11 अगस्त, 2013

आईएनएस विक्रांत का 'महाभारत' कनेक्शन

          हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा हिंदु होगा जो 'महाभारत' के बारे में नहीं जानता हो. लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि भारतवर्ष के इस सबसे लोकप्रिय और पुराने ग्रंथ के रचियता वेद-व्यास नाम के ऋषि-मुनि थे. और उससे भी कम लोग इस बात को जानते होंगे कि वेद-व्यास ने इस ग्रंथ की रचना कहां की थी. यानि वेद-व्यास की कर्मस्थली कहां पर है.

           हाल ही में मुझे ओडिसा के राउरकेला स्टील प्लांट जाने का मौका मिला. काम खत्म होने के बाद राउरकेला स्टील प्लांट के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ने बताया कि राउरकेला के करीब ही वेद-व्यास नाम की जगह है. रांची से सड़क के रास्ते जब मैं माओवादियों के कब्जे वाले जंगलों से गुजरता हुआ ओडिसा की सीमा में दाखिल हुआ था तो रात के वक्त भी मेरे नजर वेद-व्यास नाम की जगह पर पड़ गई थी. लेकिन उस वक्त जरा भी नहीं पता था कि आखिर इस जगह का नाम वेद-व्यास क्यों पड़ा है. दिल्ली से पांच घंटे की देरी से चल रही फ्लाइट और फिर रांची से राउरकेला की ट्रेन मिस करने के चलते हम सभी लोग जल्द से जल्द राउरकेला पहुंचाने चाहते थे. रास्ते में एक पुल टूटने के कारण पांच दिनों से बंद जाम में कई घंटों तक फंसे रहने के कारण तो हमारे ये सफर और भी ज्यादा उबाऊ लगने लगा था. लेकिन जब जनसंपर्क अधिकारी ने बताया कि वेद-व्यास जगह वही है जहां ऋषि वेद-व्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचियता की थी,

तो बिना जाये रहा नहीं गया. इतिहास, लेखन और पत्रकारिता के छात्र के लिए इस जगह के दर्शन करने से बड़ा पुण्य शायद ही कुछ और हो सकता था.

    जिस तरह से कम ही लोग जानते है कि वेद-व्यास ने कहां पर महाभारत ग्रंथ की रचना की थी, ठीक उसी तरह कम ही लोग जानते है कि जिस जिस राउरकेला स्टील प्लांट के चलते भारत नौसेना के क्षेत्र में जल्द ही दुनिया के चुनिंदा देशों की सूची में शामिल होने वाला है.

      रक्षा के क्षेत्र में कोई भी देश कितना भी करीबी या पुराना मित्र ना हो, लेकिन जब बात तकनीक देने की आती है तो वो किसी भी देश को देने के लिए जल्दी से तैयार नहीं होता. ये सुना जरुर था लेकिन हकीकत में भारत के साथ ऐसा हुआ है ये हाल ही में पता चला जब मैं देश के पहले युद्धपोत (विमान-वाहक पोत या एयरक्राफ़्ट कैरियर) के बनने की कहानी जानने के लिये ओडिसा स्थित राउरकेला स्टील प्लांट गया था.

              दरअसल, 12 अगस्त को भारतीय नौसेना का अपना विमान-वाहक जहाज, आईएनएस विक्रांत मिल जायेगा. दुनिया के चार देश ही ऐसे हैं जिनके पास अपना खुद का बनाया और तैयार किया गया विमान-वाहक पोत हो. अभी तक अमेरिका, ब्रिटेन, रशिया और फ्रांस सरीखे देशों की नौसेना के पास ही अपना खुद का एयरक्राफ्ट कैरियर है. अब जल्द ही भारत भी इन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो जायेगा.

          लेकिन भारतीय नौसेना का आईएनएस व्रिकांत को मिलने का सपना पूरा हो पाया है तो इसके पीछे है वो स्टील जिसकी दम पर भारत अपना खुद का एयर-क्राफ्ट कैरियर तैयार कर पाया है. जी हां इस खास तरह की स्टील को मेरिन-स्टीन (समुद्री-स्टील) कहा जाता है. ये कोई आम स्टील नहीं होती, बल्कि फौलादी किस्म की स्टील होती है। जो साल-साल पर जंग नहीं खाती. समुद्र के खारे पानी के थपड़े भी इस का बाल भी बांका नहीं कर पाते. दुश्मन की मिसाइल और बारुदे-गोले भी इस स्टील के सामने बेअसर दिखाई पड़ते हैं। ऐसी मेरिन-स्टील का बना होता है एक युद्धपोत. जिस देश के पास इस मेरिन-स्टील बनाने की तकनीक है उसी देश के पास अपना खुद का यानि स्वेदशी एयर-क्राफ्ट कैरियर नौसेना की शान बढ़ता है.

                         एयरक्राफ्ट कैरियर एक आम जहाज से

इस तरह अलग होता है कि समुद्र में चलते हुए इस जहाज पर फाइटर प्लेन और हेलीकॉप्टर उड़ान भर भी सकते हैं और उसके डेक पर उतर भी सकते हैं। यही कारण हैं कि इस तरह से जहाज और फाइटर प्लेनस की ताकत दुगनी हो जाती है।

       अभी तक दुनिया के अधिकतर देशों की तरह भारत भी अपनी नौसैन्य शक्ति के लिए रशिया और दूसरे देशों से विमान-वाहक पोत आयात करता था. भारत का पहला ऐसा युद्धपोत था आईएनएस विक्रांत (पुराना विक्रांत) जिसे भारत सरकार ने 1957 में खरीदा था और 1961 में नौसेना में शामिल किया गया था. इसके बाद भारत ने आईएनएस विराट को वर्ष 1987 में आयात किया था. लेकिन ये युद्धपोत अब बूढ़ा हो चला था. दुनिया की सुपर-पावर्स के सामने इस एयरक्राफ्ट कैरियर की बिसात कुछ भी नहीं है. इसीलिए भारत ने करीब 10-15 साल पहले अपना खुद का एक विमान-वाहक पोत तैयार करने की मन बनाया.

    लेकिन अपने युद्धपोत को तैयार करने के लिए भारत को चाहिए थी मेरिन-स्टील, जो भारत के पास नहीं थी. इसके लिए भारत ने अपने सबसे पुराने और करीबी देश रशिया की तरफ हाथ फैलाया. भारत की सैन्य शक्ति जितनी भी आज है उसका एक बड़ा हिस्सा रशिया (तत्कालीन यूएसएसआर) से आयात किया गया था या फिर उसके सहयोग से खड़ा किया गया था. लेकिन इस खास तरह की स्टील बनाने वाली तकनीक को आयात करने के लिये रशिया जैसे मित्र-देश ने भी हाथ खड़े कर दिए. भारत का अपना खुद का एयरक्राफ्ट बनाने का सपना धरा का धरा रह गया.

     रशिया के मना करने के बाबजूद हमारे देश के वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी. रक्षा के क्षेत्र में अग्रणीय रक्षा अनुसंधान परिषद यानि डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने इस खास तरह की मेरिन-स्टील बनाने का बीड़ा उठाया. डीआरडीओ की हैदाराबाद स्थित डिफेंस मैटेलरजिकल लैब (डीएमआरएल) ने कड़ी परिश्रम के बाद इस मेरिन-स्टील को बनाने में कामयाबी हासिल की. डीआरडीओ ने इस खास स्टील को बनाने वाले प्रोजेक्ट का नाम दिया डीएमआर-249.

   स्टील की तकनीक तैयार करने के बाद डीआरडीओ और नौसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी इतनी बड़ी तादाद में स्टील को तैयार करना. एक एयरक्राफ्ट कैरियर का वजन करीब-करीब 40 हजार टन से 60 हजार टन होता है। इतने बड़े और भारी जहाज के लिए मेरिन-स्टील का उत्पादन भी कोई आसान काम नहीं है. ऐसे में स्टील अथोरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड  यानि सेल का ओडिसा स्थित राउरकेला स्टील प्लांट को चुना गया। राउरकेला स्टील प्लांट की स्पेशल प्लेट प्लांट कई सालों से रक्षा क्षेत्र की जरुरतों को पूरा कर रही थी। सेना के टैंक से लेकर बुलेटप्रूफ और बोफोर्स टैंक के कैरेज से लेकर परमाणु संयत्र के लिए बनाई जानी वाली स्टील तक इसी स्पेशल प्लेट प्लांट में ही तैयार की गई थी। मेरिन स्टील का उत्पादन का जिम्मा भी राउरकेला प्लांट को सौंप दिया गया। इस खास तरह की स्टील को बनाने में छत्तीसगढ़ स्थित भिलाई स्टील प्लांट ने भी पूरा-पूरा सहयोग किया।.

     हजारों एकड़ में फैले ये दोनों स्टील प्लांट अबतक इतनी स्टील का उत्पादन कर चुके हैं कि पूरी पृथ्वी को आठ बार बांधा जा सके. जहां राउरकेला स्टील प्लांट भारत ने जर्मनी के सहयोग से सन् 1959 में खड़ा किया था, भिलाई स्टील प्लांट को रशिया की मदद से खड़ा किया गया था. वही रशिया जिसने आज भारत को मेरिन-स्टील आयात करने से मना कर दिया था. क्योंकि जर्मनी भूगोलिक कारणों से एक छोटा देश है इसलिए राउरकेला प्लांट भिलाई के अपेक्षा थोड़ा छोटा प्लांट है. लेकिन स्टील उत्पादन में ये प्लांट भिलाई से किसी मायने में कम नहीं है. रशिया (यूएसएसआर) एक बड़े क्षेत्रफल वाला देश है इसीलिए भिलाई स्टील प्लांट भी कई हजार एकड़ जमीन में फैला हुआ है.

        भिलाई और राउरकेला प्लांट ने डीएमआर-249 स्टील को दो भांगों में बांट दिया. डीएमआर-249 ए  को जहाज के ढांचे के लिए तैयार किया गया और उसके डेक यानि जहां फाइटर-प्लेन और हेलीकॉप्टर लैंड और टेक-ऑफ (उड़ान भरते और उतरते हैं) करते हैं उसके बनाने में काम आने वाली स्टील को नाम दिया गया डीएमआर-249 बी.

             वर्ष 2004-05 में राउरकेला स्टील प्लांट ने भारतीय नौसेना के फ्लैग-शिप प्रोजेक्ट (प्रोजेक्ट-71) के लिए स्टील का उत्पादन करना शुरु कर दिया. तब से आज तक करीब 23 हजार टन से भी ज्यादा मेरिन स्टील आईएनएस विक्रांत के बनाने में काम आ चुकी है. https://www.youtube.com/watch?v=AYjZK2Y0ZfU&list=FLKKYIP-E6YIes12uCeE8LLw

    इस स्टील के जरिए ही भारत 260 मीटर लंबं और 60 मीटर चौड़े 40 हजार टन के युद्धपोत को बना पाने में सक्षम हो पाया है. सतह से आकाश में मार करने वाली मिसाइल, रडार और दूसरे हथियारों से लैस इस जहाज का लोहा दुनिया मानेगी। इस पर तैनात फाइटर प्लेन और हेलीकॉप्टर इसकी ताकत को और शक्ति प्रदान करेंगे। माना ये भी जा रहा है कि भविष्य में भारतीय नौसेना इस युद्धपोत को परमाणु शक्ति से भी लैस कर सकता है। यानि की इस जहाज को परमाणु मिसाइल से भी लैस कर सकता है। और ये सबकुछ संभव हो पाया है तो उसमे एक बड़ा योगदान राउरकेला स्टील प्लांट का है। ठीक वैसे ही जैसा कि राउरकेला के करीब बहती शंख और कोयल नदी के संगम से बनी ब्राहम्णी नदी के किनारे वेद-व्यास ने महाभारत काव्य की रचना की थी। वेद-व्यास की गुफा (या आश्रम) के करीब ही सरस्वती नदी का उदगम होता है। सरस्वती नदी का जल भी ब्राहम्णी नदी में जाकर मिल जाता है। ठीक वैसे ही जैसे कि राउरकेला प्लांट की मेरिन-स्टील भारत के पहले स्वेदशी युद्पोत, आईएनएस विक्रांत में जाकर मिल जाती है।


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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)