25 दिसंबर, 2010

बुद्धं शरणं गच्छामि !

...महात्मा बुद्ध के दूसरे उपदेशों की तरह ही हमारे देश के लोगों ने उनके सबसे प्रिय वन, ‘जेतवन’ को भी भुला दिया है। शायद यही वजह थी कि जिस टैक्सी से हम श्रावस्ती पहुंचे थे, उसका ड्राइवर उसी इलाके का होने के बाबजूद जेतवन के महत्व को नहीं जानता था...


“अरे सर, इस जंगल में भी जायेंगे क्या आप ? कुछ नहीं है इसमें...टिकट अलग से लगेगा। क्यों पैसे खर्च कर रहें हैं झाड़-झकांड़ देखने में...।” लेकिन हम तो आए ही थे इस झाड़-झकांड़ को देखने...इस पावन जंगल के दर्शन के लिए। “ये कोई साधारण जंगल नहीं है भाई…” इतना कहकर हम (मैं और मेरी पत्नी) गाड़ी से नीचे उतरे और प्रवेश के लिए टिकट खरीदकर जंगल में दाखिल हो चुके थे।
दरअसल, मुझे और मेरी पत्नी को हाल ही में बौद्ध धर्म के सबसे बड़े तीर्थ में से एक श्रावस्ती (शायद आठ बड़े तीर्थ में से एक) जाने का मौका मिला। सबसे बड़ा इसलिए, क्योंकि पूरे एशिया के एक बड़े हिस्से को अपने ज्ञान से उजियारा (‘लाईट ऑफ एशिया’) करने वाले महात्मा बुद्ध ने अपने जीवनकाल का एक बड़ा हिस्सा इसी जगह (यानि ‘जंगल’ में) बिताया था। ना केवल जीवन बिताया था बल्कि इसी जगह पर बौद्ध धर्म के अनुयायी और भिक्षुओं को ज्ञान बांटा था। यही ज्ञान, बौद्ध भिक्षु देश-विदेश में जाकर जनमानस तक पहुंचाते थे।
इसी पावन स्थली, श्रावस्ती पर है जेतवन नाम का वो ‘जंगल’, जिसे देखने के लिए हम वहां पहुंचे थे। लेकिन, शायद महात्मा बुद्ध के दूसरे उपदेशों की तरह ही हमारे देश के लोगों ने उनके सबसे प्रिय जंगल, ‘जेतवन’ को भी भुला दिया है। शायद यही वजह थी कि जिस टैक्सी से हम श्रावस्ती पहुंचे थे, उसका ड्राइवर उसी इलाके का होने के बाबजूद जेतवन के महत्व को नहीं जानता था।
कई सौ एकड़ में फैले जेतवन में घुसते ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अंदर ही अंदर में अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा था, कि मुझे ऐसी धरती पर कदम रखना का मौका मिला है जहां इतिहास में अग्रणी नाम रखने वाले महान गौतम बुद्ध ने पूरी 24 ऋतुएं गुजारी थी। जेतवन में जंगल से ज्यादा पुराने इमारतों के अवशेष अधिक है। इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पुराने अवशेषों को देखने मात्र से ही जीवन सफल हो जाता है। यहां तो हम उन अवशेषों में घूम रहे थे जहां कभी महात्मा बुद्ध रहा करते थे, भिक्षुओं को उपदेश देते थे। इसका सारा श्रेय जाता है पुरातत्व विभाग (एएसआई) को, जिसने बड़े ही करीने से इस जगह को संजोकर रखा है। वन में अब वृक्ष और इमारतों की बुनियादें (नींव) ही रह गई हैं। बुद्ध के निवार्ण (483 B.C) के सैकड़ों साल बाद तक उनके दिए उपदेशों को उनके अनुयायी और भिक्षु इसी जगह कलमबंद करते रहे थे।

श्रावस्ती में दाखिल होते ही एक शांत और सौम्य वातावरण का अहसास होने लगता है। हालांकि, जिस जगह आज ये श्रावस्ती बसा हुआ है, ये हमारे देश के सबसे पिछड़े इलाकों में प्रतीत होता है। श्रावस्ती, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर है और राप्ती नदी के किनारे बसा हुआ है। इसी (श्रावस्ती) नाम से अलग जिला बनाया गया है जिसका मुख्यालय भिनगा है। लेकिन प्राचीन समय में ऐसा नहीं था। उस वक्त श्रावस्ती को ‘सहेठ-महेठ’ के नाम से जाना जाता था। ईसा पूर्व में श्रावस्ती, भारत (आर्यवर्त) के 16 सबसे बड़े और संपन्न राज्यों (महाजनपद) में से एक, कौशल की राजधानी हुआ करती थी। महात्मा बुद्ध से पहले भी ये जगह बसी हुई थी। इसके प्रमाण यहां की पुरानी इमारतों में साफ दिखाई देतें हैं। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे काव्यों में इस जगह को ‘चंपकपुरी’ और ‘चंद्रिकापुरी’ के नाम से वर्णन किया गया है। पुरातत्व विभाग की खुदाई में यहां बौद्ध काल (563-325 ईसापूर्व) से काफी पहले की किलानुमा शैली की इमारतें (दाई तरफ फोटो देंखें) भी दिखाई पड़ती हैं।
बौद्ध धर्म के मुताबिक, जिस वक्त कौशल राज्य में प्रसन्नजीत नाम के राजा का शासन था, उस वक्त यहां एक धन्ना सेठ, अनाथपिण्डक (‘नगर श्रेष्ठ सुदत्त’ के नाम से भी जाना जाता था) भी रहता था। एक बार उसकी मुलाकात महात्मा बुद्ध से हुई और उन्हें श्रावस्ती आने का निमन्त्रण दिया। बुद्ध ने उसका निमत्रंण स्वीकार कर लिया। बुद्ध के प्रवास के लिए अनाथपिण्डक को जेतवन बेहद उपयोगी जगह लगी। इसके लिए उसने कौशल के राजकुमार से जेतवन खरीदने का आग्रह किया। कहते हैं कि राजकुमार ने इस जंगल की कीमत के बदले में सेठ अनाथपिण्डक से इतनी स्वर्ण मुद्रिकाएं मांगी कि जिससे पूरे जंगल की धरती ढक जाए। अपने गुरु को दान स्वरुप देने के लिए अनाथपिण्डक ने राजकुमार की शर्त पूरी की और जंगल को खरीद लिया। अनाथपिण्डक ने इस जंगल में बुद्ध के रहने के लिए कई इमारतें (बौद्ध विहार या बिहार), आश्रम और स्तूप बनवाए। ना केवल बुद्ध बल्कि इस जंगल के एक बड़े हिस्से में बड़ी तादाद में बौद्ध भिक्षुओं के रहने की जगह बनवाई। कई सभागार बनवाए जहां महात्मा बुद्ध इन भिक्षुओं को उपदेश देते थे।
इन्हीं इमारतों की बुनियादें मात्र रह गई हैं आज के जेतवन में। ऐसा नहीं है कि बौद्ध ग्रंथों में ही इस जगह का वर्णन मिलता है।

चीनी इतिहासकार, फा-ह्यान (गुप्त काल यानि तीसरी शताब्दी) और ह्वेन-सांग ( छठी शताब्दी हर्ष काल) ने जेतवन में कई मंजिला मंदिरों का बाखूबी जिक्र किया है। यही वजह है कि श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व भी काफी बढ़ जाता है।

चीनी इतिहासकार, फा-ह्यान (गुप्त काल यानि तीसरी शताब्दी) और ह्वेन-सांग ( छठी शताब्दी हर्ष काल) ने जेतवन में कई मंजिला मंदिरों का बाखूबी जिक्र किया है। यही वजह है कि श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व भी काफी बढ़ जाता है। जिस इमारत (‘गंध कुटी’) के बारे में इन चीनी इतिहासकारों ने मंदिर होने का दावा किया था, उस जगह जब हम पहुंचे तो पाया कि दर्जनों की तादाद में देशी-विदेशी पर्यटक और श्रद्धालु पूजा-अर्चना और ध्यान में लीन हैं। हालांकि, दोनों चीनी यात्रियों, फा-ह्यान और ह्वेन-सांग जब श्रावस्ती आये थे तो गंध कुटी (चंदन की लकड़ी से निर्मित होने के कारण ये नाम दिया गया होगा) की मात्र दो मंजिल ही रह गई थी, बाकी पांच मंजिले ध्वस्त हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने लोगों से सुना था कि ये मंदिर कभी सात मंजिला था और बुद्ध अपना अधिकतर समय इसी गंध कुटी में बिताते थे। इसीलिए शायद, पूरे जेतवन में ‘गंध कुटी’ को सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।

कहते हैं महात्मा बुद्ध को ये जगह काफी पसंद आ गई और वे हर वर्षा-ऋतु में यहां आकर प्रवास करने लगे। इस तरह उन्होंनें कुल 24 वर्षा-ऋतु इसी जेतवन में बिताई थी—अपने जीवन के शायद सबसे ज्यादा दिन बुद्ध ने यहीं बिताए थे। बुद्ध 29साल की उम्र में गृहस्थ जीवन को त्यागकर निवार्ण की खोज में जगह-जगह भटकते रहे। फिर गया में पीपल के एक पेड़ (बोधि-वृक्ष) के नीचे तपस्या में लीन होने के बाद जब ज्ञान की प्राप्ति हुई तो अपने “मज्झिमा प्रतिपदा” यानि ‘बीच के रास्ते’ का उपदेश देने के लिए जगह-जगह भ्रमण करते रहते थे। सिर्फ ऋतुकाल में ही वे प्रवास करते थे—जिसके लिए अनाथपिण्डक ने उनके लिए जेतवन तैयार कराया था। कहते हैं कि कुल 871 उपदेशों (सुत्रों) में से 844 सुत्र, महात्मा बुद्ध ने इसी जेतवन में दिये थे।
गया के बोधि-वृक्ष की भांति यहां भी ‘आनन्द बोधि वृक्ष’ है। कहते हैं कि बुद्ध के प्रिय शिष्य, आनन्द और महामौदगल्यायन के प्रयासों के चलते ही गया के महाबोधि वृक्ष की संतति तैयार की गई थी। इस संतति को अनाथपिण्डक ने जेतवन में लगाया (आरोपित) किया था। ये वृक्ष अब शायद बूढ़ा हो चला है इसी वजह से उसे रोकने के लिए लोहे के खंभों का सहारा दिया गया है। इस वृक्ष के चारों तरफ बड़ी तादाद में भिक्षु और साधारण स्त्री-पुरुष ध्यान में लीन थे। शायद इस आस में कि जिस तरह महाबोधि वृक्ष के नीचे अंतर्ध्यान लगाने से महात्मा बुद्ध को अध्यातम की प्राप्ति हुई, उन्हें भी इस वृक्ष की छत्र-छाया में ज्ञान की एक किरण प्राप्त हो जाए तो उनका भी जीवन सफल हो जाए।

श्रावस्ती का जिक्र हो और आंगुलीमाल (या अगुंलीमाल) का नाम ना आए, ऐसा भला कैसे हो सकता है। जेतवन के साथ-साथ ‘आंगुलीमाल की गुफा’ के लिए भी बेहद प्रसिद्ध है ये जगह। श्रावस्ती के आस-पास के लोग, जेतवन के लिए कम और डकैत आंगुलीमाल की गुफा (‘पक्की कुटी’ के नाम से भी जानी जाती है) के लिए ज्यादा पहचानते हैं। सही सुन रहें हैं आप ‘डकैत’ आंगुलीमाल । बौद्धकाल में इस इलाके में आंगुलीमाल नाम के एक खूंखार डकैत का आंतक था। कहते हैं कि जंगल और हाईवे से गुजरने वाले लोगों से वो लूटमार करता था और निशानी के तौर पर उनकी हाथ की एक अंगुली काटकर उसकी माला पहनता था—इसीलिए शायद उसका नाम ‘अंगुलीमाल’ पड़ा था। इधर-उधर विचरते हुए एक बार महात्मा बुद्ध की मुलाकात आंगुलीमाल से हुई। बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर उसने डाकू का चोला फेंका और उनका शिष्य बन गया।
लेकिन इस ढांचे को देखकर ये समझ नहीं आया कि ये वाकई गुफा है या कोई स्तूप या दोनों। क्योंकि, ऊपर (यानि बाहर का ढांचा) से तो ये एक स्तूप दिखाई पड़ता है। लेकिन स्तूप के अंदर करीब 15 से 20 मीटर लंबी एक गुफा है। ये ‘गुफा’ सहेठ-महेठ से थोड़ी दूरी पर है या ये कह सकते है कि शहर से बाहर दिखाई पड़ती है। हो सकता है जब डाकू आंगुलीमाल की महात्मा बुद्ध से मुलाकात हुई तो वो इसी गुफा में निवास करता हो। जब वो बौद्ध भिक्षु बना तो लोगों ने इस गुफा के ऊपर स्तूप बनावा दिया हो। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह स्तूप किसी महिला का था,जिसे आंगुलीमाल ने अपने तपोबल से प्रसव पीड़ा से मुक्त कर माता और उसके नवजात शिशु को नई जिंदगी दी थी। इतिहासकारों की मानें तो ये स्तूप गिरने की कगार पर था जिसके चलते इसके नीचे से बरसाती पानी निकालने के लिए एक गुफा का निर्माण किया गया था। लोग अनजाने में ही इस जगह को ‘आंगुलीमाल गुफा’ के नाम से बुलाने लगे। गुफा के अंदर जली हुई ईंटें साफ दिखाई पड़ी रही थी। शायद, ये उन आक्रंताओं के निशान थे जिन्होने श्रावस्ती पर समय-समय पर आक्रमण किए, लूटखसोट मचाई, बड़ी तादाद में बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम किया और पूरे शहर को ध्वस्त कर किया था। इन आक्रंताओं में सबसे प्रमुख थे, हूण राजा मिहिरकुल (छठी शताब्दी) और अलाउद्दीन खिलजी (13-14वी शताब्दी)।
गुफा के ठीक सामने है ‘कच्ची कुटी’। वास्तुशिल्प से तो ये भी कोई स्तूप या महल दिखाई पड़ता है। लेकिन पुरातत्व विभाग आजतक इस ढांचे के बारे में ठीक-ठीक से कोई मत नहीं निकल पाया है। ये बात और है कि यहां के लोग इसे महादानी अनाथपिण्डक (‘सुदत्त’) के निवास-स्थल के नाम से जानते हैं।
श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि

सम्राट अशोक ('देवानं प्रिय-प्रियदर्शी') ने यहां भी एक शिलालेख लगवाया था। इतिहास की पुस्तकों में इस बात का बाकयदा जिक्र किया गया है। लेकिन कई लोगों से पूछने पर भी वो जगह कहीं नहीं मिली जहां ये शिलालेख है।

सम्राट अशोक ('देवानं प्रिय-प्रियदर्शी') ने यहां भी एक शिलालेख लगवाया था। इतिहास की पुस्तकों में इस बात का बाकयदा जिक्र किया गया है। लेकिन कई लोगों से पूछने पर भी वो जगह कहीं नहीं मिली जहां ये शिलालेख है। किसी ने बताया कि शिलालेख को पुरातत्व विभाग ने म्यूजियम भेज दिया है। एक-दो लोगों ने बताया कि उस शिलालेख को यहां के लोग शिवलिंग के रुप में पूजा करते हैं और आस-पास के किसी गांव में वो मंदिर है जहां इस शिलालेख की पूजा की जाती है। गौरतलब है कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर अपने साम्राज्य के हर कोने में शिलालेख खुदवाये और लगावाये थे जिनपर बौद्ध धर्म की महत्ता और गुणगान किया गया था।
तीर्थ-पर्यटक स्थल के तौर पर श्रावस्ती को अपना मुकाम बनाने में शायद वक्त लगेगा। जरुरी है कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं इस ओर ध्यान दे कि यहां आने वाले पर्यटकों को सही जानकारी मिल जाए। केवल बौद्ध-परिपथ बनाने से ही काम नहीं चलेगा। दरअसल, सारनाथ (वाराणसी), श्रावस्ती, कपिलवस्तु और लुंबिनी जैसे बौद्ध तीर्थ स्थलों को आर्कषक बनाने के लिए इन जगहों को एक साथ जोड़ने की प्रकिया चल रही है और इस हाईवे को ‘बौद्ध परिपथ’ का नाम दिया गया है। क्योंकि अपने जीवन-काल में महात्मा बुद्ध इसी रास्ते से होकर सारनाथ, श्रावस्ती और दूसरी जगह भ्रमण पर जाते थे।
लेकिन, शिलालेख को शिवलिंग की तरह पूजने का सुनकर मैं थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था कि आखिर बौद्ध धर्म का जिस देश में जन्म हुआ था, वही से खत्म क्यों होने लगा। जबकि, एशिया के बाकी देशों (जैसे चीन, बर्मा, नेपाल, तिब्बत, भूटान, थाईलैंड, श्रीलंका इत्यादि) में बड़ी तादाद में बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।


यही वजह है कि श्रावस्ती में एशिया के कई देशों के अलग-अलग बौद्ध मंदिर है। लेकिन इन सबमें सबसे बड़ा और अनूठा है थाई मंदिर, महामंगलोए मंदिर (ऊपर वाली फोटो)। कई हजार एकड़ में फैले इस मंदिर का निर्माण कार्य अभी जारी है। इस मंदिर को थाईलैंड की एक बौद्ध संस्था बनावा रही है। इस मंदिर के परिसर में बुद्ध की अदम्य मूर्ति लगी हुई है। मंदिर के अंदर बेहद ही शांत वातावरण रहता है। उससे भी अच्छा यहां कार्यरत थाई भिक्षुणी हैं जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं से इतने सभ्य तरीके से पेश आते है जिसकी मिसाल कही और देखने को नहीं मिल सकती। भले ही उनमें से बहुत को ठीक-ठीक से हिंदी या इंग्लिश भी ना आती हो लेकिन वे सभी अपने सौम्य व्यवहार से यहां दर्शन करने आने वाले लोगों को मुग्ध करती हैं। गरीब हो या अमीर, अच्छे कपड़े पहने हुए हो या फिर कोई देहाती, सभी को वहां तैनात भिक्षुणी बड़े ही आदर के साथ मंदिर के अंदर ले जाती और (आध्यात्मिक) ध्यान और उपदेशों (बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, सघं शरणं गच्छामि...) के उच्चारण करने की प्रकिया बताती हैं।

थाई मंदिर के उलट जब हम श्रावस्ती से कुछ किलोमीटर दूर बने हिंदुओं के पवित्र स्थल, देवीपाटन पहुंचे तो एहसास हो गया कि क्यों हजारों साल पहले बौद्ध धर्म यहां के जनमानस के दिलों-दिमाग में बैठ गया था।

क्यों हिंदु धर्म पतन की दिशा में जा रहा था, जिसके चलते ही राजकुमा सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध (या गौतम बुद्ध) बनना पड़ा और हिंदु धर्म में सुधार की जरुरत पड़ी। क्यों बड़ी तादाद में शूद्र, दलित, निर्बल और असहाय लोगों ने हिंदु धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म का दामन थामा—जो अभी भी जारी है।

क्यों हिंदु धर्म पतन की दिशा में जा रहा था, जिसके चलते ही राजकुमा सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध (या गौतम बुद्ध) बनना पड़ा और हिंदु धर्म में सुधार की जरुरत पड़ी। क्यों बड़ी तादाद में शूद्र, दलित, निर्बल और असहाय लोगों ने हिंदु धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म का दामन थामा—जो अभी भी जारी है। श्रावस्ती जिला, देवीपाटन रेंज के अंन्तर्गत आता है। इस रेंज में आने वाले दूसरे जिले हैं, गोंडा, बहराइच और बलरामपुर। इस इलाके में हिंदुओं का शक्तिपीठ है ‘देवीपाटन’। इसी नाम से चार जिलों का बनाकर एक रेंज इसी नाम से बनाई गई है।

श्रावस्ती से लौटने के बाद हम पहुंचे इस पवित्र मंदिर में। लेकिन यहां पहुंचते ही मंदिर परिसर में बने यात्री-निवास के संचालक से तू-तू-मैं-मैं हो गई। हुई किस बात को लेकर, यात्री-निवास के बाथरुम को इस्तेमाल को लेकर। ‘बाहर’ के लोग बाथरुम इस्तेमाल नहीं कर सकते— क्योंकि पता नही कौनसी जाति या धर्म के हैं! ये है हमारे देश के मंदिरों और वहां काम करने वाले लोगों की हालत। मंदिर में दर्शन से पहले अगर किसी को साफ-सफाई पर ध्यान देना है तो बाहर सड़क पर जाओ, मंदिर में नहीं। मंदिर परिसर में बने सार्वजनिक शौचालय को शाम ढलते ही केयरटेकर शराब के नशे में बंद करके कही चला गया था। जिसके चलते ही हम यात्री-निवास पहुंचे थे लेकिन वहां के संचालक ने साफ मना कर दिया कि यहां ‘नहीं एंट्री’ कर सकते। एक आम शहरी के तौर पर जो पहुंचे थे हम वहां। वहां के संचालकों से शिकायत करने का भी कोई फायदा नहीं हुआ।
खैर बाथरुम को वही छोड़कर हम मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचे तो पूजा की सामग्री जैसे ही वहां बैठे भारी-भरकम शख्स (शायद पुजारी था) की तरफ बढ़ाई तो उसने चेहरा देखा और पास खड़े एक कम उम्र के चेले को बुलाया और हमारी पूजा सामग्री ‘देवी’ के सामने अपर्ण कर दी। उस पुजारी ने हाथ आगे तक नहीं बढ़ाया। शायद वो सिर्फ वीवीआईपी श्रद्धालुओं की ही पूजा-सामग्री देवी के सामने अपर्ण करता था।
बौद्ध मंदिर (थाई मंदिर) और एक हिंदु मंदिर (देवीपाटन) में छोटे-बड़े का अंतर साफ दिखाई दे रहा...क्या हमारे देश में फिर किसी दूसरे ‘महात्मा बुद्ध’ की दरकार है ?

3 टिप्‍पणियां:

vineet kumar pathak ने कहा…

nice story of your journey to shrawasti and devi patan.

Harsh Mohan ने कहा…

पढ़कर अच्छा लगा...मन प्रसन्न हुआ...इस प्रकार का ऐतिहासिक शोधपूर्ण रचनाओं की नितांत आवश्यकता है...हर्षमोहन....
http://harshmk.blogspot.com
harshmk333@yahoo.com

अली शोएब सैय्यद ने कहा…

कोई भी यात्रा वृतांत जब रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाये तो मन में यह एहसास होता है की हम भले ही शब्दों के माध्यम से पर शायद उसी स्थान पर मौजूद हैं जहां की गाथा सुनायी जा रही है...नीरज जी आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं...साधूवाद आपको

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)