18 फ़रवरी, 2014

तैयार हैं भारतीय यूएवी ड्रोन 'लक्ष्य' की ओर


            अमेरिकी फौजों ने जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान में तालिबानी आतंकियों और उनके ठिकानों को अपने ड्रोन से चुन-चुनकर निशाना बनाया, तो हर कोई हैरान था कि आखिर ये ड्रोन नाम की बला है तो है क्या. अमेरिकी ड्रोन ने पाकिस्तान में तालिबानी आतंकियों पर इतने हमले किए कि खुद पाकिस्तानी सरकार को अमेरिका से मिन्नत करनी पड़ी कि वो ड्रोन से किये जा रहे हमले बंद कर दे. दुनिया को पहली बार पता चला कि अमेरिका ने ड्रोन नाम का ऐसा घातक हथियार तैयार किया है जिसका सैन्य-दुनिया में कोई सानी नहीं है. दुनिया को पहली बार पता चला कि ड्रोन दरअसल एक तरह का मिलेट्री-एयरक्राफ्ट है जो बिना पायलट के चलता है. यानि अनमैन्ड एरियल व्हीकल या यूएवी.
अमेरिकी ड्रोन: निशाने पर दुश्मन

               सवाल ये था कि अगर ये विमान पायलट-रहित है तो फिर मिसाइल और बमों से इतने सटीक निशाने कैसे लगाता है. यकीनन, यूएवी का पायलट तो होता है, लेकिन वो विमान के अंदर बैठकर उसे नहीं उड़ता है. वो जमीन पर रहकर कम्पयूटर और रिमोट के जरिए उसे अपनी दिशा-निर्देश के अनुसार उड़ाता है. जमीन पर बने कंट्रोल-रुम से पायलट यूएवी से ली जा रहीं तस्वीरें देखता रहता है. यूएवी की खासयित ये है कि इस तरह के विमान खास तरह के सर्विलांस टेक्नॉलोजी से लैस होते है. इसमें खास तरह के लंबी दूरी के कैमरे, रडार और सेंसर लगे होते हैं. इन उपकरणों के मदद से ये जिस भी क्षेत्र के ऊपर उड़ता है उस इलाके की एक-एक तस्वीर अपने कैमरों में कैद कर लेता है.

           इन तस्वीरों के माध्यम से पायलट जमीन पर बने कंट्रोल-रुम से पता लगा लेता है कि दुश्मन का ठिकाना कितनी दूरी पर है और कहां पर है. बस इसके जरिए वो यूएवी को आसमान में उड़ाता है और उसका टारगेट फिक्स कर मिसाइल और बमों की बौछार कर देता है. दुश्मन को संभालने तक का मौका नहीं मिलता. यहां तक की यूएवी की मिसाइलों तक में जीपीआरएस जैसी तकनीक लगी होती है. यानि पायलट चाहे तो हवा में उड़ती मिसाइल को किसी भी दिशा में मोड़ सकता है. ये तकनीक चलते (या दौड़ते) हुए दुश्मनों के टैंक के लिए काफी प्रभावी होती है.
    जानकारों की मानें तो, मिलेट्री-एयरक्राफ्ट के मुकाबले यूएवी के कई फायदे हैं. पहला तो ये कि इससे पायलट और दूसरे सैन्य-अधिकारियों की जान को कोई खतरा नहीं होता है. दरअसल, अगर लड़ाकू-विमान दुश्मन की रडार की पकड़ में आने से उसपर दुश्मन अपनी मिसाइलों से हमला बोल सकता है. ऐसी स्थिति में एयरक्राफ्ट, पायलट और उसमें बैठे दूसरे अधिकारियों की जान जोखिम में पड़ सकती है. लेकिन यूएवी क्योंकि पायलट-रहित एयरक्राफ्ट है इसके पायलट की जान को कोई खतरा नहीं होता. जो कि किसी भी युद्ध में बेहद जरुरी है. साथ ही लड़ाकू-विमान की तुलना में यूएवी बहुत छोटा होता है. इसलिए दुश्मन की नजर से दूर रहता है. साथ ही इसकी कीमत भी मिलेट्री-एयरक्राफ्ट से काफी कम होती है. इसलिए अगर इस पर हमला हो भी जाये तो नुकसान बेहद कम होता है.
अमेरिकी ड्रोन उड़ने के लिए तैयार

            अमेरिकी ड्रोन की तर्ज पर अब लगभग हर बड़ा देश इस तरह के यूएवी तैयार कर रहा है. भारत ने भी अपने कई यूएवी तैयार किए हैं. इनमें प्रमुख हैं निशांत, रुस्तम,  लक्ष्य और अभय. भारत की सबसे बड़ी सैन्य-सरकारी संस्था, डीआरडीओ ने इन सभी यूएवी को तैयार किया है. साथ ही कुछ प्राईवेट कंपनियां भी अब भारत में इस तरह की यूएवी तैयार कर रहीं हैं.

निशांत--इस मानव-रहित टोही विमान यानि यूएवी का मुख्य काम है किसी भी इलाके की निगरानी और सर्वेक्षण करना यानि सर्विलिएंस और रिकोनिसेशंस.
निशांत
भारतीय सेना निशांत का फिलहाल उपयोग बॉर्डर इलाकों में करती है. इसके जरिए बॉर्डर पर नजर रखी जाती है कि कही दुश्मन हमारी सीमा में घुसपैठ तो नहीं कर रहा है. या दुश्मन को कोई विमान हमारी एयर-स्पेस में तो नहीं घुस आया है. 
  करीब साढ़े चार मीटर लंबा और 180 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से उड़ने वाला निशांत चार घंटे से ज्यादा तक हवा में उड़ सकता है. ये 10 से 12 किलोमीटर तक की किसी भी इमारत का पता लगा सकता है. साथ ही 4-5 किलोमीटर दूर जा रहे ट्रक या टैंक को भी आसानी से कैच कर लेता है. इसके जरिए हमारी सेना की तोपें किसी भी निशाने पर आसानी से टार्गेट कर सकती हैं.

 रुस्तमरुस्तम निशांत का एडवांस वर्जन है. डीआरडीओ ने रुस्तम के भी दो वर्जन तैयार किए है. रुस्तम-I और रुत्मस-II. रुस्तम-II ज्यादा एडवांस है.
रुस्तम-
अगर इसमें एरियल-टारगेट फिट कर दिया जाये तो ये अमेरिकी ड्रोन की तर्ज पर काम करने लगेगा. फिलहाल डीआरडीओ ने इस विकल्प को खुला रखा है.

अभय—अभय नाम का यूएवी सही मायने में अमेरिकी ड्रोन की तरह काम करता है. इस यूएवी में मिसाइल फिट होती हैं. इससे जमीन या फिर समुद्री-जहाज से भी लांच किया जा सकता है. 

लक्ष्य—लक्ष्य अपने नाम की तरह ही अपने लक्ष्य को टार्गेट करता है. ये एक तरह से अभय का एडवांस वर्जन है जिसमें मिसाइल फिट होती हैं.
लक्ष्य
जमीन पर बैठा इसका पायलट लक्ष्य लेकर लक्ष्य को कहीं भी लांच कर सकता है. भारतीय सेना, एयरफोर्स और नेवी लक्ष्य का इस्तेमाल कर रहीं हैं. ये 5 से 9 किलोमीटर तक का टार्गेट कर सकती है.

एयरोस्टेट सिस्टम—ये एक तरह का बहुत बड़ा गुब्बारा होता है. करीब डेढ़ किलोमीटर की उंचाई से ये गुबारा, जिसे एयरोस्टेट कहा जाता है, 150 किलोमीटर के दायरे तक की निगरानी कर सकता है. इसमें लगे खास तरह के कैमरे दुश्मन के यूएवी और मिसाइल को टारगेट पर पहुंचने से पहले ही डिटेक्ट करने की क्षमता है.

नेत्रा—जैसा की इस यूएवी का नाम है, ठीक वैसे ही ये आंखों की तरह काम करती है. ये बेहद ही छोटा उपकरण है.
नेत्रा
जैसा कि
थ्री इडियट्स नाम की फिल्म में दिखाया गया था. चार-पांच पंखुड़ी वाला एक छोटा सा उपकरण जिसमें एक कैमरा फिट रहता है. करीब आधा-किलोमीटर की उंचाई से ये 4-5 किलोमीटर तक की निगरानी रख सकता है और तस्वीरें खीच कर जमीन पर बने कंट्रोल सिस्टम में कैद करता रहता है. इस यूएवी को भारत की पैरा-मिलेट्री फोर्स बड़ी तादाद में नकस्ली-प्रभावित इलाकों में इस्तेमाल कर रही हैं.

एक्यूलोन—भारत की प्राईवेट कंपनी, टाटा-नोवा ने इस यूएवी को तैयार किया है. ये भी निशांत और रुस्तम की तरह ही निगरानी और सर्वेक्षण का काम करती है. लेकिन इसकी उड़ने की क्षमता निशांत और रुस्तम से कहीं कम है.

                हाल ही में दिल्ली के प्रगति मैदान में संपन्न हुई एशिया की सबसे बड़ी रक्षा-प्रर्दशनी, डिफेंस-एक्सपो 2014 (6-9 फरवरी) में इन मानव-रहित विमानों को प्रर्दशित किया गया था. साफ है कि भारत भी अब दूसरे बड़े देशों की तरह यूएवी के क्षेत्र में अपने कदम जमाने की स्थिति में पहुंच गया है.

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जनमत

मेरी अलग-अलग पोस्ट पर लोगों की राय...

1. सर, आपके हर लेख में---आपके हर अनुभव का मिश्रण होता है--जो हर बार एक नई सीख देता है। पत्रकारिता में नए हैं पर बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। जहां तक ट्रैन वाले अंकलजी की बात है उसपर आपका जबाब बिल्कुल सही था कि ये तो हर फिल्ड में होता है और ये सही भी है। (मनोज एटलस, 9 अगस्त 2009 को 'आर्मी कभी मत ज्वाइन करना' में)

2. बहुत अच्छा लिखा है। अभी मीडिया में कैरियर की शुरुआत की है, पढ़ता हूं तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। (मनोज कुमार, 2 अगस्त 2009 को 'सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश' में)

3. बहुत लंबी पोल खोली आपने दिल्ली के पत्रकारों की। (वर्षा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें', में)

4. पत्रकारों के सरकारी दामाद बनने के शौक के चलते ही मीडिया की और लोकतंत्र की यह दुर्दशा है। आलेख काफी लंबा था। समझ नहीं आया कि आप पत्रकार बिरादरी के साथ मनाने वाले दल के सदस्य के तौर पर थे ता डायरेक्टर साहब के मन की बात जानकर केवल उन्हीं की करतूतों की रिपोर्टिंग करने गये थे। उम्मीद है टिप्पणी प्रकाशित जरुर होगी। (सरिथा, 14 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

5. सही है भाई। अपनी बिरादरी के लोगों का गुनाह खुद ही कबूल करने की हिम्मत...काबिल-ए-तारीफ। बधाई। (चण्डीदत्त शुक्ल, 19 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

6. जितना रोचक ये संस्मरण है--उससे ज्यादा काबिले-तारीफ है आपकी स्मरण-शक्ति. बरसों पहले की गई कवरेज के आपको नाम-गाम और पते ठिकाने सब याद है. बधाई। एक बात तो आप भी मानेंगे बंधु कि दिल्लीवाले पत्रकार सरकारी मेहमान थे--लिहाजा वो स्तरीय ट्रीटमेंट के हकदार थे और उनके लिए सारे इंतजाम करना सरकार का कर्तव्य था--जहां तक मैं समझता हूं डायरेक्टर साहब भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। दिल्ली में बैठे पत्रकार कम नहीं हैं, तो भला दिल्ली में बैठा कोई अफसर इतना भोला कैसे हो सकता है...अगर सफर की शुरुआत में ही सीएम साहब के दरबार में सीधी दस्तक दे दी जाती, तो शर्तिया तौर पर इस परेशानी से बचा जा सकता था. (अशोक कौशिक, 29 मार्च 2009 को 'पत्रकारों का स्वागत कैसे करें' में)

7. बहुत रोचक आलेख. इतनी सारी जानकारी और तस्वीरें एक वृतांत में. आन्नद आ गया नीरज भाई. लिखते रहिए नियमित. (उडन तश्तरी, 23 फरवरी 2009 को 'हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है' में)

8. नीरज भाई, आपने अदालत के फैसले को पढ़ा और आप इस खबर को शुरु से कवर करतें रहें हो, इसलिए आपके राईटअप में आपकी पकड़ दिख रही हैं...और बिल्कुल सही है कि ये बह्रामंड का सबसे क्रूरतम मानव है। शायद इनके लिए ये सजा कम है। अगर इससे भी बड़ी कोई सजा होती तो वो मिलनी चाहिए थी। (सुजीत कुमार, 15 फरवरी, 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

9. क्षमा चाहता हूं मैं आपसे और इस फैसले से सहमत नहीं हूं। इनसे भी ज्यादा क्रूर नरपिशाच है दुनिया में. वे जो इन्हे सरक्षंण देते है और जो इनके टुकड़ो पर पलते हैं. वे जो मारे जाने वाले निर्दोष लोगों के माननधिकारों की चिंता नहीं करते, पर निरीह लोगों को बेवजह मार देने नावे आतंकियों के मानवधिकारों की बात करते हैं. ऐसे लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं, कार्यपालिका, न्यायपालिका और यहां तक कि चौथे खम्बे और साहित्य में भी हैं. उनके बारे में क्या सोचते हैं आप ? (इष्ट देव सांकृत्यायन, 15 फरवरी 2009 को 'बह्रामण्ड का क्रूरतम मानव' में)

10. सोनू पंजाबन को इतना ग्लैमराइज क्यों कर दिया गया है. क्या और सोनू पंजाबने बनाने के लिए. (वर्षा, 24 नबम्बर 2008 को 'सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल गर्ल' में)

11. A very intersting post on RTI. ( Sachin Agarwal , 11 October 2008 in 'आरटीआई वाला हत्यारा')

12. नीरज, बढिया लिखे हो। महिलाओं का योन शोषण नहीं होना चाहिये। लेकिन मैं बताउं जासूसी का खेल मर्यादा और कानूनी दायरे से बाहर होता है। इसके दायरे में रह कर जासूसी नहीं हो सकता। जासूसी के ट्रेनिंग के दौरान हीं जासुसों को बेहाया बना दिया जाता है। सेक्स का कोई मायने नहीं। जासूसी के खेल में सेक्स की जो भी कल्पना कर ले सभी प्रकार का खेल होता है। लेकिन अपने देश की रक्षा में। इसी के आड़ में कुछ अधिकारी अपने हीं महिला सदस्य के साथ ऐसा करे यह गलत है। (राजेश कुमार, 24 अगस्त 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

13. कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हैजरा तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारों... आप खुद ही कह रहे हैं कि रॉ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता चल सकता.. उसके अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता... आप ये सब कुछ कहते हुए रॉ की तमाम अंदरूनी बातों को अपने ब्लाग से उजागर करते चले जा रहे हैं ... बहुत खूब..अच्छा तरीका है बखिया उधेड़ने का. (बेनामी, 3 सितम्बर 2008 को 'रॉ सेक्स स्कैंडल' में)

14. अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद. सुंदर लेख है...(विनीता, 20 अगस्त 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

15. thanx for ur travelogue! nice post! (Munish, 20 August 2008 in 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

16. आपका पहला सफर तो 'हवा-हवाई'हो गया था लेकिन अब लगता है कि नेपाल में भी आपको कुछ रस मिलने लगा है तभी तो नेपाल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं.. कारण चाहे जो भी हो पर नेपाल है काफी अच्छी जगह.. अगर लुत्फ उठाना हो तो नेपाल से अच्छी जगह दुनिया में कोई नहीं.. लेकिन सर.. जरा संभल के, क्योकि चमकता जो नजर आता है सब सोना नही होता...(दीप चंद्र शुक्ल, 3 सितंबर 2008 को 'सूरज अस्त, नेपाल मस्त' में)

17. काफ़ी रोचक साक्षात्कार है ये.अच्छा लगा शोभराज के कई अनजाने पहलुओं को जानकर. (बालकिशन, 29 जुलाई 2008 को 'चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत' में)

18. इतना व्यस्त रहने के बावजूद आप अपने ब्लॉग को दुरुस्त रखते हैं।यह चीज मुझे आपकी तारीफ करने को मजबूर कर रही है।कृपया इसे बनायें रखें।।।।आशा है अापके अनुभव समाज को आपराधिक प्रवृति को समझने में मदद करते रहेंगे।।।।।।।।।।।।। (मंयक, 7 जुलाई 2008 को 'बिकनी किलर की आशिकी' में)

19. यह जानकर खुशी हुई कि आप खबरों(विशेषकर इस खबर को लेकर)को टीआरपी के चश्में से नहीं देखते हैं।जैसा आपके अन्य साथियों देखते हैं।(मसाला मिल गया)आपका blog देखा तो comment करने की हिमाकत कर रहा हूँ।उम्मीद है आप इसी तरह खबरों के प्रति ईमानदार नजरिया रखेंगे। (मंयक, 9 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

20. नीरज जी , आपका ब्लॉग गुनाहगार मैं लगातार देखता रहता हूँ ...अपराध पर अच्छी खबरें देखने को मिलती है ...जहाँ तक बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड की बात है तो ...स्टार न्यूज़ पर अभी (देर रात बारह बजकर पचास मिनट पर) आपका ही फोनो देख रहा था .शायद खुलासा होने ही वाला है ...आज जैसा है रेणूका चौधरी ने कहा है की आरुषि पर फ़िल्म नहीं बनेगी ...अच्छी बात है ... (रामकृष्ण डोंगरे, 10 जून 2008 को 'ब्लॉग के लिए टाइम नहीं मिला' में)

21. नीरज, रोचक ब्लॉग है आपका। (हर्षवर्धन, 10 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

22. नीरज जी, आपका ब्लॉग आज पहली बार मैने पढ़ा है...काफी दिलचस्प था. मैं तूलिका सिंह हूं...सीएनईबी न्यूज चैनल में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम कर रही हूं. आपको शायद याद होगा मैने बीएजी में काम किया है इंसाफ में जो कि बाद में बंद हो गया था। मै आपके ब्लॉग की सदस्य बना चाहती हूं और आपसे क्राइम रिपोर्टिंग सीखना चाहती हूं। प्लीज अपना नंबर मुझे मेल कर दीजिए. (तूलिका सिंह, 15 अप्रैल 2008 को 'जीनियस कॉल-गर्ल' में)

23. आलेख का शीर्षक(क्लाइंट नं 9)प्रभावित कर रहा है आलेख को पढने के लिए,अच्छा लगा..साथ ही आलेख के आखिर मे कंम्पयूटर के साथ स्पिटजर को भी वायरस,व्यंग्य का भी अहसास दे रहा है।इतना तो पता था कि आपकी कलम संपूर्ण भारतवर्ष के साथ नेपाल तक मार करती है,लेकिन आपकी तूलिका से लिखी सुदूर देश की कहानी बता रही है कि सारी दुनिया मे घूमती है आपकी कलम। (अभिनव उपाध्याय, 17 मार्च 2008 को 'CLIENT NO. 9 ' में)

24. very nice information.u r a unique writer who gives a whole picture of the incedent ( आशीष, 7 फरवरी 2008 को 'कंधार से पटियाला तक' में)

25. वाह!! मिर्जा का कच्चा चिटठा देने के लिए धन्यवाद (ईष्ट देव सांकृत्यायन, 27 दिसम्बर, 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

26. नीरज जी गालिब को आज आपने फिर से मेरे जेहन में जिंदा कर दिया, वरना गालिब को तो मैं भूलता ही जा रहा था, हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले (महर्षि, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

27. क्या खूब थे तुम भी गालिब। तेरे नाम ने पहुँचाया गुनहगार तलक। (दिनेशराय द्विवेदी, 27 दिसम्बर 2007 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)

28. बहुत खूब मीर्ज़ा ग़ालिब की यह कहानी पढ़कर मज़ा आ गया. ब्लॉग को एक अलग रंग देने से अछा लगा. (वीर, 4 जनवरी, 2008 को 'मिर्ज़ा ग़ालिब हाज़िर हो' में)