21 नवंबर, 2010

खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग...

...अगली लाइन पढ़ी तो लगा जैसे मेरे ऊपर किसी ने एक घड़ा भरकर पानी डाल दिया हो। लाइन कुछ यूं थी, "नीरज हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।" अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो कविता उस दुबले-पतले से दिखने वाले गार्ड ने मेरे ऊपर ही लिखी थी...
क्या आप विश्वास कर सकतें हैं कि गेट पर रखवाली करने वाला कोई सिक्योरिटी गार्ड भी एक कवि हो सकता है ? लेकिन ये सौ फीसदी सच है। एक दिन में अपने ऑफिस (नोएडा स्थित स्टार न्यूज हेडऑफिस) के बाहर अपनी कार (नीले रंग की वेगन-आर) पार्क कर रहा था, तभी एक दुबला-पतला सा सिक्योरिटी गार्ड वहां आया और गाड़ी लगवाने लगा। मुझे लगा कि ये उसका काम है--यानि गाड़ी को पार्किंग में ठीक से लगवाना और उनकी सुरक्षा करना--इसलिए वहां आया होगा।

लेकिन मुझे ताज्जुब तब हुआ जब उसने कहा,"सर आज मेरी पार्किंग धन्य हो गई।" मैने उससे पूछा कि ऐसा क्या हुआ कि आज उसकी पार्किंग धन्य हो गई। वो बोला कि "आज आपने अपनी कार जो यहां लगाई है।" उसकी बात सुनकर मैं हलका सा मुस्कराया और ऑफिस की तरफ लपक लिया। दरअसल, हमारे ऑफिस के बाहर कम ही कार पार्क हो सकती हैं और मैं अमूमन सुबह दस बजे के बाद ही ऑफिस पहुंचता हूं तो गाड़ी ऑफिस से दूर ही खड़ी करनी पड़ती है। मुझे भी उस दिन याद आया कि काफी दिनों बाद गाड़ी ऑफिस के बेहद करीब लगाई थी। उस सिक्योरिटी गार्ड की ड्यूटी मेन-गेट के इर्द-गिर्द पार्क होने वाली गाड़ियों की निगरानी करना है।

कुछ घंटे ऑफिस में चकलसबाजी करने के बाद जब मैं अपनी गाड़ी पार्किंग से निकालकर चलने लगा,तो वो गार्ड दौड़ता हुआ आया और गाड़ी निकलवाने लगा। मुझे फिर लगा कि ये गार्ड तो अपना काम बड़े ही बखूबी तरीके से निभाता है। लगा कि शायद वो सभी गाड़ियों को ऐसे ही लगवाता और निकलवाता है। अभी मैने गाड़ी स्टार्ट ही की थी कि वो बुदबुदाया, "सर, मैने आपके लिए कुछ लिखा है।" अभी भी मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसके कहने का तात्पर्य क्या है। इस बार उसने बिना कुछ कहे मेरी तरफ एक पेपर बढ़ा दिया। उस सफेद पेपर पर कुछ दोहा (टाईप) या फिर कविता लिखी थी। मेरी व्याकरणी हिंदी (और संस्कृत) बेहद खराब है। वो देखकर मैं झल्लाया, "क्या है?" वो गार्ड घबराते हुए बोला, "सर, मैने आपके ऊपर (व्यक्तिव) एक कविता लिखी है।" उसके ये कहते ही मैं झेंप गया।

मैने इस बार पेपर को हाथ में लिया और धीरे-धीरे पढ़ना शुरु किया, "सोहत वाहन नील रंग, बहुरंगी के बीच"। लेकिन समझ नहीं आया। जैसे ही अगली लाइन पढ़ी तो लगा जैसे मेरे ऊपर किसी ने एक घड़ा भरकर पानी डाल दिया हो। अगली लाइन कुछ यूं थी,"नीरज हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।" अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो कविता उस निर्बल से गार्ड ने मेरे ऊपर ही लिखी थी। अब कविता में अपना नाम देखकर भी नहीं समझता क्या! पूरी कविता कुछ इस प्रकार थी...

सोहत वाहन नील रंग, बहुरंगी के बीच।
"नीरज" हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।

नीरज नाम नीर बिनु विकसित।
स्वच्छ धवल रंच न कलुषित।।

श्यामल गात मनोहर नैना।
उदित भयो जिमि सूरज रैना।।

खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग।
रजनी दिवस बराबर लगभग।।

दुर्जन मनुज पड़हि नित भार।
सतजन मनहुं प्रीति बड़ भारी।।

कवि "नीरस" विनती करत मानो नीरज बात।
दिल बिच करो मुकाम तुम, दिन हो चाहे रात।।

इस कविता का जो अर्थ उस गार्ड ने मुझे बताया और जो थोड़ा बहुत मुझे याद है, वो कुछ इस तरह है... मेरी वैगन-आर कार का रंग नीला है। सो पार्किंग पर तैनात उस गार्ड ने बताया कि "नीले रंग की एक अकेली गाड़ी बहुतेरी गाड़ियों में सबसे अलग दिखाई दे रही है।" वाकई जब मैने पार्किंग में खड़ी गाड़ियों पर नजर दौड़ाई तो देखा कि मेरी (नीली) गाड़ी को छोड़कर बाकी गाड़ियां फीके रंग की थीं-कोई सफेद तो कोई गोल्डन तो कोई स्टील-ग्रे। अगली लाइन का मतलब था कि इस गाड़ी को देखकर ऐसा लगता है कि कीचड़ में कमल ("नीरज") खिला हुआ हो।

अगली लाइन का अर्थ मुझे थोड़ा कम आता है। लेकिन शायद कुछ ऐसे होगा, कि जिस तरह पानी के बिना कमल (नीरज) नहीं खिलता उसी तरह आपका मन भी एकदम स्वच्छ है। उससे अगली लाइन यानि,"श्यामल गात मनोहर नैना। उदित भयो जिमि सूरज रैना" का तात्पर्य था कि आपके सांवले रंग पर जिस तरह आपकी आंखे अच्छी लगती हैं वो ठीक उस तरह है जैसे कि सुबह के अंधियारे में सूरज (सूर्य) का निकलना।
इससे अगली लाइन में 'कवि-महाराज' यानि उस गार्ड ने वर्णन किया मेरे काम-काज के ऊपर-- खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग, रजनी दिवस बराबर लगभग। यानि मैं हर रोज देश-दुनिया की खबरें बताता हूं और इस कर्म में मेरे लिए दिन क्या और रात क्या सब बराबर है।
आगे था कि मैं बुरे (दुर्जन) लोगों पर भारी पड़ता हूं और अच्छे (सतजन) लोग मुझे बेहद प्रिय हैं। कवि "नीरस" यानि वो गार्ड अपने आप को नीरस कवि बताते हुए विनती कर रहा है कि हे नीरज मेरी बात मानों कि दिन-रात तुम सभी लोगों के दिल में अपना मुकाम बनाओ।
वाह क्या बात है! क्या कविता लिखी है। वो भी चंद घंटो में ही। मेरे इस कविता का यहां लिखने का उद्देश्य ये नहीं है कि कविराज-गार्ड ने ये पंक्तियां मेरे व्यक्तिव या फिर मेरी नीले रंग की कार पर लिखी है। बल्कि इसलिए कि

ये कविता एक ऐसे इंसान ने लिखी है जो बारह से भी ज्यादा घंटे गेट पर खड़ी कारों की निगरानी करता है। एक दरबान ने लिखी है... वो दरबान जिसे शहरी दुनिया में किसी अच्छे नजरिये से देखने का प्रचलन कम ही है।

ये कविता एक ऐसे इंसान ने लिखी है जो बारह से भी ज्यादा घंटे गेट पर खड़ी कारों की निगरानी करता है। एक दरबान ने लिखी है... वो दरबान जिसे शहरी दुनिया में किसी अच्छे नजरिये से देखने का प्रचलन कम ही है। क्योंकि शहर की किसी भी छोटी-बड़ी बिल्डिंग या इमारत में चले जाओ, वहां अनपढ़ या फिर कम साक्षर गार्ड ही ज्यादा दिखाएं देते है। शायद यही वजह थी कि शुरुआत में मैने उस गार्ड को भी 'ऐसा ही' समझ लिया था। लेकिन उसकी कविता पढ़कर और उससे बात करने के बाद ही ज्ञात हुआ कि वो सचमुच एक ज्ञानी तो नहीं लेकिन किसी ज्ञानी से कम भी नहीं है।
लेकिन एक सवाल बार-बार जेहन में घूम रहा था। वो 'ज्ञानी' यहां (यानि गेट पर दरबान गिरी) क्या कर रहा है ? उसपर उसका जबाब था, "किस्मत यहां तक ले आई सर। मैं पढ़ा-लिखा हूं, कम्पयूटर भी थोड़ा बहुत आता है।" आगे उसकी गुजारिश थी, "सर, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरुर बताना।" उसे आश्वसान देकर मैने गाड़ी स्टार्ट की और निकल गया। गाड़ी चलाते हुए भी यही सोचता रहा कि क्या आज के युग में कोई ऐसा इंसान भी है जो किसी के ऊपर गेट पर खड़े-खड़े ही कविता भी लिख सकता है। ऐसा हुनर तो लाखों में नहीं तो हजारों में भी कम ही मिलता है। हैटस ऑफ टू दयाराम!
उस 'कविराज' गार्ड का नाम दयाराम है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले दयाराम का मोबाइल नंबर है 8800119745 और ईमेल आईडी है dayaramlohar@gmail.com

3 टिप्‍पणियां:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत बढिया! दयाराम का काव्य संग्रह कब प्रकाशित हो रहा है?

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя ने कहा…

सच ऐसे लोग विरले ही मिलते है,ज्ञान और किस्मत दोनों का गहरा नाता होता है शायद दोनों एक दुसरे से बिमुख है इसलिए दयाराम जी वहा है कोई ना...काफी अच्छी कविता है और उतना ही अच्छा है कविता का विषय...

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя ने कहा…

सच ऐसे लोग विरले ही मिलते है,ज्ञान और किस्मत दोनों का गहरा नाता होता है शायद दोनों एक दुसरे से बिमुख है इसलिए दयाराम जी वहा है कोई ना...काफी अच्छी कविता है और उतना ही अच्छा है कविता का विषय...

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)