28 मई, 2013

नक्सल समस्या और सेना का इस्तेमाल

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में राज्य के कई बड़े नेताओं सहित दो दर्जन से ज्यादा लोगों की हत्याओं के बाद से कयास लग रहे थे कि नक्सली समस्या से निपटने के लिये सेना का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लेकिन रक्षा मंत्री ने दो टूक शब्दों में साफ इंकार कर दिया है कि नक्सलियों से निबटने के लिए आर्मी का इस्तेमाल नहीं किया जायेगा।
यानि छत्तीसगढ़ पुलिस और केन्द्रीय अर्ध-सैनिक बलों को ही नक्सलियों से दो-दो हाथ करने पड़ेंगे। ना केवल दो-दो हाथ करने पड़ेगे बल्कि नक्सली समस्या को जड़ से खत्म करने में राज्य और केन्द्रीय सरकार की हर संभव मदद करनी पड़ेगी। भले ही नक्सली हिंसा पर उतारु हैं और नेताओं का क़त्ले-आम कर रह हैं लेकिन खुद भारतीय सेना और सरकार को लगता है कि उनसे निजात पाने के लिए अपनी ही सेना का इस्तेमाल बिल्कुल गलत है। सेना का मानना है कि ‘वे भी अपने ही लोग हैं’। यानि नक्सलियों को सेना अपने ही देश का मानती है। आर्मी कदापि नहीं चाहती कि सेना के जवान अपने ही देश के लोगों पर गोलियां बरसाये।

रक्षा मंत्री का सरकार के कई बड़े मंत्रियों से इस फैसले पर कई बार टकराव भी हुआ था। केन्द्र सरकार में ऊंचे ओहदे वाले एक पूर्व गृह मंत्री चाहते थे कि नक्सलियों के उन्मूलन के लिए सेना का इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन रक्षा मंत्री इस के पक्ष में नहीं थे। इसके कई कारण थे। पहला तो ये कि सेना को एक साथ दो-दो सीमाओं पर अपने चिर-परिचित प्रतिदंदियों से मुकाबला करना होता है। पाकिस्तानी सेना आये दिन एलओसी पर सीजफायर का उल्लंघन करती रहती है। जिसके लिये सेना को हमेशा पश्चिमी सीमा पर सजग रहना पड़ता है। सीमा पर फायरिंग की आड़ में पाकिस्तानी सेना हमारे देश में घुसपैठियों को दहशतगर्दी के लिए भेजती रहती है। वहीं दूसरी और चीन की सेना हमारे सीमा में घुसपैठ करती रहती है। ‘दुश्मन नंबर वन’ यानि चीनी सेना के नापाक इरादों को नेस्तानबूत करन के लिये सेना की मौजदूगी एलएसी यानि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर बेहद जरुरी है। ऐसे में सेना को देश के अंदर नक्सलियों से निबटने के लिए भेजना सही फैसला नहीं है।

 दूसरा ये कि सेना जम्मू-कश्मीर और नार्थ-ईस्ट के कई राज्यों में स्थानीय पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों के साथ आतंकवाद से निबटने के लिये मदद कर रही है। कुछ लोगों का मानना है कि जब सेना जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में ‘अपने लोगों पर गोली चला सकती है’ तो नक्सल-प्रभावित इलाकों में क्यों नही। ये कुछ हद तक सही तर्क हो सकता है। आखिर पंजाब में आंतकवाद के दौर में भी तो सेना का इस्तेमाल किया गया था। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को भला कोई भूला सकता है, जब सेना के टैंक तो अमृतसर में सिखों के सबसे पवित्र धर्म-स्थल की चौखट तक पहुंच गये थे। इसके ऑपरेशन के लिए तो एक आर्मी चीफ को अपनी जान तक धोनी पड़ी थी। पंजाब में आंतकवाद का खात्मा हुए सालों बीत चुके हैं लेकिन उस वक्त सेना के जो भी बड़े अधिकारी ऑपरेशन ब्लू स्टार में शामिल थे उन्हे अभी भी अपनी जान का डर सताता रहता है। कुछ महीनों पहले ही इंग्लैड में सेना के एक पूर्व अधिकारी पर जान-लेवा हमला किया गया था। वे अधिकारी भी ऑपरेशन ब्लू स्टार मे शामिल थे।

                          उत्तर-पूर्व राज्य में तो सेना ने स्पेशल पॉवर एक्ट की आड़ में इस कदर ‘बर्बरता’ बरसाई है कि वहां आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट के विरोध में शर्मिला एरोम नाम की एक महिला पिछले दस सालों से आमरण अनशन पर बैठी हुई है। मणि रत्नम और शाहरुख खान की ‘दिल से’ फिल्म को कौन भूल सकता है जिसमे सेना का भयावह चेहरा पहली बार दिखाई पड़ा था।
फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे सेना के जवान वहां की महिलाओं, लड़कियों और छोटी बच्चियों का यौन शोषण करते हैं। क्या वे हमारे लोग नहीं हैं ?

                   देश के अंदर की अराजकता ही क्यूं, विदेश तक में हमारी सेना का इस्तेमाल आंतकवाद के खिलाफ प्रयोग किया गया है। 80 के दशक के आखिरी सालों में श्रीलंका भेजी गई ‘शांति सेना’ को भला कौन भूला सकता है। उस शांति-सेना यानि आईपीकेएफ (इंडियन पीस कीपिंग फोर्स) में भारतीय सेना के ही जवान थे। उस शांति सेना के जवानों ने श्रीलंका के लोगों (लिट्टे) पर ही तो गोलियां चलाई थीं। वो बात और है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शांति सेना को प्रभाकरन की एलटीटीई (लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम) से मुंह की खानी पड़ी थी और बाद में सेना को श्रीलंका से वापस बुलाना पड़ा था।

                                लेकिन सेना का इस मामले पर अपना तर्क है। सेना के बड़े अधिकारी और थिंक-टैंक ये मानते है कि नक्सली समस्या और आंतकवाद में काफी बड़ा फर्क है। आतंकवाद कहीं ना कही देश-द्रोह से जुड़ा है। चाहे पंजाब हो या फिर जम्मू-कश्मीर या फिर उत्तर-पूर्व के नागालैंड, असम या फिर त्रिपुरा जैसे राज्य, वहां आतंकवाद की जड़ में था क्योंकि वहां के लोग अपने लिए एक अलग देश बनाने की मांग कर रहे हैं। यानि जो भी लोग इन राज्यों में विद्रोह कर रहे थे या कर रहे हैं वे वो लोग है जो भारत से अलग होने की मांग कर रहे हैं। जहां देश-द्रोह या राज-द्रोह होने की स्थिति बनेगी वहीं पर सेना का इस्तेमाल किया जायेगा।

जो लोग अपने देश से अलग होने की मानसिकता रखते हों, वे ‘अपने लोग’ कैसे हो सकते हैं। ऐसे लोगों पर गोलियां चलाने से सेना कदापि नहीं चूकेगी।
जो लोग अपने देश से अलग होने की मानसिकता रखते हों, वे ‘अपने लोग’ कैसे हो सकते हैं। ऐसे लोगों पर गोलियां चलाने से सेना कदापि नहीं चूकेगी। अलग देश बनाने की मांग करनी वाली अधिकतर ताकतें दूसरी देशों की खुफिया एजेंसियों जैसे पाकिस्तान की आईएसआई के इशारे पर काम करती हैं। या ये कह सकते है कि आईएसआई के हाथों की कठपुतलियों की तरह काम करती हैं। विदेशी ताकतों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है देश की सेना का। श्रीलंका में भी लिट्टे अपने लिए अलग देश बनाने की मांग कर रहा था। इसीलिए भारत सरकार ने श्रीलंका सरकार को अपनी सेना भेजकर मदद करने की कोशिश की थी।

 नक्सलवाद को सेना एक सामाजिक और आर्थिक समस्या के तौर पर दिखती है। वो समस्या जो उन इलाकों में सिर्फ और सिर्फ सरकार की अनदेखी के कारण पैदा हुई। आज़ादी के सालों बाद तक भी जहां मूल-भूत सुविधाएं तक नहीं पहुंच पाई हैं। स्कूल और अस्पताल तो दूर वहां बिजली-पानी तक भी वहां के लोगों को नसीब नहीं हुआ है। सच भी है
छत्तीसगढ़ के कई इलाके ऐसे है जहां आज तक कई सरकारी सर्वे भी नहीं हुआ है। यानि सरकार को कोई भी नुमाइंदा—संतरी से लेकर मंत्री और डीएम—तक वहां आज तक नहीं पहुंच पायें हैं
छत्तीसगढ़ के कई इलाके ऐसे है जहां आज तक कई सरकारी सर्वे भी नहीं हुआ है। यानि सरकार को कोई भी नुमाइंदा—संतरी से लेकर मंत्री और डीएम—तक वहां आज तक नहीं पहुंच पायें हैं। आलम ये है कि मुख्यमंत्री तक भी इन इलाकों का दौरा हेलीकॉप्टर के जरिये करते हैं। अब तो खैर नक्सलियों के डर से मुख्यमंत्री हवाई दौरा करते हैं लेकिन शायद पहले भी नक्सली प्रभावित इलाकों के मुख्यमंत्री हवाई दौरा ही करते होगें। जिसके चलते ही इन इलाकों का कभी सर्वे नहीं हुआ।

 अगर मुख्यमंत्री या फिर केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने भी कभी इन इलाकों का सड़क मार्ग से दौरा किया होता तो वहां का सरकारी अमला ये तो पता कर लेता है कि इन इलाकों में कौन रहता है। मंत्रियों के दौरे के बहाने ही सरकारी बाबू इन अपने एयर-कंडिशनर गेस्ट हाउस और ब्रिटिश-राज के बंगलों से बाहर निकल आते। या ये पता कर पाते कि आदमी नाम की कोई प्रजाति भी इन इलाकों में पाई जाती है। भले ही वे आदिवासी क्यों ना हों। जब उन इलाकों का सर्वे ही नहीं हो पाया है तो मूल-भूत सुविधाएं वहां कैसे पहुंच जायेंगी।

                              छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्य जहां पर नक्सली समस्या सबसे चरम पर है वहीं पर देश का सबसे ज्यादा खनिज का खजाना है। नक्सली विचारधारा का समर्थन करने वाले ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग का मानना है कि आजादी के बाद से जितनी भी सरकारें आईं उन्होनें इन इलाकों को लूटने से ज्यादा कुछ नहीं किया। जो अमीर थे वे और अमीर हो गए और जो गरीब थे उनकी हालत बद से बदतर होती चली गई। ऐसे में गरीब और आदिवासी लोगों के पास सरकारों के खिलाफ हथियार उठने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं था। अगर आदिवासी लोगों को मुख्य-धारा में लाये जाने की तनिक भी कोशिश की होती तो नौबत ये नहीं आती कि नक्सली लोकतंत्र को चलाने वाले नेताओं की ही मौत के घाट उतार देते।

 हालांकि नक्सली समस्या पिछले 30-40 सालों से देश के सामने मुंह बायें खड़ी है लेकिन नक्सल आंदोलन के अधिक हिंसक और जघन्य रुप लेने के पीछे ‘सलवा जूडम’ (या सलवा जुडूम) का एक बड़ा हाथ रहा है।

 सरकारों ने नक्सली समस्या का हल शांति पूर्वक या फिर लोकतांत्रिक या फिर अपने सुरक्षाबलों के जरिये निकालने के बजाय, स्थानीय लोगों (आदिवासियों) के हाथों में ही हथियार पकड़ा दिए। ये कैसा कानून है कि गोली का जबाब गोली और मौत का बदला मौत। सभ्य समाज और भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। शायद यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 में सलवा-जुडूम पर हमेशा हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया और केन्द्र और राज्य सरकारों को भी सख्त हिदायत दी गई कि भविष्य में नक्सल समस्या से निपटने के लिये ऐसे बेहूदा कदम कदापि ना उठाए। शनिवार यानि 25 मई को सुकमा में हुए नरसंहार के पीछे भी बताया जा रहा है कि नक्सली सलवा-जुडूम से जुड़े एक बड़े नेता की हत्या करना चाहते थे। और वे इसमें कामयाब भी हुए।

                           लेकिन सवाल ये है कि फिर उन्होनें दूसरे नेताओं की हत्या क्यों की ? क्यूं उन्होनें निहत्थे मजदूरों को मौत के घाट उतारा ? खैर इन सवालों के जबाब तो एनआईए (नेशनल एंवेस्टीगेशन एजेंसी) की जांच में सामने आने की उम्मीद है। नक्सली समस्या से निपटने के लिये जहां तक सेना के इस्तेमाल का जबाब है उसके लिए रक्षा मंत्री ने साफ इंकार कर दिया है। लेकिन सेना ने पुलिस और सीआरपीएफ जैसे अर्ध-सैनिक बलों की हर मदद देने का वादा किया है। सही भी है कि पुलिस और सीआरपीएफ जैसे पैरा-मिलेट्री फोर्स को ऐसी ट्रेनिंग दी जाये कि वे नक्सलियों से बेहतर तरीके से लड़ सकें। इसके लिये सेना से मदद ली जा सकती है।
पुलिस और सीआरपीएफ जैसे पैरा-मिलेट्री फोर्स को ऐसी ट्रेनिंग दी जाये कि वे नक्सलियों से बेहतर तरीके से लड़ सकें। इसके लिये सेना से मदद ली जा सकती है।

                           दरअसल, सभी राजनैतिक पार्टियों को नक्सल समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठना पड़ेगा। नक्सलवाद को उखाड़ फेंकने का श्रेय लेने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों में होड़ मची रहती है। ऐसे में होता ये है कि केन्द्र और राज्य सरकारों का समन्वय ठीक से नहीं हो पाता। ना ही स्थानीय पुलिस जो कि राज्य सरकारों के अधीन हैं उनका सीआरपीएफ जैसे केन्द्रीय बलों से ताल-मेल ठीक से हो पाता है। इस समय नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ के साथ-साथ बीएसएफ और दूसरे अर्ध-सैनिक बलों की कई टुकड़ियां ऑपरेशन के लिए लगाई गईं हैं। लेकिन सीआरपीएफ के पूर्व डीजी के. विजय कुमार को छोड़कर शायद ही किसी दूसरे मुखिया ने नक्सलियों से निपटने के लिये कोई ठोस कदम उठाये हैं। नतीजा ये है कि पैरा-मिलेट्री फोर्स के जवान नक्सलियों के निशाने पर रहते हैं—वर्ष 2010 में दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की मौत को भला कौन भूला सकता है।

 हर साल हजारों करोड़ रुपया अर्ध-सैनिक बलों की नक्सल क्षेत्र में तैनाती पर खर्च कर दिया जाता है। अगर यही पैसा स्थानीय पुलिस के आधुनिकीकरण में प्रयोग किया जाये तो परिणाम कई गुना बेहतर मिल सकते हैं। पुलिस को आधुनिक हथियार और ज़रुरत पड़ने पर हेलीकॉप्टर भी देने चाहिए। बाहरी फ़ोर्स होने के चलते भी केन्द्रीय सुरक्षा-बलों की टुकड़ियों को इन इलाकों में अपना बेस बनाने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है। किसी भी मिलिट्री ऑपरेशन से पहले वहां कि भौगोलिक स्थिति का ज्ञान तो होना ही चाहिए वहां के स्थानीय लोगों का भी मन जीतना पड़ता है। क्योंकि लोगों को अपनी तरफ किए बगैर आप अपने इंटेलीजेंस मजबूत नहीं कर सकते हैं। साथ ही विरोधियों की गतिविधियों पर भी पैनी नजर रखने के लिए मुखबिर तंत्र को मजबूत करना पड़ता है। शत्रु की चालें परखना पड़ता है। नहीं तो हश्र श्रीलंका में ‘शांति सेना’ जैसा हो सकता है।


                             ऐसे में जरुरी है कि नक्सल समस्या से निपटने के लिये दो मोर्चों पर लड़ा जाये। पहला ये कि केन्द्र और राज्य सरकारें इन (बेहद पिछड़े) इलाकों में विकास का काम तेज करे। आधार-भूत ढांचा खड़ा किया जाये। इस काम में देर लग सकती है लेकिन जिस दिन स्थानीय आदिवासी लोगों की समझ में आ जायेगा कि विकास से ही उनकी उन्नति के रास्ते खुलते हैं तो वे मुख्यधारा से जुड़ना शुरु हो जायेंगे। फिर वे भला नक्सलियों की मदद क्यूं करेंगे।
                             दूसरा ये कि स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ, कोबरा और बीएसएफ जैसे केन्द्रीय सरकारी बलों को एक साथ मिलकर नक्सलियों को हिंसा का मुंह तोड़ जबाब देना है। जबतक ऐसा नहीं होता है तब तक, छत्तीसगढ़ के अबूझमाड जैसे इलाके जहां सब को पता है कि नक्सलियों का ट्रेनिंग कैंप चलता है वहां घुस नहीं पायेंगे। एक साथ मिलकर ही नक्सलियों के गढ़ पर हमला बोल कर उन्हे गिरफ्तार किया जाये, उनके हथियार ज़ब्त कर लिए जायें। अगर जरुरत पड़े तो नक्सलियों का एनकाउंटर किया जायें (बशर्ते कि वो फर्जी ना हो)। जहां तक सेना का सवाल है अप्ररोक्ष रुप से ही सही, सेना नक्सल प्रभावित इलाकों में अपने पांव फैला रही है। छत्तीसगढ़ के ही नारायणपुरा इलाके में सेना ने अपना एक ट्रेनिंग कैंप शुरु कर दिया है। माना जाता है कि जिस इलाके में सेना का ट्रेनिंग कैंप चलता है वहां के सैकड़ों वर्ग किलोमीटर के दायरे में गैर-कानूनी गतिविधियों (या ये कहें कि नक्सली) कम ही हो पाती हैं। सेना की मूवमेंट होने से असामाजिक तत्वों के ज़हन में डर पैदा होता है।

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)