शख्स को इस किताब को एक बार जरुर पढ़ना चाहिए जिसका वास्ता खाकी वर्दी से है। क्योंकि एक खाकी वर्दीवाला, “ सिस्टम में आने वाली अड़चनों के बावजूद सिस्टम के अंदर रहते हुए भी लोगों के जीवन, संपत्ति एवं सम्मान की रक्षा कर उनकी सेवा कर सकता है।” और शायद तभी “खाकी में (बसे) इंसान को कोटि-कोटि सलाम” किया जाएगा, उससे पहले तो कदापि नहीं।

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

सार्थक आलेख. अच्छा विश्लेषण!

Suman ने कहा…

nice

निर्मला कपिला ने कहा…

हर एक शब्द खाकी पर दाग की दास्तां ब्यान कर रहा है खाकी तो क्या यहां नेताओं की स्फेद पशाक भी दागी है। शुभकामनायें

shohdah ने कहा…

acha lekh hai.

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)