
चलो कम से कम एक पुलिस अधिकारी तो है, जो ये मानता है कि इन सब कहानियों में “कुछ सत्य” होती हैं। आजतक मुझे जितने भी पुलिस अधिकारी (निचले और ऊपर दोनों के) मिलें, उनमें से अधिकतर यही मानते है कि इस तरह की बाते सिर्फ और सिर्फ आम शहरी के मन की कोरी कल्पना है। वे तो यहां तक मानते है कि हकीकत में खाकी वर्दीवाले कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और बहादुर होते है...अपनी जान हथेली पर लेकर दिन-रात जीते हैं।
दरअसल, ये सभी बातें---ठुल्ला, पुलिस –अपराधियों का गठजोड़, आदि—हाल ही में प्रकाशित हुई एक ऐसी किताब का हिस्सा है जिसका लेखक खुद एक सीनियर पुलिस अधिकारी है।
करीब बीस साल से यूपी और उत्तराखंड में पुलिसिया नौकरी बजा लेने के बाद आईपीएस अधिकारी, अशोक कुमार इन दिनों सीआरपीएफ में आईजी के पद पर तैनात है। किताब का नाम है, ‘खाकी में इंसान’। हाल ही में इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद सुपरकॉप किरन बेदी ने दिल्ली में रिलीज किया।अपने बीस साल के पुलिसिया अनुभव को अशोक कुमार ने करीब 150 पन्नों की इस किताब में उतारने की कोशिश की है। किताब में कहानियों के जरिए, अशोक कुमार ने समाज को बताने की कोशिश की है कि हम पुलिस को भले ही कितना भ्रष्ट, अमानवीय और बर्बर समझें, लेकिन अभी भी कुछ पुलिस अधिकारी ऐसे भी है जो लीक से हटकर सोचते हैं। उनके मन में अभी भी गरीब, असहाय और दलितों को इंसाफ दिलाने की एक हठ है। उसके लिए चाहे अपने ही महकमें की “गलती उजागर” होती हो।
खुद अशोक कुमार के शब्दों में कहें तो “इस किताब का उद्देश्य मेरे द्वारा किए गए कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना नहीं है—इसका उद्देश्य तो ये दिखाता है कि कैसे हर समस्या को मानवीय दृष्टिकोण से देखा व समझा जा सकता है।” वे आगे लिखते है, “ इस किताब में कुछ वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियों के जरिए यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि अच्छी पुलिस व्यवस्था से सचमुच गरीब और असहाय लोगों की जिंदगी में फर्क लाया जा सकता है।”
हरियाणा के ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखने वाले अशोक कुमार आई.आई.टी, दिल्ली के पास-आउट है। पिछले कई सालों से मैं खुद अशोक कुमार को पर्सनली और प्रोफेशनली जानता हूं। कई साल पहले एक स्टोरी (सनसनी, स्टार न्यूज में दिखाई गई थी) के सिलसिले में मेरी उनसे मुलाकात देहरादून में हुई थी। दरअसल, उन्होने एक नामी गैंगस्टर को एनकाउंट में ढेर किया था। उसी दौरान मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। इस कहानी को भी उन्होने किताब का हिस्सा बनाया है। वाकई उस बदमाश ने उत्तराखंड के लोगों का जीना दूभर कर रखा था। लेकिन एक महिला की सूझबूझ के चलते ही पुलिस उस तक पहुंच पाई थी।अशोक कुमार ने इस किताब के जरिए अपने उन साथी पुलिस अधिकारियों पर गुस्सा उतार डाला, जो ये समझते है कि आईपीएस तो “पावर, पैसा और स्टेटस” पाने का एक आसान तरीका है। उन्होंने, आईपीएस अधिकारियों को दी जाने वाली ट्रेनिंग पर सवाल खड़े कर डाले। “(पुलिस) अकादमी में हमें खाने-पीने, पहनने के साहबी तौर-तरीके सिखाये गए। कांटे और छुरी का कैसे प्रयोग होना है, चम्मच को कैसे रखा जाना है, मेज पर कैसे बैठना है आदि-आदि...। इस ट्रेनिंग में कहीं-न-कहीं ब्रिटिश सामंतवादी व्यवस्था की झलक दिखाई देती थी।” लेकिन मेरा अबतक का क्राइम (या पुलिसिया) रिर्पोटिंग का अनुभव तो ये बताता है कि ट्रेनिंग से लेकर पुलिसिंग तक में ब्रिटिशराज की बू आती है।
काश, सभी पुलिस अधिकारी अशोक कुमार की तरह सोचते तो हमारे समाज में कोई रुचिका, जेसिका, नीतिश कटारा केस ना होता। कोर्ट को हर मामले में बढ़ चढ़कर पुलिस को फटकार ना लगानी पड़ती। पुलिस का कर्तव्य क्या है, ये बताने की ना तो अदालत को जरुरत होती और ना ही मीडिया को।

अगर, पुलिस ‘माई-बाप संस्कृति’ और ‘जीप व डाकबंगला संस्कृति’ से ऊपर उठ पाती तो गरीब और असहाय लोगों को इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें ना खानी पड़ती। पॉकेट मारे जाने की एफआईआर दर्ज कराने के लिए एक आम इंसान को थाने के चक्कर ना काटना पड़ते...और ना ही गुंडे-बदमाश गली-मुहल्लों और बाजार में लड़कियों और महिलाओं को फब्तियां कसते दिखाई पड़ते। किसी मजबूर इंसान को अपने बेटे या भाई की हत्या के मामले में थानों और पुलिस अधिकारियों की चौखट पर ऐड़ियां ना रगड़नी पड़ती। ट्रैफिक पुलिस के ‘ठुल्ले’ सड़कों पर यातायात व्यवस्था कायम रखने में ज्यादा व्यस्त होतें बजाए ट्रैफिक सिग्नल का उल्लंघन करने पर अपनी जेबें गरम करतें। थानों तक में पीड़ित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना आए-दिन सुनने में आती रहती हैं। निचले स्तर के अधिकारियों के साथ-साथ सीनियर अधिकारियों तक की खाकी वर्दी के दागदार होने के किस्से आम हो चुके हैं। तब शायद लगता है कि खाकी में इंसान नहीं भेड़िये हैं।
गणतंत्र दिवस के मौके पर कई टी.वी चैनल ने पुलिसिया तंत्र की पोल खोल कर रख दी है। राजधानी दिल्ली से फरार हुए तीन खूंखार पाकिस्तानी आंतकवादियों तक की तस्वीरों को भी खाकी वर्दीवालें ठीक से नहीं पहचान पातें। जब आंतकियों को ही नहीं पहचान पाएंगे तो उन्हे पकड़ेंगे क्या खाक--अब समझ आया क्यों दिल्ली में पुलिसवाले को 'ठुल्ला' पुकारा जाता है। जब खाकी वर्दीवाले को ये तक नहीं पता होगा कि वो जिस गणतंत्र दिवस की परेड की सुरक्षा व्यवस्था में लगाया गया है उसे क्यों मनाया जाता है तो उसके लिए एक ‘गणतंत्र’ में आम शहरी के क्या अधिकार है कभी समझ पाएंगा। वो तो हर बात में यही कहेगा कि “मैं कुछ नहीं बता सकता, वो तो मेरे अधिकारी ही बताएंगे कि गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है।”
ऐसे में जरुरत है कि हर उस शख्स को इस किताब को एक बार जरुर पढ़ना चाहिए जिसका वास्ता खाकी वर्दी से है। क्योंकि एक खाकी वर्दीवाला, “ सिस्टम में आने वाली अड़चनों के बावजूद सिस्टम के अंदर रहते हुए भी लोगों के जीवन, संपत्ति एवं सम्मान की रक्षा कर उनकी सेवा कर सकता है।” और शायद तभी “खाकी में (बसे) इंसान को कोटि-कोटि सलाम” किया जाएगा, उससे पहले तो कदापि नहीं।
4 comments:
सार्थक आलेख. अच्छा विश्लेषण!
nice
हर एक शब्द खाकी पर दाग की दास्तां ब्यान कर रहा है खाकी तो क्या यहां नेताओं की स्फेद पशाक भी दागी है। शुभकामनायें
acha lekh hai.
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