08 जून, 2013

जो भारतीय नौसेना से टकरायेगा...वो...


इतिहास गवाह है कि भारत और भारतीय फौजों ने कभी दुश्मन देश पर आक्रमण नहीं किया है. प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल और आजतक कभी बाहरी देश पर बे-वजह चढ़ाई नहीं की है. अगर विदेशी मुल्क पर आक्रमण किया है तो उसके पीछे कोई ना कोई कारण या उस देश का उकसाना रहा होगा. इस बार भी भारतीय नौसेना के कदम अगर हिंद महासागर से बाहर दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर की और बढ़ रहे हैं तो उसके पीछे भी एक बड़ी वजह है। वो वजह है चीन की आक्रमक नीतियां.
     


                प्राचीन काल में अगर भगवान राम ने रामेश्वरम् से हिंद महासागर पर सेतु (राम-सेतु) बनाकर लंका (आधुनिक श्रीलंका) पर चढ़ाई की तो वो इसलिए कि रावण ने उनकी पत्नी का हरण किया था. पुरुषोत्तम राम और वानर सेना के लंका पर आक्रमण करने से पहले तक कभी नहीं सुना गया था कि आर्य-देश (भारत) की सेनाओं ने अपनी जमीन से बाहर कभी कदम भी रखा हो. लेकिन इतिहास गवाह है (राम-सेतु की सेटलाइट तस्वीरें) और हिंदुओं का सबसे धार्मिक माने जाने वाला ग्रन्थ, वाल्मीकि रचित रामायण की जरुरत पड़ने पर भारतीय सेनाएं और उसके शूरवीर (हनुमान जी जैसे) जवान नदी, नालों तो क्या समुद्र को लांघ सकते हैं. समंदर पर ना केवल पुल बना सकते हैं बल्कि उस पुल को लांघकर दुश्मन के अभेद्य किले (लंका) को जलाकर खाक कर सकते हैं.  पौराणिक इतिहास में ये शायद पहला ऐसा मौका था जब भारतीय नौसेना का जिक्र मिलता है.
              सिंधु घाटी की सभ्यता में भी धौलावीरा (गुजरात) में एक बंदरगाह के अवशेष मिले हैं. लेकिन ये साफ नहीं है कि ये बंदरगाह नौसेना के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इतिहासकार मानते है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के समकक्ष ही इस पुरातत्व बंदरगाह को समुद्री व्यापारी ही इस्तेमाल करते रहे होंगे.
              सम्राट अशोक ने लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर अपना पताका फहराया था. चक्रवर्ती अशोक के शिलालेख इस बात की जीत-जागते उदाहरण हैं। 
बावजूद इसके, चक्रवर्ती राजा अशोक ने अगर विदेशी मुल्कों पर अपना सिक्का जमाने की कोशिश की तो वो अपने शांति-दूत भेजकर ना की अपनी फौजें भेजकर.  अपने बच्चों तक को उसने शांति-दूत बनाकर बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा था. अशोक किसी भी मायने में ग्रीस के शक्तिशाली राजा सिंकदर (एल्क्जेंडर) से कम नहीं था. लेकिन उसने अपनी सेनाओं को भारत से कभी बाहर नहीं भेजा. अशोक ने सात समंदर पारचार देशों ,यूनान (ग्रीस), पर्शिया (ईरान), मिस्र (ईजिप्ट) और सीरिया में अगर किसी को भेजा तो वे उसके शांति-दूत ही थे. भारतवर्ष हमेशा से शांति-प्रिय देश रहा है और शायद आगे भी रहेगा. लेकिन जब-जब जरुरत पड़ी तब तक भारतीय फौजों ने अपनी सरजमीं से बाहर निकलकर दुश्मनों के दांत खट्टे किए हैं.
  मध्यकालीन युग के शुरुआत में भारत के शक्तिशाली चोल राजाओं ने तत्कालीन सुमात्रा ,जावा और उससे लगे द्वीपो (आज के इंडोनेशिया) पर अपनी नौसेनओं के द्वारा हमला किया तो वो इसलिए क्योंकि वहां के श्रीविजया साम्राज्य के राजा ने चोल राज्य के शांति-दूतों को चीन जाने के रास्ते में अडंगा लगाने की कोशिश की थी। 
लेकिन चोल नौसेना के आक्रमण करने के बाद से श्रीविजया राज्य के संबंध दक्षिण भारत के राजाओं से बेहद मधुर रहे, जो आजतक कायम हैं। काफी कम उदाहरण ही मिले जहां पर वर्णित है कि चोल राज्य की नौसेना ने पड़ोसी श्रीलंका या फिर मालद्वीप पर हमला किया।
            हाल ही में भारतीय नौसेना की वायुयान इकाई (एवियशन विंग) की डायमंड जुबली के अवसर पर मुझे गोवा के नेवल एयर बेस पर जाना का मौका मिला. वहां मेरी मुलाकात, इंडियन नेवी के कुछ सीनियर अधिकारियों से हुई. सभी का मानना है कि भारतीय नेवी का काम अब हिंद महासागर में सिर्फ अपने हितों की रक्षा करना नहीं रह गया है. भारतीय नौसेना अब एक आक्रमणकर्ता की भूमिका निभाने के लिए तैयार है. यानि जरुरत पड़ने पर वो अपने पड़ोसी मुल्कों की मदद करने के लिए किसी भी देश की नौसेना से भिड़ने के लिए सक्षम है.
          हिंद महासागर में मालदीव जैसे पड़ोसी देशों के लिए ही नही वरन साउथ चाइना सागर में एशियान देशों को भी हर संभव मदद करने के लिए तैयार है.
वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों की नौसेना के साथ फ्लैग-मीटिंग करने के लिए हाल ही में नेवी ने अपने चार सबसे उत्कृष्ट जहाजों-आईएनएस सतपुरा (बहुउद्देशीय स्टेलश शिप), आईएनएस किरीच (एंटी गाईडेड मिसाइल युद्धपोत), आईएनएस रणविजय (छोटा युद्धपोत), आईएनएस शक्ति (एंटी टैंक शिप) को भेजा है. ये सभी जहाज गये तो शांति मिशन (डिप्लोमेटिक मिशन) पर हैं लेकिन ये सभी युद्धपोत उस क्षेत्र में अपनी शक्ति का एहसास जरुर करा सकते हैं. क्योंकि किसी ने कहा है भी कि अपनी शक्ति का उपयोग करने के बजाय उसका एहसास कराने से बेहतर परिणाम की उम्मीद की जा सकती है.
           रक्षा मंत्री ए के एंटनी इन दिनों चार दिन की यात्रा पर सिंगापुर, थाईलैंड और आस्ट्रेलिया गये हुए थे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले हफ्ते ही जापान और थाईलैंड की यात्रा से लौंटे हैं.  प्रधानमंत्री की जापान यात्रा से चीन में सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है. चीनी हुक्मरान खुल कर तो कुछ नहीं बोल पा रहे हैं. लेकिन चीनी मीडिया के जरिये भारत-जापान की दोस्ती का मखौल उड़ा कर खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहावत जरुर सिद्ध कर रहा है.
    इसी हफ्ते आस्ट्रेलिया का दौरा करने वाले ए के एंटनी भारत के पहले रक्षा मंत्री बन गए हैं. एंटनी सबसे पहले राजधानी केनबरा के बजाय पर्थ पहुंचे. पर्थ को हिंद महासागर की राजधानी के रुप में देखा जाता है. इस शहर में आस्ट्रेलिया के कई सैन्य, सामरिक और नौसेना के महत्वपूर्ण ठिकाने हैं. एंटनी की आगवानी खुद वहां के रक्षा मंत्री स्टीफन स्मिथ ने की. पर्थ से केनबरा तक का चार घंटे का हवाई सफर दोनों मंत्रियों ने साथ में किया. बाद में केनबरा पहुंचकर दोनों देशों ने एक साझा बयान जारी कर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में समुद्री व्यापार, सैन्य और नौसेना के क्षेत्र में आपसी सहयोग करने का वादा किया.
                     भारत-आस्ट्रैलिया का सैन्य सहयोग सामरिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है ये इससे पता लगाया जा सकता है कि अमेरिका लगातार दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की बातचीत पर नजर लगाये बैठा है. जैसे ही दोनों देशों ने साझा बयान जारी किया, वो तुरंत अमेरिका के पैसिफिक कमांड ने अपने ट्विटर एकाउंट पर अपलोड कर दिया.              
             खुद रक्षा मंत्री ए के एंटनी मानते हैं कि भारतीय नौसेना दिन-ब-दिन शक्तिशाली हो रही है. यही वजह है कि दूसरे देशों की नौसेना हमारी देश की नौसेना से  सहयोग के लिए लगातार हाथ बढ़ा रही हैं. जल्द ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली माने जानी वाली अमेरिका नौसेना भारतीय नौसेना के साथ  मालाबार युद्भ्यास करने वाली है.
           भारतीय नौसेना का दमखम सोमालिया के समुद्री डकैतों के खिलाफ भी देखने को मिलता है। हमारे देश की नेवी उन चुनिंदा नौसेनाओं में से है जो गल्फ ऑफ एडन यानि फारस की खाड़ी से अपने देश के ही नहीं बल्कि दूसरे देशों के मालवाहक जहाजों को सोमालियाई डकैतों से सुरक्षित वहां से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर तक छोड़कर आते हैं।

                भारतीय नौसेना के जंगी बेड़े में लगातार अत्याधुनिक फाइटर प्लेन और जहाज शामिल हो रहे हैं.  नेवी के एवियशन विंग में दुनिया के सबसे अत्याधुनिक फाइटर प्लेन, 'मिग-29के' को शामिल किया गया है. पैतालीस स्क्वॉर्ड्रन के इस जंगी बेड़े को ब्लैक पैंथर का नाम भी दिया गया है. आवाज की स्पीड से लगभग दुगनी गति से उड़ने वाले ये जहाज पैंथर की भांति ही समुद्र में निगरानी रखते हैं और जरुरत पड़ने पर दुश्मन पर पैंथर की भांति टूट पड़ते हैं. 
इस फाइटर प्लेन की शक्ति दुगनी हो जायेगी जब एयरक्राफ्ट कैरियर, आईएनएस विराट (एडमिरल गोरशोकोव) को भारतीय नौसेना में शामिल कर लिया जायेगा. आईएनएस विराट इस साल के अंत तक रशिया से भारत पहुंच सकता है. मिग-29K हिंद महासागर में तैनात आईएनएस विराट पर तैनात किया जायेगा. वही से वो टेक-ऑफ कर सकता है और लैंड पर कर सकता है.
       भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी अरिहंत को भी नौसेना के बेड़े में जल्द ही शामिल किया जा सकता है। रशिया की मदद से बनाये जानी वाली इस पनडुब्बी को भारत में ही तैयार किया जा रहा है।
                           भारतीय नौसेना के स्वरुप बदलने के कई कारण हैं. पहला तो ये कि भारत के अपने पड़ोसी देशों से कई युद्ध हो चुके हैं. पाकिस्तान से तो तीन-तीन बार हो चुके हैं-1948,1965 और 1971. दुश्मन नंबर वन-1 यानि चीन से 1962 से भारत दो-दो हाथ कर चुका है. इसके अलावा पाकिस्तान से लगातार  हमारी सेना, पुलिस और बीएसएफ कश्मीर (और राजस्थान तक में कुछ हद तक) पोर्क्सी वार झेल रही है. कोई दिन ऐसा बीतता होगा जब पाकिस्तानी सेना सीज फायर का उल्लंघन कर फायरिंग की आड़ में आंतकवादियों को सीमा पार ना कराती हो. वो बात और है कि अधिकतर हमारी सेना और सुरक्षा एजेंसियां पाकिस्तानी सेना के मंसूबे नाकाम करने में कामयाब हो जाती है.
         पाकिस्तान तीन-तीन बार युद्ध में परास्त होने और फिर कारगिल-युद्ध में मुंह की खाने के बाद अकेले दम पर भारत से लड़ाई लड़ना भूल चुका है. लिहाजा उसने भारते के दूसरे दुश्मन देश (दुश्मन का दुश्मन, दोस्त) चीन से हाथ मिला लिया है. पाकिस्तान ने अपने ग्वादर बदंरगाह को चीन के हवाले कर दिया है. हालांकि चीन और पाकिस्तान दोनों ही दुनिया के सामने ये बघारते नहीं थकते हैं कि ये बंदरगाह पाकिस्तान ने चीन को व्यापारिक सहयोग के तहत रख-रखाव के लिये दिया है. लेकिन हकीकत ये है कि इस बंदरगाह को चोरी-छिपी गहरा किया जा रहा है. ये उसी सूरत में किया जाता है जब कि बंदरगाह पर लड़ाकू जहाजों और पनडुब्बियों के इस्तेमाल में लाया जाना हो. साफ है चीन जरुरत पड़ने पर इस बंदरगाह को अपने नेवी बेस के रुप में इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेगा. यानि चीन की नौसेना भारत को पश्चिमी दिशा से घेरने की तैयारी में है.
          पाकिस्तान और चीन समुद्री सहयोग पर इसलिए भी जोर दे रहे हैं क्योंकि 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान भारतीय नौसेना का दमखम दे चुका है. पहली बार भारतीय नौसेना की एवियशन विंग के फाइटर विमानों ने पूर्वी-पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) के चितगांव और ढाका के बंदरगाहों पर जो कहर ढाया था उसने पाकिस्तान की करारी शिकस्त में काफी भारतीय सेना की काफी हद तक मदद की थी. ये शायद पहला मौका (और आखिरी) था जब किसी युद्ध में भारतीय नौसेना का इस्तेमाल किया गया था.
         चीन पाकिस्तान के साथ-साथ भारत के दूसरे पड़ोसी देशों से भी मिलकर भारत को हिंद महासागर में ही घेरना चाहता है. वो हिंद महासागर जिसका नाम ही भारतवर्ष के नाम पर पड़ा है. मालदीव और श्रीलंका में भी चीनी नौसेना धीरे-धीरे अपने पांव पसार रही है. हिंद महासागर से सटे अफ्रीकी देशों में भी चीन अपनी धमक दिखाने के लिए तैयार है.
          चीन अपने पड़ोसी देशों पर भी अपनी फौज और नौसेना की धौंस यदा-कदा दिखाता रहता है। दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में जापान, वियतनाम, मलेशिया आदि देशों से चीन का कभी किसी टापू कर कब्जा करने को लेकर या फिर किसी और किसी वजह से कोई ना कोई विवाद चलता रहता है। ऐसे में इन देशों को भारतीय नौसेना में आशा की एक किरण नजर आ रही है। अगर चीन उनसे पंगे लेता है तो वे भारत से सहयोग की अपेक्षा कर सकते हैं। शायद इसी वजह से इंडियन नेवी एशियान देशों के साथ फ्लैग-मींटिग करती रहती है। जिसके चलते ही युद्धपोतों को फ्लैग-मीटिंग के लिए दक्षिण चीन सागर भेजा जाता है।
     इन सब वजहों के चलते ही भारतीय नौसेना दिन पर दिन अपनी ताकत बढ़ाने के लिए तैयारी कर रही है. रक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि अगला युद्ध पानी पर ही लड़ा जायेगा.’ हाल ही में कोरियन प्रायद्वीप में जो युद्ध की स्थिति खड़ी हुई थी उसमें अगर युद्ध होता तो शायद वो समुद्र में ही लड़ा जाता. हालात इतने बिगड़ गये थे कि अमेरिका ने भी अपनी नौसेना को तैयार रहने के आदेश जारी कर दिए थे.
                   ऐसे में जरुरी है कि भारतीय नौसेना को किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिये हरदम तैयार रहना होगा. चीन अगर भारत को हिंद महासागर में ही घेरने की तैयारी कर रहा है तो भारतीय नौसेना ने भी हिंद महासागर से बाहर निकलकर दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर तक पहुंचने का दृढ़ निश्चय कर लिया है. यानि भारतीय नौसेना अब अपने पड़ोसी देशों की मदद करने के लिए आक्रमणकर्ता की भूमिका भी निभाने के लिये एकदम तैयार है.
                    

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मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)