30 अक्तूबर, 2011

खबरें बिकती हैं !

हाल ही में चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के एक बाहुबली नेता की विधायक पत्नी की विधानसभा की सदस्यता रद्द कर दी। ये शायद पहली बार था कि किसी विधायक को इसलिए पद से हटा दिया गया क्योंकि चुनाव के दौरान उसने पैसे देकर अखबार में खबर प्रकाशित कराई थी। लोगों का ध्यान सिर्फ इस तरफ गया कि विधायक की सीट चली गई थी। पैसे देकर खबर यानि ‘पेड न्यूज’ छापने वाले जिन अखबारों की वजह से (महिला) विधायक की गद्दी गई, उन्होंने भी इस खबर को प्रमुखता से अपने-अपने अखबारों में जगह दी। लेकिन सवाल ये है कि क्या दूर-दराज के इलाकों में ही ये पेड न्यूज सीमित है? इसका जबाब साफ शब्दों में है, 'नहीं'।

राजधानी दिल्ली में भी ये ‘महामारी’ बाकायदा अपनी जड़े फैला चुकी है। देश के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार की पोल तो विदेशी पत्र-पत्रिकांए खोल चुकी हैं। नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजी अखबार को अपनी पेज-3 पत्रिका पर ये साफ तौर पर लिखना पड़ा कि ये खबरें विज्ञापन या फिर प्रोमशनल खबरें हैं। लेकिन हकीकत ये है कि पेड न्यूज सिर्फ अखबारों तक ही सीमित नहीं है। ये महिषासुर रुपी ‘दानव’ न्यूज चैनलों में भी घुस चुका है। लेकिन इससे पहले की ये महामारी हम सभी को ग्रसित कर दे, जरुरत है इसके खिलाफ सख्त और कारगर कदम उठाने की।

पेड न्यूज का चलन कई सालों से चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ये ट्रैंड सिर्फ और सिर्फ इलेक्शन के दौरान तक ही सीमित था। वो भी दूर-दराज के इलाकों में स्थानीय अखबारों तक ही इसका दायरा था। चुनाव में अपना भाग्य आजमाइश करने वाले उम्मीदवार पैसे देकर अपने से जुड़ी खबरें (आसान शब्दो में कहें तो ‘पीआर’ न्यूज) अखबारों में छपवाते थे। अधिकतकर ये उम्मीदवार इलाके के छुटभैया नेता होते थे, जो अपने छोटे-मोटे (सामाजिक) कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर छपवाते थे। ये नेता अमूमन स्थानीय पत्रकारों (रिपोर्टर या स्ट्रिंगर) से सांठ-गांठ कर या यूं कहें की उनकी जेब गरम कर विज्ञापनों को खबर की शक्ल में छपवाते थे। कभी-कदाक ब्यूरो चीफ या फिर स्थानीय संपादकों को भी इसका हिस्सा पहुंच जाता था।

लेकिन जब अखबार के मालिकों तक ये फुसफुसाहट पहुंची कि उनके रिपोर्टर और संपादक तक इलेक्शन के दौरान अपनी जेबें भरते हैं तो उनके कान खड़े हो गए। मालिक तो आखिर मालिक ठहरें, सो उन्होंनें चुनाव के दौरान पैसों वाली खबरों के लिए अखबार में अलग जगह बनवा दी—विज्ञापन और खबरों के बीच। यानि जो काम पहले चोरी-छिपे होता था, उसे अब ‘कानूनी’ जामा पहनाने की जुगत शुरु हो चुकी थी। इस तरह की खबरों पर रंग पोत दिया गया। दरअसल, अखबार मालिक इन खबरों को बाकी खबरों से अलग दिखाना चाहते थे। उनके मन में एक तरफ डर था कि ‘लोग क्या कहेंगे’। वही दूसरी तरफ
इन अखबार के लाला-मालिकों को अपना ‘बिजनेस’ भी बढ़ाना था। हिंदी अखबारों में चुनाव के दौरान ये ‘रंगीन’ खबरें अलग ही दिखाई देने लगीं। जिसे समझ में आ गया कि इन रंगीन खबरों का क्या मतलब है तो आ जाए—हमने तो इन खबरों को रंग-पोत कर पाठकों को आगह तो कर दिया है कि, भई ये विज्ञापन नुमा खबरें हैं।
इन अखबार के लाला-मालिकों को अपना ‘बिजनेस’ भी बढ़ाना था। हिंदी अखबारों में चुनाव के दौरान ये ‘रंगीन’ खबरें अलग ही दिखाई देने लगीं। जिसे समझ में आ गया कि इन रंगीन खबरों का क्या मतलब है तो आ जाए—हमने तो इन खबरों को रंग-पोत कर पाठकों को आगह तो कर दिया है कि, भई ये विज्ञापन नुमा खबरें हैं। जिस पाठक की समझ नहीं आया कि इन रंगीन खबरों का मतलब क्या है तो और भी अच्छा है। किसी-किसी अखबार में इन रंगीन खबरों के कोने में छोटा सा लिखा भी रहता था—‘विज्ञापन’। अब ये पढ़ने वाले पर है था कि उसे क्या ये ‘विज्ञापन’ लिखा हुआ समझ आता है या नहीं। प्रेस काउंसिल का भी डर नहीं है कि भई ये खबर छपी है या विज्ञापन।
लेकिन धीरे-धीरे इसी विज्ञापन नुमा खबर ने कब देश-दुनिया की खबरों के बीच में अपनी पैठ (सही कहें तो जगह) बना ली किसी को पता तक नहीं चला। दरअसल, रंगीन खबरों को देखकर (माफ कीजिए पढ़कर) लोग इन अखबारों की विश्वस्नीयता पर सवाल करने लगे थे। इसीलिए इस तरह की चुनावी विज्ञापनों पर से रंग उतार दिया गया और ब्लैक एंड व्हाइट खबरों के बीच में ही छिपा दिया गया। जिसका गवाह बना उत्तर-प्रदेश का बिसौली विधानसभा।


मुझे याद है कि दिल्ली में जब एमसीडी (स्थानीय निकाय, दिल्ली नगर निगम) का चुनाव हुआ तो मैं एक ऐसे न्यूज चैनल समूह से जुडा़ था जिसका अपना एक राष्ट्रीय चैनल तो था ही कई प्रादेशिक चैनल भी थे। समूह का अपना हिंदी अखबार और कई मैग्जीन थीं। इसी क्रम में समूह ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानि दिल्ली-एनसीआर (दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव) के लिए एक चैनल खोला था। इस चैनल के शुरुआत से ही मैं जुड़ गया था। चैनल ने आते ही दिल्ली में अपना डंका पीटना शुरुना कर दिया। मुझे अभी भी अच्छे से याद है कि हमारे चैनल की क्राइम रिपोर्टिंग से दूसरे नेशनल न्यूज चैनल के दिल्ली क्राइम ब्यूरो खौफ खाने लगे थे। दिल्ली-एनसीआर की शायद ही कोई ही बड़ी क्राइम खबरें होगी जो हमारे चैनल में ना ‘ब्रेक’ होती हो। आलम ये था कि जिन क्राइम रिपोर्टर्स ने ये चैनल छोड़कर दूसरे ‘बड़े’ चैनल ज्वाइन किए थे, वो हमारे चैनल के एसाइनमेंट पर फोन कर हमारी खबरों की डिटेल (जानकारी) लेते थे। जल्द ही चैनल टॉप पर था।
लेकिन टॉप पर रहने का हमें एक नुकसान हुआ। दिल्ली चैनल के हेड का प्रमोशन हुआ और उन्हें नेशनल न्यूज चैनल की डूबती नैय्या को पार करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। फिर क्या था उसके बाद तो चैनल में गंद—पैसों की गंद—शुरु हो गई। शायद एमसी़डी के चुनाव उसके लिए कई हद तक जिम्मेदार थे। या यूं कहें कि चुनावों की आड़ में चैनल का मैनजमेंट और बॉस जिम्मेदार थे। चैनल के मैनेजमेंट में शायद कोई समूह के ही अखबार से जुड़ा होगा। एक दिन चैनल के टॉप अधिकारियों की बैठक हुई और हमें यानि रिपोर्टर्स को एक ‘खास और खुफिया’ काम सौंपा गया।
चैनल के ‘पुराने चावलों’ को हम तक ये खास काम कराने का मैसेज पहुंचाया गया। बताया गया कि सभी रिपोर्टर्स, भले ही उनकी कोई भी बीट हो, एमसीडी इलेक्शन की कवरेज में जुटना है। एक रीजनल चैनल के हिसाब से नगर निगम के चुनाव हमारे लिए एक बड़ी खबर थी, हमें अपनी बीट छोड़ने में कोई गुरेज नहीं था। अखबार के दिनों में भी भले ही मेरी बीट क्राइम रही हो, लेकिन उससे पहले हुए एमसीडी चुनाव में भी मैने इलेक्शन-रिपोर्टिंग की थी। लेकिन तभी उस ‘खास’ काम के साथ एक ‘खुफिया’ काम भी सौंपा गया। वो खुफिया काम था चैनल के लिए ‘रेवेन्यू जेनरेट’ करना। सीधे शब्दों में पैसा जुटाना। यानि अब रिपोर्टिंग के साथ-साथ ‘मार्केटिंग’ का भी काम करना था। रेवेन्यू कैसे इकठ्ठा करना ये भी समझाया गया। “करना कुछ नहीं है सिर्फ आपको मॉनेटरिंग करनी है, बाकी का काम स्ट्रिंगर संभाल लेंगे… आप सभी (रिपोर्टर्स) के साथ दो-दो स्ट्रिंगर ‘अटैच्ड’ किए जायेंगे… सभी को अलग-अलग पार्टी और एरिया दिया जायेगा… कोई ‘कन्फूयजन’ नहीं होगा”, एक पुराने चावल ने गुटखे का पीक थूकते हुए कहा। दूसरा बोला, “ये (...बीप) स्ट्रिंगर बहुत तेज होते हैं, इनपर काबू करना बहुत जरुरी है । ” मैनेजमेंट चाहता है कि आप रिपोर्टंग के साथ-साथ चैनल का रेवन्यू भी बढ़ाएं।
साफ निर्देश दिए गये कि चुनाव में खड़े होने वाले सभी पार्टियों के उम्मीदवारों को ‘पकड़ना’ हैं। यहां तक की जबतक सभी पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी ना कर दें, तबतक ‘संभावित’ उम्मीदवारों को भी नहीं छोड़ना हैं। टिकट के जितने भी दावेदार हैं वे सभी ‘दुधारी गाय’ हैं। “चुनाव का ही वक्त ऐसा होता है जब इनका दूध निकाला जा सकता है।” करना कुछ नहीं है, बस जितने भी उम्मीदवार हैं उन सभी को ‘लाइव-चैट’ पर लाना है और इस काम के लिए उनकी “रेट-लिस्ट” बनाओ। जगह-जगह लोगों से ‘बोल दिल्ली बोल’ के नारे लगवाओ, नेता खुद-ब-खुद खींचे चले आयेंगे। उम्मीदवारों को लोगों के बीच लाकर भिड़वाओं। नेताओं को लाइव पर लाने का काम स्ट्रिंगर करेंगे। भीड़ खुद नेता जुटायेंगे। जो भी नेता आयेगा वो अपने समर्थक लेकर आयेगा। उन्हीं नेताओं से मेज-कुर्सी और शामियाने का इंतजाम कराओ। शामियाना नहीं मिला तो खुले पार्क में नेताओं का भिड़वाओं। लेकिन जैसे भी हो कुछ तो करना पड़ेगा बॉस।

“मैनजमेंट ने साफ निर्देश दिए हैं कि आपके चैनल से कोई रेवेन्यू नहीं मिल रहा है। उल्टा चैनल चलाने के लिए मैनेजमेंट को पैसा देना पड़ता है।”, चैनल के पुराने और वफादार लोग बोल रहे थे। जो बातें खुले तौर पर नहीं बोली जा रही थीं, उन्हे एक दूसरे के कान में फुस-फुसाहट के जरिये सभी चैनल के कर्मचारियों (पत्रकार कहना तो बेमानी ही था) तक पहुंचायी जा रही थी। किसी भी दिन चैनल बंद करने की नौबत आ सकती है। इसलिए चैनल बंद होने से बेहतर है कि मैनेजमेंट के लिए पैसा कमाओ।
लेकिन एक रिपोर्टर ने पूछ ही लिया, “सर इसमें हमारा क्या फायदा होगा।” अरे यार, फायदा क्यों नहीं होगा। “देखो, नेताओं को लाइव पर लाने के लिए हम पैसा लेंगे। मोल-भाव का काम स्ट्रिंगर का रहेगा। तुम्हें उसमें नहीं पड़ना है। बस तुम्हें ये देखना है कि स्ट्रिंगर कितने पर तय कर रहा है।
जितना भी भाव तय होगा उसका दस प्रतिशत रिपोर्टर और पांच प्रतिशत स्ट्रिंगर को दिया जायेगा। बाकी मैनेजमेंट के खाते में जायेगा।” तो सर, ये काम तो स्ट्रिंगर ही कर सकता है, दूसरे रिपोर्टर ने पूछ लिया। फिर वही बात, अरे यार तुम्हें बताया ना कि ये स्ट्रिंगर बहुत ‘तेज’ होते हैं। लेंगे 10 रुपये और बतायेंगे 5 रुपये। तुम्हें ये ध्यान रखना है कि पूरे दस की ही ‘पर्ची कटे’
जितना भी भाव तय होगा उसका दस प्रतिशत रिपोर्टर और पांच प्रतिशत स्ट्रिंगर को दिया जायेगा। बाकी मैनेजमेंट के खाते में जायेगा।” तो सर, ये काम तो स्ट्रिंगर ही कर सकता है, दूसरे रिपोर्टर ने पूछ लिया। फिर वही बात, अरे यार तुम्हें बताया ना कि ये स्ट्रिंगर बहुत ‘तेज’ होते हैं। लेंगे 10 रुपये और बतायेंगे 5 रुपये। तुम्हें ये ध्यान रखना है कि पूरे दस की ही ‘पर्ची कटे’।
‘इनपुट’ के कर्ताधर्ता बोलते चले जा रहे थे, “एक और फायदा है तुम जैसे रिपोर्टर्स का इसमें। तुम्हारा चेहरा भी तो ‘चमकेगा’ ना। जिस रिपोर्टर के इलाके में ‘बोल दिल्ली बोल’ के नारे लगेंगे, वहां वही रिपोर्टर लाइव-एंकरिंग करेगा। वैसे भी तुमसे स्टोरी (खबर) तो कोई होती नहीं है। इस बहाने तुम्हारी रिपोर्टिंग भी हो जायेगी और टी.वी पर भी दिख जाओगे।”
ये सब चिकनी-चुपड़ी बातें सुनकर अधिकतर रिपोर्टर्स की बांछे खिल गई। “ अरे यार मेरी सैलरी तो मुश्किल से 10 हजार है। अगर एक-एक लाख के चार-पांच मुर्गे भी फंस गए तो एक महीने में ही 40-50 (हजार) कही नहीं गए। ऊपर से एंकरिंग भी। कई बार एंकरिंग का टेस्ट दिया, हर बार फेल कर देतें हैं। इस बहाने क्या पता स्टूडियो एंकरिंग का भी चांस मिल जाये। ”
लेकिन इन रिपोर्टर्स के बीच एक-दो ऐसे भी रिपोर्टर थे, जिन्हे ये बात बिल्कुल नागवार गुजरी। “लेकिन सर, मार्केटिंग टीम का काम हम लोग क्यों करेंगे। ये तो पत्रकारिता के सिद्वांतों के खिलाफ है। ” जबाब मिला, अगर किसी को कोई परेशानी है तो बॉस (चैनल हेड) से जाकर बात करले। “हम जो ये बाते कर रहें है, वे उनके ही आदेश पर हो रहा है। हम अपनी तरफ से कुछ नहीं कह रहें हैं। ”
मेरी समझ में बिल्कुल साफ आ चुका था। भाई जिन सिद्धांतों को आर्दश मानकर हम ‘कुछ’ करने के लिए पत्रकारिता में शामिल हुए थे, वो धराशायी होते दिख रहे थे। लेकिन मैं ठान चुका था कि ‘बाजारु-पत्रकारिता’ नहीं करनी है। मैंने चैनल हेड तक अपनी बात पहुंचा दी थी। “अगर सभी रिपोर्टर इलेक्शन कवरेज में झोंक दिए गए तो क्राइम की खबरों का क्या होगा…वीकली क्राइम शो भी तो निकालना हैं। ” लिहाजा मुझे एमसीडी चुनावों से छुट्टी मिल गई थी।
दिल्ली नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे थे। सभी रिपोर्टर और ‘उनके’ स्ट्रिंगर चैनल का ‘रेवेन्यू’ बढ़ाने में जुट चुके थे।
न्यूजरुम में सुबह दस बजे से लेकर रात तक यही चर्चा रहती थी कि फलां नेता ने आज के इलेक्शन कवरेज के लिए टेंट शामियाने का इंतजाम किया कि नहीं...कौन कितने सर्मथक लेकर पहुंच रहा है..अरे भाई सर्मथक नहीं आए तो ‘लाइव’ में “मजा कैसे आयेगा।” शायद ही कोई सा दिन ऐसा बचा होगा कि जिस दिन लाइव कवरेज के दौरान नेताओं के सर्मथकों में जूतम-पैजार ना होता और जिस दिन पुलिस को बीच-बचाव ना करना पड़ा हो।
न्यूजरुम में सुबह दस बजे से लेकर रात तक यही चर्चा रहती थी कि फलां नेता ने आज के इलेक्शन कवरेज के लिए टेंट शामियाने का इंतजाम किया कि नहीं...कौन कितने सर्मथक लेकर पहुंच रहा है..अरे भाई सर्मथक नहीं आए तो ‘लाइव’ में “मजा कैसे आयेगा।” शायद ही कोई सा दिन ऐसा बचा होगा कि जिस दिन लाइव कवरेज के दौरान नेताओं के सर्मथकों में जूतम-पैजार ना होता और जिस दिन पुलिस को बीच-बचाव ना करना पड़ा हो। दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने अपने आला-कमान को ‘मैसेज’ पहुंचा दिया था कि अगर चैनल को इस तरह की कवरेज करनी है तो पहले पुलिस-थाने से अनुमति लेनी ही पड़ेगी। “खुले-आम कानून-व्यवस्था का मजाक नहीं बनने दिया जायेगा।”

लेकिन रह-रहकर मुझे एक बात खाए जा रही थी। आखिर मैं ये किस दल-दल में फंस गया हूं। कभी सोचा नहीं था कि मैं ऐसे चैनल में काम करुंगा जहां पैसों के लिए खबरें करनी पड़ेंगी। या खबरों के लिए पैसे लेने पड़ेंगे। जहां पैसों के लिए खबरों को बेचा नहीं जाता था बल्कि पैसों के लिए खबरों को ‘बनाया’ जा रहा था। इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि जल्द ही मुझे दूसरे चैनल से नौकरी का ऑफर मिल गया। फिर क्या था, तनिक भर भी इंतजार किए बगैर मैने एमसीडी चुनाव से पहले ही दिल्ली-एनसीआर के उस चैनल से इस्तीफा दे दिया।
चुनाव खत्म होने के बाद मुझे कई चौकाने वाली बातें पता चली अपने उस चैनल के बारे में जिसे जी-जान लगाकर हमने दिल्ली-एनसीआर में सींचा था। पता चला कि
चैनल को कोई खास रेवेन्यू हाथ ही नहीं लगा था। सबकुछ रिपोर्टर-स्ट्रिंगर की जोड़ी ने अपनी झोली में डाल लिया था। पता चला कि जितना पैसा नेता इलेक्शन कवरेज के लिए देते थे। उसका आधा हिस्सा खुद रिपोर्टर-स्ट्रिंगर ने रख लिया था और बाकी 50 प्रतिशत ही चैनल के खाते में जाता था। चैनल के हिस्से में से भी 10 और 5 प्रतिशत रिपोर्टर और स्ट्रिंगर को मिलना ही था।
चैनल को कोई खास रेवेन्यू हाथ ही नहीं लगा था। सबकुछ रिपोर्टर-स्ट्रिंगर की जोड़ी ने अपनी झोली में डाल लिया था। पता चला कि जितना पैसा नेता इलेक्शन कवरेज के लिए देते थे। उसका आधा हिस्सा खुद रिपोर्टर-स्ट्रिंगर ने रख लिया था और बाकी 50 प्रतिशत ही चैनल के खाते में जाता था। चैनल के हिस्से में से भी 10 और 5 प्रतिशत रिपोर्टर और स्ट्रिंगर को मिलना ही था। लेकिन मैनेजमेंट से ये बातें ज्यादा दिन तक छिपी नहीं रहीं कि किस इनपुट और एसाइन्मेंट के बंदे ने एमसीडी चुनाव में कितने न्यारे-वारे किए हैं। चुनाव के फौरन बाद किस रिपोर्टर ने अपने घर के सभी कमरों में एसी लगवाया है.... किसने नई कार खरीदी है... नोएडा से सटे वसुंधरा में फ्लैट बुक किया है।
जल्द ही चैनल के कई रिपोर्टर्स का तबादला दिल्ली से बाहर कर दिया गया। इनपुट और एसाइनमेंट के कई दिग्गजों को समूह के ही किसी दूसरे चैनल में ले जाकर डाल दिया गया। कई को नौकरी से ही बाहर कर दिया गया। करीब दो-तीन साल में ही चैनल का बंटाधार हो चुका था। जिस चैनल ने पूरे समूह की धाक दिल्ली-एनसीआर में बनाई थी, उस चैनल की काली-हकीकत सबके सामने आ चुकी थी। नेता से लेकर सरकारी बाबू और आम आदमी भी जान चुका था ये हकीकत। नतीजा, कुछ ही सालों बाद चैनल दिल्ली-एनसीआर से अपना बोरी-बिस्तर समेट चुका था।
अब लगातार पेड न्यूज के बारे में खबरें आ रही हैं। जाहिर है ये खतरे की घंटी सभी पत्रकारों के लिए है। अगर इससे अभी नहीं सचेते तो सभी का हश्र वही होगा जैसे हमारे उस दिल्ली-एनसीआर के रीजनल चैनल का हुआ था।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

सर, आपने जो कुछ कहा सौ फीसदी सच है..लेकिन पांच साल बाद भी कुछ खास बदलाव नहीं आया है..इस बार भी न्यूज़ चैनल्स और अखबारों ने पैसा जुटाने की तैयारी शुरू कर रखी है..ये बात और है कि ये काम बड़े चैनल्स काम, छोटे लालाओं के चैनल ज्यादा कर रहे हैं..

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)