<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162</id><updated>2012-01-24T17:29:25.487+05:30</updated><category term='जेल'/><category term='kathmandu'/><category term='KUNJAM'/><category term='HATFIELD'/><category term='VALMIKI'/><category term='TULSIDAS'/><category term='शीशगंज गुरुद्धारा'/><category term='EMPEROR&apos;S VIP CLUB'/><category term='JAMES BOND'/><category term='मिर्जा गालिब'/><category term='UNDERWORLD DON'/><category term='porbander'/><category term='SRILANKA'/><category term='DETECTIVE'/><category term='CLIENT NO.9'/><category term='mahatma gandhi'/><category term='kidney racket'/><category term='कोतवाल'/><category term='autobiography'/><category term='SPITZER'/><category term='Dr. Amit'/><category term='RAMAYANA'/><category term='RAVAN'/><category term='ROMESH SHARMA'/><title type='text'>गुनाहगार</title><subtitle type='html'>...man who lives by sword die by sword.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>50</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-1752913208663102580</id><published>2011-10-30T16:20:00.010+05:30</published><updated>2011-10-30T17:03:26.832+05:30</updated><title type='text'>खबरें बिकती हैं !</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;...&lt;strong&gt;नेताओं को 'लाइव' पर लाने के लिए हम पैसा लेंगे। मोल-भाव का काम स्ट्रिंगर का रहेगा। रिपोर्टर को उसमें नहीं पड़ना है। बस तुम्हें ये देखना है कि स्ट्रिंगर कितने पर तय कर रहा है। जितना भी भाव तय होगा उसका दस प्रतिशत रिपोर्टर और पांच प्रतिशत स्ट्रिंगर को दिया जायेगा। बाकी मैनेजमेंट के खाते में जायेगा&lt;/strong&gt;...&lt;/blockquote&gt; &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;हाल ही में चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के एक बाहुबली नेता की विधायक पत्नी की विधानसभा की सदस्यता रद्द कर दी। ये शायद पहली बार था कि किसी विधायक को इसलिए पद से हटा दिया गया क्योंकि चुनाव के दौरान उसने पैसे देकर अखबार में खबर प्रकाशित कराई थी। लोगों का ध्यान सिर्फ इस तरफ गया कि विधायक की सीट चली गई थी। पैसे देकर खबर यानि ‘पेड न्यूज’ छापने वाले जिन अखबारों की वजह से (महिला) विधायक की गद्दी गई, उन्होंने भी इस खबर को प्रमुखता से अपने-अपने अखबारों में जगह दी। लेकिन सवाल ये है कि क्या दूर-दराज के इलाकों में ही ये पेड न्यूज सीमित है? इसका जबाब साफ शब्दों में है नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;        राजधानी दिल्ली में भी ये ‘महामारी’ बाकायदा अपनी जड़े फैला चुकी है। देश के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार की पोल तो विदेशी पत्र-पत्रिकांए खोल चुकी हैं। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-npf6QCvmrwI/Tq0s9BVPhkI/AAAAAAAAA1I/Mv4E6T4UI6c/s1600/PAID%2BNEWS%2B1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 246px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-npf6QCvmrwI/Tq0s9BVPhkI/AAAAAAAAA1I/Mv4E6T4UI6c/s320/PAID%2BNEWS%2B1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5669236932770498114" /&gt;&lt;/a&gt; नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजी अखबार को अपनी पेज-3 पत्रिका पर ये साफ तौर पर लिखना पड़ा कि ये खबरें विज्ञापन या फिर प्रोमशनल खबरें हैं। लेकिन हकीकत ये है कि पेड न्यूज सिर्फ अखबारों तक ही सीमित नहीं है। ये महिषासुर रुपी ‘दानव’ न्यूज चैनलों में भी घुस चुका है। लेकिन इससे पहले की ये महामारी हम सभी को ग्रसित कर दे, जरुरत है इसके खिलाफ सख्त और कारगर कदम उठाने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           पेड न्यूज का चलन कई सालों से चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ये ट्रैंड  सिर्फ और सिर्फ इलेक्शन के दौरान तक ही सीमित था। वो भी दूर-दराज के इलाकों में स्थानीय अखबारों तक ही इसका दायरा था। चुनाव में अपना भाग्य आजमाइश करने वाले उम्मीदवार पैसे देकर अपने से जुड़ी खबरें (आसान शब्दो में कहें तो ‘पीआर’ न्यूज) अखबारों में छपवाते थे। अधिकतकर ये उम्मीदवार इलाके के छुटभैया नेता होते थे, जो अपने छोटे-मोटे (सामाजिक) कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर छपवाते थे। ये नेता अमूमन स्थानीय पत्रकारों (रिपोर्टर या स्ट्रिंगर) से सांठ-गांठ कर या यूं कहें की उनकी जेब गरम कर विज्ञापनों को खबर की शक्ल में छपवाते थे। कभी-कदाक ब्यूरो चीफ या फिर स्थानीय संपादकों को भी इसका हिस्सा पहुंच जाता था। &lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;      लेकिन जब अखबार के मालिकों तक ये फुसफुसाहट पहुंची कि उनके रिपोर्टर और संपादक तक इलेक्शन के दौरान अपनी जेबें भरते हैं तो उनके कान खड़े हो गए। मालिक तो आखिर मालिक ठहरें, सो उन्होंनें चुनाव के दौरान पैसों वाली खबरों के लिए अखबार में अलग जगह बनवा दी—विज्ञापन और खबरों के बीच। यानि जो काम पहले चोरी-छिपे होता था, उसे अब ‘कानूनी’ जामा पहनाने की जुगत शुरु हो चुकी थी।  इस तरह की खबरों पर रंग पोत दिया गया। दरअसल, अखबार मालिक इन खबरों को बाकी खबरों से अलग दिखाना चाहते थे। उनके मन में एक तरफ डर था कि  ‘लोग क्या कहेंगे’। वही दूसरी तरफ &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; इन अखबार के लाला-मालिकों को अपना ‘बिजनेस’ भी बढ़ाना था। हिंदी अखबारों में चुनाव के दौरान ये ‘रंगीन’ खबरें अलग ही दिखाई देने लगीं। जिसे समझ में आ गया कि इन रंगीन खबरों का क्या मतलब है तो आ जाए—हमने तो इन खबरों को रंग-पोत कर पाठकों को आगह तो कर दिया है कि, भई ये विज्ञापन नुमा खबरें हैं। &lt;/p&gt; इन अखबार के लाला-मालिकों को अपना ‘बिजनेस’ भी बढ़ाना था। हिंदी अखबारों में चुनाव के दौरान ये ‘रंगीन’ खबरें अलग ही दिखाई देने लगीं। जिसे समझ में आ गया कि इन रंगीन खबरों का क्या मतलब है तो आ जाए—हमने तो इन खबरों को रंग-पोत कर पाठकों को आगह तो कर दिया है कि, भई ये विज्ञापन नुमा खबरें हैं। जिस पाठक की समझ नहीं आया कि इन रंगीन खबरों का मतलब क्या है तो और भी अच्छा है। किसी-किसी अखबार में इन रंगीन खबरों के कोने में छोटा सा लिखा भी रहता था—‘विज्ञापन’। अब ये पढ़ने वाले पर है था कि उसे क्या ये ‘विज्ञापन’ लिखा हुआ समझ आता है या नहीं। प्रेस काउंसिल का भी डर नहीं है कि भई ये खबर छपी है या विज्ञापन। &lt;br /&gt;       लेकिन धीरे-धीरे इसी विज्ञापन नुमा खबर ने कब देश-दुनिया की खबरों के बीच में अपनी पैठ (सही कहें तो जगह) बना ली किसी को पता तक नहीं चला। दरअसल, रंगीन खबरों को देखकर (माफ कीजिए पढ़कर) लोग इन अखबारों की विश्वस्नीयता पर सवाल करने लगे थे। इसीलिए इस तरह की चुनावी विज्ञापनों पर से रंग उतार दिया गया और ब्लैक एंड व्हाइट खबरों के बीच में ही छिपा दिया गया। जिसका गवाह बना उत्तर-प्रदेश का बिसौली विधानसभा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-l-JEoDBZTiE/Tq0uIhO2zcI/AAAAAAAAA1U/LnL5n1QODGc/s1600/PAID%2BNEWS%2B2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 302px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-l-JEoDBZTiE/Tq0uIhO2zcI/AAAAAAAAA1U/LnL5n1QODGc/s320/PAID%2BNEWS%2B2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5669238229823835586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                 मुझे याद है कि दिल्ली में जब एमसीडी (स्थानीय निकाय, दिल्ली नगर निगम) का चुनाव हुआ तो मैं एक ऐसे न्यूज चैनल समूह से जुडा़ था जिसका अपना एक राष्ट्रीय चैनल तो था ही कई प्रादेशिक चैनल भी थे। समूह का अपना हिंदी अखबार और कई मैग्जीन थीं। इसी क्रम में समूह ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानि दिल्ली-एनसीआर (दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव) के लिए एक चैनल खोला था। इस चैनल के शुरुआत से ही मैं जुड़ गया था। चैनल ने आते ही दिल्ली में अपना डंका पीटना शुरुना कर दिया। मुझे अभी भी अच्छे से याद है कि हमारे चैनल की क्राइम रिपोर्टिंग से दूसरे नेशनल न्यूज चैनल के दिल्ली क्राइम ब्यूरो खौफ खाने लगे थे। दिल्ली-एनसीआर की शायद ही कोई ही बड़ी क्राइम खबरें होगी जो हमारे चैनल में ना ‘ब्रेक’ होती हो। आलम ये था कि जिन क्राइम रिपोर्टर्स ने ये चैनल छोड़कर दूसरे ‘बड़े’ चैनल ज्वाइन किए थे, वो हमारे चैनल के एसाइनमेंट पर फोन कर हमारी खबरों की डिटेल (जानकारी) लेते थे।  जल्द ही चैनल टॉप पर था। &lt;br /&gt;          लेकिन टॉप पर रहने का हमें एक नुकसान हुआ। दिल्ली चैनल के हेड का प्रमोशन हुआ और उन्हें नेशनल न्यूज चैनल की डूबती नैय्या को पार करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। फिर क्या था उसके बाद तो चैनल में गंद—पैसों की गंद—शुरु  हो गई। शायद एमसी़डी के चुनाव उसके लिए कई हद तक जिम्मेदार थे। या यूं कहें कि चुनावों की आड़ में चैनल का मैनजमेंट और बॉस जिम्मेदार थे। चैनल के मैनेजमेंट में शायद कोई समूह के ही अखबार से जुड़ा होगा। एक दिन चैनल के टॉप अधिकारियों की बैठक हुई और हमें यानि रिपोर्टर्स को एक ‘खास और खुफिया’ काम सौंपा गया। &lt;br /&gt;          चैनल के ‘पुराने चावलों’ को हम तक ये खास काम कराने का मैसेज पहुंचाया गया। बताया गया कि सभी रिपोर्टर्स, भले ही उनकी कोई भी बीट हो, एमसीडी इलेक्शन की कवरेज में जुटना है। एक रीजनल चैनल के हिसाब से नगर निगम के चुनाव हमारे लिए एक बड़ी खबर थी, हमें अपनी बीट छोड़ने में कोई गुरेज नहीं था। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-LAjLDbFwP0U/Tq0uhu29WXI/AAAAAAAAA1g/BqLlG1ChP4w/s1600/PAID%2BNEWS%2B3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 209px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-LAjLDbFwP0U/Tq0uhu29WXI/AAAAAAAAA1g/BqLlG1ChP4w/s320/PAID%2BNEWS%2B3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5669238662978427250" /&gt;&lt;/a&gt;  अखबार के दिनों में भी भले ही मेरी बीट क्राइम रही हो, लेकिन उससे पहले हुए एमसीडी चुनाव में भी मैने इलेक्शन-रिपोर्टिंग की थी। लेकिन तभी उस ‘खास’ काम के साथ एक ‘खुफिया’ काम भी सौंपा गया। वो खुफिया काम था चैनल के लिए ‘रेवेन्यू जेनरेट’ करना। सीधे शब्दों में पैसा जुटाना। यानि अब रिपोर्टिंग के साथ-साथ ‘मार्केटिंग’ का भी काम करना था। रेवेन्यू कैसे इकठ्ठा करना ये भी समझाया गया। “करना कुछ नहीं है सिर्फ आपको मॉनेटरिंग करनी है, बाकी का काम स्ट्रिंगर संभाल लेंगे… आप सभी (रिपोर्टर्स) के साथ दो-दो स्ट्रिंगर ‘अटैच्ड’ किए जायेंगे… सभी को अलग-अलग पार्टी और एरिया दिया जायेगा… कोई ‘कन्फूयजन’ नहीं होगा”, एक पुराने चावल ने गुटखे का पीक थूकते हुए कहा। दूसरा बोला, “ये (...बीप) स्ट्रिंगर बहुत तेज होते हैं, इनपर काबू करना बहुत जरुरी है । ” मैनेजमेंट चाहता है कि आप रिपोर्टंग के साथ-साथ चैनल का रेवन्यू भी बढ़ाएं। &lt;br /&gt;       साफ निर्देश दिए गये कि चुनाव में खड़े होने वाले सभी पार्टियों के उम्मीदवारों को ‘पकड़ना’ हैं। यहां तक की जबतक सभी पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी ना कर दें, तबतक ‘संभावित’ उम्मीदवारों को भी नहीं छोड़ना हैं। टिकट के जितने भी दावेदार हैं वे सभी ‘दुधारी गाय’ हैं। “चुनाव का ही वक्त ऐसा होता है जब इनका दूध निकाला जा सकता है।” करना कुछ नहीं है, बस जितने भी उम्मीदवार हैं उन सभी को ‘लाइव-चैट’ पर लाना है और इस काम के लिए उनकी “रेट-लिस्ट” बनाओ। जगह-जगह लोगों से ‘बोल दिल्ली बोल’ के नारे लगवाओ, नेता खुद-ब-खुद खींचे चले आयेंगे। उम्मीदवारों को लोगों के बीच लाकर भिड़वाओं। नेताओं को लाइव पर लाने का काम स्ट्रिंगर करेंगे। भीड़ खुद नेता जुटायेंगे। जो भी नेता आयेगा वो अपने समर्थक लेकर आयेगा। उन्हीं नेताओं से मेज-कुर्सी और शामियाने का इंतजाम कराओ। शामियाना नहीं मिला तो खुले पार्क में नेताओं का भिड़वाओं। लेकिन जैसे भी हो कुछ तो करना पड़ेगा बॉस।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Lv79Q2CUSnk/Tq0u-Vz18aI/AAAAAAAAA1s/6xql4PPrcaE/s1600/PAID%2BNEWS%2B6.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 269px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-Lv79Q2CUSnk/Tq0u-Vz18aI/AAAAAAAAA1s/6xql4PPrcaE/s320/PAID%2BNEWS%2B6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5669239154470678946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;          “मैनजमेंट ने साफ निर्देश दिए हैं कि आपके चैनल से कोई रेवेन्यू नहीं मिल रहा है। उल्टा चैनल चलाने के लिए मैनेजमेंट को पैसा देना पड़ता है।”, चैनल के पुराने और वफादार लोग बोल रहे थे। जो बातें खुले तौर पर नहीं बोली जा रही थीं, उन्हे एक दूसरे के कान में फुस-फुसाहट के जरिये सभी चैनल के कर्मचारियों (पत्रकार कहना तो बेमानी ही था) तक पहुंचायी जा रही थी। किसी भी दिन चैनल बंद करने की नौबत आ सकती है। इसलिए चैनल बंद होने से बेहतर है कि मैनेजमेंट के लिए पैसा कमाओ।  &lt;br /&gt;        लेकिन एक रिपोर्टर ने पूछ ही लिया, “सर इसमें हमारा क्या फायदा होगा।” अरे यार, फायदा क्यों नहीं होगा। “देखो, नेताओं को लाइव पर लाने के लिए हम पैसा लेंगे। मोल-भाव का काम स्ट्रिंगर का रहेगा। तुम्हें उसमें नहीं पड़ना है। बस तुम्हें ये देखना है कि स्ट्रिंगर कितने पर तय कर रहा है। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; जितना भी भाव तय होगा उसका दस प्रतिशत रिपोर्टर और पांच प्रतिशत स्ट्रिंगर को दिया जायेगा। बाकी मैनेजमेंट के खाते में जायेगा।” तो सर, ये काम तो स्ट्रिंगर ही कर सकता है, दूसरे रिपोर्टर ने पूछ लिया। फिर वही बात, अरे यार तुम्हें बताया ना कि ये स्ट्रिंगर बहुत ‘तेज’ होते हैं। लेंगे 10 रुपये और बतायेंगे 5 रुपये। तुम्हें ये ध्यान रखना है कि पूरे दस की ही ‘पर्ची कटे’&lt;/p&gt; जितना भी भाव तय होगा उसका दस प्रतिशत रिपोर्टर और पांच प्रतिशत स्ट्रिंगर को दिया जायेगा। बाकी मैनेजमेंट के खाते में जायेगा।” तो सर, ये काम तो स्ट्रिंगर ही कर सकता है, दूसरे रिपोर्टर ने पूछ लिया। फिर वही बात, अरे यार तुम्हें बताया ना कि ये स्ट्रिंगर बहुत ‘तेज’ होते हैं। लेंगे 10 रुपये और बतायेंगे 5 रुपये। तुम्हें ये ध्यान रखना है कि पूरे दस की ही ‘पर्ची कटे’। &lt;br /&gt;‘इनपुट’ के कर्ताधर्ता बोलते चले जा रहे थे, “एक और फायदा है तुम जैसे रिपोर्टर्स का इसमें। तुम्हारा चेहरा भी तो ‘चमकेगा’ ना। जिस रिपोर्टर के इलाके में ‘बोल दिल्ली बोल’ के नारे लगेंगे, वहां वही रिपोर्टर लाइव-एंकरिंग करेगा। वैसे भी तुमसे स्टोरी (खबर) तो कोई होती नहीं है। इस बहाने तुम्हारी रिपोर्टिंग भी हो जायेगी और टी.वी पर भी दिख जाओगे।”&lt;br /&gt;          ये सब चिकनी-चुपड़ी बातें सुनकर अधिकतर रिपोर्टर्स की बांछे खिल गई।   “ अरे यार मेरी सैलरी तो मुश्किल से 10 हजार है। अगर एक-एक लाख के चार-पांच मुर्गे भी फंस गए तो एक महीने में ही 40-50 (हजार) कही नहीं गए। ऊपर से एंकरिंग भी। कई बार एंकरिंग का टेस्ट दिया, हर बार फेल कर देतें हैं। इस बहाने क्या पता स्टूडियो एंकरिंग का भी चांस मिल जाये। ”&lt;br /&gt;     लेकिन इन रिपोर्टर्स के बीच एक-दो ऐसे भी रिपोर्टर थे, जिन्हे ये बात बिल्कुल नागवार गुजरी। “लेकिन सर, मार्केटिंग टीम का काम हम लोग क्यों करेंगे। ये तो पत्रकारिता के सिद्वांतों के खिलाफ है। ” जबाब मिला, अगर किसी को कोई परेशानी है तो बॉस (चैनल हेड) से जाकर बात करले। “हम जो ये बाते कर रहें है, वे उनके ही आदेश पर हो रहा है। हम अपनी तरफ से कुछ नहीं कह रहें हैं। ”&lt;br /&gt;   मेरी समझ में बिल्कुल साफ आ चुका था। भाई जिन सिद्धांतों को आर्दश मानकर हम ‘कुछ’ करने के लिए पत्रकारिता में शामिल हुए थे, वो धराशायी होते दिख रहे थे।  लेकिन मैं ठान चुका था कि ‘बाजारु-पत्रकारिता’ नहीं करनी है। मैंने चैनल हेड तक अपनी बात पहुंचा दी थी। “अगर सभी रिपोर्टर इलेक्शन कवरेज में झोंक दिए गए तो क्राइम की खबरों का क्या होगा…वीकली क्राइम शो भी तो निकालना हैं। ” लिहाजा मुझे एमसीडी चुनावों से छुट्टी मिल गई थी।&lt;br /&gt;   दिल्ली नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे थे। सभी रिपोर्टर और ‘उनके’ स्ट्रिंगर चैनल का ‘रेवेन्यू’ बढ़ाने में जुट चुके थे। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; न्यूजरुम में सुबह दस बजे से लेकर रात तक यही चर्चा रहती थी कि फलां नेता ने आज के इलेक्शन कवरेज के लिए टेंट शामियाने का इंतजाम किया कि नहीं...कौन कितने सर्मथक लेकर पहुंच रहा है..अरे भाई सर्मथक नहीं आए तो ‘लाइव’ में “मजा कैसे आयेगा।” शायद ही कोई सा दिन ऐसा बचा होगा कि जिस दिन लाइव कवरेज के दौरान नेताओं के सर्मथकों में जूतम-पैजार ना होता और जिस दिन पुलिस को बीच-बचाव ना करना पड़ा हो। &lt;/p&gt; न्यूजरुम में सुबह दस बजे से लेकर रात तक यही चर्चा रहती थी कि फलां नेता ने आज के इलेक्शन कवरेज के लिए टेंट शामियाने का इंतजाम किया कि नहीं...कौन कितने सर्मथक लेकर पहुंच रहा है..अरे भाई सर्मथक नहीं आए तो ‘लाइव’ में “मजा कैसे आयेगा।” शायद ही कोई सा दिन ऐसा बचा होगा कि जिस दिन लाइव कवरेज के दौरान नेताओं के सर्मथकों में जूतम-पैजार ना होता और जिस दिन पुलिस को बीच-बचाव ना करना पड़ा हो। दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने अपने आला-कमान को ‘मैसेज’ पहुंचा दिया था कि अगर चैनल को इस तरह की कवरेज करनी है तो पहले पुलिस-थाने से अनुमति लेनी ही पड़ेगी। “खुले-आम कानून-व्यवस्था का मजाक नहीं बनने दिया जायेगा।”&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;       लेकिन रह-रहकर मुझे एक बात खाए जा रही थी। आखिर मैं ये किस दल-दल में फंस गया हूं। कभी सोचा नहीं था कि मैं ऐसे चैनल में काम करुंगा जहां पैसों के लिए खबरें करनी पड़ेंगी। या खबरों के लिए पैसे लेने पड़ेंगे। जहां पैसों के लिए खबरों को बेचा नहीं जाता था बल्कि पैसों के लिए खबरों को ‘बनाया’ जा रहा था। इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि जल्द ही मुझे दूसरे चैनल से नौकरी का ऑफर मिल गया। फिर क्या था, तनिक भर भी इंतजार किए बगैर मैने एमसीडी चुनाव से पहले ही दिल्ली-एनसीआर के उस चैनल से इस्तीफा दे दिया। &lt;br /&gt;   चुनाव खत्म होने के बाद मुझे कई चौकाने वाली बातें पता चली अपने उस चैनल के बारे में जिसे जी-जान लगाकर हमने दिल्ली-एनसीआर में सींचा था। पता चला कि &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; चैनल को कोई खास रेवेन्यू हाथ ही नहीं लगा था। सबकुछ रिपोर्टर-स्ट्रिंगर की जोड़ी ने अपनी झोली में डाल लिया था। पता चला कि जितना पैसा नेता इलेक्शन कवरेज के लिए देते थे। उसका आधा हिस्सा खुद रिपोर्टर-स्ट्रिंगर ने रख लिया था और बाकी 50 प्रतिशत ही चैनल के खाते में जाता था। चैनल के हिस्से में से भी 10 और 5 प्रतिशत रिपोर्टर और स्ट्रिंगर को मिलना ही था। &lt;/p&gt; चैनल को कोई खास रेवेन्यू हाथ ही नहीं लगा था। सबकुछ रिपोर्टर-स्ट्रिंगर की जोड़ी ने अपनी झोली में डाल लिया था। पता चला कि जितना पैसा नेता इलेक्शन कवरेज के लिए देते थे। उसका आधा हिस्सा खुद रिपोर्टर-स्ट्रिंगर ने रख लिया था और बाकी 50 प्रतिशत ही चैनल के खाते में जाता था। चैनल के हिस्से में से भी 10 और 5 प्रतिशत रिपोर्टर और स्ट्रिंगर को मिलना ही था। लेकिन मैनेजमेंट से ये बातें ज्यादा दिन तक छिपी नहीं रहीं कि किस इनपुट और एसाइन्मेंट के बंदे ने एमसीडी चुनाव में कितने न्यारे-वारे किए हैं। चुनाव के फौरन बाद किस रिपोर्टर ने अपने घर के सभी कमरों में एसी लगवाया है.... किसने नई कार खरीदी है... नोएडा से सटे वसुंधरा में फ्लैट बुक किया है। &lt;br /&gt;              जल्द ही चैनल के कई रिपोर्टर्स का तबादला दिल्ली से बाहर कर दिया गया। इनपुट और एसाइनमेंट के कई दिग्गजों को समूह के ही किसी दूसरे चैनल में ले जाकर डाल दिया गया। कई को नौकरी से ही बाहर कर दिया गया। करीब दो-तीन साल में ही चैनल का बंटाधार हो चुका था। जिस चैनल ने पूरे समूह की धाक दिल्ली-एनसीआर में बनाई थी, उस चैनल की काली-हकीकत सबके सामने आ चुकी थी। नेता से लेकर सरकारी बाबू और आम आदमी भी जान चुका था ये हकीकत। नतीजा, कुछ ही सालों बाद चैनल दिल्ली-एनसीआर से अपना बोरी-बिस्तर समेट चुका था।&lt;br /&gt;   अब लगातार पेड न्यूज के बारे में खबरें आ रही हैं। जाहिर है ये खतरे की घंटी सभी पत्रकारों के लिए है। अगर इससे अभी नहीं सचेते तो सभी का हश्र वही होगा जैसे हमारे उस दिल्ली-एनसीआर के रीजनल चैनल का हुआ था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-1752913208663102580?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/1752913208663102580/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=1752913208663102580' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1752913208663102580'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1752913208663102580'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='खबरें बिकती हैं !'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-npf6QCvmrwI/Tq0s9BVPhkI/AAAAAAAAA1I/Mv4E6T4UI6c/s72-c/PAID%2BNEWS%2B1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-2928018545653591327</id><published>2010-12-25T16:30:00.012+05:30</published><updated>2010-12-26T20:48:09.681+05:30</updated><title type='text'>बुद्धं शरणं गच्छामि !</title><content type='html'>&lt;em&gt;...महात्मा बुद्ध के दूसरे उपदेशों की तरह ही हमारे देश के लोगों ने उनके सबसे प्रिय वन,   ‘जेतवन’ को भी भुला दिया है। शायद यही वजह थी कि जिस टैक्सी से हम श्रावस्ती पहुंचे थे, उसका ड्राइवर उसी इलाके का होने के बाबजूद जेतवन के महत्व को नहीं जानता था...&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXPgBxUxdI/AAAAAAAAAzg/irUzxQMmEP0/s1600/Photo0733.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554573864569456082" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXPgBxUxdI/AAAAAAAAAzg/irUzxQMmEP0/s320/Photo0733.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;“अरे सर, इस जंगल में भी जायेंगे क्या आप ? कुछ नहीं है इसमें...टिकट अलग से लगेगा। क्यों पैसे खर्च कर रहें हैं झाड़-झकांड़ देखने में...।” लेकिन हम तो आए ही थे इस झाड़-झकांड़ को देखने...इस पावन जंगल के दर्शन के लिए। “ये कोई साधारण जंगल नहीं है भाई…” इतना कहकर हम (मैं और मेरी पत्नी) गाड़ी से नीचे उतरे और प्रवेश के लिए टिकट खरीदकर जंगल में दाखिल हो चुके थे।&lt;br /&gt;दरअसल, मुझे और मेरी पत्नी को हाल ही में बौद्ध धर्म के सबसे बड़े तीर्थ में से एक श्रावस्ती (शायद आठ बड़े तीर्थ में से एक) जाने का मौका मिला। सबसे बड़ा इसलिए, क्योंकि पूरे एशिया के एक बड़े हिस्से को अपने ज्ञान से उजियारा &lt;em&gt;(‘लाईट ऑफ एशिया’)&lt;/em&gt; करने वाले महात्मा बुद्ध ने अपने जीवनकाल का एक बड़ा हिस्सा इसी जगह (यानि ‘जंगल’ में) बिताया था। ना केवल जीवन बिताया था बल्कि इसी जगह पर बौद्ध धर्म के अनुयायी और भिक्षुओं को ज्ञान बांटा था। यही ज्ञान, बौद्ध भिक्षु देश-विदेश में जाकर जनमानस तक पहुंचाते थे।&lt;br /&gt;इसी पावन स्थली, श्रावस्ती पर है जेतवन नाम का वो ‘जंगल’, जिसे देखने के लिए हम वहां पहुंचे थे। लेकिन, शायद महात्मा बुद्ध के दूसरे उपदेशों की तरह ही हमारे देश के लोगों ने उनके सबसे प्रिय जंगल, ‘जेतवन’ को भी भुला दिया है। शायद यही वजह थी कि जिस टैक्सी से हम श्रावस्ती पहुंचे थे, उसका ड्राइवर उसी इलाके का होने के बाबजूद जेतवन के महत्व को नहीं जानता था।&lt;br /&gt;कई सौ एकड़ में फैले जेतवन में घुसते ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अंदर ही अंदर में अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा था, कि मुझे ऐसी धरती पर कदम रखना का मौका मिला है जहां इतिहास में अग्रणी नाम रखने वाले महान गौतम बुद्ध ने पूरी 24 ऋतुएं गुजारी थी। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXQgVot2wI/AAAAAAAAAzo/ZMsRHmbY7dI/s1600/Photo0727.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554574969413688066" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXQgVot2wI/AAAAAAAAAzo/ZMsRHmbY7dI/s320/Photo0727.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; जेतवन में जंगल से ज्यादा पुराने इमारतों के अवशेष अधिक है। इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पुराने अवशेषों को देखने मात्र से ही जीवन सफल हो जाता है। यहां तो हम उन अवशेषों में घूम रहे थे जहां कभी महात्मा बुद्ध रहा करते थे, भिक्षुओं को उपदेश देते थे। इसका सारा श्रेय जाता है पुरातत्व विभाग (एएसआई) को,  जिसने बड़े ही करीने से इस जगह को संजोकर रखा है। वन में अब वृक्ष &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; और इमारतों की बुनियादें (नींव) ही रह गई हैं। बुद्ध के निवार्ण (483 B.C) के सैकड़ों साल बाद तक उनके दिए उपदेशों को उनके अनुयायी और भिक्षु इसी जगह कलमबंद करते रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रावस्ती में दाखिल होते ही एक शांत और सौम्य वातावरण का अहसास होने लगता है। हालांकि, जिस जगह आज ये श्रावस्ती बसा हुआ है, ये हमारे देश के सबसे पिछड़े इलाकों में प्रतीत होता है। श्रावस्ती, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर है और राप्ती नदी के किनारे बसा हुआ है। इसी (श्रावस्ती) नाम से अलग जिला बनाया गया है जिसका मुख्यालय भिनगा है। लेकिन प्राचीन समय में ऐसा नहीं था। उस वक्त श्रावस्ती को ‘सहेठ-महेठ’ के नाम से जाना जाता था। ईसा पूर्व में श्रावस्ती, भारत (आर्यवर्त) के 16 सबसे बड़े और संपन्न राज्यों (महाजनपद) में से एक, कौशल की राजधानी हुआ करती थी। महात्मा बुद्ध से पहले भी ये जगह बसी हुई थी। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRdNsIEBgcI/AAAAAAAAA0I/1a1kaTctz-E/s1600/07122010112.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRdNsIEBgcI/AAAAAAAAA0I/1a1kaTctz-E/s320/07122010112.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554994085858738626" /&gt;&lt;/a&gt; इसके प्रमाण यहां की पुरानी इमारतों में साफ दिखाई देतें हैं। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे काव्यों में इस जगह को ‘चंपकपुरी’ और ‘चंद्रिकापुरी’ के नाम से वर्णन किया गया है। पुरातत्व विभाग की खुदाई में यहां बौद्ध काल (563-325 ईसापूर्व) से काफी पहले की किलानुमा शैली की इमारतें &lt;em&gt;(दाई तरफ फोटो देंखें)&lt;/em&gt; भी दिखाई पड़ती हैं।&lt;br /&gt;बौद्ध धर्म के मुताबिक, जिस वक्त कौशल राज्य में प्रसन्नजीत नाम के राजा का शासन था, उस वक्त यहां एक धन्ना सेठ, अनाथपिण्डक (‘नगर श्रेष्ठ सुदत्त’ के नाम से भी जाना जाता था) भी रहता था। एक बार उसकी मुलाकात महात्मा बुद्ध से हुई और उन्हें श्रावस्ती आने का निमन्त्रण दिया। बुद्ध ने उसका निमत्रंण स्वीकार कर लिया। बुद्ध के प्रवास के लिए अनाथपिण्डक को जेतवन बेहद उपयोगी जगह लगी। इसके लिए उसने कौशल के राजकुमार से जेतवन खरीदने का आग्रह किया। कहते हैं कि राजकुमार ने इस जंगल की कीमत के बदले में सेठ अनाथपिण्डक से इतनी स्वर्ण मुद्रिकाएं मांगी कि जिससे पूरे जंगल की धरती ढक जाए। अपने गुरु को दान स्वरुप देने के लिए अनाथपिण्डक ने राजकुमार की शर्त पूरी की और जंगल को खरीद लिया। अनाथपिण्डक ने इस जंगल में बुद्ध के रहने के लिए कई इमारतें (बौद्ध विहार या बिहार), आश्रम और स्तूप बनवाए। ना केवल बुद्ध बल्कि इस जंगल के एक बड़े हिस्से में बड़ी तादाद में बौद्ध भिक्षुओं के रहने की जगह बनवाई। कई सभागार बनवाए जहां महात्मा बुद्ध इन भिक्षुओं को उपदेश देते थे।&lt;br /&gt;इन्हीं इमारतों की बुनियादें मात्र रह गई हैं आज के जेतवन में। ऐसा नहीं है कि बौद्ध ग्रंथों में ही इस जगह का वर्णन मिलता है। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; चीनी इतिहासकार, फा-ह्यान (गुप्त काल यानि तीसरी शताब्दी) और ह्वेन-सांग ( छठी शताब्दी हर्ष काल) ने जेतवन में कई मंजिला मंदिरों का बाखूबी जिक्र किया है। यही वजह है कि श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व भी काफी बढ़ जाता है। &lt;/p&gt; चीनी इतिहासकार, फा-ह्यान (गुप्त काल यानि तीसरी शताब्दी) और ह्वेन-सांग ( छठी शताब्दी हर्ष काल) ने जेतवन में कई मंजिला मंदिरों का बाखूबी जिक्र किया है। यही वजह है कि श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व भी काफी बढ़ जाता है। जिस इमारत (‘गंध कुटी’) के बारे में इन चीनी इतिहासकारों ने मंदिर होने का दावा किया था, उस जगह जब हम पहुंचे तो पाया कि दर्जनों की तादाद में देशी-विदेशी पर्यटक और श्रद्धालु पूजा-अर्चना और ध्यान में लीन हैं। हालांकि, दोनों चीनी यात्रियों, फा-ह्यान और ह्वेन-सांग जब श्रावस्ती आये थे तो गंध कुटी (चंदन की लकड़ी से निर्मित होने के कारण ये नाम दिया गया होगा) की मात्र दो मंजिल ही रह गई थी, बाकी पांच मंजिले ध्वस्त हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने लोगों से सुना था कि ये मंदिर कभी सात मंजिला था और बुद्ध अपना अधिकतर समय इसी गंध कुटी में बिताते थे। इसीलिए शायद, पूरे जेतवन में ‘गंध कुटी’ को सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं महात्मा बुद्ध को ये जगह काफी पसंद आ गई और वे हर वर्षा-ऋतु में यहां आकर प्रवास करने लगे। इस तरह उन्होंनें कुल 24 वर्षा-ऋतु इसी जेतवन में बिताई थी—अपने जीवन के शायद सबसे ज्यादा दिन बुद्ध ने यहीं बिताए थे। बुद्ध 29साल की उम्र में गृहस्थ जीवन को त्यागकर निवार्ण की खोज में जगह-जगह भटकते रहे। फिर गया में पीपल के एक पेड़ (बोधि-वृक्ष) के नीचे तपस्या में लीन होने के बाद जब ज्ञान की प्राप्ति हुई तो अपने “मज्झिमा प्रतिपदा” यानि ‘बीच के रास्ते’ का उपदेश देने के लिए जगह-जगह भ्रमण करते रहते थे। सिर्फ ऋतुकाल में ही वे प्रवास करते थे—जिसके लिए अनाथपिण्डक ने उनके लिए जेतवन तैयार कराया था। कहते हैं कि कुल 871 उपदेशों (सुत्रों) में से 844 सुत्र, महात्मा बुद्ध ने इसी जेतवन में दिये थे।&lt;br /&gt;गया के बोधि-वृक्ष की भांति यहां भी ‘आनन्द बोधि वृक्ष’ है। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXRTlYzLyI/AAAAAAAAAzw/O13N_WaGVCw/s1600/Photo0728.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554575849815224098" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXRTlYzLyI/AAAAAAAAAzw/O13N_WaGVCw/s320/Photo0728.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; कहते हैं कि बुद्ध के प्रिय शिष्य, आनन्द और महामौदगल्यायन के प्रयासों के चलते ही गया के महाबोधि वृक्ष की संतति तैयार की गई थी। इस संतति को अनाथपिण्डक ने जेतवन में लगाया (आरोपित) किया था। ये वृक्ष अब शायद बूढ़ा हो चला है इसी वजह से उसे रोकने के लिए लोहे के खंभों का सहारा दिया गया है। इस वृक्ष के चारों तरफ बड़ी तादाद में भिक्षु और साधारण स्त्री-पुरुष ध्यान में लीन थे। शायद इस आस में कि जिस तरह महाबोधि वृक्ष के नीचे अंतर्ध्यान लगाने से महात्मा बुद्ध को अध्यातम की प्राप्ति हुई, उन्हें भी इस वृक्ष की छत्र-छाया में ज्ञान की एक किरण प्राप्त हो जाए तो उनका भी जीवन सफल हो जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रावस्ती का जिक्र हो और आंगुलीमाल (या अगुंलीमाल) का नाम ना आए, ऐसा भला कैसे हो सकता है। जेतवन के साथ-साथ ‘आंगुलीमाल की गुफा’ के लिए भी बेहद प्रसिद्ध है ये जगह। श्रावस्ती के आस-पास के लोग, जेतवन के लिए कम और डकैत आंगुलीमाल की गुफा (‘पक्की कुटी’ के नाम से भी जानी जाती है) के लिए ज्यादा पहचानते हैं। सही सुन रहें हैं आप ‘डकैत’ आंगुलीमाल । बौद्धकाल में इस इलाके में आंगुलीमाल नाम के एक खूंखार डकैत का आंतक था। कहते हैं कि जंगल और हाईवे से गुजरने वाले लोगों से वो लूटमार करता था और निशानी के तौर पर उनकी हाथ की एक अंगुली काटकर उसकी माला पहनता था—इसीलिए शायद उसका नाम ‘अंगुलीमाल’ पड़ा था। इधर-उधर विचरते हुए एक बार महात्मा बुद्ध की मुलाकात आंगुलीमाल से हुई। बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर उसने डाकू का चोला फेंका और उनका शिष्य बन गया। &lt;br /&gt;      लेकिन इस ढांचे को देखकर ये समझ नहीं आया कि ये वाकई गुफा है या कोई स्तूप या दोनों। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXTe7yjaOI/AAAAAAAAAz4/B0jPquR0Nm0/s1600/Photo0718.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554578243830638818" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXTe7yjaOI/AAAAAAAAAz4/B0jPquR0Nm0/s320/Photo0718.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; क्योंकि, ऊपर (यानि बाहर का ढांचा) से तो ये एक स्तूप दिखाई पड़ता है। लेकिन स्तूप के अंदर करीब 15 से 20 मीटर लंबी एक गुफा है। ये ‘गुफा’ सहेठ-महेठ से थोड़ी दूरी पर है या ये कह सकते है कि शहर से बाहर दिखाई पड़ती है। हो सकता है जब डाकू आंगुलीमाल की महात्मा बुद्ध से मुलाकात हुई तो वो इसी गुफा में निवास करता हो। जब वो बौद्ध भिक्षु बना तो लोगों ने इस गुफा के ऊपर स्तूप बनावा दिया हो। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह स्तूप किसी महिला का था,जिसे आंगुलीमाल ने अपने तपोबल से प्रसव पीड़ा से मुक्त कर माता और उसके नवजात शिशु को नई जिंदगी दी थी। इतिहासकारों की मानें तो ये स्तूप गिरने की कगार पर था जिसके चलते इसके नीचे से बरसाती पानी निकालने के लिए एक गुफा का निर्माण किया गया था। लोग अनजाने में ही इस जगह को ‘आंगुलीमाल गुफा’ के नाम से बुलाने लगे। गुफा के अंदर जली हुई ईंटें साफ दिखाई पड़ी रही थी। शायद, ये उन आक्रंताओं के निशान थे जिन्होने श्रावस्ती पर समय-समय पर आक्रमण किए, लूटखसोट मचाई, बड़ी तादाद में बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम किया और पूरे शहर को ध्वस्त कर किया था। इन आक्रंताओं में सबसे प्रमुख थे, हूण राजा मिहिरकुल (छठी शताब्दी) और अलाउद्दीन खिलजी (13-14वी शताब्दी)।&lt;br /&gt;          गुफा के ठीक सामने है ‘कच्ची कुटी’। वास्तुशिल्प से तो ये भी कोई स्तूप या महल दिखाई पड़ता है। लेकिन पुरातत्व विभाग आजतक इस ढांचे के बारे में ठीक-ठीक से कोई मत नहीं निकल पाया है। ये बात और है कि यहां के लोग इसे महादानी अनाथपिण्डक (‘सुदत्त’) के निवास-स्थल के नाम से जानते हैं।&lt;br /&gt;            श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; सम्राट अशोक ('देवानं प्रिय-प्रियदर्शी') ने यहां भी एक शिलालेख लगवाया था। इतिहास की पुस्तकों में इस बात का बाकयदा जिक्र किया गया है। लेकिन कई लोगों से पूछने पर भी वो जगह कहीं नहीं मिली जहां ये शिलालेख है। &lt;/p&gt; सम्राट अशोक ('देवानं प्रिय-प्रियदर्शी') ने यहां भी एक शिलालेख लगवाया था। इतिहास की पुस्तकों में इस बात का बाकयदा जिक्र किया गया है। लेकिन कई लोगों से पूछने पर भी वो जगह कहीं नहीं मिली जहां ये शिलालेख है। किसी ने बताया कि शिलालेख को पुरातत्व विभाग ने म्यूजियम भेज दिया है। एक-दो लोगों ने बताया कि उस शिलालेख को यहां के लोग शिवलिंग के रुप में पूजा करते हैं और आस-पास के किसी गांव में वो मंदिर है जहां इस शिलालेख की पूजा की जाती है। गौरतलब है कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर अपने साम्राज्य के हर कोने में शिलालेख खुदवाये और लगावाये थे जिनपर बौद्ध धर्म की महत्ता और गुणगान किया गया था। &lt;br /&gt;         तीर्थ-पर्यटक स्थल के तौर पर श्रावस्ती को अपना मुकाम बनाने में शायद वक्त लगेगा। जरुरी है कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं इस ओर ध्यान दे कि यहां आने वाले पर्यटकों को सही जानकारी मिल जाए। केवल बौद्ध-परिपथ बनाने से ही काम नहीं चलेगा। दरअसल, सारनाथ (वाराणसी), श्रावस्ती, कपिलवस्तु और लुंबिनी जैसे बौद्ध तीर्थ स्थलों को आर्कषक बनाने के लिए इन जगहों को एक साथ जोड़ने की प्रकिया चल रही है और इस हाईवे को ‘बौद्ध परिपथ’ का नाम दिया गया है। क्योंकि अपने जीवन-काल में महात्मा बुद्ध इसी रास्ते से होकर सारनाथ, श्रावस्ती और दूसरी जगह भ्रमण पर जाते थे।&lt;br /&gt;       लेकिन, शिलालेख को शिवलिंग की तरह पूजने का सुनकर मैं थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था कि आखिर बौद्ध धर्म का जिस देश में जन्म हुआ था, वही से खत्म क्यों होने लगा। जबकि, एशिया के बाकी देशों (जैसे चीन, बर्मा, नेपाल, तिब्बत, भूटान, थाईलैंड,  श्रीलंका इत्यादि) में बड़ी तादाद में बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRdcemP6wgI/AAAAAAAAA0Q/1jRFOy9UO2g/s1600/SHRAVASTI%2BTHAI%2BTEMPLE.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRdcemP6wgI/AAAAAAAAA0Q/1jRFOy9UO2g/s320/SHRAVASTI%2BTHAI%2BTEMPLE.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5555010346117939714" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          यही वजह है कि श्रावस्ती में एशिया के कई देशों के अलग-अलग बौद्ध मंदिर है। लेकिन इन सबमें सबसे बड़ा और अनूठा है थाई मंदिर, महामंगलोए मंदिर (&lt;em&gt;ऊपर वाली फोटो&lt;/em&gt;)। कई हजार एकड़ में फैले इस मंदिर का निर्माण कार्य अभी जारी है। इस मंदिर को थाईलैंड की एक बौद्ध संस्था बनावा रही है। इस मंदिर के परिसर में बुद्ध की अदम्य मूर्ति लगी हुई है। मंदिर के अंदर बेहद ही शांत वातावरण रहता है। उससे भी अच्छा यहां कार्यरत थाई भिक्षुणी हैं जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं से इतने सभ्य तरीके से पेश आते है जिसकी मिसाल कही और देखने को नहीं मिल सकती। भले ही उनमें से बहुत को ठीक-ठीक से हिंदी या इंग्लिश भी ना आती हो लेकिन वे सभी अपने सौम्य व्यवहार से यहां दर्शन करने आने वाले लोगों को मुग्ध करती हैं। गरीब हो या अमीर, अच्छे कपड़े पहने हुए हो या फिर कोई देहाती, सभी को वहां तैनात भिक्षुणी बड़े ही आदर के साथ मंदिर के अंदर ले जाती और (आध्यात्मिक) ध्यान और उपदेशों (बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, सघं शरणं गच्छामि...) के उच्चारण करने की प्रकिया बताती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थाई मंदिर के उलट जब हम श्रावस्ती से कुछ किलोमीटर दूर बने हिंदुओं के पवित्र स्थल, देवीपाटन पहुंचे तो एहसास हो गया कि क्यों हजारों साल पहले बौद्ध धर्म यहां के जनमानस के दिलों-दिमाग में बैठ गया था। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; क्यों हिंदु धर्म पतन की दिशा में जा रहा था, जिसके चलते ही राजकुमा सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध (या गौतम बुद्ध) बनना पड़ा और हिंदु धर्म में सुधार की जरुरत पड़ी। क्यों बड़ी तादाद में शूद्र, दलित, निर्बल और असहाय लोगों ने हिंदु धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म का दामन थामा—जो अभी भी जारी है।  &lt;/p&gt; क्यों हिंदु धर्म पतन की दिशा में जा रहा था, जिसके चलते ही राजकुमा सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध (या गौतम बुद्ध) बनना पड़ा और हिंदु धर्म में सुधार की जरुरत पड़ी। क्यों बड़ी तादाद में शूद्र, दलित, निर्बल और असहाय लोगों ने हिंदु धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म का दामन थामा—जो अभी भी जारी है। श्रावस्ती जिला, देवीपाटन रेंज के अंन्तर्गत आता है। इस रेंज में आने वाले दूसरे जिले हैं, गोंडा, बहराइच और बलरामपुर। इस इलाके में हिंदुओं का शक्तिपीठ है ‘देवीपाटन’। इसी नाम से चार जिलों का बनाकर एक रेंज इसी नाम से बनाई गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रावस्ती से लौटने के बाद हम पहुंचे इस पवित्र मंदिर में। लेकिन यहां पहुंचते ही मंदिर परिसर में बने यात्री-निवास के संचालक से तू-तू-मैं-मैं हो गई। हुई किस बात को लेकर, यात्री-निवास के बाथरुम को इस्तेमाल को लेकर। ‘बाहर’ के लोग बाथरुम इस्तेमाल नहीं कर सकते— क्योंकि पता नही कौनसी जाति या धर्म के हैं! ये है हमारे देश के मंदिरों और वहां काम करने वाले लोगों की हालत। मंदिर में दर्शन से पहले अगर किसी को साफ-सफाई पर ध्यान देना है तो बाहर सड़क पर जाओ, मंदिर में नहीं। मंदिर परिसर में बने सार्वजनिक शौचालय को शाम ढलते ही केयरटेकर शराब के नशे में बंद करके कही चला गया था। जिसके चलते ही हम यात्री-निवास पहुंचे थे लेकिन वहां के संचालक ने साफ मना कर दिया कि यहां ‘नहीं एंट्री’ कर सकते। एक आम शहरी के तौर पर जो पहुंचे थे हम वहां। वहां के संचालकों से शिकायत करने का भी कोई फायदा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;            खैर बाथरुम को वही छोड़कर हम मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचे तो पूजा की सामग्री जैसे ही वहां बैठे भारी-भरकम शख्स (शायद पुजारी था) की तरफ बढ़ाई तो उसने चेहरा देखा और पास खड़े एक कम उम्र के चेले को बुलाया और हमारी पूजा सामग्री ‘देवी’ के सामने अपर्ण कर दी। उस पुजारी ने हाथ आगे तक नहीं बढ़ाया। शायद वो सिर्फ वीवीआईपी श्रद्धालुओं की ही पूजा-सामग्री देवी के सामने अपर्ण करता था।&lt;br /&gt;           बौद्ध मंदिर (थाई मंदिर) और एक हिंदु मंदिर (देवीपाटन) में छोटे-बड़े का अंतर साफ दिखाई दे रहा...क्या हमारे देश में फिर किसी दूसरे ‘महात्मा बुद्ध’ की दरकार है ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-2928018545653591327?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/2928018545653591327/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=2928018545653591327' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2928018545653591327'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2928018545653591327'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='बुद्धं शरणं गच्छामि !'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TRXPgBxUxdI/AAAAAAAAAzg/irUzxQMmEP0/s72-c/Photo0733.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-7730885959535332275</id><published>2010-11-21T14:19:00.020+05:30</published><updated>2010-12-01T22:43:22.420+05:30</updated><title type='text'>खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग...</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;...अगली लाइन पढ़ी तो लगा जैसे मेरे ऊपर किसी ने एक घड़ा भरकर पानी डाल दिया हो। लाइन कुछ यूं थी, "नीरज हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।" अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो कविता उस दुबले-पतले से दिखने वाले गार्ड ने मेरे ऊपर ही लिखी थी...&lt;/strong&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;क्या आप विश्वास कर सकतें हैं कि गेट पर रखवाली करने वाला कोई सिक्योरिटी गार्ड भी एक कवि हो सकता है ? लेकिन ये सौ फीसदी सच है। एक दिन में अपने ऑफिस (नोएडा स्थित स्टार न्यूज हेडऑफिस) के बाहर अपनी कार (नीले रंग की वेगन-आर) पार्क कर रहा था, तभी एक दुबला-पतला सा सिक्योरिटी गार्ड वहां आया और गाड़ी लगवाने लगा। मुझे लगा कि ये उसका काम है--यानि गाड़ी को पार्किंग में ठीक से लगवाना और उनकी सुरक्षा करना--इसलिए वहां आया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मुझे ताज्जुब तब हुआ जब उसने कहा,"सर आज मेरी पार्किंग धन्य हो गई।" मैने उससे पूछा कि ऐसा क्या हुआ कि आज उसकी पार्किंग धन्य हो गई। वो बोला कि "आज आपने अपनी कार जो यहां लगाई है।" उसकी बात सुनकर मैं हलका सा मुस्कराया और ऑफिस की तरफ लपक लिया। दरअसल, हमारे ऑफिस के बाहर कम ही कार पार्क हो सकती हैं और मैं अमूमन सुबह दस बजे के बाद ही ऑफिस पहुंचता हूं तो गाड़ी ऑफिस से दूर ही खड़ी करनी पड़ती है। मुझे भी उस दिन याद आया कि काफी दिनों बाद गाड़ी ऑफिस के बेहद करीब लगाई थी। उस सिक्योरिटी गार्ड की ड्यूटी मेन-गेट के इर्द-गिर्द पार्क होने वाली गाड़ियों की निगरानी करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ घंटे ऑफिस में चकलसबाजी करने के बाद जब मैं अपनी गाड़ी पार्किंग से निकालकर चलने लगा,तो वो गार्ड दौड़ता हुआ आया और गाड़ी निकलवाने लगा। मुझे फिर लगा कि ये गार्ड तो अपना काम बड़े ही बखूबी तरीके से निभाता है। लगा कि शायद वो सभी गाड़ियों को ऐसे ही लगवाता और निकलवाता है। अभी मैने गाड़ी स्टार्ट ही की थी कि वो बुदबुदाया, "सर, मैने आपके लिए कुछ लिखा है।" अभी भी मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसके कहने का तात्पर्य क्या है। इस बार उसने बिना कुछ कहे मेरी तरफ एक पेपर बढ़ा दिया। उस सफेद पेपर पर कुछ दोहा (टाईप) या फिर कविता लिखी थी। मेरी व्याकरणी हिंदी (और संस्कृत) बेहद खराब है। वो देखकर मैं झल्लाया, "क्या है?" वो गार्ड घबराते हुए बोला, "सर, मैने आपके ऊपर (व्यक्तिव) एक कविता लिखी है।" उसके ये कहते ही मैं झेंप गया।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TOvtjRgqoHI/AAAAAAAAAy8/4gempflfWlQ/s1600/72250001.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5542784956661145714" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 212px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TOvtjRgqoHI/AAAAAAAAAy8/4gempflfWlQ/s320/72250001.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मैने इस बार पेपर को हाथ में लिया और धीरे-धीरे पढ़ना शुरु किया, "सोहत वाहन नील रंग, बहुरंगी के बीच"। लेकिन समझ नहीं आया। जैसे ही अगली लाइन पढ़ी तो लगा जैसे मेरे ऊपर किसी ने एक घड़ा भरकर पानी डाल दिया हो। अगली लाइन कुछ यूं थी,"नीरज हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।" अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो कविता उस निर्बल से गार्ड ने मेरे ऊपर ही लिखी थी। अब कविता में अपना नाम देखकर भी नहीं समझता क्या! पूरी कविता कुछ इस प्रकार थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;सोहत वाहन नील रंग, बहुरंगी के बीच।&lt;br /&gt;"नीरज" हुआ विलोप तब, सघन रहयो जब कीच।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज नाम नीर बिनु विकसित।&lt;br /&gt;स्वच्छ धवल रंच न कलुषित।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्यामल गात मनोहर नैना।&lt;br /&gt;उदित भयो जिमि सूरज रैना।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग।&lt;br /&gt;रजनी दिवस बराबर लगभग।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्जन मनुज पड़हि नित भार।&lt;br /&gt;सतजन मनहुं प्रीति बड़ भारी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि "नीरस" विनती करत मानो नीरज बात।&lt;br /&gt;दिल बिच करो मुकाम तुम, दिन हो चाहे रात।।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस कविता का जो अर्थ उस गार्ड ने मुझे बताया और जो थोड़ा बहुत मुझे याद है, वो कुछ इस तरह है... &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TOvuLVyoI3I/AAAAAAAAAzE/_HisE6uGM9s/s1600/WAGON-R.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5542785645004989298" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TOvuLVyoI3I/AAAAAAAAAzE/_HisE6uGM9s/s320/WAGON-R.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; मेरी वैगन-आर कार का रंग नीला है। सो पार्किंग पर तैनात उस गार्ड ने बताया कि "नीले रंग की एक अकेली गाड़ी बहुतेरी गाड़ियों में सबसे अलग दिखाई दे रही है।" वाकई जब मैने पार्किंग में खड़ी गाड़ियों पर नजर दौड़ाई तो देखा कि मेरी (नीली) गाड़ी को छोड़कर बाकी गाड़ियां फीके रंग की थीं-कोई सफेद तो कोई गोल्डन तो कोई स्टील-ग्रे। अगली लाइन का मतलब था कि इस गाड़ी को देखकर ऐसा लगता है कि कीचड़ में कमल ("नीरज") खिला हुआ हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली लाइन का अर्थ मुझे थोड़ा कम आता है। लेकिन शायद कुछ ऐसे होगा, कि जिस तरह पानी के बिना कमल (नीरज) नहीं खिलता उसी तरह आपका मन भी एकदम स्वच्छ है। उससे अगली लाइन यानि,"श्यामल गात मनोहर नैना। उदित भयो जिमि सूरज रैना" का तात्पर्य था कि आपके सांवले रंग पर जिस तरह आपकी आंखे अच्छी लगती हैं वो ठीक उस तरह है जैसे कि सुबह के अंधियारे में सूरज (सूर्य) का निकलना।&lt;br /&gt;इससे अगली लाइन में 'कवि-महाराज' यानि उस गार्ड ने वर्णन किया &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TOyrBbKl7SI/AAAAAAAAAzM/kdF91oEFVd4/s1600/NEERAJ%2BARUSHI%2BBULANDSHAHR.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5542993282346642722" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 120px; CURSOR: hand; HEIGHT: 90px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TOyrBbKl7SI/AAAAAAAAAzM/kdF91oEFVd4/s320/NEERAJ%2BARUSHI%2BBULANDSHAHR.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मेरे काम-काज के ऊपर-- खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग, रजनी दिवस बराबर लगभग। यानि मैं हर रोज देश-दुनिया की खबरें बताता हूं और इस कर्म में मेरे लिए दिन क्या और रात क्या सब बराबर है।&lt;br /&gt;आगे था कि मैं बुरे (दुर्जन) लोगों पर भारी पड़ता हूं और अच्छे (सतजन) लोग मुझे बेहद प्रिय हैं। कवि "नीरस" यानि वो गार्ड अपने आप को नीरस कवि बताते हुए विनती कर रहा है कि हे नीरज मेरी बात मानों कि दिन-रात तुम सभी लोगों के दिल में अपना मुकाम बनाओ।&lt;br /&gt;वाह क्या बात है! क्या कविता लिखी है। वो भी चंद घंटो में ही। मेरे इस कविता का यहां लिखने का उद्देश्य ये नहीं है कि कविराज-गार्ड ने ये पंक्तियां मेरे व्यक्तिव या फिर मेरी नीले रंग की कार पर लिखी है। बल्कि इसलिए कि &lt;p style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 7px solid; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 12pt; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 7px; MARGIN: 10px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 7px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 7px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;ये कविता एक ऐसे इंसान ने लिखी है जो बारह से भी ज्यादा घंटे गेट पर खड़ी कारों की निगरानी करता है। एक दरबान ने लिखी है... वो दरबान जिसे शहरी दुनिया में किसी अच्छे नजरिये से देखने का प्रचलन कम ही है। &lt;/p&gt;ये कविता एक ऐसे इंसान ने लिखी है जो बारह से भी ज्यादा घंटे गेट पर खड़ी कारों की निगरानी करता है। एक दरबान ने लिखी है... वो दरबान जिसे शहरी दुनिया में किसी अच्छे नजरिये से देखने का प्रचलन कम ही है। क्योंकि शहर की किसी भी छोटी-बड़ी बिल्डिंग या इमारत में चले जाओ, वहां अनपढ़ या फिर कम साक्षर गार्ड ही ज्यादा दिखाएं देते है। शायद यही वजह थी कि शुरुआत में मैने उस गार्ड को भी 'ऐसा ही' समझ लिया था। लेकिन उसकी कविता पढ़कर और उससे बात करने के बाद ही ज्ञात हुआ कि वो सचमुच एक ज्ञानी तो नहीं लेकिन किसी ज्ञानी से कम भी नहीं है।&lt;br /&gt;लेकिन एक सवाल बार-बार जेहन में घूम रहा था। वो 'ज्ञानी' यहां (यानि गेट पर दरबान गिरी) क्या कर रहा है ? उसपर उसका जबाब था, "किस्मत यहां तक ले आई सर। मैं पढ़ा-लिखा हूं, कम्पयूटर भी थोड़ा बहुत आता है।" आगे उसकी गुजारिश थी, "सर, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरुर बताना।" उसे आश्वसान देकर मैने गाड़ी स्टार्ट की और निकल गया। गाड़ी चलाते हुए भी यही सोचता रहा कि क्या आज के युग में कोई ऐसा इंसान भी है जो किसी के ऊपर गेट पर खड़े-खड़े ही कविता भी लिख सकता है। ऐसा हुनर तो लाखों में नहीं तो हजारों में भी कम ही मिलता है। हैटस ऑफ टू दयाराम!&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;      उस&lt;/span&gt; 'कविराज' गार्ड का नाम दयाराम है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले दयाराम का मोबाइल नंबर है 8800119745 और ईमेल आईडी है dayaramlohar@gmail.com&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-7730885959535332275?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/7730885959535332275/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=7730885959535332275' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/7730885959535332275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/7730885959535332275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='खोजहिं खबर सुनावहि अग-जग...'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TOvtjRgqoHI/AAAAAAAAAy8/4gempflfWlQ/s72-c/72250001.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-932492933494816367</id><published>2010-06-01T14:40:00.014+05:30</published><updated>2010-06-05T13:43:48.866+05:30</updated><title type='text'>पीले रुमाल का फंदा</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;...किसी भी नए सदस्य को ठगों के गिरोह में शामिल करने से पहले वो उसे कब्रगाह पर बैठाकर गुड़ जरुर खिलाता था। एक बार कैप्टन स्लीमैन ने एक ठग से इसका कारण पहुंचा तो उसने जबाब दिया कि हुजूर ‘तपोनी’ (यानि कब्रगाह) का गुड़ जिसने भी चखा, उसके लिये “दुनिया ही दूसरी हो गई।” अगर आपने भी तपोनी का गुड़ खा लिया तो “फौरन ठग बन जाओगे…” &lt;/blockquote&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATQwQ_J-jI/AAAAAAAAAws/yjX62vfjrac/s1600/BEHRAM+THUG+3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 230px; height: 264px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATQwQ_J-jI/AAAAAAAAAws/yjX62vfjrac/s320/BEHRAM+THUG+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477732574401526322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;         जिस रास्ते से वो गुजरता था, वहां कोसों दूर इंसान तो क्या इंसानों की छाप तक मिलनी बंद हो जाती थी। जहां-जहां भी वो जाता, लोग इलाका खाली कर उसकी पहुंच से दूर निकल जाते। जानते हैं क्यों ? इंसान के भेष में वो था एक खूंखार जानवर। पैसे के लिये वो लोगों को अपना निशाना बनाता था और उसका हथियार होता था रुमाल। जी हां एक पीला रुमाल ! वो रुमाल से देता था अपने शिकार को मौत। क्योंकि खून से लगता था दुनिया के सबसे खूंखार सीरियल किलर को डर। एक नहीं, दो नहीं, दो सौ नहीं तीन सौ नहीं पूरे 931 लोगों को उतारा था उसने अपने पीले रुमाल से मौत के घाट।&lt;br /&gt;          &lt;br /&gt; व्यापारी, काफिला और पीला रुमाल... ये दास्तां है एक ऐसे ठग की जिसे दुनिया का आजतक का सबसे क्रूर सीरियल किलर का खिताब हासिल है। बेहराम नाम का वो ठग असल में था ‘बेरहम’ ठग। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATPFy-JEZI/AAAAAAAAAwM/yQTZn7Km2YE/s1600/BEHRAM+THUG.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATPFy-JEZI/AAAAAAAAAwM/yQTZn7Km2YE/s320/BEHRAM+THUG.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477730745278075282" /&gt;&lt;/a&gt; भोले-भाले व्यापारियों के काफिले को अपना निशान बनाता था  वो ठग। बेहराम ठग का दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक इस कदर खौफ था कि लोगों ने इस रास्ते से चलना बंद कर दिया था।&lt;br /&gt;    बेहराम ठग को समझने के लिए हमें उसी युग (1765-1840) में चलना होगा, जिसमें वो रहता था। 18वीं सदी खत्म होने को थी। मुगल साम्राज्य खत्म हो चला था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में अपनी जड़े जमा ली थीं। ब्रिटिश-पुलिस देश में कानून व्यवस्था दुरूस्त करने में जुटी थी। लेकिन दिल्ली से जबलपुर के रास्ते में पड़ने वाले थानों मे कोई सा दिन ऐसा गुजरता था जब कोई पीड़ित आदमी अपने किसी करीबी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज ना कराने आता हो। अंग्रेज अफसर परेशान थे कि इतनी बड़ी तादाद में लोग कैसे गायब हो रहे थे।  &lt;br /&gt;   कराची, लाहौर, मंदसौर, मारवाड़, काठियावाड़, मुर्शिदाबाद के व्यापारी बड़ी तादाद में रहस्यमय परिस्थितियो में अपने पूरे की पूरे काफिलों के साथ गायब थे। तिजारत करने जाते इन व्यापारियों के मुनीम और कारिंदे भी रास्ते से गायब हो जाते। लखनऊ की खूबसूरत तवायफ हों, डोली में बैठकर ससुराल जाती नई–नवेली दुल्हनें या फिर बंगाल से इलाहाबाद और बनारस की तीर्थयात्रा पर आने वाले दल, सभी रास्ते से गायब हो रहे थे। छुट्टी से घर लौट रहे ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों की टोली भी अपनी ड्यूटी पर नहीं लौट रही थीं। उनका भी कही कोई अता-पता नहीं था। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATSH0XlmPI/AAAAAAAAAw0/CuWnrODYQYE/s1600/DELHI+TO+JABALPUR+MAP+1.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 243px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATSH0XlmPI/AAAAAAAAAw0/CuWnrODYQYE/s320/DELHI+TO+JABALPUR+MAP+1.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477734078547859698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पुलिस की फाइले लगातार गायब हो रहे लोगो की शिकायतों से बढ़ती जा रही थीं। लेकिन अंग्रेज अफसर चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। आलम ये हो गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी को एक फरमान जारी करना पड़ा। फरमान के मुताबिक कंपनी-बहादुर का कोई भी सिपाही या सैनिक इक्का-दुक्का यात्रा नहीं करेगा। यात्रा करते वक्त सभी सैनिक बड़े झुंड में चले और अपनी साथ ज्यादा नकदी ना लेकर चले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;        व्यापारी हो या फिर तीर्थयात्रा पर निकले श्रद्धालु या फिर चार धाम के यात्रा करने जा रहे परिवार, सभी निकलते तो अपने-अपने घरों से लेकिन ना जाने कहां गायब हो जाते, ये एक रहस्य ही था। काफिले में चलने वाले लोगों को जमीन खा जाती है या आसमां निगल जाता है, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। लेकिन सबसे हैरानी की बात ये थी कि पुलिस को इन लगातार गायब हो रहे लोगों की लाश तक नहीं मिलती थी। लाश मिलने के बाद पुलिस की तफ्तीश आगे बढ़ सकती थी। आखिर कैसे गायब हो रही थी लाशें।&lt;br /&gt;          &lt;br /&gt;सन् 1809 मे इंग्लैंड से भारत आने वाले अंग्रेज अफसर कैप्टन विलियम स्लीमैन को ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगातार गायब हो रहे लोगों के रहस्य का पता लगाने की जिम्मेदारी सौपी। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATPcuZmmnI/AAAAAAAAAwU/rTpyqxhtEec/s1600/CAPTAIN+SLEEMAN+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 180px; height: 225px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATPcuZmmnI/AAAAAAAAAwU/rTpyqxhtEec/s320/CAPTAIN+SLEEMAN+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477731139188071026" /&gt;&lt;/a&gt; थोड़े ही दिनों मे कैप्टन स्लीमैन को पता चल गया कि इन लोगों के गायब होने के पीछे किसका हाथ है। इन लोगों को गायब करने वाली था ठगों का एक गिरोह। एक ऐसा गिरोह जो करता था लूटपाट के लिये हत्या। इस गिरोह में करीब 200 सदस्य थे। इस गिरोह का मुखिया था बेरहाम ठग नाम का एक क्रूर इंसान, जो हाईवे और जंगलों पर अपने साथियों के साथ घोड़ों पर घूमता रहता। उसके निशाने पर होते थे तिजारत करने जाने वाले व्यापारी, अमीर सेठ और वेश्याएं। हर वो शख्स जिसके पास धन-दौलत होती थी वो बन जाता था ठगों का शिकार। बेहराम ठग के नेतृत्व में ही गिरोह के बाकी सदस्य लूटपाट और हत्याओं को अंजाम देते थे।&lt;br /&gt;       ठगों के खिलाफ विलियम स्लीमैन ने पूरे उत्तर भारत में एक मुहिम छेड़ दी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने विलियम स्लीमैन को  THUGEE AND DACOITY DEPARTMENT का इंचार्ज बना दिया। इस ऑफिस का मुख्यालय स्लीमैन ने जबलपुर में बनाया। स्लीमैन जानते थे कि जबलपुर और ग्वालियर के आस-पास ही ठग गिरोह सक्रिय है। ये दोनों ऐसी जगह थी जहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिये गुजरना पड़ता था। साथ ही साथ इस इलाके की सड़कें घने जंगल से होकर गुजरती थी। इसका फायदा ठग बडे आराम से उठाते थे। एक तो इन सुनसान जंगलों में किसी को भी निशाना बनाना आसान होता था साथ ही साथ अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद यहां छिपना भी आसान था।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATVhbz7ImI/AAAAAAAAAw8/ES-IQQmpCCE/s1600/THUGS.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 205px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATVhbz7ImI/AAAAAAAAAw8/ES-IQQmpCCE/s320/THUGS.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477737817167307362" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;      विलियम स्लीमैन ने जबलपुर में अपना मुख्यालय बनाने के बाद सबसे पहले दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक के हाईवे के किनारे  जंगल का सफाया कर दिया। इसके बाद स्लीमैन ने गुप्तचरों का एक बडा जाल बिछाया। कहते हैं कि भारत में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की नींव तभी की रखी हुई है। गुप्तचरों की मदद से स्लीमैन ने पहले तो ठगों की भाषा को समझने की कोशिश की। ठग अपनी इस विशेष भाषा को ‘रामोसी’ कहते थे।  रामोसी एक सांकेतिक भाषा थी जिसे ठग अपने शिकार को खत्म करते वक्त इस्तेमाल करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. पक्के ठग को कहते थे बोरा या औला&lt;br /&gt;2. ठगों के गिरोह के सरगना को कहते थे जमादार&lt;br /&gt;3. अशर्फी को कहते थे गान या खार&lt;br /&gt;4. जिस जगह सारे ठग इकठ्ठा होते थे उसे कहते थे बाग या फूर&lt;br /&gt;5. शिकार के आस-पास मंडराने वाले को कहते थे सोथा&lt;br /&gt;6. जो ठग सोथा की मदद करता था उसे कहते थे दक्ष&lt;br /&gt;7. पुलिस को वो बुलाते थे डानकी के नाम से&lt;br /&gt;8. जो ठग शिकार को फांसी लगता था उसे फांसीगीर के नाम से जाना जाता था।&lt;br /&gt;9. जिस जगह शिकार को दफनाया जाता था उसे तपोनी कहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      करीब 10 साल की कड़ी मशक्कत के बाद कैप्टन स्लीमैन ने आखिरकार बेहराम ठग को गिरफ्तार कर ही लिया। उसके गिरफ्तार होने के बाद खुला उत्तर भारत मे लगातार हो रहे हजारों लोगों के गायब होने का राज़। एक ऐसा राज़ जो सिर्फ उस बेरहम गिरोह को मालूम था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरफ्तार होने के बाद बेहराम ठग ने बताया कि उसके गिरोह के कुछ सदस्य व्यापारियों का भेष बनाकर जंगलों में घूमते रहते थे। व्यापारियों के भेष में इन ठगों का पीछा बाकी गिरोह करता रहता था। रात के अंधेरे में जो भी व्यापारियों का काफिला जंगल से गुजरता था, नकली भेष धारण करने वाले ठग उनके काफिले में शामिल हो जाते थे। ठगों का ये गिरोह धर्मशाला और बाबड़ी (पुराने जमाने के कुएं) इत्यादि के आस-पास भी बेहद सक्रिय रहता था। &lt;br /&gt;    काफिले के लोगों को जब गहरी नींद आने लगती तो दूर से गीदड़ के रोने की आवाज आने लगती। ये गीदड़ की आवाज पूरे गिरोह के लिए एक सांकेतिक आदेश होता था कि अब काफिले पर हमला बोला जा सकता है। थोड़ी ही देर में अपने गिरोह के साथियों के साथ बेहराम ठग वहां पहुंचा जाता। &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATQEd8wIfI/AAAAAAAAAwk/r09RdNlrMzQ/s1600/YELLOW+HANDKERCHIEF.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 241px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATQEd8wIfI/AAAAAAAAAwk/r09RdNlrMzQ/s320/YELLOW+HANDKERCHIEF.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477731821966860786" /&gt;&lt;/a&gt; सारे ठग पहले सोते हुये लोगों का मुआयना करते। बेहराम ठग अपने गुर्गे को अपना सबसे पसंदीदा रुमाल लाने का आदेश देता। पीला रुमाल मिलते ही बेरहाम ठग अपनी जेब से एक सिक्का निकालता और रुमाल में एक सिक्का डालकर गॉठ बनाता। सिक्के से गॉठ लगाने के बाद बेहरम ठग एक-एककर सोते हुये काफिले के लोगों का गला घोट देता। &lt;br /&gt;         काफिले में शामिल सभी लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद  बेरहाम ठग साथियों के साथ मिलकर जश्न मनाता था। लेकिन जश्न से पहले उन्हें करना होता था एक और काम। ठग मरे हुये लोगों की लाशों के घुटने की हड्डी तोड़ देते। हड्डी तोड़ने के बाद लाशों को तोड़ मोड़कर मौका-ए-वारदात पर ही एक गड्डा खोदकर दबा दिया जाता। दरअसल, काफिले में शामिल व्यापारियों को मारने के बाद बेहराम ठग और उसके गिरोह के सदस्य उनकी वही कब्रगाह बना देते थे। अगर वही उनकी कब्रगाह बनाना संभव ना हुआ तो उनकी लाशों को पास के ही किसे सूखे कुएं या फिर नदी में फेंक देते थे। यही वजह थी कि पुलिस को गुमशुदा लोगों की लाश कभी नहीं मिलती थी। और ना ही इन ठगों का कोई सुराग मिल पाता था।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATPrEqhXNI/AAAAAAAAAwc/YLzMmMPO26o/s1600/BEHRAM+THUG+2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 287px; height: 243px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATPrEqhXNI/AAAAAAAAAwc/YLzMmMPO26o/s320/BEHRAM+THUG+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477731385682779346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;    जब तक बेहराम ठग और उसके साथी काफिले के लोगों को ठिकाने नहीं लगा देते, तब तक उसके गिरोह के दो सदस्य दूर खड़े हुये पूरे इलाके पर नजर रखते। शिकार का काम तमाम होने तक वे दोनों हाथ में सफेद रुमाल लिये हिलाते रहते। सफेद रुमाल से वे दोनों ठगों को इशारा करते रहते कि सबकुछ ठीक है। जैसे ही उन्हें खतरे का अंदेशा होता वे दोनों सफेद रुमाल हिलाना बंद कर देते। सफेद रुमाल नीचे होते ही ठग चौकन्ना हो जाते। रुमाल हिलने लगता तो अपने काम में एक बार फिर से मशगूल हो जाते। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद ठग मौका-ए-वारदात पर ही जश्न मनाते थे। जश्न के तौर पर जिस जगह मारे गये लोगों की कब्रगाह बनाई जाती थी उसके पहले नाच-गाना करते। कव्वाली का दौर चलता। गाने-बजाने से जब थक जाते तो कब्रगाह के ऊपर बैठकर ही वो गुड़ खाते थे। &lt;br /&gt;कहते है ठग जिस किसी भी नए सदस्य को अपने गिरोह में शामिल करते थे तो उसे कब्रगाह पर बैठकर गुड़ जरुर खिलाया जाता था। एक बार कैप्टन स्लीमैन ने एक ठग से इसका कारण पहुंचा तो उसने जबाब दिया कि हजूर ‘तपोनी’ यानि कब्रगाह का गुड़ जिसने भी चखा उसके लिये दुनिया ही दूसरी हो गई। अगर आपने भी तपोनी का गुड़ खा लिया तो फौरन ठग बन जाओगे।&lt;br /&gt;बेहराम ठग ने गिरफ्तार होने के बाद खुलासा किया कि उसके गिरोह ने पीले रुमाल से पूरे 931 लोगो को मौत के घाट उतारा है। उसने ये भी खुलासा किया कि अकेले उसने ही 150 लोगों के गले में रुमाल डालकर हत्या की है। बेहराम की गिरफ्तारी के बाद उसके गिरोह के बाकी सदस्य भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATWFrl1ZMI/AAAAAAAAAxE/CjRkxYClJjQ/s1600/CAPTAIN+SLEEMAN+3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATWFrl1ZMI/AAAAAAAAAxE/CjRkxYClJjQ/s320/CAPTAIN+SLEEMAN+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477738439878468802" /&gt;&lt;/a&gt; बेहराम सहित जितने भी इस गिरोह के कुख्यात सदस्य थे उन्हे जबलपुर के पेड़ों पर फांसी दे दी गई—जबलपुर में ये पेड़ अभी भी हैं। गिरोह के जितने भी नये सदस्य थे उनके लिये स्लीमैन ने जबलपुर में ही एक सुधारगृह  खुलवा दिया—इस बंदीगृह के अवशेष अभी भी जबलपुर में मौजूद हैं। कहते हैं कि हफ्ते में एक दिन जबलपुर में एक हाट लगता है। हाट में लगनी वाली दुकानों के अधिकतर मालिक उन्हीं ठगों की औलाद है जिन्हे स्लीमैन मुख्यधारा में लाया था। &lt;br /&gt;           कहते तो ये भी है कि स्लीमैन का एक पड़पोता इंग्लैड में रहता है और उसने अपने ड्राइंगरुम में उस पीले रुमाल को संजों कर रख रखा है। वही पीला रुमाल जिससे बेहराम ठग लोगों को मौत के घाट उतारता था और जिसके चलते उसे इतिहास का अबतक का सबसे बड़ा सीरियल किलर माना जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-932492933494816367?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/932492933494816367/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=932492933494816367' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/932492933494816367'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/932492933494816367'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='पीले रुमाल का फंदा'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TATQwQ_J-jI/AAAAAAAAAws/yjX62vfjrac/s72-c/BEHRAM+THUG+3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-7051867133837425507</id><published>2010-01-26T23:49:00.006+05:30</published><updated>2010-01-27T22:39:57.954+05:30</updated><title type='text'>खाकी में इंसान या भेड़िया ?</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S182nu4RTXI/AAAAAAAAAuE/LtTDZK_L1ss/s1600-h/COPS+1.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431119731858951538" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 239px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S182nu4RTXI/AAAAAAAAAuE/LtTDZK_L1ss/s320/COPS+1.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;“दिल्ली में पुलिस को ‘ठुल्ला’ कहकर पुकारा जाता है ! यह शब्द सम्भवत: निठल्ला से बना है...पुलिस, अपराधियों से मिली होती है या पुलिस ही अपराध करवाती हैं...पुलिस सब बदमाशों को जानती है...वो चाहे तो मिनटों में चोरों-डकैतों को पकड़ सकती है... पुलिस के बारे में ढेर सारे किस्से-कहानियां प्रचलित होते हैं—जिनमें से कुछ सत्य होते हैं तो कुछ एकदम मिथ्या...”&lt;br /&gt;चलो कम से कम एक पुलिस अधिकारी तो है, जो ये मानता है कि इन सब कहानियों में “कुछ सत्य” होती हैं। आजतक मुझे जितने भी पुलिस अधिकारी (निचले और ऊपर दोनों के) मिलें, उनमें से अधिकतर यही मानते है कि इस तरह की बाते सिर्फ और सिर्फ आम शहरी के मन की कोरी कल्पना है। वे तो यहां तक मानते है कि हकीकत में खाकी वर्दीवाले कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और बहादुर होते है...अपनी जान हथेली पर लेकर दिन-रात जीते हैं।&lt;br /&gt;दरअसल, ये सभी बातें---ठुल्ला, पुलिस –अपराधियों का गठजोड़, आदि—हाल ही में प्रकाशित हुई एक ऐसी किताब का हिस्सा है जिसका लेखक खुद एक सीनियर पुलिस अधिकारी है। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S184KStnKII/AAAAAAAAAuU/mZE9apvZiLk/s1600-h/KHAKI+BOOK.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 177px; height: 254px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S184KStnKII/AAAAAAAAAuU/mZE9apvZiLk/s320/KHAKI+BOOK.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431121425105102978" /&gt;&lt;/a&gt;  करीब बीस साल से यूपी और उत्तराखंड में पुलिसिया नौकरी बजा लेने के बाद आईपीएस अधिकारी, अशोक कुमार इन दिनों सीआरपीएफ में आईजी के पद पर तैनात है। किताब का नाम है, ‘खाकी में इंसान’। हाल ही में इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद सुपरकॉप किरन बेदी ने दिल्ली में रिलीज किया।&lt;br /&gt;अपने बीस साल के पुलिसिया अनुभव को अशोक कुमार ने करीब 150 पन्नों की इस किताब में उतारने की कोशिश की है। किताब में कहानियों के जरिए, अशोक कुमार ने समाज को बताने की कोशिश की है कि हम पुलिस को भले ही कितना भ्रष्ट, अमानवीय और बर्बर समझें, लेकिन अभी भी कुछ पुलिस अधिकारी ऐसे भी है जो लीक से हटकर सोचते हैं। उनके मन में अभी भी गरीब, असहाय और दलितों को इंसाफ दिलाने की एक हठ है। उसके लिए चाहे अपने ही महकमें की “गलती उजागर” होती हो।&lt;br /&gt;खुद अशोक कुमार के शब्दों में कहें तो “इस किताब का उद्देश्य मेरे द्वारा किए गए कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना नहीं है—इसका उद्देश्य तो ये दिखाता है कि कैसे हर समस्या को मानवीय दृष्टिकोण से देखा व समझा जा सकता है।” वे आगे लिखते है, “ इस किताब में कुछ वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियों के जरिए यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि अच्छी पुलिस व्यवस्था से सचमुच गरीब और असहाय लोगों की जिंदगी में फर्क लाया जा सकता है।” &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S184xyeReYI/AAAAAAAAAuc/A6nA6aMo5h4/s1600-h/BRAVE+COP.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 275px; height: 221px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S184xyeReYI/AAAAAAAAAuc/A6nA6aMo5h4/s320/BRAVE+COP.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431122103645600130" /&gt;&lt;/a&gt; हरियाणा के ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखने वाले अशोक कुमार आई.आई.टी, दिल्ली के पास-आउट है। पिछले कई सालों से मैं खुद अशोक कुमार को पर्सनली और प्रोफेशनली जानता हूं। कई साल पहले एक स्टोरी (सनसनी, स्टार न्यूज में दिखाई गई थी) के सिलसिले में मेरी उनसे मुलाकात देहरादून में हुई थी। दरअसल, उन्होने एक नामी गैंगस्टर को एनकाउंट में ढेर किया था। उसी दौरान मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। इस कहानी को भी उन्होने किताब का हिस्सा बनाया है। वाकई उस बदमाश ने उत्तराखंड के लोगों का जीना दूभर कर रखा था। लेकिन एक महिला की सूझबूझ के चलते ही पुलिस उस तक पहुंच पाई थी।&lt;br /&gt;अशोक कुमार ने इस किताब के जरिए अपने उन साथी पुलिस अधिकारियों पर गुस्सा उतार डाला, जो ये समझते है कि आईपीएस तो “पावर, पैसा और स्टेटस” पाने का एक आसान तरीका है। उन्होंने, आईपीएस अधिकारियों को दी जाने वाली ट्रेनिंग पर सवाल खड़े कर डाले। “(पुलिस) अकादमी में हमें खाने-पीने, पहनने के साहबी तौर-तरीके सिखाये गए। कांटे और छुरी का कैसे प्रयोग होना है, चम्मच को कैसे रखा जाना है, मेज पर कैसे बैठना है आदि-आदि...। इस ट्रेनिंग में कहीं-न-कहीं ब्रिटिश सामंतवादी व्यवस्था की झलक दिखाई देती थी।” लेकिन मेरा अबतक का क्राइम (या पुलिसिया) रिर्पोटिंग का अनुभव तो ये बताता है कि ट्रेनिंग से लेकर पुलिसिंग तक में ब्रिटिशराज की बू आती है।&lt;br /&gt;काश, सभी पुलिस अधिकारी अशोक कुमार की तरह सोचते तो हमारे समाज में कोई रुचिका, जेसिका, नीतिश कटारा केस ना होता। कोर्ट को हर मामले में बढ़ चढ़कर पुलिस को फटकार ना लगानी पड़ती। पुलिस का कर्तव्य क्या है, ये बताने की ना तो अदालत को जरुरत होती और ना ही मीडिया को। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S18286LcVxI/AAAAAAAAAuM/O5w-tpcFMjs/s1600-h/COPS.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431120095669409554" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 263px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S18286LcVxI/AAAAAAAAAuM/O5w-tpcFMjs/s320/COPS.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अगर, पुलिस ‘माई-बाप संस्कृति’ और ‘जीप व डाकबंगला संस्कृति’ से ऊपर उठ पाती तो गरीब और असहाय लोगों को इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें ना खानी पड़ती। पॉकेट मारे जाने की एफआईआर दर्ज कराने के लिए एक आम इंसान को थाने के चक्कर ना काटना पड़ते...और ना ही गुंडे-बदमाश गली-मुहल्लों और बाजार में लड़कियों और महिलाओं को फब्तियां कसते दिखाई पड़ते। किसी मजबूर इंसान को अपने बेटे या भाई की हत्या के मामले में थानों और पुलिस अधिकारियों की चौखट पर ऐड़ियां ना रगड़नी पड़ती। ट्रैफिक पुलिस के ‘ठुल्ले’ सड़कों पर यातायात व्यवस्था कायम रखने में ज्यादा व्यस्त होतें बजाए ट्रैफिक सिग्नल का उल्लंघन करने पर अपनी जेबें गरम करतें। थानों तक में पीड़ित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना आए-दिन सुनने में आती रहती हैं। निचले स्तर के अधिकारियों के साथ-साथ सीनियर अधिकारियों तक की खाकी वर्दी के दागदार होने के किस्से आम हो चुके हैं। तब शायद लगता है कि खाकी में इंसान नहीं भेड़िये हैं।&lt;br /&gt;गणतंत्र दिवस के मौके पर कई टी.वी चैनल ने पुलिसिया तंत्र की पोल खोल कर रख दी है। राजधानी दिल्ली से फरार हुए तीन खूंखार पाकिस्तानी आंतकवादियों तक की तस्वीरों को भी खाकी वर्दीवालें ठीक से नहीं पहचान पातें। जब आंतकियों को ही नहीं पहचान पाएंगे तो उन्हे पकड़ेंगे क्या खाक--अब समझ आया क्यों दिल्ली में पुलिसवाले को 'ठुल्ला' पुकारा जाता है। जब खाकी वर्दीवाले को ये तक नहीं पता होगा कि वो जिस गणतंत्र दिवस की परेड की सुरक्षा व्यवस्था में लगाया गया है उसे क्यों मनाया जाता है तो उसके लिए एक ‘गणतंत्र’ में आम शहरी के क्या अधिकार है कभी समझ पाएंगा। वो तो हर बात में यही कहेगा कि “मैं कुछ नहीं बता सकता, वो तो मेरे अधिकारी ही बताएंगे कि गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है।”&lt;br /&gt;ऐसे में जरुरत है कि हर उस शख्स को इस किताब को एक बार जरुर पढ़ना चाहिए जिसका वास्ता खाकी वर्दी से है। क्योंकि एक खाकी वर्दीवाला, “ सिस्टम में आने वाली अड़चनों के बावजूद सिस्टम के अंदर रहते हुए भी लोगों के जीवन, संपत्ति एवं सम्मान की रक्षा कर उनकी सेवा कर सकता है।” और शायद तभी “खाकी में (बसे) इंसान को कोटि-कोटि सलाम” किया जाएगा, उससे पहले तो कदापि नहीं।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-7051867133837425507?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/7051867133837425507/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=7051867133837425507' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/7051867133837425507'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/7051867133837425507'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='खाकी में इंसान या भेड़िया ?'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/S182nu4RTXI/AAAAAAAAAuE/LtTDZK_L1ss/s72-c/COPS+1.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-7991130356640226346</id><published>2009-11-29T22:58:00.012+05:30</published><updated>2009-12-09T20:09:24.372+05:30</updated><title type='text'>अखबार(वालों) की सुपारी!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxKxb4q3PRI/AAAAAAAAArg/FwRGIlCb6V8/s1600/CRIMINAL+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxKxb4q3PRI/AAAAAAAAArg/FwRGIlCb6V8/s320/CRIMINAL+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409581195052137746" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;...पुलिस के हत्थे चढ़े सुपारी किलर ने खुलासा किया कि उसे हिंदी के एक जाने-माने अखबार के बिजनेस-पार्टनर को जान से मारने का काम सौंपा गया है...इस लोकप्रिय अखबार के मालिकों में जंग छिड़ी हुई थी... लेकिन ये लड़ाई सुपारी किलिंग तक पहुंच जाएगी, इस बात का किसी को जरा भी इल्म नहीं था... &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी. सीबीआई ने दिल्ली में &lt;a href="http://clb.nic.in/"&gt;कंपनी लॉ बोर्ड &lt;/a&gt;के एक सदस्य को घूस लेते रंगे हाथ धर-दबोचा। सीबीआई ने बाकायदा इसके लिए एक &lt;a href="http://www.cbi.gov.in/pressreleases/pressrelease.php"&gt;प्रेस रिलीज &lt;/a&gt;भी जारी की। लेकिन प्रेस रिलीज में ना तो इस बात का खुलासा किया गया कि कंपनी लॉ बोर्ड के इन महानुभाव को क्यों गिरफ्तार किया गया है और ना ही ये बताया गया कि वे किस कंपनी के झगड़े का निबटारा करने के लिए ये घूस की रकम हड़पना चाहते थे। ये खबर ना तो शायद किसी टी.वी चैनल में चली और ना ही शायद किसी अखबार में। अगर खबर आई भी तो इतनी कि “कंपनी लॉ बोर्ड का सदस्य घूस लेते गिरफ्तार”। लेकिन &lt;a href="http://bhadas4media.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=3250:amar-ujala-clb&amp;catid=27:latest-news&amp;Itemid=29"&gt;मीडिया&lt;/a&gt; में ये बात साफ हो चुकी थी कि ये कौन से कंपनी थी। बताया जा रहा है कि ये कंपनी कोई ऐसी-वैसी नहीं थी—उत्तरी भारत के सबसे लोकप्रिय माने जाने वाला अखबार, &lt;em&gt;&lt;strong&gt;अमर उजाला&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;। अखबार के बिजनेस पार्टनर्स के बीच कई सालों से चलती आ रही जंग का नतीजा थी ये खबर। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxKzMpKWimI/AAAAAAAAAr4/-tVLFtvkTsA/s1600/AMAR+UJALA+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxKzMpKWimI/AAAAAAAAAr4/-tVLFtvkTsA/s320/AMAR+UJALA+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409583132214463074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अमर उजाला की नींव कई साल पहले दो दोस्तों—डोरी लाल अग्रवाल और मुरारी लाल माहेश्वरी—ने डाली थी। आगरा और बरेली से प्रकाशित होने वाली इस अखबार ने पिछले दो दशकों में हिंदी भाषी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। आज ये अखबार उत्तर भारत  के डेढ़ दर्जन शहरों से प्रकाशित किया जाता है। लेकिन डोरी लाल और मुरारी लाल जी की मौत के बाद इस अखबार की बागडोर एक साथ दोनों के परिवारों को सयुंक्त रुप में आ गई। अखबार नई पीढ़ी के हाथों में आने के बाद दिन दोगुनी और रात चौगुनी तो करने लगा, लेकिन अंदर ही अंदर दोनों परिवारों के बीच शायद मन-मुटाव रहने लगा।&lt;br /&gt;    मेरे लिए अमर उजाला से जुड़ी खबर इसलिए भी हैरान करने वाली थी, क्योकि ये एक ऐसा अखबार है जिसे मैं पिछले करीब 25 सालों से पढ़ रहा हूं। मुझे याद है कि 1983 के क्रिकेट विश्वकप जीतने की खबर भी मैने इसी अखबार में पढ़ी थी और उसकी क्लीपिंग काट कर कई सालों तक संजोकर रखी थी—टी.वी पर 1983 विश्वकप की फाइनल की रिकॉर्डिंग देखने के बाद ही वो क्लीपिंग गायब हुई थी। आज, मीडिया में होने के चलते मेरे पास हिंदी अखबार पढ़ने के कई विकल्प है। लेकिन  मुझे लगता है कि हिंदी अखबारों में अगर सबसे अच्छी क्राइम रिपोर्टिंग अगर कहीं होती है तो वो है अमर उजाला। हाल ही में एमेटी यूनिवर्सिटी में एक सेमिनार के दौरान जब छात्रों ने मुझसे पूछा कि क्राइम रिपोर्टिंग के लिए कौन सा अखबार पढ़ना चाहिए, तो बिना सोचे मेरा जबाब था, &lt;strong&gt;अमर उजाला&lt;/strong&gt;।&lt;br /&gt;     खैर, ये खबर पता चलते ही कि अमर उजाला में कंपनी के बंटबारे को लेकर क्या पैतरे अपनाए जाते हैं, तो मुझे चार-पांच साल पुराना एक मामला याद आ गया। इसी तरह से उत्तर भारत के एक जाने-माने हिंदी अखबार के मालिक ने अपने बिजनेस पार्टनर की ‘सुपारी’ दी थी। उस अखबार में भी हिस्से को लेकर बंदरबाट चल रही थी। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxK0o_Ori9I/AAAAAAAAAsA/cME9dUTH2SI/s1600/NEWSPAPER.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 277px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxK0o_Ori9I/AAAAAAAAAsA/cME9dUTH2SI/s320/NEWSPAPER.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409584718686161874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; एक दिन मैं अपने आफिस—सहारा टी.वी—में बैठा था कि एक ‘मित्र’ का फोन आया। उसने मुझे तुंरत अपने ऑफिस आने के लिए कहा। मैं तुंरत वहां पहुंच गया। उसने मेरे सामने एक सुपारी किलर का इकबालिया बयान रख दिया। बयान पढ़ते ही मैं चौंक गया। उसपर उत्तर प्रदेश के एक अखबार मालिक के दक्षिणी दिल्ली स्थित कोठी के बाहर जान से मारने का प्लान लिखा था। साथ ही लिखा था कि वो पिछले कुछ दिनों से उसकी रेकी (पीछा) कर रहा है—कहां जाता है, किससे मिलता है, इत्यादि। मेरे मित्र ने बताया कि इस हिंदी अखबार—ये भी उत्तर भारत के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबारों में से एक हैं—में  कंपनी में हिस्से को लेकर लड़ाई छिड़ी हुई है। नौबत यहां तक पहुंच गई कि एक (बिजनेस) पार्टनर ने दूसरे पार्टनर की सुपारी तक दे डाली है।&lt;br /&gt;सुपारी किलर के बयान में लिखा था कि उसे ये काम (जान से मारने का) मेरठ जेल में बंद एक बड़े गैंगस्टर ने दिया है। उसके इस इकबालिया बयान को पढ़कर मुझे लगा कि ये मेरा अबतक सबसे बड़ा स्कूप (खुलासा) हो सकता है—अखबारवालों की सुपारी! लेकिन ऑफिस लौटने से पहले मेंरे उस मित्र ने कई बार कुरेद-कुरेद कर मुझसे पहुंचा, “स्टोरी चलाने का दम है।” मैने जवाब दिया, क्यों नहीं...जरुर चलेगी। ये वायदा करके मैं आफिस लौट आया। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxKx-cN4crI/AAAAAAAAArw/ddqbEo7msQo/s1600/ENCOUNTER.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 227px; height: 233px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxKx-cN4crI/AAAAAAAAArw/ddqbEo7msQo/s320/ENCOUNTER.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409581788709810866" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; लेकिन बॉस को स्टोरी बताने से पहले, मैं खुद इस इकबालिया बयान की तस्दीक करना चाहता था। स्टोरी को क्रॉस-चैक करने में दो-तीन दिन लग गए। इसी बीच, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पूर्वी दिल्ली में दो बदमाशों का एनकाउंटर कर डाला। अगर मैं गलत नहीं हूं तो उनसे से एक बदमाश का नाम था, अशोक उर्फ बंटी। कोई बड़ा एनकाउंटर नहीं था। खबर को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई क्योंकि कुछ हफ्ते पहले ही, दिल्ली पुलिस ने हरियाणा पुलिस के साथ मिलकर इन बदमाशों के सरगना, हेमंत उर्फ सोनू को गुंड़गांव में एक (लाइव) एनकाउंटर में ढेर किया था। लिहाजा, अशोक उर्फ बंटी का एनकाउंटर आया-गया हो गया—जैसे कंपनी लॉ बोर्ड के सदस्य की गिरफ्तारी का हो गया। हां, एनकाउंटर के कई साल बाद, अशोक उर्फ बंटी अखबार की सुर्खियों में एक बार फिर तब आया, जब पता चला कि वो दिल्ली में जिस्मफरोशी के धंधे की सबसे बड़ी दलाल, &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/11/blog-post.html"&gt;सोनू पंजाबन &lt;/a&gt;का पति भी रहा चुका था।&lt;br /&gt;कुछ दिनों बाद के बाद मैने अखबारवालों की सुपारी वाली स्टोरी पर फिर से काम करना शुरु कर दिया। इस बार मैने दिल्ली पुलिस के आला-अधिकारियों से सुपारी मामले में संपर्क किया तो पता चला कि “सुपारी किलर की बात कन्फर्म नहीं हो पाई।” मैंने उन अधिकारी से जब इसका कारण पूछा, तो उन्होने बताया कि जब मेरठ जेल में बंद उस गैंगस्टर—जिसने इस किलर को सुपारी दी थी—से पूछताछ की गई तो उसने खुलासा किया कि उसे ये सुपारी किसी और ने नहीं अशोक उर्फ बंटी ने दी थी। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxK2gjJyh7I/AAAAAAAAAsI/RHxe-yh8qj8/s1600/CRIME+REPORTER+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 226px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxK2gjJyh7I/AAAAAAAAAsI/RHxe-yh8qj8/s320/CRIME+REPORTER+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409586772733757362" /&gt;&lt;/a&gt;  इससे पहले की दिल्ली पुलिस बंटी से पूछताछ कर इस मामले की तहतक पहुंच पाती, उसका एनकाउंटर हो गया। ऐसे में पुलिस का मानना था कि जब मामले का “लिंक” ही टूट गया है तो “सुपारी किलर की बात पर कैसे भरोसा कर लें।” लिहाजा, अखबारवालों की अखबारवालों के लिए सुपारी का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।&lt;br /&gt;यहां, ये भी बताना जरुरी है कि जैसे ही ये खबर मैने अपने बॉस को बताई, तो वे अपनी कुर्सी से उछल गए। “...अबे मरवाओगे क्या...ये खबर चलाकर...”, उनका जबाब था। लेकिन, मेरे जिद करने पर, वे इस स्टोरी को लेकर सुपर-बॉस के पास पहुंचे और फिर मुंह लटकाकर वापस आ गए। मैं समझ गया कि मेरी स्टोरी का क्या हश्र हुआ है। मेरे साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि किसी स्टोरी को इसलिए ड्राप कर दिया गया था कि उसमें एक बड़े अखबार के मालिकों की काली-करतूत का भांडाफोड़ हो जाता या फिर किसी रसूखदार की साख पर बट्टा लगा जाता। मीडिया में काम करते हुए एक क्राइम रिपोर्टर को कई बार ऐसे दौर से गुजरना पड़ता है।&lt;br /&gt;एक खबर तो मुझे आजतक याद है। ये बात करीब छह साल पुरानी है। पंजाब पुलिस के एक तेजतर्रार आईजी पर तीन लोगों के अपहरण और हत्या का मामला चल रहा है—आईजी का भाई एक सीनियर आईएएस आफिसर है और उस वक्त (केन्द्रीय) गृह मंत्रालय में तैनात था। उसकी कवरेज (ना) करने के लिए तो मुझे पंजाब से ही बीच शूट से लौटना पड़ा था। बॉस का स्टोरी ना करने का फोन जो आ गया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-7991130356640226346?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/7991130356640226346/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=7991130356640226346' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/7991130356640226346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/7991130356640226346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/11/blog-post_29.html' title='अखबार(वालों) की सुपारी!'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SxKxb4q3PRI/AAAAAAAAArg/FwRGIlCb6V8/s72-c/CRIMINAL+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-24834079460864760</id><published>2009-11-14T00:39:00.009+05:30</published><updated>2009-11-22T13:54:28.758+05:30</updated><title type='text'>भारत मांगे एफबीआई</title><content type='html'>&lt;A href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sv2xuQB1M0I/AAAAAAAAArQ/k5WMiiO65KE/s1600-h/FBI.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5403670536049210178 style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 201px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sv2xuQB1M0I/AAAAAAAAArQ/k5WMiiO65KE/s320/FBI.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; हमारी जांच एजेंसियां एफबीआई जैसी क्यों नहीं है? मुंबई हमले का 'मास्टरमाइंड' रिचर्ड कॉलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी, दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में लगभग एक साल तक रहा। लेकिन आईबी,रॉ, एनआईए, सीबीआई, और पुलिस को कानो-कान खबर तक नहीं लगी। शहर तो दूर, उस ताज होटल के एक रूम में रहा और रेकी की, जिसपर मुंबई पर सबसे बड़ा हमला हुआ था। इस बात का खुलासा भारत में क्यों नहीं हुआ? हर आतंकवादी हमले के बाद हमारे नेता और मंत्री संसद में बस इस बहस पर ज्यादा जोर देते हैं कि हमलों की जांच के लिए एक नई एजेसी बनाई जाए। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) बनाई। लेकिन क्या ये जवाब है कि उसने एक साल में किया क्या है। क्या हमारी जांच एजेंसिया फोन और एसएमएस टैप नहीं करती? क्या वे ई-मेल ट्रैक नहीं कर पाती? लेकिन गौर करने की बात ये है कि अगर मुंबई आतंकवादी हमले में कई अमेरिकी नागरिक ना मारे जाते तो क्या हमारी खुफिया एजेंसियां हेडली को बेनकाब कर पाती? अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई मामले की तफ्तीश कर रही थी इसलिए हेडली पकड़ा गया। &lt;A href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sv2xqolojkI/AAAAAAAAArI/nKPX6FPE04c/s1600-h/MUMBAI+ATTACK.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5403670473922350658 style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 177px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sv2xqolojkI/AAAAAAAAArI/nKPX6FPE04c/s320/MUMBAI+ATTACK.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; एफबीआई के शिंकजे में आए खतरनाक आतंकवादी डेविड कॉलमैन हेडली उर्फ दाउद के खौफनाक मंसूबो को अगर वो और उसके साथी अंजाम दे पाते तो भारत में तबाही मच जाती। शायद 26/11 से भी ज्यादा बड़े आतंकवादी हमले होते। हमारी सरकार और खुफिया एंजेसियों ने मुंबई हमले के एक साल बाद तक हमले से जुड़े कितने आतंकवादियों का खुलासा किया ? कसाब को छोड़कर पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां किसी भी बड़े आतंकवादी को गिरफ्तार नहीं कर पाई। इस हमले को सीमा पार से बैठकर अंजाम देने वाले बड़े आंतकवादियों को भारत सिर्फ पाकिस्तान से मांगता रह गया और पाकिस्तान सबूतों के नाम पर सभी आग्रह ठुकराता रहा। अमेरिका से लगाई गुहार भी काम नहीं आई। हमारी खुफिया एजेंसियां भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं रही हैं। ये मुझे तब पता चला जब सीबीआई ने रॉ (देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी, रिसर्च एंड एनेलेसस विंग) के एक डायरेक्टर को करोड़ों की घूस लेते रंगे हाथ पकड़ा। हैरानी की बात ये थी कि डायरेक्टर साहब आर्म्स सप्लाई करने वाली एक प्राईवेट कंपनी को नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NoC) दिलवा रहे थे। क्या उन्हे ये नहीं पता था कि वही हथियार हमारे देश के लिए इस्तेमाल हो सकते थे। और जब उस डायरेक्टर को तीसहजारी कोर्ट में पेश किया गया तो रॉ के आरोपी डायरेक्टर ने जज के सामने अपने महकमें के सीनियर अधिकारियों के भ्रष्टाचार के बारे में ही खुलासा कर डाला। रॉ की एक &lt;A href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/08/blog-post_24.html"&gt;महिला डायरेक्टर &lt;/A&gt;ने अपने चीफ (सबसे बड़े बॉस) के ऊपर ही उत्पीड़न का आरोप लगा डाला और मीडिया के सामने ना जाने क्या-क्या बोल डाला। क्या यही सब होता है हमारी खुफिया एजेसिंयो में? ये सब सुनकर और देखकर तो मुझे सीबीआई के उस अधिकारी की बात सही लगती है जिन्होंने मुझे ये बताया था कि विदेशों में अपने जासूस बनाने के नाम पर रॉ और आईबी के अधिकारी बहुत पैसे उड़ाते हैं। रॉ की तरह ही आईबी के भी यदा-कदा मामले सामने आते है। दिल्ली की एक अदालत में पिछले कई सालों से अपने ही मुखबिरों को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल से गिरफ्तार कराने का मामला चल रहा है। सीबीआई तक इस मामले में आईबी और स्पेशल सेल की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा चुकी है। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी समझे जाने वाली, सीबीआई की कलई भी &lt;A href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/06/blog-post.html"&gt;आरुषि हत्याकांड &lt;/A&gt;में जगजाहिर हो चुकी है। आंतकवादी हमलों की जांच के लिए बनी नई एजेंसी, नेशनल इंवेस्टीगेटीव एजेंसी (एनआईए) के पास फिलहाल कम ही मामले है। एफबीआई के इस खुलासे के बाद की मुंबई हमलों में हेडली और तहुव्वर राणा का हाथ है, एनआईए ने दोनों के खिलाफ भारत में मामला दर्ज कर लिया है। लेकिन एनआईए की तरफ से अभी तक किसी भी आंतकवादी हमले (मुंबई या दूसरे) की जांच का कोई बड़ा खुलासा अभी तक सामने नहीं आया है। &lt;A href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sv5ghuUNOxI/AAAAAAAAArY/bzCbLKVtH7c/s1600-h/SPY.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5403862735375907602 style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 247px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sv5ghuUNOxI/AAAAAAAAArY/bzCbLKVtH7c/s320/SPY.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; भारत की एक जांच टीम फिलहाल अमेरिका गई हुई है। मकसद है हेडली और तहुव्वर से पूछताछ। लेकिन पूछताछ तो दूर शायद एफबीआई ने भारतीय जांच टीम को अपने हेडक्वार्टर तक में फटकने नहीं दिया है। ऐसे में हम कैसे भरोसा करे कि हमारी जांच (और खुफिया) एजेंसियां, आतंकवादियां का नामों-निशान देश से मिटा देंगी। वैसे, अमेरिकी जांच एजेंसी, एफबीआई का कोई सानी नहीं है। एफबीआई हो या फिर सीआईए (अमेरिकी खुफिया एजेंसी), अमेरिका की कोशिश है कि 9/11 जैसा हमला दोहराया ना जा सकें। साथ ही साथ कोशिश ये भी है कि दुनिया के किसी भी कोने में रह रहा अमेरिकी मूल का कोई भी शख्स आंतकवाद की भेंट ना चढ़े। यही वजह थी कि मुंबई के 26/11 के हमले में मारे गए अमेरिकी नागरिकों की मौत के मामले में एफबीआई अपनी जांच कर रही थी। जांच के दौरान ही एफबीआई, पाकिस्तान में जन्मे और अब अमेरिकी नागिरकता हासिल कर चुके, हेडली और उसके साथी तहव्वुर राणा तक पहुंच पाई। दोनों ही पाकिस्तान से संचालित आतंकवादी संगठन, लश्कर-ए-तैयबा के लिए काम करते है। जैसे ही ये खबर आई कि हेडली के तार दिल्ली से भी जुड़े हुए थे, दिल्ली पुलिस के साथ-साथ दूसरी जांच एजेंसियों के भी कान खड़े हो गए है। खबर ये भी आ रही है कि कही हेडली के तार दिल्ली बम धमाकों से तो नहीं जुड़े हुए थे। इसका कारण ये है कि दिल्ली बम धमाकों को अंजाम देने वाले संगठन, इंडियन मुजाहिद्दीन को लश्कर और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी, आईएसआई ही चला रहे थे। &lt;EM&gt;(ये लेख मेरी पत्नी नलिनी तिवारी ने मेरे ब्लॉग के लिए लिखा है, जो खुद मुंबई हमले पर रिपोर्टिंग कर चुकी है)&lt;/EM&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-24834079460864760?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/24834079460864760/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=24834079460864760' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/24834079460864760'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/24834079460864760'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='भारत मांगे एफबीआई'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sv2xuQB1M0I/AAAAAAAAArQ/k5WMiiO65KE/s72-c/FBI.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-994507535526202967</id><published>2009-07-26T23:26:00.000+05:30</published><updated>2009-07-26T23:59:11.853+05:30</updated><title type='text'>आर्मी कभी मत ज्वाइन करना</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Smya9lNjkgI/AAAAAAAAAqw/gfNJHndeiao/s1600-h/KARGIL+WAR+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 257px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Smya9lNjkgI/AAAAAAAAAqw/gfNJHndeiao/s320/KARGIL+WAR+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5362831639043084802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;“आर्मी में सिर्फ नौजवानों की ही मौत होती है, बड़े अफसर तो अपने ऑफिस और टेंट में बैठकर कम उम्र के जवानों और अधिकारियों को बलि का बकरा बनाते है।”&lt;/strong&gt; ट्रेन में मेरे साथ सफर कर रहे अधेढ़ उम्र के एक अंकलजी बोलते जा रहे थे और मैं उनकी बातों पर मंद-मंद मुस्कारा रहा था। कोच में बैठा हर कोई हम दोनों के बीच हो रही चर्चा सुन रहा था। “तुम बिन बुलाए मौत को दावत क्यों दे रहे हो ?” अंकलजी, एक सांस में बोलते ही जा रहे थे, “अरे करगिल में एक के बाद एक जवानों की मौत हो रही है और तुम फिर भी आर्मी ज्वाइन करने के लिए इंटरव्यू देने जा रहे हो।” &lt;br /&gt; ये वाक्या अब से ठीक दस साल पहले का है। मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी (हिंदु कॉलेज) से एम.ए की पढ़ाई कर रहा था। मैने सीडीएस यानि कम्बाइंट डिफेंस सर्विस का एग्जाम दिया और क्लीयर कर लिया था। उसी के सिलसिले में इंटरव्यू के लिए कर्नाटक एक्सप्रेस से बैंगलोर जा रहा था। ये उसी समय की बात है जब कश्मीर में करगिल युद्ध चल रहा था। रोज, एक ना एक लेफ्टीनेंट या कैप्टन की मौत की खबर लगातार मीडिया पर आ रही थी। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; कारगिल युद्ध, भारतीय मीडिया के लिए ठीक वैसा ही था, जैसा ईराक का युद्ध पश्चिमी मीडिया के लिए था। &lt;/p&gt; कारगिल युद्ध, भारतीय मीडिया के लिए ठीक वैसा ही था, जैसा ईराक का युद्ध पश्चिमी मीडिया के लिए था। जैसे ही मेरी इंटरव्यू कॉल आई, मैने तैयारी शुरु कर दी। तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गया। मेरे बड़े भाई और भाभी स्टेशन पर छोड़ने आए। जैसे ही हम स्टेशन पहुंचे तो वहां बेहद भीड़ थी। लोगों की इतनी बड़ी तादाद देखकर लगा कि आज कुछ ज्यादा ही लोग दिल्ली से बाहर जा रहे है। लेकिन जैसे ही स्टेशन में दाखिल हुए तो पता चला कि कुछ घंटे पहले ही मथुरा के पास एक बड़ा ट्रेन हादसा हो गया है। इसके चलते उस रुट पर जाने वाली सभी ट्रेन रद्द कर दी गई हैं। इन गाड़ियों में कर्नाटक एक्सप्रेस भी शामिल थी। मैने स्टेशन स्थित एमसीओ (आर्मी मूवमेंट ऑफिस) से संपर्क स्थापित किया, तो उन्होने सलाह दी कि तुरंत ही बैंगलोर स्थित ऑफिस में इस बात की इत्तिला कर दूं कि ट्रैन रद्द हो गई है। वो इंटरव्यू की आगे की तारीख दे देंगे। ऐसा ही हुआ, दस दिन बाद की तारीख मिल गई थी। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SmybM7OMukI/AAAAAAAAAq4/H4bO9GNvV0w/s1600-h/KARGIL+WAR+5.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 176px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SmybM7OMukI/AAAAAAAAAq4/H4bO9GNvV0w/s320/KARGIL+WAR+5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5362831902649399874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;   मैं एक बार फिर सबसे सम्मानित नौकरी में शामिल होने के लिये बैंगलोर की ट्रैन में सफर करने के लिए बैठ चुका था। ट्रेन दिल्ली से निकली ही थी कि अंकलजी (जिन का जिक्र ऊपर किया है) से बात-चीत शुरु हो गई। बातों ही बातों में मैने उन्हे बता दिया कि मैं सेना में इंटरव्यू के लिए बैंगलोर जा रहा हूं। इतना सुनते ही वे मुझ पर आग-बबूला हो गए। अंग्रेजी में बोलें, “ तुम इतना गलत कदम कैसे उठा सकते हो। तुम्हारें घरवालों ने तुम्हे रोका क्यों नहीं।” &lt;br /&gt;अब बोलने की मेरी बारी थी। “नहीं सर, आप ये कैसे कह सकते है...&lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt;  अगर हर देशवासी की सोच ऐसी होगी तो हमारी सीमाओं की रखवाली कौन करेगा ? इस देश की रक्षा कौन करेगा ?  &lt;/p&gt;  अगर हर देशवासी की सोच ऐसी होगी तो हमारी सीमाओं की रखवाली कौन करेगा ? इस देश की रक्षा कौन करेगा ?” मैं अंकलजी की बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता था। उस वक्त देश पर मर-मिटने की तमन्ना थी, देश के लिए कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश थी (वैसे आज भी वैसी ही है)। क्या करना है ये नहीं पता था। बस एक जुनून था कि देश की सेवा बेहतर तरीके से करनी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था अच्छी शिक्षा हासिल करने के लिए। तमन्ना थी आईएएस अफसर बनने की। लेकिन इसी बीच सीडीएस का एग्जाम आया तो फार्म भर दिया। सोचा आर्मी भी देश-सेवा करने का एक बेहतर विकल्प है। उन्हीं दिनों करगिल वॉर छिड़ गया। सो, आर्मी का क्रेज और भी बढ़ गया। मेरे परिवार ने भी इसके लिए मेरा पूरा सपोर्ट किया। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SmybbmampgI/AAAAAAAAArA/_0i2Fdvbzbw/s1600-h/KARGIL+WAR+3.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 285px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SmybbmampgI/AAAAAAAAArA/_0i2Fdvbzbw/s320/KARGIL+WAR+3.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5362832154762323458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बड़े अधिकारियों का काम होता है रणनीति तैयार करना और अपने मातहत अधिकारियों को दिशा-निर्देश देना। उस रणनीति को अंजाम देना ग्राउंड अधिकारियों का ही काम होता है। ये सिर्फ नियम सिर्फ आर्मी में ही नहीं लागू होता, बल्कि सभी फील्ड में लगभग ऐसा ही होता है-इसलिए, आज भी मैं ट्रेनवाले अंकल जी की बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि युद्ध में कम उम्र के अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया जाता है।&lt;br /&gt;लेकिन, जैसे अंकलजी की हाय मेरे इंटरव्यू पर लग गई थी। आगरा पहुंचते-पहुंचते मुझे ध्यान आया कि मैं अपने स्कूल और कॉलेज सर्टीफिकेट लाना भूल गया हूं। आगरा पहुंचते ही मैने बैंगलोर हेडक्वार्टर में फोन कर सारी वस्तुस्थिति से अवगत कराया। लेकिन वहां से जबाब आया कि बिना सर्टीफिकेट के इंटरव्यू  नहीं दे सकते है। वैसे भी मुझे दूसरी बार मौका दिया गया था। हारकर मैं आगरा स्टेशन पर ही उतर गया। बेहद मायूसी छा रही थी। लड़खड़ाते कदमों से अपना सामान लेकर मैं दिल्ली आ रही ट्रेन में सवार हो गया।&lt;br /&gt;उसके बाद से यदा-कदा ही मैं घटना को याद करता हूं। एम.ए खत्म होते ही पत्रकारिता का कोर्स किया और बन गए पत्रकार। आज करगिल युद्ध के दस साल पूरे होने पर ये घटना अचानक याद आ गई। दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस (जहां मैने पढ़ाई की थी) में तीन दिन पहले हिंमाशु सभरवाल के दोस्त और एकाउंटेट परविन्द्र सिंह की हत्या कर दी गई थी। उसी के कवरेज के लिए आज वहीं गया हुआ था। तभी एयरफोर्स हेडक्वार्टर से फोन आया, "सर, करगिल वॉर पर जो आपके यहां कवरेज चल रही है, उसमें एयरफोर्स का जरा भी जिक्र नहीं है।” आज करगिल युद्ध की दसवी सालगिरह थी। सो सभी चैनल पर लाइव कवरेज चल रहा था। एयरपोर्स अधिकारी ने एक के बाद एक कई फोन किए, “नीरज जी, बस &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; थोड़ा सा एयरफोर्स की भूमिका को भी हाइलाईट करा दीजिए...करगिल युद्ध में एयरफोर्स की अहम भूमिका थी। &lt;/p&gt; थोड़ा सा एयरफोर्स की भूमिका को भी हाइलाईट करा दीजिए...करगिल युद्ध में एयरफोर्स की अहम भूमिका थी।” वाकई करगिल युद्ध में सेना के 'आपरेशन विजय' के सपोर्ट में एयरफोर्स ने भी 'ऑपरेशन सेफ सागर' लांच किया था। करगिल युद्ध की दसवी वर्षगांठ पर भी एयरफोर्स ने अपने फाइटर प्लेनस के जरिए जौहर दिखाया और साथ ही सीमा पार के दुश्मनों को चेतावनी भी दी कि अगर फिर कभी हमारी सरजमीं पर घुसपैठ करने की गुस्ताखी की तो ठीक वैसा ही मुंहतोड़ जबाब दिया जायेगा, जैसा दस साल पहले दिया था। &lt;br /&gt;    आज, मुझे लग रहा है कि भले ही मैं आज सेना का हिस्सा नहीं हूं, लेकिन किसी ना किसी तरह से मैं भी करगिल युद्ध से जुड़ा हूं। भले ही युद्ध में हिस्सा ना लिया हो, भले ही सीमाओं की रखवाली ना कर रहा हूं, लेकिन चाहे वो सेना हो, नौसेना हो या फिर वायुसेना, अगर उनके वीर सपूतों की गाथा और अदम्य साहस की कहानी हम (मीडिया) सुना रहे है तो हम भी उसका एक हिस्सा ही तो बन जाते हैं। &lt;br /&gt;जय हिंद !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-994507535526202967?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/994507535526202967/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=994507535526202967' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/994507535526202967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/994507535526202967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='आर्मी कभी मत ज्वाइन करना'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Smya9lNjkgI/AAAAAAAAAqw/gfNJHndeiao/s72-c/KARGIL+WAR+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-3739813428281510875</id><published>2009-05-23T03:10:00.000+05:30</published><updated>2009-05-24T16:44:48.253+05:30</updated><title type='text'>सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShcocdzMtCI/AAAAAAAAAqo/Takzj8WB_TA/s1600-h/REPOPRTING.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 248px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShcocdzMtCI/AAAAAAAAAqo/Takzj8WB_TA/s320/REPOPRTING.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338780352771830818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सरकार बनने का किसी क्राइम रिपोर्टर के खुश होने से क्या वास्ता हो सकता है? बिल्कुल है! दिल्ली के क्राइम रिपोर्टर तो पिछले एक महीने से सरकार बनने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। जब से चुनावों की घोषणा हुई थी और सरकार बनने से लेकर तक, क्राइम रिपोर्टर यही सोच रहे थे कि किसी की भी सरकार बने-चाहे वो कांग्रेस की हो या फिर बीजेपी की- बस जल्द से जल्द बन जानी चाहिए। इसलिए नहीं कि सरकार उनके लिए कोई पैकेज की घोषणा करने वाली है। जानने चाहेंगे क्यो ?  &lt;br /&gt;   दरअसल चुनावों के घोषणा होने के चंद रोज बाद ही दिल्ली पुलिस ने आदेश जारी कर दिया कि कोई भी पुलिस अधिकारी तब तक प्रेस कांफ्रेंस नहीं करेगा, जबतक की सरकार का गठन ना हो जाए और प्रधानमंत्री सहित कैबिनट के मंत्री शपथ ग्रहण ना कर ले। ये आदेश दिल्ली पुलिस ने चुनाव सहिंता लागू होने के कुछ रोज बाद किया था। ये बात आजतक साफ नहीं हो पाई है कि क्या वाकई चुनाव आयोग ने दिल्ली पुलिस को ऐसा करने का आदेश दिया था या फिर गृह मंत्रालय ने। लेकिन दिल्ली पुलिस ने अपनी जुबां पर ताला लगा लिया। अब जबकि मंत्रिमंडल ने शपथ ग्रहण कर ली है तो पुलिस अधिकारियों पर प्रेस कांफ्रेंस ना करने का आदेश भी खत्म ही समझ लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShciwBpKvVI/AAAAAAAAApw/ORRwNOl67ps/s1600-h/REPORTER.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 122px; height: 123px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShciwBpKvVI/AAAAAAAAApw/ORRwNOl67ps/s320/REPORTER.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338774091741183314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अगर आपको याद ना रहा हो तो यहां ये बात दीगर है कि इलेक्शन के घोषणा से पहले तक दिल्ली पुलिस की डीसीपी तो क्या, खुद पुलिस महकमें के मुखिया यानि कमिश्नर साहब तक को गृह मंत्रालय ने (अनौपचारिक) आदेश दे रखा था कि राजधानी की कानून-व्यवस्था पर हर पंद्रह दिन पर अपना पक्ष रखा जाएं। ये आदेश तब दिया गया था जब दिल्ली एक के बाद एक वारदात से दहल कर रह गई थी। पहले बाइकर्स गैंग के सरगना बंटी और फिर सत्ते गैंग ने लोगों को जीना मुहाल कर दिया था। मीडिया में दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे थे। हालांकि पुलिस का दावा था कि आंकड़ो पर गौर किया जाए तो राजधानी में क्राइम कम हो रहा है लेकिन किसी ने पुलिस के दावा पर पूरी तरह यकीन नहीं किया। हारकर गृह मंत्रालय को दखल देना पड़ा और पुलिस कमिश्नर को मीडिया के सामने आना पड़ा। ये वही कमिश्नर है जिनके दिल्ली पुलिस के मुखिया बनने के बाद कुछ सीनियर अधिकारी कहते सुने गए थे कि “ सीपी (कमिश्नर ऑफ पुलिस को महकमें मे इसी निक-नेम से जाना जाता है) साहब ने हमें मीडिया की खबरों पर ज्यादा गौर ना करने का मशवरा दिया है।” लेकिन कुछ दिनों बाद ही कमिश्नर साहब को अपनी सोच बदलनी पड़ गई।&lt;br /&gt;खैर, सरकार बनने का क्राइम रिपोर्टर के खुश होने से क्या ताल्लुक। बिल्कुल ताल्लुक है। मुझे याद है कि करीब पांच-छह साल पहले मैं मध्य-प्रदेश के टूर पर गया था। वहां मैने कई लुटेरों की बस्तियों पर पुलिस के साथ मिलकर लाइव रेड की थी। उसी दौरान मेरी मुलाकात वहां के एक डीआईजी साहब से हुई। इंटरव्यू खत्म होने के बाद डीआईजी साहब बातों ही बातों में कहने लगे कि अगर हम ना हो तो आपका काम बंद हो जाएं। “ हम इंटरव्यू देते है तो आप की खबर पूरी होती है। वरना अधूरी ही रह जाएंगी।” मेरा जबाब था डीआईजी साहब, आप बिल्कुल ठीक फरमा रहे है। दरअसल आप जिस महकमें और पद पर बैठे है वो सरकार ने आपको दिया है। हम आप से इसलिए किसी भी खबर पर इंटरव्यू (बाइट या पक्ष) लेने आते है क्योंकि आप सरकार के नुमाइंदे है। आप जो बोलेंगे वो हमे मानना पड़ेगा। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Shckmcq_OtI/AAAAAAAAAqQ/iQ0MY-Q3x5M/s1600-h/CRIME+REPORTER+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 273px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Shckmcq_OtI/AAAAAAAAAqQ/iQ0MY-Q3x5M/s320/CRIME+REPORTER+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338776126221138642" /&gt;&lt;/a&gt; क्राइम की जितनी खबरें टी.वी या अखबार में दिखाई पड़ती हैं उसमे से कम से कम बीस से तीस प्रतिशत वे होती है जो किसी भी क्राइम रिपोर्टर को पुलिस महकमें से मिलती है। वो माध्यम है प्रेस कांफ्रेंस के जरिए। पुलिस किसी चोर-उचक्के या गिरहकट (माफ कीजिए पॉकेटमार) को पकड़ती है और बड़ी शान से प्रेस कांफ्रेस करती है और उसमें उन आरोपियों के बारे में ऐसा कोई शगुफा छोड़ देगी कि वो खबर टी.वी या अखबार में दिखाई दे ही जाती है। कभी बताएगी कि ये चोर, अपनी गर्लफ्रेंड के गिफ्ट के लिए चोरी करता था... ये पढ़ा-लिखा चोर है, मंदी के मारे नौकरी नहीं मिली तो लूटपाट करने लगा। फलां आरोपी, मोटरसाइकिल की चोरियां महज अपने शौक के लिए करता था, बाइक का पैट्रोल खत्म होने पर उसे वहीं फेंक कर दूसरी मोटरसाइकिल चोरी कर लेता था। कभी बताया जाएगा कि ये अपनी बहन की शादी के लिए चोरी के पैसे से दहेज इकठ्ठा कर रहा था । ये सब पुलिसवाले के मुंह से निकला नहीं कि बस बन गई हेडलाईन। कभी-कभी अच्छी प्रेस कांफ्रेंस भी होती है। जैसे, किसी नामी-गिरामी बदमाश (बंटी, सत्ते इत्यादि) के एनकाउंटर के बाद या फिर किसी आंतकवादी को ढेर करने के बाद (जैसे बटला हाउस एनकाउंटर)। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; अब जब ये प्रेस कांफ्रेंस ही बंद हो जाएंगी तो क्राइम रिपोर्टर तो उदास हो ही जाएगां ना। एनकाउंटर होगा कैसे, सभी पुलिसवाले तो इलेक्शन डयूटी पर तैनात है। बदमाश भी नेताओं के चुनाव प्रचार में जुट जाते है इलेक्शन के दौरान। आप यकीन करें या ना करें, लेकिन ये हकीकत है कि चुनाव के दौरान क्राइम ग्राफ नीचे आ जाता है। &lt;/p&gt; अब जब ये प्रेस कांफ्रेंस ही बंद हो जाएंगी तो क्राइम रिपोर्टर तो उदास हो ही जाएगां ना। एनकाउंटर होगा कैसे, सभी पुलिसवाले तो इलेक्शन डयूटी पर तैनात है। बदमाश भी नेताओं के चुनाव प्रचार में जुट जाते है इलेक्शन के दौरान। आप यकीन करें या ना करें, लेकिन ये हकीकत है कि चुनाव के दौरान क्राइम ग्राफ नीचे आ जाता है। &lt;br /&gt;क्राइम रिपोर्टिंग में बीस ये तीस प्रतिशत वे खबरें होती है जो ब्रेकिंग होती है। जैसे किसी बुजर्ग दंपत्ति की उनके ही नौकर ने लूटपाट के इरादे से हत्या कर दी। या फिर जैसे किसी बैंक में दिन-दहाड़े लूट हो गई। किसी लड़की को उसके प्रेमी ने प्यार में तकरार के बाद बीच सड़क में चाकू से गोद डाला। दो जिंदा महिलाएं ऑटो में जलकर खाक।  &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShclxWpzi_I/AAAAAAAAAqg/NRsD1jUEqrY/s1600-h/CRIME+SCENE+3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 199px; height: 187px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShclxWpzi_I/AAAAAAAAAqg/NRsD1jUEqrY/s320/CRIME+SCENE+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338777413095754738" /&gt;&lt;/a&gt; लेकिन अगर खबर कुछ ऐसी हुई जैसे, बैंक से पैसे निकालकर बाहर निकल रहे व्यापारी को हथियारों की नोंक पर लूटा तो शायद ऐसी खबर के चलने का चांस कम होता है। ऐसे में, ऑफिस वाले कहेंगे, अरे यार कोई स्टोरी नहीं दे रहे हो आजकल। क्राइम रिपोर्टर मन ही मन बुदबुदाता है, “इलेक्शन के दौरान चलेगी कोई स्टोरी, जो बोल रहे हो स्टोरी नहीं दे रहे हो।” जी हां, इलेक्शन टाइम में क्राइम की खबरों को कम ही तरजीह दी जाती है। जबतक की कोई बहुत बड़ी ब्रेकिंग खबर ना हो अपराध और अपराध से जुड़ी टी.वी और अखबार से गायब रहती है।&lt;br /&gt;टी.वी के क्राइम रिपोर्टर की करीब दस-बीस प्रतिशत खबरें वे होती है जो बहुत शानदार होती है, लेकिन ऑफिस से फोन आता है, खबर में किसी पुलिस अधिकारी की बाइट जरुरी है। “लोचा हो सकता है इस स्टोरी में बॉस, इसलिए ऑफिशियल बाइट के बिना नहीं चलेगी ये स्टोरी।” यानि तीस प्रतिशित खबरें प्रेस कांफ्रेस से मारी गई और बीस प्रतिशित बिना पुलिस की बाइट की। और अगर कोई बड़ी ब्रैकिंग नहीं हुई पंद्रह-बीस दिन तो बाकी कितनी प्रतिशत खबरें बची। मात्र बीस प्रतिशत।&lt;br /&gt;      ये बीस प्रतिशत वे खबरें होती है जो किसी भी क्राइम रिपोर्टर की अपनी होती है। ना तो वे कोई ब्रेकिंग न्यूज का हिस्सा होती है और ना ही पुलिस की प्रेस कांफ्रेंस की। जैसे, जब हाल ही में दो महिलाएं ऑटो में जिंदा जलकर खाक हो गई तो पुलिस ने बिना तफ्तीश किए दावा किया कि शॉट-सर्किट की वजह से आग लगने के कारण दोनों महिलाओं की मौत हुई है। ये वारदात रात को हुई थी। खबर सनसनीखेज थी, लिहाजा मैं  सुबह होते ही उस इलाके के थाने पर पहुंच गया जहां ये वारदात हुई थी। थाने का गेट पुलिसवालों ने बंद कर रख था मीडियाकर्मियों के लिए। साफ था कि मामले में कुछ पेंच है। मेरे साथ बाकी चैनल के रिपोर्टर भी खड़े थे। इतने में एक पुलिसवाला दो महिलाओं और एक छोटे बच्चे के साथ वहां पहुंचे। पुलिसवाला उन महिलाओं में से एक को अंदर ले गया। इतने में हमने दूसरी महिला से बातचीत शुरु कर दी। बातों ही बातों में उसने बताया कि जिस महिला को पुलिसवाला थाने के अंदर ले गया था वो भी वारदात के वक्त ऑटो में मौजूद थी। लेकिन वो किसी तरह जान बचाकर भाग निकली थी। उस महिला ने बताया कि मौत के मुंह से निकल कर आने वाली वो महिला उसकी बेटी है और उसके साथ छोटा बच्चा उसका नाती है। महिला ने खुलासा किया कि ऑटो में आग अपने आप नहीं लगी बल्कि उसकी बेटी ने उसे बताया था कि किसी आदमी ने ज्वलनशील पदार्थ ऑटो पर डालकर आग लगा दी थी। इस बयान के बाद तो मानों पुलिस की जांच पर ही सवाल खड़े हो गए। आला-अधिकारी कैमरे पर तो कुछ नहीं बोले, लेकिन ये बात मान ली कि तीसरी महिला भी ऑटो में मौजूद थी। इससे पहले तक दिल्ली पुलिस दो महिलाओं के ही ऑटो में होने का दावा कर रही थी। यानि पुलिस की जांच में झोल था। ये होती है किसी भी क्राइम रिपोर्टर की अपनी स्टोरी। अगर इस तरह कि खबर यदा-कदा भी क्राइम रिपोर्टर के हाथ लग जाएं तो बल्ले-बल्ले।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShckITBUJaI/AAAAAAAAAqI/plrpprKRjhQ/s1600-h/CRIME+REPORTER.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 222px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShckITBUJaI/AAAAAAAAAqI/plrpprKRjhQ/s320/CRIME+REPORTER.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338775608234354082" /&gt;&lt;/a&gt; अब मैं मध्य-प्रदेश के उन्ही डीआईजी साहब की बात पर एक बार फिर से लौटता हूं कि “हमारी (पुलिस की) वजह से ही तुम खबरें कर पाते हो।” बिल्कुल ठीक कहा था डीआईजी साहब ने। लेकिन ऐसी खबरों का क्या, जैसा मैने अभी ऑटो मे तीसरी महिला के बारे में जिक्र किया है। कोई भी क्राइम रिपोर्टर, किसी प्रेस कांफ्रेंस की खबर के कारण नहीं जाना जाता है। वो जाना जाता है ऐसी ही किसी स्कूप ( एक्सक्लूसिव खबर) के लिए। मुझे अब भी याद है कि वर्ष 2005 में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में एक महिला की दिन-दहाडे़ अस्पताल परिसर में ही आबरु लूट ली गई थी। दिल्ली में लगातार बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही थी तिस पर अस्पताल में बलात्कार से पुलिस महकमें की नींद हराम हो गई। महिला संगठनों के साथ-साथ सरकार ने भी पुलिस पर उंगलियां उठानी शुरु कर दी। आनन-फानन में पुलिस ने दो दिन बाद ही एक शख्स को पकड़ा और दावा किया कि उसी ने अस्पताल में महिला की इज्जत लूटी है। लेकिन पुलिस ने ना तो आरोपी से मीडिया को बात करने दिया और ना ही महिला से। मीडिया को महिला का पता तक नहीं बताया गया। महिला और उसके पति को एक गुप्त स्थान पर भेज दिया गया। लेकिन किसी तरह मैने उस पीड़ित महिला और पति का ढूंढ निकाला। मैने दोनों से बात की तो उन्होने साफ कर दिया कि पुलिस ने जिस आरोपी को पकड़ा है वो कोई और है। इतना सुनते ही मै भौचक्का रह गय़ा। मैने फौरन सहारा टी.वी (उस वक्त मैं वहां क्राइम रिपोर्टिंग करता था) में अपनी सीनियर्स को इस खुलासे की जानकारी दी। फिर क्या था मैने महिला का इंटरव्यू सहारा टी.वी पर चला दिया। इंटरव्यू चलते ही हड़कंप मच गया। मामले की जांच तुंरत क्राइम ब्रांच के हवाले कर दी गई। एक साल बाद अदालत ने उस निर्दोष व्यक्ति को बाइज्जत बरी कर दिया। वो बात और है कि दिल्ली पुलिस अभी तक असली आरोपी को पकड़ने में नाकाम रही है। लेकिन एक बेगुनाह बच गया। &lt;br /&gt;    बस &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt;  कहने का तात्पर्य ये है कि जो पुलिस बोलती है हम उसे तोते की तरह नहीं रटते है। क्राइम रिपोर्टर अपने विवेक से काम करता है। वो तो अपने सूत्रों और इंवेस्टीगेटीव स्किल (कौशल) से किसी भी मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करता है।  &lt;/p&gt; कहने का तात्पर्य ये है कि जो पुलिस बोलती है हम उसे तोते की तरह नहीं रटते है। क्राइम रिपोर्टर अपने विवेक से काम करता है। वो तो अपने सूत्रों और इन्वेस्टिगेटिव स्किल (कौशल) से किसी भी मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करता है। कोशिश करता है कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। डीआईजी साहब को मैने उस वक्त भी यही जबाब दिया था कि माना सभी खबरें आप से मिलती है, लेकिन उन मामलों को क्या जो सिर्फ और सिर्फ एक क्राइम रिपोर्टर की होती है। तब फिर कोई पुलिस अधिकारी दूध में पानी मिलाने से पहले सौ बार सोचेगा जरुर। &lt;br /&gt;याद है ना किस तरह यू.पी पुलिस के एक आला-अधिकारी ने आरुषि हत्याकांड में प्रेस कांफ्रेंस कर एक छात्रा, नौकर और उसके पिता पर कीचड़ उछालने की कोशिश की थी। लेकिन उस प्रेस कांफ्रेस में मौजूद कम ही क्राइम रिपोर्टर को उन आईजी साहब के दावे पर यकीन था। नतीजा, आईजी साहब की छुट्टी हो गई और बाकी सब इतिहास बन चुका है। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Shcje31AOOI/AAAAAAAAAqA/RHsRYfa7-MI/s1600-h/ARUSHI+3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 243px; height: 260px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Shcje31AOOI/AAAAAAAAAqA/RHsRYfa7-MI/s320/ARUSHI+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338774896560322786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इतिहास इसलिए कि इन चुनावों के दौरान ही आरुषि हत्याकांड की पहली बरसी बीत गई और एक्का-दुक्का टी.वी या अखबार को छोड़ दे तो इस सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री से जुड़ी कोई खबर नहीं दिखाई दी। ये बात जरुर है कि सीबीआई की एक टीम दिन-रात इस मामले की जांच में अभी भी जुटी है। उम्मीद करते है कि जल्द ही देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री के राज से पर्दा उठ पाएं। अगर क्राइम रिपोर्टर ना होते तो शायद नोएडा पुलिस और फिर सीबीआई इस मामलें को किसी भी तरह सुलझा लेती और आरुषि के साथ इंसाफ नहीं हुआ होता। इंसाफ तो खैर अभी भी नहीं हुआ है लेकिन अगर गलत लोग पकड़े जाते तो हमारी कानून-व्यवस्था और समाज के साथ एक खिलवाड़ होता, जो किसी सभ्य समाज में कतई मंजूर नहीं है। मैने खुद कई बार पुलिस अधिकारियों को कहते सुना है कि अगर मीडिया ना हो तो हम इस मर्डर मिस्ट्री को चुटकियों में सुलझा लेंगे। यानि प्रेस के उस सिंद्वात को क्राइम रिपोर्टर पूरी तरह से मानता है जिसमें मीडिया को समाज का ‘वॉच-डॉग’ माना जाता है। &lt;br /&gt;समझ गए ना एक क्राइम रिपोर्टर की इस समाज में कितनी अहमियत है। वो सिर्फ सनसनीखेज खबरें परोसता ही नहीं, सैकड़ो-हजारों पीड़ित लोगों का रहनुमा भी होता है।  &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt;  शायद ही कोई सा दिन ऐसा बीतता होगा जब उसपर किसी पुलिस के सताएं, तो कभी बदमाशों के सताएं लोगों के इंसाफ की आस में फोन ना आते हो। सभी सरकारी दफ्तरों, मंत्रियों और संतरियों के दरवाजों से थक-हारकर आदमी क्राइम रिपोर्टर को ही इंसाफ की आखिरी उम्मीद मानता है।  &lt;/p&gt;शायद ही कोई सा दिन ऐसा बीतता होगा जब उसपर किसी पुलिस के सताएं, तो कभी बदमाशों के सताएं लोगों के इंसाफ की आस में फोन ना आते हो। सभी सरकारी दफ्तरों, मंत्रियों और संतरियों के दरवाजों से थक-हारकर आदमी क्राइम रिपोर्टर को ही इंसाफ की आखिरी उम्मीद मानता है। कई बार तो अदालतों में सालों से लटके पड़े मामले भी तभी जोर पकड़ते है जब क्राइम रिपोर्टर उनका खुलासा करता है।&lt;br /&gt;खैर, अब जब सरकार बन गई है तो सभी तरह के क्राइम की खबरें आपको देखने, सुनने और पढ़ने को मिलेगी। पुलिस के ‘दावों’ वाली भी, उनके दावों के झोलवाली भी, ब्रेकिंग न्यूज भी और स्कूप भी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-3739813428281510875?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/3739813428281510875/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=3739813428281510875' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/3739813428281510875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/3739813428281510875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='सरकार बनी, क्राइम रिपोर्टर खुश'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/ShcocdzMtCI/AAAAAAAAAqo/Takzj8WB_TA/s72-c/REPOPRTING.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-2617853747903224225</id><published>2009-03-14T14:35:00.000+05:30</published><updated>2009-03-15T18:53:13.316+05:30</updated><title type='text'>पत्रकारों का स्वागत कैसे करें</title><content type='html'>ये पोस्ट मैने एक कमेंट के रुप में लिखी थी। ब्लॉगिंग करते वक्त शेखावाटी इलाके के एक ब्लॉग पर पहुंच गया। इलाके का नाम सुनते ही मुझे याद आ गया कि एक बार मै भी शेखावाटी इलाके में आया था। शायद 2002-03 का साल था वो। झुंझनू के एक गांव में कांग्रेस अध्यक्षा, सोनिया गांधी की रैली कवर करने के लिए मै आया था। &lt;a href="http://myshekhawati.blogspot.com/"&gt;शेखावाटी ब्लॉग &lt;/a&gt;पर आया तो वो याद ताजा हो गई। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt66IYcZZI/AAAAAAAAAow/aErZqWuTwK4/s1600-h/SONIA+GANDHI+RALLY.1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 223px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt66IYcZZI/AAAAAAAAAow/aErZqWuTwK4/s320/SONIA+GANDHI+RALLY.1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312975324514641298" /&gt;&lt;/a&gt; रैली कवर करने या अखबार की हेडलाईन की वजह से याद ताजा नहीं हुई बल्कि राजस्थान सरकार के मीडिया विभाग (सूचना एंवम जनसंर्पक विभाग) की कार्यशैली (या कारगुजारियों) और अपने साथी पत्रकारों के अड़ियल व्यवहार की वजह से। &lt;br /&gt;दिन के करीब 12 बजे चले थे हम झुंझनू के लिए और रात में नौ बजे पहुंचे शेखावटी (या शेखावाटी) इलाके में ...उस वक्त राजस्थान में अशोक गहलौत की सरकार थी, सो दिल्ली से पत्रकारों (टी.वी और अखबार) को लाने ले जाने का पूरा जिम्मा राज्य सरकार पर था। केन्द्र में उस वक्त एनडीए (बीजेपी) की सरकार थी। राजस्थान सूखे की मार झेल रहा था। केन्द्र से कोई राहत नहीं मिल रही थी। बस इसीलिए आयोजित की गई थी शेखावाटी (राजस्थान का सीकर, झूंझनू, खेतरी इलाका) में किसान रैली। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt9KDqECCI/AAAAAAAAApQ/ytJafjAoCAM/s1600-h/SHEKHAWATI.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt9KDqECCI/AAAAAAAAApQ/ytJafjAoCAM/s320/SHEKHAWATI.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312977797147527202" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;करीब एक दर्जन पत्रकारों के लिए मीडिया विभाग ने बुलाई दो छोटी कारें। ठूंसठूंस कर भरा जाने लगा पत्रकरों को। खुद मीडिया विभाग के डायेरक्टर ( दिल्ली के बीकानेर हाउस में था उनका ऑफिस) भी उसी में बैठने लगे हमारे साथ। "दिल्ली के पत्रकारों की इतनी बेइज्जती" किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। फिर क्या था सभी बरस पड़े डायरेक्टर साहब पर। हारकर रास्ते में ही दो और गाड़ियां मंगानी पड़ी। फिर कही जाकर यात्रा चल पड़ी।&lt;br /&gt;कई घंटे चलने के बाद भी जब डायरेक्टर साहब ने "चाय-पानी" के लिए भी नहीं पूछा तो हारकर एक वरिष्ठ साथी को ही बोलना पड़ा, "डायरेक्टर साहब किसी ढाबे पर ही रुकवा दीजिए, हम पत्रकार ज्यादा देर बिना चाय के नहीं रह सकते।" बस, फिर क्या था, डायरेक्टर साहब ने वाकई एक रोड-साईड ढाबे पर सभी गाड़ियों को रोकने का आदेश दे डाला। फिर क्या होना था, एक बार फिर डायेरक्टर साहब को पत्रकारों के गुस्से का कोप झेलना पड़ा।  थोड़ी दूर जाकर एक हेरिटज रेस्टोरेंट पर गाड़ियां रोकी गई और सभी ने चाय-नाश्ता लिया। उस वक्त भी डायरेक्टर साहब का चेहरा देखने लायक था। अब तो वे पत्रकारों से दूर ही रहने लगे। बात करनी भी बंद कर दी। मुझे आजतक ये बात समझ नहीं आई कि सरकारी विभागों को प्रेस के लिए अलग सा खर्चा मिलता है। लेकिन ना जाने क्यों डायेरक्टर साहब कंजूसी में क्यों लगे हुए थे। कुछ पत्रकारों का मानना था कि &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; यही सब मौके होते है सरकारी अफसरों को "ऊपरी कमाई"  के।  "कम खर्च करो और बिल लंबा-चौड़ा थमा दो विभाग के हाथ में।"&lt;/p&gt; यही सब मौके होते है सरकारी अफसरों को "ऊपरी कमाई"  के।  "कम खर्च करो और बिल लंबा-चौड़ा थमा दो विभाग के हाथ में।"&lt;br /&gt;खैर जैसे-तैसे हम एक छोटे से कस्बे में (झूंझनू ही था शायद) पहुंचे। हमारी कारें एक बड़े से मंदिर के पार्किंग में रोक दी गई। काफी पुराना मंदिर था, शायद मध्यकालीन युग का। काफी भीड़ थी दर्शन करने वालों की वहां। हां, इससे पहले की आगे की कहानी बताऊं, उस कस्बे के बाहर ही डायरेक्टर साहब को दो-तीन बाबू स्वागत करने लेने के लिए खड़े थे। डायरेक्टर साहब वहां से कब खिसक लिए हमे पता ही नहीं चला। अब 40-45 साल के वे बाबू हमे आगे ले जा रहे थे। वो मंदिर सती माता का था शायद, ठीक से याद नहीं आ रहा है मुझे। मंदिर पहुंचकर हमे लगा कि शायद रास्ते में मंदिर पड़ा है तो हमे दिखाने के इरादे से यहां लाया गया है। हम उतरकर चलने लगे। &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt7zR6RE1I/AAAAAAAAApA/RhL4U8eFxvA/s1600-h/SHEKHAWATI+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 182px; height: 130px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt7zR6RE1I/AAAAAAAAApA/RhL4U8eFxvA/s320/SHEKHAWATI+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312976306324968274" /&gt;&lt;/a&gt; लेकिन तभी वे बाबू बोले," साहब, अपना सामान तो ले लिजिए।" अब हमसब एक दूसरे का मुंह तांकने लगे। समझ आ गया था कि इसी मंदिर में ये लोग हमे ठहराने की व्यवस्था कर चुके है। &lt;br /&gt;मंदिर में ठहरने की बात सुनते ही साथी पत्रकार आग-बबूला हो गए। लेकिन मैने और एक-दो साथियों ने समझाया कि चलिए एक बार अंदर चलकर देखते है कि क्या व्यवस्था की है इन लोगो ने। नीचे एक भव्य मंदिर था और ऊपर बरामदे के चारों और कमरे बने हुए थें।  उन्ही कमरों में हमारे रुकने का इंतजाम किया गया था। थोड़ी देर कमरे का मुआयना करने के बाद मै और मेरा साथी (अगर गलत नही हूं तो शायद उनका नाम रंजीत जामवाल था। इंग्लिश अखबार, &lt;em&gt;STATESMAN&lt;/em&gt; के रिपोर्टर) बिस्तर पर पसर गए। थोड़ी ही देर में सहारा अखबार के फोटोग्राफर भी आ गए। वे भी हमारे पास आकर बैठ गए। यात्रा में हम काफी थक चुके थे और उससे भी ज्यादा अपने पत्रकार बंधुओं और डायरेक्टर साहब की किच-किच की वजह से। अभी बैठकर बात कर ही रहे थे कि बाहर से कुछ शोरगुल की आवाज आने लगी। कमरे के बाहर आकर देखा तो ‘दिग्गज पत्रकारों’ का समूह फिर झगड़े के मूड में था। हमे अपने कमरे दिखाने लगे। “देखो यार, कैसे गुजरी की रात यहां, बिस्तर कितने गंदे है...बाथरुम देखो...बाल्टी तक नहीं है....पंखा बाबाआदम के जमाने का है...रात में मच्छर उठाकर ले जाएंगे।” एक बोला, बुलाओ, “उस .... को। खुद तो आराम से सरकारी गेस्ट हाउस में मजे काट रहा होगा और हमे यहां छोड़ गया।” दूसरे ने कहा, &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; इसकी शिकायत, मुख्यमंत्री के पीआरओ से करनी पड़ेगी। इतना सुनते ही प्रेस विभाग के बाबूओं के कान खड़े हो गए। &lt;/p&gt; इसकी शिकायत, मुख्यमंत्री के पीआरओ से करनी पड़ेगी। इतना सुनते ही प्रेस विभाग के बाबूओं के कान खड़े हो गए। उन्होने चुपके से डायरेक्टर साहब को फोन किया। थोड़ी ही देर में डायरेक्टर साहब वहां पहुंच चुके थे। लेकिन तबतक सभी पत्रकार (मै और रंजीत जामवाल भी) मंदिर के अहाते से बाहर आ चुके थे—पत्रकार एकता का सवाल जो था भई।&lt;br /&gt;डरते-डरते डायरेक्टर साहब ने पूछा, “अरे क्या हुआ है बंधुओं, आप सब बाहर कैसे।” सबसे सीनियर पत्रकार बोले, “ ऐसी की तैसी ..... साहब,  खुद तो आप यहां से चुपचाप निकल लिए और हमें यहां मंदिर में छोड़ दिया।” अब तो डायरेक्टर साहब मिमियाने लगे, “नहीं-नहीं आपको छोड़कर नहीं गया था, मै तो डीएम साहब से कल की रैली के बारे में मीटिंग करने चला गया था...मै तो बताकर गया था कि थोड़ी देर में आ रहा हूं।” आप बताईये क्या तकलीफ है आपको। “अरे .... साहब, हम टी.वी में काम करते है, बिना टी.वी के तो हम एक घंटा भी नहीं रुक सकते। मंदिर में टी.वी की कोई व्यवस्था नहीं है। हम तो पूरी दुनिया से कट गए है।” अच्छा ये परेशानी का सबब है आप लोगो का। धीरे से कोई साथी बुदबुदाया, “ मंदिर में शराब भी तो नहीं पी सकते है।” इतना सुनते ही सब ठहाके मारकर हंसने लगे। डायरेक्टर साहब समझ गए थे कि मंदिर में ना रुकने की असली वजह क्या थी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt9xJBBbeI/AAAAAAAAApY/uQO3JJJirxM/s1600-h/BOOZE.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 225px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt9xJBBbeI/AAAAAAAAApY/uQO3JJJirxM/s320/BOOZE.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312978468600901090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रा्त के दस बजे ही डायरेक्टर साहब ने अपने बाबूओं को एक “अच्छे से होटल” को ढूंढने का आदेश दे दिया। कोई भीड़ में बोल पड़ा, डायरेक्टर साहब आप अगर थोड़ी देर और हो जाते तो हम सीएम साहब के पीआरओ साहब को सबकुछ बताने वाले थे। ये सुनते ही डायरेक्टर साहब बोल उठे, अरे छोड़िए बाकी बाते, मै अभी यहां का एक शानदार हेरिटज रिसोर्ट देखकर आया हूं। सब वही चलते है। वहां राजस्थान का लोक नाच-गाना भी होता है और जो कुछ आपको चाहिए वो सबकुछ भी मिल जाएगा। ये सुनते ही सबकी बांछे खिल गई। दरअसल पत्रकारों के लिए शहर से बाहर कवरेज पर जाना किसी हॉली-डे से कम नहीं होता। काम का काम और पिकनिक का पिकनिक। हो गया ना एक पंथ दो काज। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt8LmjTlxI/AAAAAAAAApI/V8S_pTKT6Pw/s1600-h/SHEKHAWATI+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 176px; height: 136px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt8LmjTlxI/AAAAAAAAApI/V8S_pTKT6Pw/s320/SHEKHAWATI+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312976724182669074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रिसोर्ट में सभी ने जमकर शराब पी और लोक नृत्य का लुत्फ उठाया। देर रात होटल पहुंचे तो किसी ने भी कमरे में जाकर टी.वी पर न्यूज देखनी की जहमत नहीँ उठाई। राजस्थान की हेरिटज शराब पीने के बाद क्या किसी को दीन-दुनिया याद रहती है।&lt;br /&gt;खैर, किसी तरह रात काटी और सुबह होते ही चल दिए रैली को कवर करने। लाखों की तादाद में भीड़ जुटी थी उस गांव के मैदान में। सोनिया गांधी ने जमकर केन्द्र में सतारुढ बीजेपी सरकार को खरी-खोटी सुनाई। मै मंद-मंद मुस्करा रहा था, अब तो स्टोरी जरुर पेज वन लगेगी। मै उस वक्त कांग्रेस के माऊथपीस अखबार, &lt;em&gt;नेशनल हेराल्ड &lt;/em&gt;में काम जो करता था—हाल ही में ये अखबार बंद हो गया है। अरे हां इससे पहले का एक और किस्सा सुनाना भूल गया। कई किलोमीटर दूर से ही गाड़ियों का काफिला रोक दिया गया था भीड़ के चलते। अब पत्रकारों के लिए इतनी दूर चलना “शान के खिलाफ था।” थोड़ी दी दूर गए थे कि कुछ साथी पत्रकार एसपीजी के अधिकारियों से टकरा गए—सोनिया गांधी की सुरक्षा एसपीजी के हवाले है। एक बुर्जग पत्रकार ने एसपीजी के कमांडो को हडकाया, “ हमे लोकल मत समझ लेना, दिल्ली से आए है हम। एक मिनट में अक्ल ठिकाने आ जाएगी।” देख रहे है आप इनको, दिल्ली में तो एकदम भिगी बिल्ली बने रहते है यहां आकर “चौ़डे” हो रहे है। “पीआईबी पत्रकार हूं मैं, शिकायत कर दी तो लेने के देने पड़ जाएंगे। फिर पीछे-पीछे फिरोगे....”&lt;br /&gt;जैसे-तैसे रैली कवर करने के लिए मैदान में पहुंचे, तो टी.वी के कुछ पत्रकार फिर बिदक गए। “कहां है....(डायेरक्टर) साहब, यहां बुलाओ उन्हे।” &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt-76TO8_I/AAAAAAAAApg/05Ufgffz2f0/s1600-h/JOURNALIST+1.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 252px; height: 308px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt-76TO8_I/AAAAAAAAApg/05Ufgffz2f0/s320/JOURNALIST+1.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312979753140941810" /&gt;&lt;/a&gt; जैसे ही डायरेक्टर साहब प्रेस गैलरी पहुंचे, टी.वी पत्रकार बोल उठे, सर ये बताईये कि इनती दूरी पर कैमरा लगेगा तो कैमरामैन सोनिया जी को कैसे शूट (वीडियो फिल्म) करेगा। आपने छुटभैया नेताओं को तो आगे बैठा दिया और हमे यहां पीछे बैठा दिया। आपको यही सब करना था तो हमें दिल्ली से इनती दूर क्यो बुलाया। ऐसा काम तो हमारे स्ट्रिंगर (स्थानीय संवाददाता) भी कर सकते थे।&lt;br /&gt;अब बारी थी रिपोर्ट फाईल करने की। टीवीवालों ने अपनी टेप सोनिया गांधी के विशेष हैलीकॉप्टर में सवार अधिकारियों को सौंप दी। दिक्कत थी हम जैसे अखबार और न्यूज एजेंसी के पत्रकारों के लिए। झूंझनु से दिल्ली पहुंचने में शाम हो सकती थी, तबतक अखबार का प्रिंट तैयार हो चुका होता है। सो डायरेक्टर साहब से कहा गया कि किसी पीसीओ पर ले चले, जहां फोन और फैक्स दोनो की व्यवस्था हो। डायरेक्टर साहब ने किसी अधिकारी से बात की और हमे ले चले गांव से थोड़ी दूर। एक आढ़ती के गोदाम नुमा ऑफिस के बाहर ले जाकर हम रोक दिया गया। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; डायरेक्टर साहब के साथ चल रहे अधिकारी को देखते ही लालाजी गोदाम से निकाल आए और गदगद होकर बोले, “अहो भाग्य हमारे की तहसीलदार साहब हमारे ऑफिस पधारे है।”&lt;/p&gt; डायरेक्टर साहब के साथ चल रहे अधिकारी को देखते ही लालाजी गोदाम से निकाल आए और गदगद होकर बोले, “अहो भाग्य हमारे की तहसीलदार साहब हमारे ऑफिस पधारे है।” तब जाकर हमे पता चला कि वो अधिकारी स्थानीय तहसीलदार था। तहसीलदार ने लालाजी को बताया कि ये सभी दिल्ली से आये हुए पत्रकार हैं इन सबको अपनी रिपोर्ट दफ्तर भेजनी है। ये सुनते ही लालाजी बोल उठे, “हुक्म सरकार, हमारे लायक कोई सेवा?” लालाजी, अब गांव के आस-पास ना तो कोई फोन है और ना ही फैक्स, इन्हे जल्दी थी, सो हम इन्हे यहां ले आए। अरे साहब आपने कैसी बात कर दी। ये फोन, फैक्स और ऑफिस सब आपके रहमोकरम पर ही तो चल रहा है। उसने हमसे मुखातिब होते हुए कहा, “ये तो हमारा भाग्य है कि आपकी सेवा करने का मौका मिल रहा है और इस बहाने तहसीलदार साहब भी यहां पधारे। आप मेरे फोन और फैक्स को अपने ही समझे, जहां फोन-फैक्स करना है कर लीजिए।” हम सभी ने वहां से अपनी-अपनी रिपोर्ट फाईल की। मैने अपने ऑफिस में फोन कर सारी डिटेल लिखवा दी थी। दफ्तरवालों ने बताया कि ये तो आज की फ्रंन्ट हेडलाईन है। मैने कहा कि अगर कुछ समझ में ना आए तो “एजेंसी की खबर पढ़ लेना।” &lt;br /&gt;  वहां से निकलने के बाद हम एक बार फिर वापस दिल्ली की और रुख कर चुके थे। देर शाम ऑफिस पहुंचा तो सबने बधाई दी कि पहली बार मेरी कोई स्टोरी अखबार की मुख्य हेडलाईन ली गई थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-2617853747903224225?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/2617853747903224225/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=2617853747903224225' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2617853747903224225'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2617853747903224225'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='पत्रकारों का स्वागत कैसे करें'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/Sbt66IYcZZI/AAAAAAAAAow/aErZqWuTwK4/s72-c/SONIA+GANDHI+RALLY.1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-3933106615283084053</id><published>2009-02-22T23:39:00.002+05:30</published><updated>2011-01-19T21:42:28.213+05:30</updated><title type='text'>हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGhry4zMCI/AAAAAAAAAoQ/ykpFoL_f_t8/s1600-h/MAHARANA+PRATAP.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 201px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGhry4zMCI/AAAAAAAAAoQ/ykpFoL_f_t8/s320/MAHARANA+PRATAP.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305699609785610274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हिंदू रीतिरिवाज के मुताबिक महिलाएं अपने सुहाग के प्रतीक के रुप में सिंदूर लगाती हैं। लेकिन राजस्थान का एक इलाका ऐसा है जहां महिलाएं सिंदूर नहीं मिट्टी लगाती हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि कहने को तो ये मिट्टी पीली है लेकिन रंग इसका लाल है। ये इलाका है हल्दीघाटी का। &lt;br /&gt;झीलों के शहर, उदयपुर से महज 40-45 किलोमीटर की दूरी पर है हल्दीघाटी। चारों तरफ ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और बीच में एक सूनसान घाटी। इस घाटी का नाम यहां के रंग के कारण पड़ा था। पहले इस घाटी का रंग बिल्कुल पीला था—एक दम हल्दी के सामान। लेकिन पिछले 400 सालों से ये घाटी लाल है। इसी घाटी की मिट्टी से यहां की महिलाएं अपनी मांग भरती हैं। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGicsyDvQI/AAAAAAAAAog/Lga4qG58AaA/s1600-h/Haldighati+neeraj+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGicsyDvQI/AAAAAAAAAog/Lga4qG58AaA/s320/Haldighati+neeraj+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305700449960312066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;    सन् 1576 में मुगल सम्राट अकबर और मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के बीच इसी जगह हल्दीघाटी का ऐतिहासिक (और घमासान) युद्ध हुआ था। इतिहासकारों के मुताबिक एक ही दिन में इस युद्ध में करीब 18 हजार सैनिक मारें गए थे। इस घाटी में इतना खून बहा था कि हल्दीघाटी, पीली के बजाय लाल हो गई थी। यही वजह है कि हल्दीघाटी (बाहर से) देखने में तो पीली दिखाई पड़ती है लेकिन अगर मिट्टी को थोड़ा सा खुरेचा जाए तो वो लाल दिखाई पड़ती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेवाड़ राज्य के अंतर्गत ही आती है इतिहास प्रसिद्ध ये रणस्थली, यानि हल्दीघाटी। मेवाड़ राज्य का क्षेत्रफल आज के उदयपुर, चित्तौड़गढ और भीलवाड़ा जिलों तक फैला था। इतिहास में वैसे तो मेवाड़ राज्य ने कई सूरमा राजा पैदा किए, लेकिन इन सबमें अग्रणी स्थान है महाराणा प्रताप का। महाराणा प्रताप ही पूरे राजपूताना (राजस्थान) के अकेले ऐसे राजा थे जिन्होनें मुगलों की गुलामी नहीं की थी। मुगलकाल में राजस्थान दर्जनों छोटे-बड़े राज्यों (मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, आमेर आदि) में विभाजित था। &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/02/blog-post_22.html"&gt;मुगल सम्राट अकबर &lt;/a&gt;पूरे वृहत भारत का राजा बनने का सपना देखता था। उसने राजपूत घरानों से शादी करके या फिर उन्हें हराकर पूरे राजस्थान को अपने कब्जे में कर लिया था। लेकिन मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप को ये कतई बर्दाश्त नहीं था। फिर क्या था अकबर ने राजपूत सेनापति मानसिंह (जयपुर घरानें) के नेतृत्व में एक विशाल सेना मेवाड़ की और कूच कर दी। उस वक्त मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ हुआ करती थी। लेकिन युद्ध के लिये जगह चूनी गई चित्तौड़गढ़ से डेढ सौ किलोमीटर दूर हल्दीघाटी। &lt;br /&gt;&lt;P style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 7px solid; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 12pt; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 7px; MARGIN: 10px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 7px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 7px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगल सेना के सामने मेवाड़ की सेना कुछ नहीं थी, लेकिन अपनी छापेमार शैली (गुरिल्ला स्टाइल) से महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिये। &lt;/P&gt;मुगल सेना के सामने मेवाड़ की सेना कुछ नहीं थी, लेकिन अपनी छापेमार शैली (गुरिल्ला स्टाइल) से महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिये। लेकिन अचानक महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा, चेतक घायल हो गया। घायल अवस्था में ही चेतक पांच किलोमीटर दूर तक महाराणा प्रताप को लेकर रणभूमि से भाग निकला। जिस जगह चेतक ने अपने प्राण त्यागे, उस जगह उसकी याद में महाराणा ने एक स्मारक बनाया था—जो आज भी मौजूद है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान सरकार ने इस रणभूमि को पर्यटन स्थल घोषित कर रखा है। हर रोज बड़ी तादाद में लोग यहां बने म्यूजियम (महाराणा प्रताप म्यूजियम) को देखने आते हैं—हल्दीघाटी को कम लोग देखते हैं। इस म्यूजियम में हल्दीघाटी, महाराणा प्रताप की वीरता और वनवासी जीवन, चेतक की बहादुरी और छापेमार शैली (गौरिल्ला युद्ध) पर लाईट एंड साउंड शो दिखाया जाता है। इसके साथ-साथ म्यूजियम में मध्यकालीन अस्त्र-शस्त्र, अलग-अलग जातियों के वेश-भूषा और साहित्य को संजोकर रखा गया है। महाराणा प्रताप के वक्त तक मेवाड़ राज्य की राजधानी चित्तौड़गढ और कुंभलगढ़ थी। लेकिन सौगंध खाने के बाद महाराणा ने अपनी राजधानी को त्याग दिया। सौगंध थी कि जबतक वे मुगल सेना को मेवाड़ से खदेड़ नहीं देते तबतक ना तो बिस्तर पर सोएंगे और ना ही रोटी खाएंगे। मुगल सेना को आखिरकार वहां से अपना बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ा, लेकिन महाराणा प्रताप फिर कभी चित्तौड़गढ़ किले नहीं गए। उन्होंने अपनी नई राजधानी बनाई चावण्ड (उदयपुर से 50 किलोमीटर)। पूरा मेवाड़ इलाका, किलों और महलों से पटा पड़ा है और इन्हीं से जुड़ा है यहां का इतिहास। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले बात करते है यहां के सबसे खूबसूरत शहर उदयपुर की। वैसे तो कई झील है इस शहर में लेकिन सबसे खूबसूरत झील है पीछोला झील। उदयपुर के राजमहल (यानि सिटी पैलेस) के ठीक पीछे या यूं कहें कि महल इसी झील के किनारे बना है। &lt;A href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGW-KHncWI/AAAAAAAAAno/8ODxYesiww4/s1600-h/Neeraj+lake+pichola.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5305687830631510370 style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGW-KHncWI/AAAAAAAAAno/8ODxYesiww4/s320/Neeraj+lake+pichola.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; पीछोला झील के बीचों-बीच दो महल और है। एक है लेक पैलेस (ताज ग्रुप का फाइव स्टार होटल) और दूसरा है जग-निवास (मंदिर)। झील और महल तो पूरे भारतवर्ष में तो क्या दुनियाभर में हैं लेकिन उदयपुर के महल और झील को लाखों की तादाद में देशी-विदेशी पर्यटक देखने आतें है क्योकि ये एक अदभुत नजारा है। हर कोई यहीं सोचता है कि झील के बीचों-बीच महल कैसे खड़े कर दिये गये। मध्यकालीन राजस्थान के वास्तुशास्त्र का ये एक नायाब तोहफा है। उदयपुर शहर को मेवाड़ के राजा उदयसिंह ने बसाया था। कहते है कि एक बार राजा उदयसिंह शिकार खेलते हुए इस झील तक पहुंच गए। ये उस काल की बात है जब मुगल और दूसरे राजपूत राजाओं की आंख में चित्तौड़गढ और कुंभलगढ़ किलें आखों की किरकिरी बने हुए थे। लगातार हो रहें आक्रमणों से दोनो किले ध्वस्त हो गए थे। उन्ही दिनों राजा उदयसिंह एक नई राजधानी बसाने की योजना बना रहे थे। शिकार की तलाश में भटकते हुये जब राजा पीछोला झील तक पहुंच गये तो देखते है कि यहां एक ऋषि मुनि धुनी लगाए बैठे है। जैसे ही राजा ने मुनिवर को प्रणाम किया, ऋषिमुनि बोल उठे, “ राजा तुम अपने राज्य की राजधानी इसी झील के किनारे बसाओ। यहां कोई तुम्हारा बांल भी बांका नहीं कर पाएगा।”&lt;A href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGYkhP5JdI/AAAAAAAAAnw/k3X85R-vg_M/s1600-h/Nalini+neeraj+city+palace.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5305689589186897362 style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGYkhP5JdI/AAAAAAAAAnw/k3X85R-vg_M/s320/Nalini+neeraj+city+palace.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; कहते ही उस भविष्यवाणी के बाद ही राजा उदयसिंह ने अपनी राजधानी चित्तौड़गढ़ को छोड़कर यहां बस गए। उनके द्वारा खड़ा किया गया सिटी पैलेस अदभुत है। इस पैलेस के एक हिस्से को अब संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। महल के एक हिस्से में राजा के वंशज रहते हैं और एक बड़े हिस्से को होटल में तब्दील कर दिया गया है। इसी महल के एक हिस्से में महाराणा प्रताप का “ऐतिहासिक भाला रखा है”—कितनी सच्चाई है इस बात में कहा नहीं जा सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;P style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 7px solid; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 12pt; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 7px; MARGIN: 10px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 7px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 7px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने उदयपुर के महलों की सुंदरता और भव्यता को देखते हुए इन्हें “राजस्थान के विंडसर पैलेस” की संज्ञा दी है। &lt;/P&gt;प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने उदयपुर के महलों की सुंदरता और भव्यता को देखते हुए इन्हें “राजस्थान के विंडसर पैलेस” की संज्ञा दी है। लेकिन उदयपुर से भी बढ़कर एक जगह और है। वो है चित्तौड़गढ़ का किला। उदयपुर से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर है “ शक्ति और भक्ति का नगर, जहां कि मिट्टी का एक-एक कण रणबांकुरों के लहू से रंगा हुआ है। कोने-कोने से सुनाई पड़ती है देश-प्रेम, स्वाभिमान, आन-बान-शान तथा मान-मर्यादा की रक्षा हेतु मिटने वाले वीर सपूतों की कहानियां। हजारों क्षत्रियों, लाखों सैनिकों और अनगिनत योद्धाओं ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये जहां जीवन का बलिदान किया। सैकड़ो हजारों राजपूत महिलाओं ने अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राणों की आहूति दी। रानी पदमिनी के जौहर, राणा सांगा के पराक्रम, हमीरहठ व गोरा-बादल के बलिदान की गाथा सुनाने वाली ऐसी वीर प्रसूता भूमि, चित्तौड़गढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग अपने नैसर्गिक सौन्दर्य एवं स्थापत्य शिल्प के कारण सदियों से जग विख्यात है।” &lt;A href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGZAlVGzeI/AAAAAAAAAn4/DzB_lzLEggQ/s1600-h/Nalini+chittorgarh+fort.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5305690071318842850 style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGZAlVGzeI/AAAAAAAAAn4/DzB_lzLEggQ/s320/Nalini+chittorgarh+fort.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; पांच किलोमीटर से भी ज्यादा लंबे इस किले में खंण्डर हो चुके कुम्भा महल के करीब ही है मीरा मंदिर। जी हां वही मीरा, जिसने भगवान कृष्ण की भक्ति में जहर पीया तो वो भी अमृत बन गया। मेवाड़ राजघरानें की ही बहू थी मीरा और इसी किले में था उनका महल। विवाह के कुछ समय पश्चात ही मीरा के पति का निधन हो गया था। विधवा होने के बाद होने वैराग्य जीवन को अपना लिया था, जो राजपरिवार को नागवार गुजरा था। चित्तौड़गढ किले में ही दो स्तम्भ है। पहला है 122 फीट ऊंचा (नौ मंजिला) विजय स्तम्भ, जिसे राणा कुंभा ने कई राजाओं पर फतह प्राप्त करने के बाद बनवाया था। इस मीनार पर हिंदू धर्म के भगवान और सैकड़ो देवी-देवाताओं की मूर्तियां बन हुई हैं। दूसरा है कीर्ति स्तम्भ। &lt;A href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGZYnAzldI/AAAAAAAAAoA/FxVmB6Uol-c/s1600-h/Neeraj+chittorgarh.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5305690484087428562 style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGZYnAzldI/AAAAAAAAAoA/FxVmB6Uol-c/s320/Neeraj+chittorgarh.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; इस स्तम्भ को मेवाड़ राज्य के एक राजा के जैन दीवान ने बनावाया था। इस मीनार को जैन दीवान साहब ने जैन धर्म के सभी तीर्थ-स्थलों की यात्रा पूरी करने के बाद खड़ा करवाया था। सत्तर फीट ऊंच लंबे इस स्तम्भ पर जैन सम्प्रदाय के भगवान दर्शायें गए हैं। यानि एक ही किले के अंदर दो धर्मो (हिंदु और जैन) का मिलन। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्तौड़गढ़ किले और मेवाड़ राज्य का इतिहास बिना रानी पदमिनी के अधूरा है। इसी किले के अंदर है झील के किनारें बना पदमिनी महल। कहते है कि मेवाड़ राज्य की रानी पद्मिनी बेहद खूबसूरत थी। उसकी सुंदरता के चर्चे दिल्ली तक थे। फिर क्या था दिल्ली की गद्दी पर काबिज सम्राट अलाउद्दीन खिलजी का दिल उस पर आ गया। रानी को पाने के लिये अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। कई महीनें तक युद्ध चलता रहा। आखिरकार दोनों पक्षों में संधि हुई। अलाउद्दीन इस शर्त पर अपनी सेना को वापस ले जाने के लिये तैयार हुआ कि वो एक बार पद्मिनी को देखना चाहता है। राजा रतन सिंह के सामने एक तरफ मेवाड़ की जनता थी, जो कई महीनें के युद्ध के बाद थक चुकी थी। किले के अंदर का रसद-पानी खत्म होने की कगार पर था। तो दूसरी तरफ था रानी को एक गैर-धर्म के राजा के सामने खड़ा करना—जो कि राजपूती शान के खिलाफ था। ऐसे में राजा ने एक तरीका सोच निकाला। महल में एक शीशा लगा दिया गया। &lt;br /&gt;&lt;P style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 7px solid; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 12pt; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 7px; MARGIN: 10px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 7px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 7px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;उस शीशे में अलाऊद्दीन को झील के बीचो-बीच खड़ी रानी पदमिनी का अक्स (प्रतिबिम्ब) दिखाया गया। &lt;/P&gt;उस शीशे में अलाऊद्दीन को झील के बीचो-बीच खड़ी रानी पदमिनी का अक्स (प्रतिबिम्ब) दिखाया गया। ऐसे में राजा ने एक तीर से दो शिकार कर डाले। लेकिन राजपूताना के राजपूत राजा, दिल्ली के राजाओं (दिल्ली सल्तनत) की धूर्तता को ठीक से कभी नहीं पहचान पाते थे। इसका कारण शायद ये था कि राजपूत राजाओं ने युद्धभूमि में कभी—चाहे हार का सामना ही करना पड़ा—धूर्ताता का परिचय नहीं दिया था। पद्मिनी के अक्स को देखने के बाद अलाऊद्दीन ने चालाकी से उनके पति राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया। लेकिन मेवाड़ के ही एक 12 साल के वीर बालक, बादल ने अलाऊद्दीन की छावनी पर हमला बोलकर रतन सिंह को आजाद करा लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ही ढेरों रणबांकुरों की कहानियों से भरी हुई है मेवाड़ की धरती। इसी किले में ऐसी भी जगह हैं जहां सैकड़ो की तादाद में राजपूत क्षत्राणियों ने जौहर किया था। जब भी उन्हे लगा कि किले पर बाहरी राजा कब्जा कर लेगा, उससे पहले ही वे अग्नि में कूदकर अपनी जान दे देती थी। मेवाड़ के इन ऐतिहासिक स्थलों को हाल ही में मैने अपनी पत्नी के साथ करीब से देखा है। जिस मेवाड़ राज्य के साहस और वीरता की कहानियां सिर्फ पढ़ी और सुनी थी उसे देखकर मन गौरवान्वित महसूस कर रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-3933106615283084053?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/3933106615283084053/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=3933106615283084053' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/3933106615283084053'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/3933106615283084053'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/02/blog-post_22.html' title='हल्दीघाटी पीली नहीं लाल है'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SaGhry4zMCI/AAAAAAAAAoQ/ykpFoL_f_t8/s72-c/MAHARANA+PRATAP.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-2798586855855876729</id><published>2009-02-16T02:26:00.000+05:30</published><updated>2009-02-22T18:38:12.494+05:30</updated><title type='text'>राजपूतों की उत्पत्ति</title><content type='html'>&lt;A href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiCKudkN-I/AAAAAAAAAl0/J3fVRW4AabM/s1600-h/MT+ABU+4.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5303131682011101154 style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 229px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiCKudkN-I/AAAAAAAAAl0/J3fVRW4AabM/s320/MT+ABU+4.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; एक चर्चित रियलिटी शो, M.TV ROADIES में इनदिनों प्रतियोगियों को राजस्थान के प्रसिद्ध हिल स्टेशन, माउंट आबू के दर्शन कराए जा रहें हैं। या यूं कहें कि उनकी प्रतियोगिता अब वही चल रही है। अगर आपने शो देखा होगा तो आसानी समझ आ ही गया होगा कि माउंट आबू पर्यटकों को इतना लोकप्रिय क्यों है। अरावली पहाड़ियों के बीच बनी नक्खी झील, ऐतिहासिक (और अद्वितीय) दिलवाड़ा जैन मंदिर, ब्रह्मकुमारी आश्रम का हेडक्वार्टर, सन-सेट प्वाइंट (सूर्यास्त दर्शन स्थल), गुरु शिखर (राजस्थान और अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची पहाड़ी) और हनीमून प्वाइंट पर्यटकों को अपनी और अनायास ही खींच लेती है। राजस्थान-गुजरात बार्डर पर बना ये छोटा सा हिल स्टेशन इतना खूबसूरत हो सकता है ये मुझे वहां जाकर ही पता चला। कुछ दिन पहले ही मैं भी अपनी पत्नी के साथ छुट्टी मनाने माउंट आबू गया था। जितने भी पर्यटक स्थल मैने अभी बतायें हैं वो सभी मुझे वहां जाने से पहले भी पता थे। &lt;A href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiCYFfhI3I/AAAAAAAAAl8/rpsCDvxS22A/s1600-h/MT+ABU+9.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5303131911531602802 style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 151px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiCYFfhI3I/AAAAAAAAAl8/rpsCDvxS22A/s320/MT+ABU+9.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; जिस हेरिटज होटल (&lt;EM&gt;केसर भवन पैलेस&lt;/EM&gt;) में हम ठहरे थे वहां के जनरल-मैनेजर से मेरी जान-पहचान हो गई थी। उन्हें जैसे ही पता चला कि मैं राजपूत हूं, वे बोल उठे, “अगर आप राजपूत है तो गऊ-मुख जरुर घूम कर आईए।” मैने पूछा, वो क्या है ? जबाब देने से पहले जीएम साहब ने एक सवाल और दाग दिया कि मैं कौन सा राजपूत हूं। मैने बताया कि मै चौहान राजपूत हूं। उन्होंने बताया, “चौहान राजपूतों की उत्पत्ति गऊ(या 'गौ') मुख आश्रम में ही तो हुई थी।” जीएम साहब ने बताया कि गौ-मुख में ही महर्षि वशिष्ठ का प्राचीन आश्रम है जहां उन्होने अग्निकुल यज्ञ किया था और राजपूतों की उत्पत्ति हुई थी। उनके इतना कहते ही मेरे अंदर बसा इतिहास का छात्र जाग उठा। याद आया कि &lt;br /&gt;&lt;P style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 7px solid; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 12pt; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 7px; MARGIN: 10px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 7px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 7px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब &lt;EM&gt;&lt;STRONG&gt;Annals and antiquities of Rajasthan&lt;/STRONG&gt; &lt;/EM&gt;में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी। &lt;/P&gt;चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब &lt;EM&gt;&lt;STRONG&gt;Annals and Antiquities of Rajasthan&lt;/STRONG&gt; &lt;/EM&gt;में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी। 12वीं सदी में लिखी गई चंदबरदाई की &lt;STRONG&gt;&lt;EM&gt;पृथ्वीराज रासो &lt;/EM&gt;&lt;/STRONG&gt;में भी इस यज्ञ का वर्णन है। इतिहास की पढ़ाई के वक्त सब रटा था, लेकिन अब ध्यान नहीं रहा था कि अग्निकुल यज्ञ इसी जगह हुआ था। मैने उन्हें बताया कि हम वहां जरुर जायेंगे। लेकिन उन्होंने पहले ही आगाह कर दिया कि वहां ध्यान से जायेंगा, “खतरनाक जगह है।” &lt;br /&gt;जिस टैक्सी ड्राइवर ने हमे पूरा माउंट आबू घूमाया था, जब मैने उससे गऊमुख(गौमुख)चलने के लिये कहा तो वो चौंक गया। बहानें बनानें लगा, “सर वहां मत जाइए... जगंली रास्ता है... कोई नहीं जाता वहां... सैकड़ों सीढ़ियां चढनी-उतरनी पड़ेंगी।” कहने लगा, वहां आदिवासी भी रहतें है, अकेला देखकर लूट लेते हैं। मैंने पूछा आदिवासी ? जी सर, वे राजाओं की अवैध संतान होती थी, जन्म के बाद उन्हे यहां छोड़ दिया जाता था। उनकी आंखे सुनहरी होती है। लेकिन हम ठान चुके थे, वही जायेंगे। आखिरकार ड्राइवर को मानना पड़ा, लेकिन बोला कि सर मैं आपको बाहर ही छोड़ दूंगा, आपके साथ आश्रम नहीं जाऊंगा। &lt;A href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZmJ7NBJthI/AAAAAAAAAnA/cuUpbQjPfDo/s1600-h/Gaumukh.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5303421686405248530 style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZmJ7NBJthI/AAAAAAAAAnA/cuUpbQjPfDo/s320/Gaumukh.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; माउंट आबू शहर से तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर है वशिष्ठ आश्रम। लोग इसे गौमुख के नाम से जानते है। सामने ही बोर्ड लगा था, उसपर पूरे आश्रम का इतिहास और राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन था। जिस जगह टैक्सी ने हमें छोड़ा था वहां से हमें खाई में 750 सीढ़ियां उतरनी थी (लौटने पर इतनी ही चढ़नी थी)। कुछ कदम ही चले थे कि एक परिवार आता दिखाई दिया। हमें देखकर वो सभी मुस्करायें और कहा “हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं।” मैंने पूछा कि क्या वे सभी बीच रास्ते से ही लौट आये हैं, तो उन्होंने कहा कि इतने खतरनाक जंगली रास्ते पर अकेले जाना ठीक नहीं है। मेरी पत्नी को अब कुछ शंका होने लगी, बोली कि वहां जाना सुरक्षित है ? मैने कहा, डरो नहीं चलो। वाकई हम दोंनों के और एक नये नवेले पति-पत्नी के जोड़े के सिवा हमें रास्ते में कोई नहीं मिला। रास्ता बेहद खतरनाक था। लिखा हुआ था, "जंगली जानवरों से सावधान।" लेकिन जब हम वहां पहुंचे तो वहां का नजारा देखते ही बनाता था। बेहद शांत और रमणीक दृश्य था वहां का। आश्रम के बाहर ही एक पवित्र कुंड है। एक गाय के मुख से उस कुंड में लगातार जल गिर रहा था।  उस कुंड के पास ही एक स्थानीय शख्स बैठा था। उसने बताया था कि ये पवित्र सरस्वती की धारा है और बारह महीनें जल की धारा ऐसी ही चलती रहती है। ये धारा कभी बंद नहीं हुई है। “बड़े-बड़े इंजीनियर भी आजतक इस जल का स्त्रोत्र पता नहीं कर पाए।       &lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZnLKfk8rWI/AAAAAAAAAnI/NZ4rnyjtLWs/s1600-h/MT+ABU+2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZnLKfk8rWI/AAAAAAAAAnI/NZ4rnyjtLWs/s320/MT+ABU+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5303493417341070690" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आश्रम के अंदर भगवान राम का मंदिर है। रामायण में बताया गया है कि इक्ष्वाकु वंश (जिसके राम वंशज थे) के गुरु महर्षि वशिष्ठ ही थे। वशिष्ठ ऋषि के पास ही नंदिनी गाय थी जिसे छीनने के लिये राजा विश्वामित्र (बाद में महर्षि) ने उनसे युद्ध किया था। महाभारत में भी जिक्र है कि नारद मुनि ने धर्मराज युधिष्ठर को अरबुदाचल पर्वत की तीर्थ-यात्रा करने का निर्देश दिया था&lt;A href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiC75Uta1I/AAAAAAAAAmM/Yu9gdS7dI3U/s1600-h/MT+ABU+8.gif"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5303132526740335442 style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 94px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiC75Uta1I/AAAAAAAAAmM/Yu9gdS7dI3U/s320/MT+ABU+8.gif" border=0&gt;&lt;/A&gt; । पुराण और शास्त्रों के मुताबिक अरबुदाचल पर्वत हिमालय का पुत्र था और महर्षि वशिष्ठ के आग्रह पर हिमालय ने अपने पुत्र को यहां भेज दिया था। शायद यही वजह है कि रेगिस्तान में भी पर्वत श्रृंखला खड़ी हो गई। बाद में इसी अरबुदाचल पर्वत को लोग आबू के नाम से जानने लगे। मध्यकालीन युग में ये जगह अगर राजाओं के लिये पवित्र तीर्थ-स्थल था तो ब्रिटिश काल में ये जगह राजस्थान के छोटे-बड़े राजाओं और अंग्रेज अफसरों के लिये गर्मियां बिताने की खास जगह। माउंट आबू में राजस्थान के हर राज-घरानें का महल है जिन्हे अब हेरिटज होटलों में तब्दील कर दिया गया है। जिस केसर भवन पैलेस में हम ठहरें थे, वो कभी सिरोही राजाओं का महल था। माउंट आबू, राजस्थान के सिरोही जिले का ही हिस्सा है। भगवान राम के मंदिर के बाहर ही है पवित्र अग्निकुंड। मंदिर और आश्रम के एक केयर-टेकर ने बताया कि इसी यज्ञकुंड से ही चार राजपूत जातियों की उत्पत्ति हुई थी। जब भारतवर्ष में चारों तरफ मार-काट मची थी, अशांति फैली हुई थी, कानून का कोई राज नहीं था, कोई चक्रवर्ती राजा नहीं बचा था, तब महर्षि वशिष्ठ नें महायज्ञ किया था। अग्नि की स्तुति करके सबसे पहले देवराज इंद्र की पूजा की। यज्ञ करते समय अग्नि में से तलवार लियें एक पराक्रमी निकला। वो परमार वंश का संस्थापक बना। उसके बाद भगवान विष्णु का आह्ववाहन किया गया तो उसमें से चौहान वंश का संस्थापक निकला। इसी तरह से भगवान शिव से सोलंकी और ब्रह्मा से प्रतिहारों की उत्पत्ति हुई। &lt;br /&gt;&lt;P style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 7px solid; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 12pt; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 7px; MARGIN: 10px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 7px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 7px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। &lt;/P&gt;इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। आधुनिक इतिहासकार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल यज्ञ के बाद से तो मानते हैं लेकिन इस बात पर यकीन नहीं करते कि चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार अग्नि से उत्पन्न हुए हैं। इतिहासकार इस यज्ञ को एक तरह के शुद्धिकरण की तौर पर देखते है। पहली बात तो अगर हजारों साल पहले भगवान राम के समय में भी वशिष्ठ मुनि थे, तो वे क्या सैकड़ो साल तक वे जिंदा रहें इस यज्ञ को करने के लिये। इसका जबाब शायद ये है कि ऋषि मुनियों में गुरु-शिष्य पंरपरा चलती थी। एक ऋषि की मौत के बाद उसका एक शिष्य गुरु की गद्दी पर आसीन होता था और उसे भी अपनी गुरु की भांति वही नाम मिल जाता था। इतिहासकार, महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ को मध्ययुग के नवी-दसवी काल में देखते है। ये वो समय था जब भारत में अरबों ने आक्रमण करना शुरु कर दिया था। गुप्तवंश के राजाओं और हर्षवर्धन के बाद पूरे देश में कोई पराक्रमी राजा ना बचा था। ये वही वक्त था जब महमूद गजनी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत को लूटता हुआ पश्चिमी मुहाने पर बने प्राचीन सोमनाथ मंदिर तक पहुंच गया था। उसने वहां लूटपाट और तबाही का वो मंजर खेला था कि आज भी लोग सुनकर सिहर उठते हैं। हिंदु समाज में लोगो की रक्षा करने वाले क्षत्रियों का पतन तेजी से हो रहा था। पहले वैश्य राजा (गुप्त वंश) और फिर हुण और शक राजाओं (उन्हें नीची जाति का माना जाता था) के हाथों सत्ता चले जाने से ब्राहमण और क्षत्रिय समाज परेशान था। शायद इसका ही नतीजा था अग्निकुल यज्ञ। इस यज्ञ के बाद पूरे उत्तर भारत में चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार वंश का ही राज हो गया। प्राचीन आश्रम के द्वार पर ही मध्यकालीन युग के कुछ शिलालेख रखें हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि राजाओं ने दान स्वरुप कई गांव इसी आश्रम को दियें थें। जो मंदिर आज के स्वरुप में खड़ा है वो भी सन् 1394 में बनाया गया था। &lt;A href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiEGkrqTHI/AAAAAAAAAmk/VVrKXG9JNAQ/s1600-h/MT+ABU+5.jpg"&gt;&lt;IMG id=BLOGGER_PHOTO_ID_5303133809689644146 style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 285px; CURSOR: hand; HEIGHT: 211px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiEGkrqTHI/AAAAAAAAAmk/VVrKXG9JNAQ/s320/MT+ABU+5.jpg" border=0&gt;&lt;/A&gt; करीब दो घंटे आश्रम में बितानें के बाद जैसे ही हम बाहर निकले हमने देखा कि चार-पांच संदिग्ध लोग वहां टहल रहें थे। मैने गौर से देखा तो एक शख्स की आंख सुनहरी थी-होटल के जीएम और ड्राइवर की बात याद आ गई। मेरी पत्नी ने मुझे अलर्ट रहने का इशारा किया। वो समझ गई थी कि कुछ गड़बड़ है, उसे शायद खतरे का एहसास हो गया था (क्राइम रिपोर्टर जो है)। मुझे भी खतरें का अंदेशा तो था लेकिन मैं इसलिये चुप था कि कही मेरी पत्नी डर ना जायें। लेकिन इससे पहले कि वो चार-पांच लोग कुछ कर पाते या कुछ प्लानिंग कर पाते, मैं उनके पास पहुंच गया। पूछा, “ यही के रहने वाले हो क्या ?” ये सुनते ही वे सभी सकपका गये। कहने लगें, नहीं साहब हम गुजरात से आये है। मैने रोबदार आवाज में पूछा, “ गुजरात में कहां?” इतना कहते ही वे सभी बगलें झाकनें लगे। लेकिन हमारा काम हो गया था। मै समझ गया कि आश्रम से लौटते हुए सुनसान जंगली रास्ते पर वे अब हमें नहीं टकरायेंगे। अब मेरी समझ में आ गया था कि माउंट आबू के दर्शनीय स्थलों में गौमुख और वशिष्ठ आश्रम का नाम क्यों नहीं है। खैर, हम 750 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच चुके थे। वहां ड्राइवर खड़ा इंतजार कर रहा था। उसने पूछा, सर कोई दिक्कत तो नहीं हुई ? मैने कहा नहीं। शायद जो थोड़ी बहुत दिक्कत या परेशानी हमने झेली थी वो गौमुख के दर्शन मात्र के सामने बहुत छोटी जो थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-2798586855855876729?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/2798586855855876729/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=2798586855855876729' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2798586855855876729'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2798586855855876729'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/02/blog-post_15.html' title='राजपूतों की उत्पत्ति'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZiCKudkN-I/AAAAAAAAAl0/J3fVRW4AabM/s72-c/MT+ABU+4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-6535271662672841866</id><published>2009-02-15T03:54:00.000+05:30</published><updated>2009-02-15T13:09:20.005+05:30</updated><title type='text'>ब्रह्माण्ड का क्रूरतम मानव</title><content type='html'>अदालत ने जैसे ही अपना फैसला सुनाया, वो नरपिशाच बोल उठा, “मुझे ऑर्डर की कॉपी चाहिये।” किसी को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि मौत की सजा के ऐलान के बाद भी उसके तेवर ढीले नहीं पड़ेंगे। लेकिन अदालत में मौजूद सभी लोगों को समझ आ गया था कि अदालत ने उसे ब्रह्माण्ड का सबसे खतरनाक व्यक्ति ऐसे ही नहीं मान लिया है। कुछ घंटे पहले चली जिरह में सीबीआई के वकील ने उसे तीन ऐसी गुणों से ग्रस्त बताया था जो साइंस में आजतक देखने को नहीं मिला है। वो पैराफिलिया यानि साईको सैक्सयुल डिसऑर्डर, नैकरोफिलिया यानि शवों से शारारिक संबध की प्रवृत्ति और पीडोफीलिया (बच्चों से दुराचार) से ग्रस्त है। इस प्रकार का मामला पूरे यूनिवर्स में पहली बार देखनें को मिला है। कोई आदमी किसी एक से ग्रस्त होता है तो कोई किसी एक से। लेकिन सुरेन्द्र कोली तीनों से पीड़ित है। &lt;br /&gt;निठारी कांड के दोनों दोषियों, नोएडा की डी-5 कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर और उसके नौकर सुरेन्द्र कोली, को गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने सुना दी है मौत की सजा। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZdFCeRAmyI/AAAAAAAAAlc/WpT7h8FQxzI/s1600-h/NITHARI.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 258px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZdFCeRAmyI/AAAAAAAAAlc/WpT7h8FQxzI/s320/NITHARI.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5302782995038509858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;फैसला सुनाते समय अदालत ने निठारी कांड को कुछ यूं बयां किया...&lt;br /&gt;“...एक ओर तो मानवता, विधि की सुरक्षा कि पुकार कर रही है और दूसरी ओर एक निर्धन बालिका (निठारी की रहने वाली 14 साल की रिंपा हलधर जिसकी डी-5 कोठी में हत्या कर दी गई थी) के परिजन न्याय सम्मत न्यायालय से हवशी, गिद्धों से सुरक्षा के लिये चिल्ला रहे हैं और अपील कर रहें हैं कि उन्हें इस प्रकार के भूखे, वहशी, दरिंदो की भूख से बचाया जाए तथा यातनाओं एंव अमानवीयताओं से बचाये जाए, जो अबोध बालिकाओं को अपनी हवस का शिकार करने के लिये प्रयोग करते थे। रिंपा हलधर एक अबोध बालिका अभियुक्तगढ (पंढेर और कोली) के हाथों का शिकार बन गई है। दुखद, कारुणिक, रोंगटे खड़े करने वाली, दिल को तोड़नें वाली तथा धड़कनों को रोकने वाली तथा चेतना को भंग करने वाली तथा समाज की दुर्दशा करने वाले असुरक्षित, असहाय और निर्दोष, निर्धन, 14 वर्ष की अल्प आयु की अबोध बालिका की कहानी है। जिसको कम आयु में अभियुक्तगढ द्वारा उसे अपनी हवस का शिकार बनाया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई और यह सिलसिला यही नहीं थमा बल्कि उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर पॉलीथीन की पन्नियों में बंद कर फेंका गया और शरीर के कुछ हिस्से के मांस को पकाकर खाया भी गया। यह अपराध समाज के विरुद्व, स्त्रीत्व के विरुद्व, गरीबों के विरुद्व और संविधान के कल्पित सभी पीढ़ियों के विरुद्व अपराध है। यह सामाजिक न्याय शास्त्र की धारणा के साथ दिन-दहाड़े बलात्संग है।&lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; यह घटना समाज पर एक कलंक है और हमारी वर्तमान पीढ़ी पर दाग है, अमानवीय और बर्बर, विकृत, राक्षसी, वीभत्स और निर्दय ढंग से किया गया है, जिससे कि समाज में तीव्र एंव घोर आक्रोश उत्पन हो गया है। अत: मामला विरल से विरल मामलों (RAREST OF THE RARE ) की कोटि में आता है  &lt;/p&gt; यह घटना समाज पर एक कलंक है और हमारी वर्तमान पीढी पर दाग है, अमानवीय और बर्बर, विकृत, राक्षसी, वीभत्स और निर्दय ढंग से किया गया है, जिससे कि समाज में तीव्र एंव घोर आक्रोश उत्पन हो गया है। अत: मामला विरल से विरल मामलों (RAREST OF THE RARE ) की कोटि में आता है, जिससे अभियुक्तगढ के साथ उदारता का व्यवहार करना समाज एंव विधि के न्याय संगत सिद्वान्तों से खिलवाड़ करना होगा। जिस प्रकार अभियुक्तगढ द्वारा अपराध किया गया है उन्हे गुरुतर शास्ति ही दी जानी चाहिये क्योकि भविष्य में उनके आचरण में सुधार की कोई गुजांईश प्रतीत नहीं होती...।” इसलिये अदालत दोनो को मृत्यु दंड की घोषणा करती है।&lt;br /&gt;कोर्ट का ऑर्डर पढकर साफ समझ में आ जाता है कि सुरेन्द्र कोली क्यों दुनिया का सबसे क्रूर व्यक्ति है।&lt;br /&gt;निठारी कांड अब से करीब दो साल पहले, दिसम्बर 2006,में दुनिया के सामने आया था। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZdFkTHfnSI/AAAAAAAAAlk/LtloRZIlJJk/s1600-h/NITAHRI+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 160px; height: 176px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZdFkTHfnSI/AAAAAAAAAlk/LtloRZIlJJk/s320/NITAHRI+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5302783576161361186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर के बीचो-बीच बसा एक छोटा से गांव है निठारी। स्थानीय लोगों के साथ-साथ बड़ी तादाद में यहां मजदूर, रिक्शाचालक और निम्न आयवर्ग के लोग इस गांव में रहते है। बाहरी लोगों में अधिकतर बंगाल के रहने वाले हैं। वर्ष 2005 से ही यहां एक के बाद एक कई बच्चे गायब होने लगे। निठारी गांव को नोएडा के सेक्टर 31 से जोड़ने वाली सड़क से ही बच्चे रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो जाते। मां-बाप परेशान थे कि बच्चे आखिर कहां चले जाते है। अधिकतर बच्चे गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे, सो पुलिस भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। लाचार मां-बाप को सुना पड़ता कि उनके बच्चे कही भाग गये होंगे, चोर गिरोह के हाथ पड़े गये होंगे, या भीख मांगने वाला गिरोह उठाकर ले गया होगा... जो बच्चियां थोड़ी बड़ी होती (जैसे रिंपा हलधर, पायल वगैरहा) उनके बारे में पुलिस दलील देती कि वो अपने आशिक के साथ कहीं भाग गई होंगी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZdF64rxvjI/AAAAAAAAAls/i5scMDwqJTo/s1600-h/NITHARI+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 248px; height: 178px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZdF64rxvjI/AAAAAAAAAls/i5scMDwqJTo/s320/NITHARI+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5302783964202778162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; मामलें ने तूल पकड़ा तो मीडिया में लगातार खबरें आने लगी। स्थानीय अखबारों और न्यूज चैनलों ने निठारी प्रकरण को जोर-शोर से उछाला तो तब जाकर यूपी पुलिस कुंभकर्णी नींद से जागी। मानवाअधिकार आयोग और महिला आयोग ने कान खीचें तो बच्चों के गायब होने की तफ्तीश तेज हुई, लेकिन तब तक अकेले निठारी से ही डेढ़ दर्जन बच्चे काल के गाल में समा चुके थे।&lt;br /&gt;  नोएडा पुलिस को तफ्तीश का कोई सिरा हाथ नहीं आ रहा था कि अचानक एक दिन पुलिस को पता चला कि 16 साल की पायल नाम की लड़की जो गायब हुई है वो मोबाइल फोन प्रयोग करती थी। फिर क्या था पुलिस ने उस मोबाइल की आईएमईआई नंबर से उसकी लोकेशन पता कि तो मालूम पड़ा कि वो डी-5 कोठी में चालू था। डी-5 निठारी को नोएडा के सेक्टर 31 से जोड़ने वाली सड़क पर ही स्थित एक आलीशान कोठी थी (अब ये कोठी वीरान पड़ी है। चौबीसो घंटे पुलिस का पहरा रहता है कोठी पर)। कोठी का मालिक था नोएडा का एक बड़ा बिजनेसमैन, मोनिंदर सिंह पंधेर। पंधेर की पत्नी चंडीगढ, और बेटा कनाडा में रहता था। कोठी की देखभाल करता था उसका नौकर सुरेन्द्र कोली। फोन की लोकेशन मिलते ही पुलिस पहुंच गई डी-5 कोठी। वैसे पुलिस पहले भी कई बार उस कोठी में पूछताछ करने पहुंची थी लेकिन हरबार खाली हाथ लौट आती थी। लेकिन लगातार पड़ रहे दबाब के चलते इस बार पुलिस ने सुरेन्द्र कोली को अपने साथ लिया और सख्ती से पूछताछ की तो उसने पायल की हत्या की बात कबूल कर ली। सुरेन्द्र ने बताया कि पायल, मोनिंदर सिंह पंधेर से मिलने कोठी आती थी। एक दिन उसने पायल के साथ जोर-जबर्दस्ती की और नाकाम होने पर उसकी गला घोटकर हत्या कर दी। हत्या करने के बाद उसकी लाश के टुकड़े कोठी के ठीक पीछे बनी एक गैलरी&lt;br /&gt; में फेंक दिये हैं। पुलिस कोठी के पीछे बनी गैलरी में पहुंची तो पाया कि वहां पायल ही नहीं दर्जनो बच्चो और लड़कियों की मानव अंग और कपड़े दबे हुये है। &lt;br /&gt;लेकिन यहां बात गौरतलब है कि&lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; निठारी के पीड़ितो को जैसे ही गैलरी के रहस्य के बारे में पता चला उन्होंने सबसे पहले मीडिया को खबर की और कैमरे की मौजदूगी में मानव अंगो की बरामदगी हुई। निठारी पीड़ितो की माने तो अगर 29 दिसम्बर 2006 को वहां मीडिया नहीं पहुंची होती तो डी-5 कोठी के राज से पर्दा कभी नहीं उठा पाता। &lt;/p&gt; निठारी के पीड़ितो को जैसे ही गैलरी के रहस्य के बारे में पता चला उन्होने सबसे पहले मीडिया को खबर की और कैमरे की मौजदूगी में मानव अंगो की बरामदगी हुई। निठारी पीड़ितो की माने तो अगर 29 दिसम्बर 2006 को वहां मीडिया नहीं पहुंची होती तो डी-5 कोठी के राज से पर्दा कभी नहीं उठा पाता। पुलिस पायल के हत्या का मामला दर्ज कर केस फाईल वही बंद कर देती। लेकिन मीडिया की मौजदूगी की वजह से पुलिस को अपनी जांच का दायरा बढाना पड़ा और निठारी कांड का खुलासा हुआ।&lt;br /&gt;नोएडा पुलिस ने सुरेन्द्र कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर को तो गिरफ्तार कर लिया था लेकिन ये बताने में नाकाम थी कि आखिर ये दोनों हत्या किस कारण से करते थे। पुलिस मानव-अंगो की तस्करी से जोड़कर इस मामले की तफ्तीश कर रही थी। आखिरकार लोगों के आक्रोश के चलते मामले की जांच का जिम्मा देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानि सीबीआई को सौंपा गया। पांच महीने तक सीबीआई जांच करती रही और आखिरकार इस नतीजें पर पहुंची कि सुरेन्द्र कोली ही बच्चों, लड़कियों और महिलाओ को डी-5 कोठी के गेट के बाहर खड़ा होकर अंदर बुलाता था और उनसे जोर-जबर्दस्ती करता था। नाकाम होने पर उनकी बड़ी ही बेरहमी से हत्या कर देता था। लाश के टुकड़े कर उन्हें पकाता और फिर खा लेता। बाकी बची लाश के टुकड़े कर पन्नी में भरकर नालों और कोठी के पीछे बनी गैलरी में फेंक देता।&lt;br /&gt; मैजिस्ट्रेट के सामने कैमरे पर दिये अपने बयान में सुरेन्द्र कोली ने बताया कि, “ &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; जब मैडम (यानि मोनिंदर सिंह की पत्नी) घर पर नहीं होती थी तो पंधेर रोजाना कॉल-गर्ल लाता था...जितनी भी लड़की वहां आती थी मै उनके लिये खाना बनाता था, खिलाता था। उनको देख-देखकर मेरा मन भी बहक जाता था। मन करता था कि किसी को मारुं, काटूं खाओ...&lt;/p&gt;जब मैडम (यानि मोनिंदर सिंह की पत्नी) घर पर नहीं होती थी तो पंधेर रोजाना कॉल-गर्ल लाता था...जितनी भी लड़की वहां आती थी मैं उनके लिये खाना बनाता था, खिलाता था। उनको देख-देखकर मेरा मन भी बहक जाता था। मन करता था कि किसी को मारुं, काटूं खाओ...”&lt;br /&gt;सीबीआई के मुताबिक निठारी कांड को अंजाम अकेले कोली ने ही दिया था। मोनिंदर का दोष सिर्फ इतना था कि वो कोठी में कॉल-गर्ल लाता था। यही वजह थी कि सीबीआई ने कोली पर तो अपहरण, बलात्कार, हत्य़ा और सबूत मिटाने का चार्ज लगाया, लेकिन पंधेर पर वैश्यावृति में लिप्त होने का मामूली से आरोप लगया। इस बात से निठारी पीड़ितो के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा। उन्होने सीबीआई पर गंभीर आरोप लगा डाले। अदालत में उन्होंने अपना वकील खड़ा कर दिया। निठारी पीड़ितों के वकील, खालिद खान ने अदालत में दलील दी कि सुरेन्द्र कोली और मोनिंदर सिंह पंधेर दोनो ही बराबर के कसूरवार है, लिहाजा दोनों पर हत्या और बलात्कार का मुकदमा चलना चाहिये। कोर्ट ने खालिद खान की दलीलों को मंजूरी दे दी। &lt;br /&gt;करीब दो साल बाद अदालत ने मोनिंदर और कोली को बराबर का दोषी ठहराया और सुना दिया मौत का ऐलान।&lt;br /&gt;ये शायद पहला ऐसा मामला होगा कि जब अदालत ने सीबीआई की जांच को दरकिनार करते हुए अपनी जांच के आधार पर मोनिंदर को दोषी करार दिया है। जांच में सीबीआई ने लाख दलील दी थी कि मोनिंदर का कोई कसूर नहीं है। जिस वक्त रिंपा हलधर और बाकी बच्चो और लड़कियों हत्या की हई थी उस वक्त वो नोएडा तो क्या देश में ही नहीं था। उसके पासपोर्ट तक को अदालत के पटल पर रखा गया। लेकिन&lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; अपने फैसले मे अदालत ने सीबीआई की फटकार लगाते हुये कहा कि जांच एजेंसी को ये साबित करने की जरुरत नहीं है कि पंधेर नोएडा में नहीं था। ये काम आरोपी का है कि वो खुद साबित करे कि वारदात के वक्त वो मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था। &lt;/p&gt; अपने फैसले मे अदालत ने सीबीआई की फटकार लगाते हुये कहा कि जांच एजेंसी को ये साबित करने की जरुरत नहीं है कि पंधेर नोएडा में नहीं था। ये काम आरोपी का है कि वो खुद साबित करे कि वारदात के वक्त वो मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था। लेकिन पंधेर की पत्नी के सिवा ऐसा कोई स्वतंत्र गवाह नहीं मिला जो ये कह सके कि रिंपा हलधर की हत्या के वक्त पंधेर आस्ट्रेलिया में था। अदालत ने ये भी माना कि ऐसा कैसे संभव है कि कोठी में रहते हुये एक के बाद एक 19 लोगों की हत्या कर दी गई और मालिक को पता ही ना चले। साथ ही साथ लाशों की दुर्गंध भी क्या पंधेर को नहीं आती थी। खुद अदालत ने माना है कि एकाध केस में तो ऐसा भी देखने को आया है कि पंधेर की मौजूदगी में ही कोली ने किसी मासूम की हत्या कोठी में की है। साथ ही साथ पंधेर इस बात से पूरी तरफ वाकिफ था कि पायल का मोबाइल फोन कोली प्रयोग कर रहा है। क्या पंधेर ने कोली से कभी नहीं पूछा कि उसपर पायल का फोन कहां से आया है। ये सारे सबूत पंधेर के खिलाफ साबित हुये और उसे भी अपने नौकर की तरह मौत की सजा का ऐलान झेलना पड़ा।&lt;br /&gt;सजा सुनाये जाने के बाद पंधेर ने अपने बेटे से ये भी कहा कि वो हाईकोर्ट में अपील ना करे, “ वो मर जाना चाहता है। ” लेकिन दुनिया का सबसे क्रूरतम व्यक्ति (सुरेन्द्र कोली) जीना चाहता है। फैसला आते ही उसने कोर्ट स्टाफ से कहा, उसे फैसले की कॉपी चाहिये। जब तक आर्डर की कॉपी नहीं मिलेगी वो अदालत से बाहर नहीं जाएगा। कोर्ट स्टाफ ने समझाया कि ऑर्डर की कॉपी उसके वकील को मिल जायेगी। तब जाकर वो अदालत से बाहर जाने (जेल जाने) के लिये तैयार हुआ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-6535271662672841866?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/6535271662672841866/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=6535271662672841866' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/6535271662672841866'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/6535271662672841866'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='ब्रह्माण्ड का क्रूरतम मानव'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SZdFCeRAmyI/AAAAAAAAAlc/WpT7h8FQxzI/s72-c/NITHARI.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-1473422803743356597</id><published>2009-02-01T18:21:00.000+05:30</published><updated>2009-02-01T18:35:50.066+05:30</updated><title type='text'>GANDHI'S FORAY INTO JOURNALISM</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWb7H0vUrI/AAAAAAAAAk8/Edl-4oHPajM/s1600-h/GANDHI+JOURNALIST+6.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 206px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWb7H0vUrI/AAAAAAAAAk8/Edl-4oHPajM/s320/GANDHI+JOURNALIST+6.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5297811976686097074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;Much has been written on Mahatma Gandhi’s political, social and economic ideas, his role in India’s struggle for independence and upliftment of the weaker sections. But one aspect of his life that has remained untraversed is his foray into journalism.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Gandhi&lt;em&gt;ji&lt;/em&gt; was born in a period of colonialism and imperial rule. His experiences in South Africa and India changed his meek personality (who felt fear in sleeping in a dark room and was a stammer) “into a great orator and the leader of the Indian national movement.” The half-naked fakir became the most dreaded man for the English masters under the sun.&lt;br /&gt;The leader of the freedom struggle as he had turned this elite movement into a mass-movement. And for this, he used press as a toll “to establish closeness with his countrymen.” &lt;br /&gt;What Gandhi wrote is evident from the four newspapers he edited—&lt;em&gt;Indian Opinion&lt;/em&gt; (1903-1914), &lt;em&gt;Young India &lt;/em&gt;(1919-1933), &lt;em&gt;Navjivan&lt;/em&gt; (started in 1919), &lt;em&gt;Harijan&lt;/em&gt; (1933-1948)-apart from his books including autobiography (&lt;em&gt;My Experiments with truth&lt;/em&gt;) and &lt;em&gt;Hind Swaraj&lt;/em&gt;. About 75per cent of the contents of his newspapers came from his pen only.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWcqGe1PeI/AAAAAAAAAlE/n4iEmU5_s3Y/s1600-h/Navjivan.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 212px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWcqGe1PeI/AAAAAAAAAlE/n4iEmU5_s3Y/s320/Navjivan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5297812783779626466" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;Till 19 years of age, Gandhi never had the opportunity to read newspapers. It was after reaching England, he became a reader of the newspapers-“a window to the world.” Even after becoming the barrister in the initial years, he was a shy person, hesitant of speaking even in court. As ideas were evolving in his mind, they needed a vent to overflow to the outside world. Writings thus become a ‘vent’ for Gandhi. Once he started writing, his pen didn’t stop till his death in 1948.&lt;br /&gt;Gandhi never wrote anything only for creating an impression and carefully avoided exaggeration. “His aim was to serve truth, to educate people and to be useful to his country. Like every other activity, he ever took in hand, he took this one also very seriously—not merely the external discipline, code and technique of journalism but the spirit of vocation”, wrote K. Kriplani, his biographer.&lt;br /&gt;If Gandhi wrote on as complex objects as political freedom, liberty, swaraj, satyagraha, non-violence, truth, he also wrote on simple and day-to-day activities of people like vegetarian diets, cleanliness and family-planning besides social and economic reforms.&lt;br /&gt;“The sole aim of journalism”, according to Mahatma was “service”. A newspaper shouldn’t be used as a means of earning or living, he wrote, further adding , “When newspapers are made an instrument of earning not one’s livelihood but also of making profits, it leads to a number of evils.”&lt;br /&gt;The objective of newspaper, according to him (in &lt;em&gt;Hind Swaraj&lt;/em&gt;) was to “understand the popular feelings and gave expressions to them; to arouse among the people certain desirable sentiments; and to express the popular defect.” Newspapers, to him, were primarily to educate people, and to apprise them of current trends in the history of the world.”&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWdThg5lpI/AAAAAAAAAlM/3qxYYsz4dmE/s1600-h/GANDHI+1.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 230px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWdThg5lpI/AAAAAAAAAlM/3qxYYsz4dmE/s320/GANDHI+1.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5297813495410693778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;Press had played an important role in the freedom struggle of the country. As noted historian Bipin Chandra wrote in his classic account &lt;em&gt;India’s Struggle for Independence&lt;/em&gt; (Penguin, 1966): “Nearly all political controversies of the day were conducted through the press. It also played the institutional role of opposition to the British government. Almost every act and every policy of the government was subjected to sharp criticisms, in many cases with great care and vast learning back up. “Oppose, oppose, and oppose ”was the motto of the Indian press.”&lt;br /&gt;It was, thus, the newspapers which had to bear the brunt of crucial rules and restrictions (Press laws) of the British rule. Even the newspapers of the Gandhi had to face this ‘heat’. But he was for “free press”. He resisted all kinds of rules, restrictions, registration and censorship. For, these restrictions were bound to affect the objectivity and news to the readers. “Free speech, free association and free press”, according to Gandhi was “almost the whole Swaraj.”&lt;br /&gt;It was for these reasons that he wanted “fearless editors.” He wanted them “to be patient and seek for truth only.” That editor should be free, fair and objective, without any bias and prejudice.”&lt;br /&gt;The press, the fourth estate, for him was a power. A means of bringing bloodless and peaceful revolution in the society. A power which can awake millions of Indians form terror deep slumber against the mighty and cruel British empire.&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWdzZaG0QI/AAAAAAAAAlU/5FNEr5OgCDA/s1600-h/GANDHI+JOURNALIST+4.gif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 185px; height: 186px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWdzZaG0QI/AAAAAAAAAlU/5FNEr5OgCDA/s320/GANDHI+JOURNALIST+4.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5297814042990530818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;He wrote: The Press is called the fourth estate. It is definitively a power but to misuse that power is criminal. I am journalist myself and would appeal to fellow journalists to realize their responsibility and to carry on their work with no idea other than that of upholding the truth.&lt;br /&gt;More than 50 years have passed since Gandhi&lt;em&gt;ji&lt;/em&gt; wrote his ideas and philosophies including that on the nature and role of press. The question arises whether the press in India is carrying forward the ideas of the Father of the Nation.&lt;br /&gt;Barring some (objective) newspapers and magazines, many are biased—politically, ideologically, commercially or otherwise. The ratio of advertisement in comparison to news (contents) has increased in the last 10 years or so—the result of liberlisation and globalization. The newspapers have become a commodity, sold like other consumer goods. Readers are lured by quizzes, competitions, coupons, jam bola, scratch and win, whereby products from stereo to car are gifted to the “lucky” readers. Readers are again targeted by publishing sensational news. Even the newspapers, in the birth of which Gandhi was instrumental are behind in the “race of attracting readers—by price-war or otherwise—Gandhi’s view that India lives in rural areas has largely been forgotten.&lt;br /&gt;There are few ideas of Gandhiji, however, which have been kept alive by almost the whole of Indian press. First among them is freedom of press. Recently when Indian government came out with the controversial ordinance POTO (now POTA) which if implemented could have hit the journalists below the belt, the whole of the domestic press resisted the ordinance tooth and nail. The government, under pressure deleted the controversial section 3 (8) of the ordinance which dealt with journalists.&lt;br /&gt;    However, business-oriented the press could have become, it is still not considered as just another industry. &lt;br /&gt;(By Neeraj Rajput, &lt;em&gt;National Herald&lt;/em&gt;, 30 January, 2003)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-1473422803743356597?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/1473422803743356597/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=1473422803743356597' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1473422803743356597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1473422803743356597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2009/02/gandhis-foray-into-journalism.html' title='GANDHI&apos;S FORAY INTO JOURNALISM'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SYWb7H0vUrI/AAAAAAAAAk8/Edl-4oHPajM/s72-c/GANDHI+JOURNALIST+6.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-654510910439232058</id><published>2008-11-25T23:32:00.001+05:30</published><updated>2010-08-13T14:30:03.903+05:30</updated><title type='text'>कॉल-गर्ल से रुबरु</title><content type='html'>&lt;strong&gt;दिल्ली की सबसे बड़ी जिस्मफरोशी की दलाल माने जाने वाली सोनू पंजाबन से अदालत में मुलाकात हुई। कुछ साल पहले तक एक कॉल-गर्ल के रुप में काम करने वाली &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/11/blog-post.html"&gt;सोनू पंजाबन &lt;/a&gt; अब इस धंधे की एक बड़ी दलाल बन गई है। अदालत में पेशी के दौरान चलते-चलते मैने सोनू पंजाबन की ‘सीक्रेट डायरी’  के कुछ पन्ने खंगाल डाले।&lt;/strong&gt; उसने जो कुछ अपने बारे में, अपने धंधे के बारे में, और पुलिस के आरोपो के बारे में बताया, वो यहां लिख रहा हूं...&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSxBb7eXdbI/AAAAAAAAAko/44v5SY8-NQc/s1600-h/CALL+GIRL+2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 216px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSxBb7eXdbI/AAAAAAAAAko/44v5SY8-NQc/s320/CALL+GIRL+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5272661211821340082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;- सोनू ये बताओ, दिल्ली पुलिस का आरोप है कि तुम दिल्ली की सबसे बड़ी दलाल (जिस्मफरोशी की) हो। कितनी सच्चाई है इसमें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;-कुछ नहीं...झूठ बोल रहें हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;-सोनू ये बताओ, पुलिस का कहना है कि तुम्हारे गैंगस्टर्स से काफी रिश्ते रहें हैं...शादी की है आपने..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;-नहीं ऐसा कुछ नही है। शादी हुई थी लेकिन EXPIRE (मौत) हो गये थे मेरे हस्बैंड (पति)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;-कौन थे आपके पति?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;-विजय (गैंगस्टर विजय, जिसकी पुलिस के हाथो मुठभेड़ में मौत हो गई थी।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;- हेमंत सोनू से आपके क्या संबध थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;- FRIEND (दोस्त) थे वो मेरे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;-...और दीपक ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;- नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है सब झूठ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;-आपके साथ जो दलाल पकड़े गये थे वो कौन थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;- वो मेरे घर में बर्थ-डे था, तो वैसे आये थे वो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;-और जो लड़कियां पकड़ी गई थी, कॉल-गर्ल थी बाहर से आई थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;-कॉल-गर्ल नही है बर्थ-डे पर आई थी उस रात को। उन्होने (पुलिस ने) वैसे ही रेड (छापा) कर दी घर पर। झूठ है सब।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;-तो जो पुलिस का कहना है कि दिल्ली के जिस्मफरोशी की सबसे बड़ी दलाल तुम हो  वो गलत है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;-बिल्कुल गलत है, बदमाशों से मेरा लिंक (रिश्ता) करके मेरा नाम बढ़ा दिया है...ऐसा कुछ नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज राजपूत&lt;/strong&gt;-अच्छा ये बताईये पुलिस का कहना है कि आप लड़कियों को सैलरी देती है उसमें कितनी सच्चाई है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोनू पंजाबन&lt;/strong&gt;-झूठ बोल रहे हैं। लड़कियां कुछ नहीं बोल रही हैं। ये (पुलिस) अपने आप बना रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-654510910439232058?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/654510910439232058/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=654510910439232058' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/654510910439232058'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/654510910439232058'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/11/blog-post_25.html' title='कॉल-गर्ल से रुबरु'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSxBb7eXdbI/AAAAAAAAAko/44v5SY8-NQc/s72-c/CALL+GIRL+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-9031018685393967016</id><published>2008-11-23T23:46:00.002+05:30</published><updated>2011-04-04T22:40:55.220+05:30</updated><title type='text'>सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल-गर्ल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSmeojWxxhI/AAAAAAAAAkY/A29svqmyUAc/s1600-h/CALL+GIRL+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 256px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSmeojWxxhI/AAAAAAAAAkY/A29svqmyUAc/s320/CALL+GIRL+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5271919258336609810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुलिस-वैन से उतरने के अंदाज से ही लगता था कि वो कोई आम लड़की नहीं है। दर्जनों पुलिसवालों की कस्टडी में वो उतरी तो चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। बल्कि बड़े रौब के साथ वैन से उतरकर चली तो मीडिया और वकीलों का जमावड़ा देखकर वो मुस्कुरा रही थी। अखबार और टी.वी चैनल के कैमरे जब उसकी एक झलक लेने के लिये बेताब थे तो वो पुलिसवालों से कहती सुनाई दी, “क्या कर रहे हैं ये ?”  &lt;/strong&gt;दर्जनों कैमरे, पत्रकारों, वकीलों और पुलिसवालों की मौजूदगी में उसे अदालत में पेश किया गया तो हर किसी की जुबान पर उसकी ही चर्चा थी। “अरे भाई साहब, क्या वाकई ये लड़की दिल्ली का सबसे बड़ा कॉल-गर्ल रैकेट चलाती है,” एक वकील ने पूछा। दूसरे ने कहा, आजकल इसका किससे ‘लफड़ा’ चल रहा है?  सुना है चार-चार बदमाशों से इसने शादी की थी।&lt;br /&gt;  करीब एक साल पहले जब सोनू पंजाबन नाम की उस कॉल गर्ल को अपनी तीन साथियों के साथ प्रीत विहार इलाके से पकड़ा गया था तो उसका चेहरा ढका हुआ था। लेकिन इस बार (21 नबंबर 2008) जब उसे राजधानी दिल्ली के पॉश साकेत इलाके से गिरफ्तार किया गया और बाद में अदालत में पेश किया गया तो उसे छोड़कर बाकी सभी लड़कियों का चेहरा ढका हुआ था। &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSme2p7irkI/AAAAAAAAAkg/kt3UA4rihFA/s1600-h/CALL+GIRL.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSme2p7irkI/AAAAAAAAAkg/kt3UA4rihFA/s320/CALL+GIRL.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5271919500619591234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; साफ था अब सोनू पंजाबन कॉल-गर्ल मात्र नहीं थी। अब वो बन गई है जिस्मफरोशी के धंधे की एक बड़ी दलाल (कहना गलत ना होगा कि, सबसे बड़ी दलाल)।  बड़ी दलाल इस मायने में क्योकिं उसके साथ दस और दलाल गिरफ्तार किये गये हैं। सोनू पंजाबन को मिलाकर कुल पंद्रह लोग (चार कॉल-गर्ल और दस दलाल)। &lt;br /&gt;&lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; दिल्ली पुलिस की मानें तो ये दस दलाल अब सोनू पंजाबन के लिये काम करते थे। यानि अब वो बन गई है “दलालों की दलाल”। &lt;/p&gt; दिल्ली पुलिस की मानें तो ये दस दलाल अब सोनू पंजाबन के लिये काम करते थे। यानि अब वो बन गई है “दलालों की दलाल”। एक साल में इतनी तरक्की शायद ही किसी धंधे में हो। और वो भी 30 साल की एक लड़की को। सुनकर हैरानी जरुर होती है।&lt;br /&gt;   हरियाणा के रोहतक जिले की रहने वाली गीता अरोड़ा नाम की ये लड़की कभी जिस्मफरोशी और गुनाह की दुनिया की इतनी बड़ी खिलाड़ी बन जाएगी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। लेकिन ये हकीकत है। करीब पांच साल पहले गीता अरोड़ा का नाम उस वक्त सामने आया था, जब दिल्ली के एक व्यापारी की लाश उसकी ही गाड़ी में रोहतक के बहादुरगढ़ इलाके में पड़ी मिली थी। जांच में पाया गया कि उस व्यापारी को  एक कॉल-गर्ल ने ही बहादुरगढ़ बुलाया था। लेकिन पुलिसिया जांच में वो खूबसूरत बाला आसानी से पाक साफ निकल गई। कहते है कि वो कॉल-गर्ल कोई और नहीं खुद गीता अरोड़ा थी।  उसके बाद से गीता गुमनामी की जिंदगी बीता रही थी। इसी बीच उसकी दोस्ती रोहतक के एक बदमाश विजय से उसकी हो गई। कहते हैं कि दोनों ने शादी भी कर ली थी। लेकिन बदकिस्मती से विजय जल्द ही यूपी पुलिस के हाथों मारा गया। इसके बाद गीता की दोस्ती हुई दिल्ली-हरियाणा के एक बदमाश दीपक से। दीपक और उसका भाई हेमंत दिल्ली और आस-पास के इलाकों में कार चोरी करते थे। लेकिन कार चोरी करते-करते वे दोनों कब एक कुख्यात गैंग के सरगना बन गये किसी को कानों-कान खबर नहीं लगी। पुलिस पीछे पड़ी तो दीपक असम भाग गया, लेकिन एक मुठभेड़ में वो भी वहीं ढ़ेर हो गया। &lt;br /&gt;दीपक के छोटे भाई, हेमंत सोनू को जब ये पता चला कि उसके भाई की मुखबरी दिल्ली के ही दो भाईयों ने की थी, तो उसने दिन-दहाड़े दोनों भाईयों का कत्ल कर दिया। इस दोहरे हत्याकांड के बाद तो हेमंत सोनू दिल्ली के गुनाह की दुनिया का बेताज बादशाह बन गया। इसके साथ-साथ हेमंत ने अपने भाई की महबूबा गीता अरोड़ा को भी अपना लिया। कुछ लोग तो यहां तक मानते है कि हेमंत ने गीता से शादी रचा ली थी (हालांकि जब गीता से पकड़े जाने पर ये सवाल पूछा गया तो वो इस बात से साफ मुकर गई) हेमंत के साथ गीता भी दिल्ली आ गई। यहां &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; हेमंत के संरक्षण में गीता का जिस्मफरोशी का धंधा चल निकला। अब गोरी चमड़ी के इस धंधे में लोग उसे सोनू पंजाबन (‘सोनू’, हेमंत सोनू की वजह से और ‘पंजाबन’ उसकी जाति, अरोड़ा की वजह से) बुलाने लगे।   &lt;/p&gt; हेमंत के संरक्षण में गीता का जिस्मफरोशी का धंधा चल निकला। अब गोरी चमड़ी के इस धंधे में लोग उसे सोनू पंजाबन (‘सोनू’, हेमंत सोनू की वजह से और ‘पंजाबन’ उसकी जाति, अरोड़ा की वजह से) बुलाने लगे। पहले दीपक और अब हेमंत सोनू से नजदीकियों के चलते सोनू पंजाबन धीरे-धीरे गुनाह की दल-दल में भी फंसती जा रही थी। उसने दिल्ली में सक्रिय जिस्मफरोशों के बड़े दलालों (कंवलजीत, अंकित धीर, रितिका ठाकुर) को किनारे लगाना शुरु कर दिया। कुछ दलालों (जैसे बॉबी हिजड़ा) को उसने अपने खेमें मे शामिल कर लिया।&lt;br /&gt;सोनू पंजाबन ने अब लड़कियों को अपने यहां काम पर रख लिया। इन लड़कियों को वो ग्राहक के पैसो में हिस्सा नहीं देती थी, बल्कि उन्हें एक मुश्त सैलेरी देती थी। यूं कहे तो &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt;  उसके काम करने का तरीका बिल्कुल कॉर्पोरेट स्टाइल तो था ही उसने इस धंधे को एक तरह से संगठित अपराध (ORGANISED CRIME) की शक्ल दे दी थी।  &lt;/p&gt; उसके काम करने का तरीका बिल्कुल कॉर्पोरेट स्टाइल तो था ही उसने इस धंधे को एक तरह से संगठित अपराध (ORGANISED CRIME) की शक्ल दे दी थी। उसके धंधे में लड़कियों साथ-साथ लड़के भी नौकरी पर रख लिया। हर किसी का काम बंटा हुआ था। कोई लड़कियों को एस्कार्ट करता था, तो कोई उनका ड्राइवर बनकर उन्हे बड़े-बड़े ग्राहकों के पास छोड़कर आता था। सोनू का बिजनेस चल निकला। पुलिस के मुताबिक वो एक ग्राहक से एक रात के पांच हजार से लेकर पचास हजार तक वसूलती है। &lt;br /&gt;           सोनू अपने धंधे को बढ़ा ही रही थी कि अचानक हेमंत सोनू को वर्ष 2006 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गुड़गांव में बड़े ही नाटकीय अंदाज में ढेर कर दिया। हेमंत के मारे जाने के बाद सोनू पंजाबन ने उसके ही गैंग के दूसरे सदस्य (और अब मुखिया) अशोक उर्फ बंटी का हाथ थाम लिया। लेकिन इसे इत्तेफाक कहेंगे या कुछ और कि दो महीने बाद ही बंटी में राजधानी के दिलशाद गार्डन इलाके में पुलिस के हत्थे मुठभेड़ में मारा गया।&lt;br /&gt;एक के बाद एक सोनू पंजाबन के चार बदमाश दोस्त मारे जा चुके थे। अब तो हर किसी की जुबान पर यही चर्चा थी कि सोनू पंजाबन ही इन चारों बदमाशों के मारे जाने की वजह बनी है। दिल्ली पुलिस में ये बात जोरों पर थी कि इन सभी बदमाशों की मुखबरी सोनू पंजाबन ने ही की थी। लेकिन क्यों?  &lt;br /&gt;कुछ लोगों की माने तो सोनू ये सब दो कारणों से करती थी। पहला, बदमाशों के मारे जाने के बाद उनकी लाखों की बेनामी संपत्ति की मालकिन खुद सोनू पंजाबन बन जाती थी। इस वक्त सोनू पंजाबन के नेब सराय, गीता कालोनी और कुछ दूसरे इलाकों में फ्लैट है। दूसरी वजह ये कि बदमाशों की मुखबरी कर वो पुलिस से हाथ मिलाना चाहती थी। खैर हकीकत जो भी हो सोनू पंजाबन की बदमाशों से दोस्ती और उनके पुलिस के हाथों मारे जाने के चलते लोग उसे ‘विष-कन्या’ का खिताब देने से भी नही चूकें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-9031018685393967016?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/9031018685393967016/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=9031018685393967016' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/9031018685393967016'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/9031018685393967016'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='सीक्रेट डायरी ऑफ ए कॉल-गर्ल'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SSmeojWxxhI/AAAAAAAAAkY/A29svqmyUAc/s72-c/CALL+GIRL+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-2684857717999765334</id><published>2008-10-11T18:52:00.000+05:30</published><updated>2008-10-11T19:09:02.431+05:30</updated><title type='text'>आरटीआई वाला हत्यारा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SPCqMptWUjI/AAAAAAAAAkA/YxYbXhrFaDo/s1600-h/HANGING.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SPCqMptWUjI/AAAAAAAAAkA/YxYbXhrFaDo/s320/HANGING.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5255887899472581170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तिहाड़ जेल में बंद एक बलात्कारी, सूचना के अधिकार (यानि आरटीआई) को हथियार बनाकर दिल्ली पुलिस की खाट खड़ी करनी की तैयारी में जुटा था। वो अपने आप को बेगुनाह साबित करने के लिये एक आम शहरी की ही तरह राजधानी दिल्ली के कश्मीरी गेट थाने से आरटीआई के तहत एक जानकारी इकठ्ठा करना चाहता था। लेकिन जबतक उसे सूचना प्राप्त होती, वो बलात्कारी के साथ-साथ बन गया तीन बेकसूर लोगों का हत्यारा।&lt;br /&gt;    तिहाड़ जेल में बंद था राजधानी के मोतिया खान इलाके का एक प्रॉपर्टी डीलर के के सेठ। इल्ज़ाम था एक मासूम लड़की की अस्मत लूटने का। इस गुनाह में अपने पति की सहभागी बनने वाली के के सेठ की पत्नी, उषा को भी जेल भेजा गया था। लिहाजा दोनों पति पत्नी जेल की सलाखों के पीछे ही थे कि एक दिन के के सेठ अखबार के पन्ने पलट रहा था कि उसकी नजर एक इश्तेहारे-शोरे-गोगा (अपील) पर पड़ी। कश्मीरी गेट थाने ने अखबार में एक अज्ञात महिला की लाश की पहचान के लिये जनता से मदद मांगी थी।  पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक उस महिला के हाथ पर ‘वजीरो’ लिखा था। यानि महिला का नाम (वजीरो) तो पुलिस को पता था लेकिन उसके अलावा पुलिस को उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उसकी लाश कुछ दिनों पहले कश्मीरी गेट बस अड्डे के पास एक बक्से में पड़ी मिली थी। तब से ही पुलिस उस महिला की पहचान और उसके कातिल को तलाश कर रही थी।&lt;br /&gt;    &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; जेल में बंद के के सेठ ने जैसे ही पुलिस के विज्ञापन को पढ़ा, वो बलात्कार के मामले में खुद को बेगुनाह साबित करने में जुट गया। के के सेठ ने पुलिस से आरटीआई के तहत मामले की तफ्तीश के बारे में पता करने की कोशिश की। &lt;/p&gt;जेल में बंद के के सेठ ने जैसे ही पुलिस के विज्ञापन को पढ़ा, कि बलात्कार के मामले में खुद को बेगुनाह साबित करने में जुट गया। के के सेठ ने पुलिस से आरटीआई के तहत मामले की तफ्तीश के बारे में पता करने की कोशिश की। पहली बार तो पुलिस ने उसकी अपील ये कहते हुये खारिज कर दी कि वजीरो नाम की महिला के हत्यारों का कोई अता-पता नहीं चला है। लेकिन के के सेठ कहां चुप बैठने वाला था। उसके कुछ महीनों बाद एक बार फिर आईटीआई लगा दी पुलिस के आला-अधिकारियों के दरबार में। इस बार पुलिस ने के के सेठ से पूछताछ करने का मन बनाया। सो पहुंच गये तिहाड़ जेल कि भई उसे इस अज्ञात लाश की तफ्तीश में इतनी दिलचस्पी क्यों है ?  के के सेठ ने बताया कि जिस वजीरो नाम की महिला की लाश कश्मीरी गेट इलाके में पड़ी मिली है, उसी की बेटी के बलात्कार के इल्जाम में ही वो जेल में हवा खा रहा है।  उसने बताया कि जिस शख्स ने वजीरो की हत्या की है उसी ने वजीरो की बेटी की आबरु लूटी है। उसने अपने बेगुनाह होने की दलील भी पुलिस के सामने रख दी। इस खुलासे के बाद तो मानों पुलिस को वजीरो की हत्या की तफ्तीश में दिशा मिलती दिखाई पड़ी। &lt;br /&gt;   पुलिस अब वजीरो की बेटी की तलाश में जुट गई। पता चला कि वजीरो की बेटी इनदिनों अपने पति के साथ हरियाणा के रेवाड़ी शहर में रहती है। वजीरो की बेटी ने जो कुछ बताया, उसके आधार पर पुलिस ने कड़ी से कड़ी मिलानी शुरु कर दी।  &lt;br /&gt;    &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SPCrwIvoBbI/AAAAAAAAAkQ/ZeujmsureEg/s1600-h/MURDRER.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SPCrwIvoBbI/AAAAAAAAAkQ/ZeujmsureEg/s320/MURDRER.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5255889608610678194" /&gt;&lt;/a&gt; पूरा मामला शीशे की तरह साफ हो चुका था। पुलिस ने जिस शख्स की मदद से वजीरो की हत्या का मामला खोल दिया था वही था कत्ल का असल हत्यारा यानि कि के के सेठ। पुलिस ने वजीरो और उसके दो मासूम बेटो की हत्या के आरोप में भी के के सेठ को गिरफ्तार कर लिया। पूरा मामला कुछ यूं था...&lt;br /&gt;    राजधानी के सीलमपुर इलाके में वजीरो नाम की एक गरीब महिला अपने नाबालिग बेटी और दो बेटों के साथ रहती थी। पेट भरने के लिये चारो बंग्लासाहिब गुरुद्वारे जाते थे। एक रोज उनकी मुलाकात प्रॉपर्टी डीलर के के सेठ और उनकी पत्नी उषा से हुई। दोनों ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में वजीरो को फंसा लिया और अपने घर ले आए। एक दिन वजीरो की बेटी सो कर उठी तो उसने पाया कि उसकी मां और दोनो भाई घर पर नहीं हैं। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; लड़की ने अपनी मां और भाईयों के बारे में के के सेठ और उषा से पता किया, तो दोनों ने बताया कि वजीरो ने उसे 75 हजार रुपये में बेच दिया है। &lt;/p&gt;लड़की ने अपनी मां और भाईयों के बारे में के के सेठ और उषा से पता किया, तो दोनों ने बताया कि वजीरो ने उसे 75 हजार रुपये में बेच दिया है। और मां और भाई उसे छोड़कर वहां से चले गए हैं। इसके बाद तो मानों वजीरो की बेटी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। के के सेठ उससे जबर्दस्ती करता। लेकिन एक दिन वजीरो की बेटी किसी तरह उसके चंगुल से भाग खड़ी हुई और पुलिस को पूरा मामला बताया। पुलिस ने के के सेठ और उसकी पत्नी उषा को बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।&lt;br /&gt; पुलिस के मुताबिक, के के सेठ ने अपनी हवस की आग बुझाने से पहले वजीरो और उसके दो मासूम बेटों का भी कत्ल कर दिया था। दोनों बच्चों की लाश को उसने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ट्रैक पर फेंक दी थी। वजीरो की लाश को उसने बक्से में बंद कर कश्मीरी गेट बस अड्डे पर फेंक दी थी। उसके बाद के के सेठ ने वजीरो की बेटी को बेचने की झूठी कहानी सुना दी। &lt;br /&gt;    जब पुलिस ने वजीरो की लाश के बारे में अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कराया, तो के के सेठ अपनी बेगुनाही साबित करने पर जुट गया। वो पुलिस को ये मानने के लिये मजबूर करने लगा कि वजीरो का कातिल वही है जिसने उसकी बेटी का बलात्कार किया है। वजीरो की बेटी ने उसे गलत फंसाया है। यानि वजीरो की बेटी की इज्जत उसने नहीं लूटी है। लेकिन पुलिस की कड़ी पूछताछ में के के सेठ टूट गया और अपना गुनाह कबूल कर लिया।&lt;br /&gt;   दिल्ली पुलिस भी मानती है कि अगर के के सेठ ने आरटीआई नहीं लगाई होती तो उन्हें वजीरो और उसके दो मासूम बेटों के हत्यारे का कभी पता नहीं चलता। यानि आरटीआई आम लोगों के लिये ही कारगार साबित नहीं हुई है पुलिस को भी एक मामले की गुत्थी सुलाझाने में एक अहम सुराग के तौर पर साबित हुई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-2684857717999765334?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/2684857717999765334/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=2684857717999765334' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2684857717999765334'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/2684857717999765334'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='आरटीआई वाला हत्यारा'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SPCqMptWUjI/AAAAAAAAAkA/YxYbXhrFaDo/s72-c/HANGING.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-6063136459369854369</id><published>2008-08-24T19:13:00.002+05:30</published><updated>2011-01-15T19:35:04.233+05:30</updated><title type='text'>रॉ सेक्स स्कैंडल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SLFmUGfTB0I/AAAAAAAAAZ4/OA47gXCktFw/s1600-h/JAMES+BOND.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SLFmUGfTB0I/AAAAAAAAAZ4/OA47gXCktFw/s320/JAMES+BOND.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5238080337133897538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;“तुम तो अभी हसीन हो, जवां हो। तुम्हारे चेहरे पर कितना नूर है। अपने लिये कोई आदमी क्यों नहीं ढूंढ लेती, जो तुम्हे खुश रख सके। या एक काम करो तुम रात को मेरे पास होटल में आ जाना। एक रात मेरे साथ होटल में बिताने के मैं तुम्हें तीस हजार रुपये दूंगा।”&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;ये बात-चीत है हमारे देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी, रॉ के दो अधिकारियों के बीच की। लेकिन ये कोई जासूसी भाषा नहीं है। बल्कि ये शब्द कहे हैं रॉ के एक सीनियर अधिकारी ने अपने साथ काम करने वाली महिला अधिकारी से। ये गंभीर आरोप लगाए हैं खुद उसी महिला अधिकारी ने। जबसे ये बातचीत सार्वजनिक हुई है, सबसे बड़ी गुप्तचर एजेंसी में चल रहे सेक्स स्कैंडल का पर्दाफाश हो गया है। ऐसा कम ही होता है कि रॉ जैसी खुफिया एजेंसी के अंदर चल रहे गड़बड़ झाले का लोगों को पता चले सके। लेकिन रॉ ट्रैनिग इंस्टीटयूट की डायरेक्टर निशा प्रिया भाटिया ने जबसे ये खुलासा किया है गुप्तचर एजेंसी के मुंह पर तो मानों कालिख पुत गई है।&lt;br /&gt;    रॉ यानि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Research_and_Analysis_Wing"&gt;RESARCH AND ANALYSIS WING (RAW) &lt;/a&gt;, सीधे तौर से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के अंतर्गत काम करने वाली खुफिया एजेंसी है। इसका काम है दूसरे देशों की जासूसी करना--यानि खुफिया जानकारी इकठ्ठा करना। जिस तरह अमेरिका की &lt;em&gt;सीआईए&lt;/em&gt; है और ब्रिटेन की &lt;em&gt;एमआई-6&lt;/em&gt;, इस्रायल की &lt;em&gt;मोसाद&lt;/em&gt; और पूर्व सोवियत संघ की &lt;em&gt;केजीबी&lt;/em&gt;, वैसे ही भारत की सीक्रेट सर्विस एजेंसी है &lt;em&gt;रॉ&lt;/em&gt;। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; अगर आप जेम्स बांड (&lt;em&gt;एमआई-6 एजेंट 007&lt;/em&gt;) की फिल्में देखते हैं तो बस समझ लीजिये रॉ के अधिकारी भी बहुत कुछ वैसा ही काम करते है। भारत में रॉ के जासूसो पर बनी फिल्में गिनी-चुनी ही है। जैसे धर्मेन्द्र की &lt;em&gt;आंखें&lt;/em&gt;, देव आन्नद की &lt;em&gt;प्रेम-पुजारी&lt;/em&gt;, सन्नी देओल की &lt;em&gt;हीरो-लव स्टोरी ऑफ ए स्पाई &lt;/em&gt;और &lt;em&gt;16 दिसम्बर &lt;/em&gt; &lt;/p&gt; अगर आप जेम्स बांड (एमआई-6 एजेंट 007) की फिल्में देखते है तो बस समझ लीजिये रॉ के अधिकारी भी बहुत कुछ वैसा ही काम करते है। भारत में रॉ के जासूसों पर बनी फिल्में गिनी-चुनी ही है। जैसे धर्मेन्द्र की &lt;em&gt;आंखें&lt;/em&gt;, देव आन्नद की &lt;em&gt;प्रेम-पुजारी&lt;/em&gt;, सन्नी देओल की &lt;em&gt;हीरो-लव स्टोरी ऑफ ए स्पाई &lt;/em&gt;और &lt;em&gt;16 दिसम्बर &lt;/em&gt;। वैसे यहां ये बात दीगर है कि रॉ के काम-काज करने के तरीके से लेकर उसके हेडक्वार्टर और उसमें काम करने वाले जासूसों के बारे में लोगों को कम ही पता चलता है। उससे जुड़ी घटनायें (विवाद) कम ही सार्वजनिक होते हैं। लेकिन निशा भाटिया स्कैंडल से रॉ की काफी छीछालेदर हुई है। आम लोगों तक को पता चल गया कि रॉ का हेडक्वार्टर दिल्ली के लोदी कॉलोनी इलाके में है और उसके चीफ हैं ए के चतुर्वेदी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SLFmdzU6aPI/AAAAAAAAAaA/Omjded25rbU/s1600-h/RAW+HEADQUARTER.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SLFmdzU6aPI/AAAAAAAAAaA/Omjded25rbU/s320/RAW+HEADQUARTER.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5238080503788759282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;   आरोप है कि चालीस साल की तलाकशुदा महिला अधिकारी, निशा प्रिया भाटिया को उनके महकमें के एक सीनियर ऑफिसर ने अपने साथ होटल में रात बिताने का ऑफर किया था। इसकी शिकायत जब निशा ने अपने चीफ &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ashok_Chaturvedi"&gt;ए के चतुर्वेदी &lt;/a&gt;से की तो उन्होने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। निशा का आरोप है कि चतुर्वेदी साहब तक ने उनसे अश्लील बातें कर डाली। निशा ने पीएमओ से शिकायत की। लेकिन &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; जब इंसाफ मिलता नहीं दिखा तो हारकर निशा ने पीएमओ यानि साउथ ब्लॉक के अंदर जहर खाकर अपनी जान देनी चाही। पीएमओ में आत्महत्या की कोशिश से प्रधानमंत्री कार्यालय तक हिल कर रह गया। &lt;/p&gt; जब इंसाफ मिलता नहीं दिखा तो हारकर निशा ने पीएमओ यानि साउथ ब्लॉक के अंदर जहर खाकर अपनी जान देनी चाही। पीएमओ में आत्महत्या की कोशिश से प्रधानमंत्री कार्यालय तक हिल कर रह गया। फिर क्या था...मीडिया तक बात पहुंच गई। अंतर्राष्ट्रीय अखबारो तक में ये मामला सुर्खियों में छा गया है। निशा ने मीडिया के सामने अपने विभाग का काला चिठ्ठा खोल कर रख दिया। जिस महकमें में मीडिया (प्रेस) से बात करने तक पर सजा मिलती है, उसके अंदर चल रहे यौन शोषण के मामले ने तूल पकड़ लिया। चतुर्वेदी साहब को जबाब देना भारी पड़ रहा है। पहले दिन तो पीएमओ ने बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी कि &lt;blockquote&gt;निशा की दिमागी हालत ठीक नहीं है और उनकी शिकायत पर एक जांच कमेटी बिठाई गई थी लेकिन खुद निशा ने जांच में सहयोग नहीं दिया। &lt;/blockquote&gt; अब इसका बात का जबाब किसी के पास नहीं है कि दिमागी तौर से बीमार एक महिला को रॉ ट्रैनिंग इस्टीटयूट का डायरेक्टर कैसे बना दिया गया। इस घटना के दो दिन बाद ही निशा का तबादला गुड़गांव ट्रेनिग सेंटर से हेडक्वार्टर में कर दिया गया। निशा को ये बात नागवार गुजरी कि जिन अधिकारियों के खिलाफ उन्होंने शिकायत की अब उन्हीं के साथ एक ही छत के नीचे वो कैसे काम कर सकतीं है। अब निशा ने ऑफिस जाना बंद कर दिया है।&lt;br /&gt;  निशा का ये भी आरोप है कि जब उसने ए के चतुर्वेदी और एक अन्य अधिकारी के खिलाफ पुलिस मे (यौन शोषण) की शिकायत करानी चाही तो पुलिस अधिकारियों ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया। साफ है जिस हेडक्वार्टर के अंदर कोई पुलिसवाला भी नहीं जा सकता उसके चीफ के खिलाफ कोई पुलिसवाला कैसे पंगा ले सकता है। हारकर अब निशा भाटिया अदालत का दरवाजा खटखटाने का विचार बना रही है।&lt;br /&gt;  सवाल ये खड़ा होता है कि रॉ जैसी गुप्तचर एजेंसी में ये सब क्या हो रहा है? गोपनीयता के नाम पर वहां महिला जासूसों को क्या इसी तरह प्रताड़ित होना पड़ता है? क्या यही वजह है कि हमारे देश के जासूस आतंकवाद और दूसरी समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुंच पा रहें हैं। क्या यही वजह है कि दूसरे देश के जासूस हमारे देश में आकर आराम से खुफिया जानकारी चुरा कर ले जाते है और रॉ को पता तक नहीं चलता है। क्या इस देश में कोई रॉ जैसी खुफिया एजेंसियों से कोई सवाल-जबाब नहीं कर सकता है। प्रधानमंत्री क्यो इस मामलें पर चुप्पी साधें हुये है। &lt;br /&gt; लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब रॉ विवादों में रही है। करीब दस साल पहले रॉ के एक अधिकारी की उनके नोएडा स्थित फ्लैट में हुई रहस्यमय मौत की गुत्थी आजतक नहीं सुलझी है। बताते है कि ललित मोहन अपने घर में अकेले थे और सिगेरट पी रहे थे। कुछ देर बाद उनके बाथरुम से धुआं उठता दिखाई दिया। पुलिस मौके पर पहुंची तो देखा कि ललित मोहन की जली हुई लाश बाथरुम में पड़ी है। &lt;br /&gt;खुद जिस रॉ हेडक्वार्टर में बिना इजाजत के परिंदा भी पर नहीं मार सकता है उसके अंदर करीब पांच साल पहले लिफ्ट में फंस कर एक सीनियर अधिकारी, विपिन हांडा की मौत हो गई थी। गौरतलब है कि विपिन हांडा मौत से दो महीने पहले ही पाकिस्तान सरकार के विरोध के चलते इस्लामाबाद स्थित हाई कमिशन (दूतावास) से वापस बुलाये गये थे।&lt;br /&gt;     &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; रॉ अधिकारी रबिन्द्र कुमार को कौन भुला सकता है। वे तो बाकयदा रॉ में रहते हुये अमेरिका के लिये जासूसी करते थे। जैसे ही ये खबर विभाग को लगी और पुलिस उन्हें पकड़ पाती, वर्ष 2004 में वे विदेश भाग गये। &lt;/p&gt; रॉ अधिकारी रबिन्द्र कुमार को कौन भुला सकता है। वे तो बाकयदा रॉ में रहते हुये अमेरिका के लिये जासूसी करते थे। जैसे ही ये खबर विभाग को लगी और इसे पहले की पुलिस उन्हे पकड़ पाती, वर्ष 2004 में वे विदेश भाग गये। खबर है कि वे इनदिनों अमेरिका के सरकारी मेहमान बन गये है। हद तो तब हो गई जब एक बांग्लादेशी अपनी पहचान (दीवान चंद मलिक) छिपाकर दस सालों तक रॉ के लिये काम करता रहा। हमारी खुफिया एजेंसी को उसकी असलियत तब पता चली जब वो कुछ महत्वपूर्ण और गोपनीय दस्तावेज लेकर बांग्लादेश भाग गया। दीवान चंद मलिक के खिलाफ दिल्ली के लोदी कालोनी थाने में मामला दर्ज है और उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया है।&lt;br /&gt;     इन सब कारनामों के बाबजूद रॉ को पसंद नहीं है कि कोई उनके बारे में बात करे या लिखे। यही वजह थी कि वर्ष 2007 में जब एक पूर्व रॉ अधिकारी, मेजर जनरल (रिटायर्ड) वी के सिंह ने रॉ पर किताब &lt;em&gt;(India's External Intelligence: Secrets of Research and Analysis Wing R&amp;AW&lt;/em&gt;) लिख डाली तो बवाल मच गया। उनके घर पर सीबीआई की रेड डाली गई। उनके किताब जब्त कर ली गई। वी के सिंह पर OFFICIAL SECRET ACT के तहत मामला दर्ज कर दिया गया।&lt;br /&gt;निशा भाटिया स्कैंडल ने रॉ की साख पर बट्टा लगा दिया है जिसे धो पाने में हमारे देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी को एक लंबा वक्त लग सकता है। जरुरत है देश के जासूसों का मनोबन ऊंचा रखने की। क्योंकि जिस दिन हमारे देश के जासूसों का मनोबल गिरा तो समझो देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। हमारा देश को तो पहले से ही आंतकवाद और सीमापार घुसपैठ से दो-चार होना पड़ा रहा है। ऐसे में खुफिया एजेंसियां बजाय इन विवादों में पड़ने के अपना काम ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और एकाग्रता से करे। और हां किसी महिला (खासतौर से तलाकशुदा) की इज्जत से खिलवाड़ बिल्कुल ना करे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-6063136459369854369?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/6063136459369854369/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=6063136459369854369' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/6063136459369854369'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/6063136459369854369'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/08/blog-post_24.html' title='रॉ सेक्स स्कैंडल'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SLFmUGfTB0I/AAAAAAAAAZ4/OA47gXCktFw/s72-c/JAMES+BOND.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-1517279330438484421</id><published>2008-08-19T14:58:00.000+05:30</published><updated>2008-08-24T14:14:50.483+05:30</updated><title type='text'>सूरज अस्त, नेपाल मस्त</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvOHgPTqvI/AAAAAAAAAZo/YNTLguWE-po/s1600-h/kATHMANDU.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvOHgPTqvI/AAAAAAAAAZo/YNTLguWE-po/s320/kATHMANDU.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236505620056877810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मौज मस्ती करनी है सर... कैसी मस्ती ? वही... कौनसी वही ? लड़की वाली सर, और कौनसी... दिनभर का काम खत्म करने के बाद शाम को मै और मेरा साथी कैमरामैन काठमांडू के एक जाने-माने पांच सितारा होटल के बाहर घूमने निकले तो हमें सड़क पर एक लड़के के इन्ही सवालो से रुबरु होना पड़ा। &lt;/strong&gt; राजदरबार के ठीक सामने वाली सड़क के किनारे ही वो लड़का हमें टकराया था। उस लड़के की बात सुनकर हमें हंसी भी आ रही थी और हैरानी भी हो रही थी। उस लड़के की उम्र महज दस साल थी। इतनी छोटी सी उम्र में ही वो जिस्मफरोशी के धंधे का दलाल बन गया था। लड़के से बात करने के बहाने मेरे साथी कैमरामैन ने उससे रेट लिस्ट भी पता कर ली। लेकिन मैने उन दोनो की बात-चीत को बीच में ही रोका और लड़के को वहां से चलता कर दिया।&lt;br /&gt;पिछले छह सात-महीने में &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/07/blog-post_29.html"&gt;चार्ल्स शोभराज  &lt;/a&gt;के केस के चलते मेरा काठमांडू आना-जाना कई बार हो चुका है। इन यात्राओं के दौरान मुझे नेपाल और खासतौर से काठमांडू के बारे में जाने का अच्छे से मौका मिला। काठमांडू के थामेल इलाके (दिल्ली के पहाड़गंज की तरह ये इलाका भी होटलगंज के नाम से मशहूर है) के बारे में तो थोड़ा-बहुत सुन रखा था। विदेशी सैलानियों के बीच ये इलाका खासा मशहूर है। &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvIrTElCHI/AAAAAAAAAZA/Jx516HE3Irs/s1600-h/kATHAMNDU+DANCE+BAR.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvIrTElCHI/AAAAAAAAAZA/Jx516HE3Irs/s320/kATHAMNDU+DANCE+BAR.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236499637927741554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सैकड़ो की तादाद में होटल और उन्ही के बीच तंग गलियों में जिस्मफरोशी के अड्डे। छोटे-बड़े लड़के इन्ही गलियों में ग्राहको को तलाशते आसानी से मिल जाते है। डांस बार के नाम पर इन अड्डो में वो सबकुछ होता है जो पर्यटक यहां आने पर चाहते है। डांस बार के नाम भी ऐसे कि कोई भी उनकी और आकृषित हो जायें—कोबरा, रैन डांस, टकीला और ना जाने क्या-क्या। &lt;br /&gt;हाल ही प्रकाशित एक न्यूज रिपोर्ट की माने तो अकेले काठमांडू में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा वेश्यावृति के धंधे में लिप्त है। इसका एक बड़ा कारण है नेपाल में बेरोजगारी। हर साल सैकड़ो की तादाद में नेपाली लड़कियों की भारत और दूसरे देशो में तस्करी की जाती है। रोजगार की तलाश में क्या लड़के और क्या बच्चे और बूढे भारत सिर्फ और सिर्फ नौकरी की तलाश में आते है (भारत के चर्चित &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/06/blog-post.html"&gt;आरुषि-हेमराज हत्याकांड &lt;/a&gt;में नेपाली नौकरो की भूमिका को कौन भूल सकता है)। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; पिछले कई सालो से अस्थिरता की मार झेल रहे नेपाल में रोजमर्रा की वस्तुओं के लाले पड़ गये है। पैट्रोल पंप पर गाड़ियों की लंबी लाईन, बाजार में सब्जियों की कमी, गैस की किल्लत, सड़को पर भारी ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं ने नेपाल के आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है।  &lt;/p&gt; पिछले कई सालो से अस्थिरता की मार झेल रहे नेपाल में रोजमर्रा की वस्तुओं के लाले पड़ गये है। पैट्रोल पंप पर गाड़ियों की लंबी लाईन, बाजार में सब्जियों की कमी, गैस की किल्लत, सड़को पर भारी ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं ने नेपाल के आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। पिछले कई महीनो से नेपाल में अस्थाई सरकार काम कर रही है। सभी राजनैतिक पार्टियों के नेता जल्द ही सरकार बनाने का भरोसा तो दिला रहे है लेकिन आपसी सामंजस्य की वजह से ये काम टलता जा रहा है। इसका खामियाजा आम आदमी को सहना पड़ रहा है। वर्ष 2001 में राजदरबार में हुये नरसंहार (जिसमें नेपाल के सबसे चहेते राजा वीरेन्द्र का पूरा परिवार मारा गया था) के बाद से तो मानो इस हिमालय-राष्ट्र में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पहले माओवादियो का आंदोलन फिर आम चुनाव में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत ना मिलना। ऐसा लगता है कि नेपाल को ग्रहण लग गया है। माओवादी भले ही अब आंदोलन का रास्ता छोड़कर प्रचंड (नये प्रधानमंत्री) के नेतृत्व में मुख्यधारा से जुड़ गये हो लेकिन उनके द्वारा बेघर लोग अभी भी सैकड़ो की तादाद में अपनी मांगो के लिये सड़को पर मार्च करते दिख जाते है।&lt;br /&gt;पिछले कुछ सालो में नेपाल के अपने पड़ोसी और कभी सबसे करीबी मित्र-राष्ट्र, भारत से रिश्तो में भी खटास आ गई है। ये बात जरुर है कि हाल ही में हुये चुनावो के बाद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद पर दो भारतीय मूल के शख्स ही चुने गये है। बाबजूद इसके, नेपाली लोगो का भारत के प्रति दृष्टिकोण में कोई सुधार नही हुआ है। इसका ताजा उदाहरण सामने तब आया जब नेपाल के उपराष्ट्रपति ने हिंदी में शपथ ली। ये बात वहां के लोगो को इतनी नागवार गुजरी की वे सड़को पर उतर आये। जगह-जगह हड़ताल और बंद घोषित कर दिया गया। लोगो का गुस्सा तभी शांत हुआ जब उपराष्ट्रपति ने नेपाल की जनता से माफी मांगी। जानकारों का तो ये भी मानना है कि नेपाल में बदहाली का एक बड़ा कारण भारत से हुये खराब रिश्ते ही है। दरअसल जब तक भारत के नेपाल से मधुर संबध थे तबतक सभी जरुरत का सामान आसानी से मिल जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। उम्मीद यही है कि प्रंचड के नेतृत्व वाली सरकार जल्द ही नेपाल की स्थिति को सुधार देगी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKqS0gtdJJI/AAAAAAAAAYQ/BpXA0d6RVL8/s1600-h/CASINO+2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKqS0gtdJJI/AAAAAAAAAYQ/BpXA0d6RVL8/s320/CASINO+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236158947603063954" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इतनी खस्ता हालात के बाबजूद काठमांडू के कैसिनो (casino) को कौन भुला सकता है। हर साल हजारो की तादाद में विदेशी पर्यटक सिर्फ और सिर्फ काठमांडू के कैसिनो में मौज-मस्ती और पैसा कमाने (या लुटाने) के इरादे से ही आते है। एक ही रात में यहां के कैसिनो में लाखो-करोड़ो के वारे-न्यारे हो जाते है। एक ही ऐसी शाम को हम अपने होटल पहुंचे तो देखा की होटल के अंदर बड़ी तादाद में पुलिस बल मौजूद है। कुछ मीडियाकर्मी भी कवरेज के लिये पहुंचे हुये थे। समझते देर ना लगी कि कुछ गड़बड़ झाला है। दरअसल कैसिनो के अंदर कुछ सटोरियें मोटी रकम हार गये थे और कैसिनो के कर्मचारियों से हाथा-पाई पर उतर आये थे। कर्मचारियों से पता किया तो उन्होने बड़ी इत्मीनान से कहा, "ये तो साहब यहां रोजमर्रा की बात है। जो आदमी लाखो गवांयेगा तो गुस्सा तो आयेगा ही। फिर ऊपर से दारु का नशा।" इन कैसिनो की खास बात ये है कि यहां कस्टमर को फ्री शराब पिलाई जाती है। यानि एक हाथ में जाम और दूसरे में नेपाली रुपया और डालर। जाम पे जाम पीते जाओ और पैसा लुटाते जाओ। शराब के नशे में जितना जी चाहे उतना लुटाओ। &lt;br /&gt;यहां ये बाद दीगर है कि वर्ष 2003 में जब &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2007/11/blog-post_27.html"&gt;चार्ल्स शोभराज &lt;/a&gt;को काठमांडू में गिरफ्तार किया गया था तो वो उस वक्त एक पांच सितारा होटल के कैसिनो में ही सट्टा लगा रहा था।&lt;br /&gt;शराब से याद आया कि काठमांडू में कुछ मिले या ना मिले, शराब बहुत आसानी से मिल जाती है। देशी, विदेशी, इंडियन ब्रांड सबकुछ यहां मिल जाती है और वो भी बहुत कम दामों में। चाहे कोई डिपार्टेमेंटल स्टोर हो या फिर रेस्त्रा, मिठाई की दुकान या फिर चाय की दुकान, सब जगह दारु 'खुली' मिलती है। शराब पीने पर कोई रोक-टोक नही है। नेपाल में रहने वाले एक जानकार से पता किया तो उसने बताया कि यहां एक कहावत मशहूर है, “ सूरज अस्त, नेपाल मस्त ।” &lt;br /&gt;इन सबके बाबजूद मुझे काठमांडू शहर काफी पसंद आता है। इसका कारण इस शहर का ऐतिहासिक महत्व। काठमांडू शहर तीन भागो में बांटा जा सकता है—काठमांडू शहर, भक्तापुर और पाटन। इन तीनो जगहों पर नेपाल के शासको ने ऐसी-ऐसी लकड़ी की इमारतें बनावाई जिनकी छंटा देखते ही बनती है। काठमांडू शहर के बीचो-बीच है दरबार स्कवायर और हनुमान ढोका। &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvJnASmSZI/AAAAAAAAAZY/1d2OH6usvC0/s1600-h/KATHMANDU+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvJnASmSZI/AAAAAAAAAZY/1d2OH6usvC0/s320/KATHMANDU+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236500663678421394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; मौजूदा दरबार (जिसे अब म्यूजयिम में तब्दील कर दिया गया है और जहां राजा वीरेन्द्र के पूरे परिवार का नरसंहार किया गया था) से पहले नेपाल के शासक इसी दरवार स्कावयर के महल में रहते थे। कहते है कि नेपाल के मल्लाह और शाह राजा (इन दोनो राज घरानो ने ही नेपाल में ज्यादातर समय में राज किया है) रोज शाम को इसी महल की सातवी मंजिल से खड़े होकर पूरे काठमांडू शहर का जायजा लिया करते थे। राजा देखता था कि हर घर में चूल्हा जल रहा है या नही। अगर नही तो वो खुद उस घर में जाकर पूछता था कि चूल्हा क्यो नही जल रहा है। शायद यही वजह थी कि नेपाल के राजा अपनी जनता में बहुत लोकप्रिय थे। लेकिन बकौल एक दुकानदार, "सर आज के नौजवान नेपाल की हर पुरानी चीज खत्म करने पर तुले है। वे जगह-जगह लगी राजाओ की मूर्तियो के स्थान पर आज के नेताओ की मूर्ति लगाने की कवायद में जुटे है। नेपाली लोग अपने इतिहास को संभालने में नाकाम नजर आ रहे है।" राजा के इस पुराने महल को भी अब म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है। महल सहित यहां की अधिकतर इमारतें लकड़ी की है। इन्ही में से एक काष्ठमंडप (यानि एक ही पेड़ की लकड़ी से बना दरबार)। इस ‘काष्ठमंडप’ के नाम से ही नेपाल की राजधानी का नाम काठमांडू पड़ा है। काष्ठमंडप के करीब ही है ‘कुमारी मंदिर’। दरबार स्कावायर और हनुमान ढोका में कई मंदिर है। लेकिन सभी बंद रहते है। हमारे ड्राइवर ने बताया कि ये सभी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलतें है। दशहरा के मौके पर राजा ही यहां के मंदिर के कपाट खोलते है। अगर आपने सत्तर के दशक में देव आनंद की फिल्म ‘हरे कृष्णा हरे रामा’ देखी हो तो आसानी से पता चल जायेगा कि उसकी अधिकतर शूटिंग इस शहर और यहां के मंदिरो की है। हिप्पी कलचर के अवशेष अब भी यहां देखे जा सकते है। मुझे लगता है कि चार्ल्स शोभराज भी इसी हिप्पी कलचर को तलाशता हुआ वर्ष 2003 में यहां आया था। सत्तर के दशक में चार्ल्स शोभराज भी इसी संस्कृति का एक अहम हिस्सा था। कहते है कि उसने दुनिया के कई देशो में &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2007/11/blog-post_27.html"&gt;हिप्पी स्टाईल &lt;/a&gt;पापुलर किया था। खैर अब यहां के इन मंदिरो और उनकी बड़ी-बड़ी सीढियों पर बड़ी तादाद में प्रेमी जोड़े बैठे दिख जायेंगे। शाम के वक्त यहां भारी भीड़ रहती है।&lt;br /&gt;हनुमान ढोका और दरबार स्कवायर से मिलता-जुलता शहर है भक्तापुर। काठमांडू शहर के बाहरी हिस्से में बना ये शहर भी यूनस्को द्वारा ‘सरंक्षित इलाका’ घोषित किया जा चुका है। शहर से बाहर होने की वजह से ये बेहद खूबसूरत लगता है। भीड़ भी कम रहती है। इमारतें लगभग एक जैसी ही है। राजा का घर हो या दरबार या फिर मंदिर, सभी ठीक उसी स्टाइल में बने है जैसे हनुमान ढोका और दरबार स्कवायर में। कहते है जब यहां राजशाही थी तो तीनो शहर—काठमांडू, भक्तापुर और पाटन—के राजाओं में एक दूसरे से अच्छी इमारत बनानी की होड़ लगी रहती थी। शायद यही वजह है कि तीनों जगह की इमारतें बनाने की कला एक जैसी है। ड्राइवर ने बताया कि पाटन शहर भी ठीक वैसा ही है जैसा भक्तापुर। अगली बार काठमांडू जाना हुआ तो पाटन भी जरुर जाउंगा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvJEs_Tl7I/AAAAAAAAAZI/UAJMXNsO-Vw/s1600-h/KATHMANDU+PASHUPATINATH.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvJEs_Tl7I/AAAAAAAAAZI/UAJMXNsO-Vw/s320/KATHMANDU+PASHUPATINATH.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236500074381678514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अरे हां, काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर को कैसे भुलाया जा सकता है। भगवान शिव के पांचमुखी मंदिर की भव्यता देखती ही बनती है। ये मंदिर बागमती नदी के किनारे बना है। हिंदुओ के साथ-साथ दूसरे धर्म के लोग दूर-दूर से इस मंदिर को देखने आते है। लेकिन ना तो किसी दूसरे धर्म के लोग और ना ही विदेशी इस मंदिर के परिसर में दाखिल हो सकते है। विदेशियों के लोग बागमती नदी के उसपार एक जगह बनाई गई है। वे सभी वहां से खड़े होकर इस मंदिर के दर्शन कर सकते है। इसी नदी के नाम पर नेपाल के एक सूबे का नाम बागमती है। काठमांडू इसी बागमती सूबे के अंतर्गत आता है। &lt;br /&gt;काठमांडू के मंदिर देखकर मेरे कैमरामैन ने अचानक एक सवाल दाग दिया, “नीरजजी, यहां के मंदिर इतने सालो से इतने सुरक्षित क्यो है? हमारे देश के मंदिर तो एकदम खस्ताहाल में नजर आते है।” मैने जबाब दिया, “क्योकि नेपाल पर कभी भी किसी बाहरी देश ने ना तो आक्रमण किया और ना ही ये देश कभी किसी का गुलाम रहा है।” इस बात का इतिहास गवाह है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-1517279330438484421?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/1517279330438484421/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=1517279330438484421' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1517279330438484421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1517279330438484421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='सूरज अस्त, नेपाल मस्त'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SKvOHgPTqvI/AAAAAAAAAZo/YNTLguWE-po/s72-c/kATHMANDU.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-4437453255936777561</id><published>2008-07-29T13:03:00.003+05:30</published><updated>2011-10-18T22:17:47.828+05:30</updated><title type='text'>चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SI7JONjJuFI/AAAAAAAAAX4/jKjDv9ixoHg/s1600-h/CHARLES+SHOBRAJ+6.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SI7JONjJuFI/AAAAAAAAAX4/jKjDv9ixoHg/s320/CHARLES+SHOBRAJ+6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5228337463416174674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पिछले हफ्ते मेरी मुलाकात चार्ल्स शोभराज से काठमांडू जेल में हुई। खबर थी कि जेल के अंदर दुनिया के सबसे खतरनाक अपराधी से एक करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी गई है। लेकिन चार्ल्स शोभराज तो &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2007/11/blog-post_27.html"&gt;चार्ल्स शोभराज &lt;/a&gt;ठहरा, सो साफ मना कर दिया किसी भी रंगदारी देने को। &lt;/strong&gt;लेकिन रंगदारो को मालूम था कि चार्ल्स को अपनी जान की फ्रिक तो है नहीं। क्योंकि इन दिनो चार्ल्स की जान तो कही और बसी हुई है। जी हां, उन्होनें चार्ल्स की मंगेतर &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2008/07/blog-post.html"&gt;निहिता बिस्वास &lt;/a&gt;को धमकी देनी शुरु कर दी। बस उसके बाद से ही चार्ल्स की जान पर बन आई है। &lt;br /&gt;दिन था बुधवार...तारीख थी 23 जुलाई... जगह...काठमांडू सेंट्रल जेल...मुलाकाती नंबर था 26... बीस मिनट हुई इस खास-बातचीत में चार्ल्स ने अपने दिल के कई राज़ खोल दिये। इस दौरान चार्ल्स की मंगतेर निहिता और उसका इंटरप्रेटर भी मौजूद था। चार्ल्स ने मेरे से अंग्रेजी में बातचीत की। इस इंटरव्यू के दौरान जेल स्टाफ भी मौजूद था। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt;  बातचीत में चार्ल्स शोभराज पहले की तरह यंग और डायनैमिक (चुस्त-दुरस्त) दिखाई पड़ा। कही से भी देखने में ये नहीं लगता है कि पिछले तीस सालों में उसने अधिकतर समय जेल में ही बिताया है--पिछले पांच साल से वो काठमांडू की जेल में बंद है। &lt;/p&gt; बातचीत में चार्ल्स शोभराज पहले की तरह यंग और डायनैमिक (चुस्त-दुरस्त) दिखाई पड़ा। कही से भी देखने में ये नही लगता है कि पिछले तीस सालों में उसने अधिकतर समय जेल में ही बिताया है--पिछले पांच साल से वो काठमांडू की जेल में बंद है। एक और खास बात उससे बात करने में ये नजर आई कि वो ना तो जेल प्रशासने से डरता है और ना ही जेल में सक्रिय माफिया से। लेकिन वो चिंतित है अपनी महबूबा निहिता और उसके परिवार के लिये। जेल में चार्ल्स ने जैसे ही निहिता को देखा, उसकी  खुशी का ठिकाना नहीं रहा। निहिता को देखते ही उसने कहां... HOW ARE YOU MY DARLING? HOW IS YOUR MOTHER?  यानि कैसी हो मेरी महबूबा। तुम्हारी मां कैसी हैं... निहिता ने धीरे से कहां... “सब ठीक है।” इसके बाद शुरु हुई मेरे से बातचीत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज राजपूत--- मैं नीरज राजपूत हूं। स्टार न्यूज, दिल्ली से।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- (खुशी से) ओह हो स्टार। GREAT ( बढिया)... मैने जेल में तुम्हारा प्रोग्राम देखा था जिसमें निहिता से बातचीत दिखाई गई थी।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत --- जेल में तुम कैसे हो।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- मै बढिया हूं।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत ---  निहिता से मंगनी पर आप खुश हैं।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज— &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; निहिता से मंगनी मेरी जिंदगी का यादगार लम्हा है। मै बहुत बढ़िया महसूस कर रहा हूं। लेकिन निहिता और उसके परिवार के लिये मैं चिंतित हूं... निहिता ने धमकियों के बारे में आपको बताया होगा। &lt;/p&gt; निहिता से मंगनी मेरी जिंदगी का यादगार लम्हा है। मै बहुत बढिया महसूस कर रहा हूं। लेकिन मैं निहिता और उसके परिवार के लिये चिंतित हूं... निहिता ने धमकियों के बारे में आपको बताया होगा।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत —हां... तो क्या आपको भी धमकी मिल रही है।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज—बिल्कुल... जेल में मेरी जान को खतरा है। मुझे यहां कुछ भी हो सकता है। लेकिन मै निहिता के लिये चिंतित हो। तुम तो शायद अच्छी तरह जानते होंगे कि  चार्ल्स किसी से नहीं डरता।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत --- तुमने इन धमकियों के बारे में जेल प्रशासन से शिकायत की है ? &lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- यहां ये एक बड़ी समस्या है। मुझे जेलर से नही मिलने दिया जाता।  ना ही जेलर यहां हमसे जेल में मिलने आता है। उसे यहां पर एक साल हो गया है लेकिन वो कभी कैदियों से नहीं मिलता। यहां पर कैदियों का एक गैंग है जो इस जेल को संचालित कर रहा है। जो भी शिकायत मैं जेल प्रशासन को लिखता हूं, वो पहले इसी गैंग के पास पहुंचती है। यही वजह है कि मेरी शिकायत कभी भी सही आदमी तक नहीं पहुंच पाती।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत --- सुप्रीम कोर्ट में तुम्हारी हत्या के मामले में भी सुनवाई चल रही है। कितना यकीन है कि आप छूट जायेंगे।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज—मै जल्द से जल्द जेल से बाहर आना चाहता हूं। (खुशी से) जब से निहिता मेरी जिंदगी में आई है, तब से और भी जल्दी निकलना चाहता हूं।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत --- क्या आप अभी भी ये मानते हो कि 1975 में तुम नेपाल नही आये थे।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- बिल्कुल... मैं 1975 में नेपाल नही आया था। मैने कोई मर्डर नही किया है।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत --- उन लैटरर्स का क्या है जो आपने "LIFE AND CRIME OF CHARLES SHOBRAJ" किताब के लेखक को दिये थे। उसमें तो आपने खुद कबूल किया था कि 1975 मे नेपाल आये थे।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- तुम LIFE AND CRIME OF CHARLES SHOBRAJ और  SERPENT किताब को गौर से पढ़ना। कही भी ये नहीं लिखा है कि चार्ल्स 1975 में नेपाल आया था। जो कुछ भी किताब में लिखा है वो सबकुछ पुलिस के हवाले से लिखा गया है। “ POLICE HAS SAID….”&lt;br /&gt;नीरज राजपूत ---लेकिन निचली अदालत ने तुम्हारे खिलाफ फैसला सुनाया था।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज---इसीलिये तो मैने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है। पुलिस और सरकारी वकील के पास मेरे खिलाफ कोई भी सबूत नहीं है। सबूत के नाम पर सिर्फ उनके पास सिर्फ भारत के एक न्यूज-पैपर (&lt;strong&gt;&lt;em&gt;नवभारत टाईम्स&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;, 13 जुलाई 1976) की किलिपिंग (कतरनें) हैं जो 1976 में छपी थीं। उस अखबार में छपा था कि दिल्ली में एक ऐसा गैंग पकड़ा गया है जिसने अफगानिस्तान, थाईलैंड, टर्की, ग्रीस और नेपाल में कई पर्यटकों की हत्या की है। इस अखबार की कतरन के अलावा नेपाल पुलिस के पास मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है।&lt;br /&gt;स्टार न्यूज--- सुप्रीम कोर्ट में 10 अगस्त को अगली सुनवाई है ना।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- हां... और मुझे लगता है कि 10 या फिर 12 अगस्त तक सबकुछ पूरा हो जायेगा।&lt;br /&gt;नीरज राजपूत --- तुम्हारा मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना देगी।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- हां... क्योकि अदालत में बहस पूरी हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को साफ मना कर दिया है कि अब वो अदालत में कोई और सबूत ना पेश करे। पिछली सुनवाई में सरकारी वकील अदालत में पासपोर्ट थ्योरी ले आये थे। लेकिन अदालत ने उन्ही परमिशन नहीं दी। &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt;  हर बार पुलिस कभी किसी फर्जी कागजात को सामने ले आती है कभी कुछ। (कागजात दिखाते हुये) इन होटल के पेपरर्स को देखो। ये सब फर्जी हैं। आप खुद देख लीजिये कि पुलिस ने कैसे इन पेपरर्स को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है।  &lt;/p&gt; हर बार पुलिस कभी किसी फर्जी कागजात को सामने ले आती है कभी कुछ। (कागजात दिखाते हुये) इन होटल के पेपरर्स को देखो। ये सब फर्जी हैं। आप खुद देख लीजिये कि पुलिस ने कैसे इन पेपरर्स को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। निहिता ने ये पेपरर्स आपके स्टार न्यूज पर दिखाये भी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(इस बीच जेल स्टाफ चार्ल्स को बातचीत खत्म करने का आदेश देता है)&lt;br /&gt;जेल स्टाफ---चलिये अंदर चलियें। आपकी मुलाकात का वक्त खत्म हो गया है।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- (एक मुलाकाती की तरफ इशारा करते हुये)... ये महिला हमारे से पहले से (जेल में बंद) अपने रिश्तेदार से बातचीत कर रही है। फिर तुम मुझे कैसे बोल सकते हो बातचीत खत्म करने के लिये।&lt;br /&gt;जेल स्टाफ---ठीक है थोडी देर और कर लीजिये बात।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- (स्टार न्यूज से बातचीत में) यहां पर मुलाकात का वक्त 20 मिनट है। लेकिन जब से मेरी मंगनी निहिता से हुई है, ये मुझे पांच-सात मिनट से ज्यादा नहीं मिलने देते। बाकी कैदी यहां एक-एक दो-दो घंटे तक मुलाकात कर सकते हैं। लेकिन मुझे नहीं करने देते।&lt;br /&gt;निहिता--- ( मेरे से) आज आप हमारे साथ आये हो इसलिये हमे बीस मिनट मिलने दिया है नहीं तो हमे जल्दी भगा देते हैं। ये सब हमारी मंगनी के बाद से शुऱु हुआ है।&lt;br /&gt;जेल स्टाफ--- मिलने का टाईम खत्म हो गया है।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- अभी तक मैं पत्रकार से मुलाकात कर रहा था। अब मैं अपने घरवालों से बात करुंगा।&lt;br /&gt;निहिता--- बिल्कुल&lt;br /&gt;जेल स्टाफ--- नही-नही टाईम खत्म हो गया है। चार्ल्स अब तुम अंदर चलो।&lt;br /&gt;निहिता--- ओके...अब हम जा रहे है।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज--- BYE-BYE… BYE  निहिता।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;(मुलाकात खत्म होते ही निहिता की आंख छलक पड़ती है)&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-4437453255936777561?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/4437453255936777561/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=4437453255936777561' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/4437453255936777561'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/4437453255936777561'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/07/blog-post_29.html' title='चार्ल्स शोभराज से खास बातचीत'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SI7JONjJuFI/AAAAAAAAAX4/jKjDv9ixoHg/s72-c/CHARLES+SHOBRAJ+6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-1439412329550658444</id><published>2008-07-06T20:00:00.000+05:30</published><updated>2008-07-06T21:17:11.148+05:30</updated><title type='text'>आज रात भगवान कृष्ण आ रहें हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SHDo3ZZ0LTI/AAAAAAAAAXw/28Zn4glLAU8/s1600-h/KRISHNA+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SHDo3ZZ0LTI/AAAAAAAAAXw/28Zn4glLAU8/s320/KRISHNA+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219928006532017458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज रात भगवान श्रीकृष्ण इस वन में आएंगे और गोपियों के साथ रास-लीला मनाएंगे। कृष्णजी के साथ राधा भी यहां आएंगी। दिन में जो ये आप वृक्ष देख रहे है, रात में ये गोपियों में तब्दील हो जायेंगे... तो क्या रात में भगवान कृष्ण की इस रास-लीला को हम भी देख सकेंगें।&lt;/strong&gt; नहीं साहब नहीं, भूलकर भी ऐसी गलती मत कीजियेगा। जिसने भी इस वन में रात को भगवान की रास-लीला देखने की भूल की है, वो यहां से जिंदा बाहर नहीं निकला है। रात में तो ये वन बंद कर दिया जाता है। आप सिर्फ बांसुरी और घुंघरुओं की आवाज सुन सकते है।&lt;br /&gt;ये कहानी नहीं हकीकत है। वृंदावन (या बृंदावन) शहर के बीचो-बीच एक ऐसा वन (वाटिका कहना ज्यादा ठीक रहेगा) है, जिसमें लोग मानतें हैं कि रात में भगवान श्रीकृष्ण यहां आते हैं और गोपियों के साथ रास-लीला रचाते हैं। ये वन यमुना नदी से भी ज्यादा दूरी पर नहीं है। इस वाटिका को लोग ‘निधि-वन’ के नाम से जानते है। बृज-भूमि में यमुना नदी के किनारे भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली (मथुरा) है, उनका गांव नंदगांव है, गोकुल है, गोवर्धन पर्वत है, ये सब जानकारी थी। लेकिन वृंदावन में एक ऐसा वन है जहां अभी भी कृष्णजी रास-लीला रचाते है सुनकर आश्चर्य जरुर हुआ। ये सब जानकारी मुझे वृंदावन जाकर ही लगी थी। दरअसल इन वनों (निधि-वन इत्यादि) के कारण ही इस छोटे से शहर का नाम वृदांवन पड़ा था। &lt;br /&gt;ये तो मुझे मालूम था कि जहां ये पूज्यनीय स्थल है वहां कभी घने वन हुआ करते थे। मान्यता ये है कि यमुना नदी के किनारे इन्हीं वनों में कदंब वृक्षों पर भगवान कृष्ण राधा और दूसरी गोपियों के साथ क्रीड़ा किया करते थे। घंटो-घंटो इन्हीं वृक्षों की डाल पर बैठकर माखन-चोर कृष्ण बांसुरी बजाया करता थे और आस-पास के गांव में रहने वाली लड़कियां और महिलाएं उसकी धुन में इतनी मद-मस्त हो जाती थी कि अपना काम-काज छोड़कर वहां पहुंच जाती थी। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SHDYYvyuZnI/AAAAAAAAAXg/lbSDG-m009c/s1600-h/NIDHI+VAN+2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SHDYYvyuZnI/AAAAAAAAAXg/lbSDG-m009c/s320/NIDHI+VAN+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219909887780087410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये बात मुझे वृंदावन जाकर ही पता चली कि यहां एक वन (निधि-वन) ऐसा भी है जहां माना जाता है कि रात में कृष्णजी रोज रात को यहां पहुंचते है, राधाजी से मिलते है और दूसरी गोपियों के साथ रास-लीला रचाते हैं। सुनकर अजीब जरुर लगा।&lt;br /&gt;मैंने गाइड से कहा कि रात में इस वन में छिपकर क्या किसी ने रास-लीला देखी है। तो उसका जबाब सुनकर हैरानी हुई। गाइड के मुताबिक जिस किसी ने भी रात में निधि वन में रुकने की कोशिश की, वो अगली सुबह नहीं देख सका। उसकी लाश इस वन में मिलती है। उस गाइड ने उन लोगो की समाधि भी दिखाई, जो इसी वन में बनी हुई है। ये समाधियां अधिकतर साधु-संतो की है। उन संतो की जो अपने प्रिय भगवान के एक दर्शन-मात्र करना चाहते थे। मौत से पहले उन्होने दर्शन कर भी लिए हो, कौन जानता है। लेकिन लोगों की मान्यता है कि उनकी मौत भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के बाद ही होती होगी। यही वजह है कि उन सभी लोगों की समाधि इसी वन में बनाई गई है। &lt;br /&gt; कहते है कि वृदांवन शहर को बसाने में निम्बार्क संप्रदाय के स्वामी हरिदास (संगीत सम्राट तानसेन के गुरु) का अहम योगदान था। लोग तो यहां तक मानते है कि हरिदास और कोई नहीं बल्कि पिछले जन्म में भगवान श्रीकृष्ण की एक गोपी, ललिता थे। 15वीं सदी में जब उनका जन्म मथुरा के करीब एक गांव में हुआ तो, वे कृष्ण भगवान और राधा की भक्ति में डूब गये। भगवान की तलाश में वो यमुना नदी के किनारे आकर रहने लगे और यहीं अपना आश्रम बना लिया। कहते हैं निधि-वन में उन्हें भी साक्षात् कृष्णजी और राधाजी के दर्शन हुये थे। भगवान ने उन्हे अपनी एक मूर्ति भी वरदान के रुप में दी थी, जो अब बांके-बिहारी मंदिर में विराजमान है। कुछ लोगों की मान्यता है कि हरिदासजी को ये मूर्ति निधि-वन की खुदाई में मिली थी। अब मेरी समझ में आ चुका था कि कैसे मिलन होता है इतिहास और मान्यता का।&lt;br /&gt;बांके-बिहारी की मूर्ति देखकर हैरानी होती है। दरअसल ये मूर्ति बिल्कुल काली है। लोगों की मानें तो यमुना नदी में काली नाग को मारने के बाद कृष्णजी का रंग एकदम काला हो गया था। बांके-बिहारी मंदिर के दर्शन के दौरान मैंने देखा कि पंडित जी हर दो मिनट बाद भगवान की मूर्ति को पर्दे से ढक देते है। पता किया तो पता चला कि &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt;  एक बार बांके-बिहारी का दिल उस लड़की पर आ गया था जो मंदिर में उनके दर्शन करने पंहुची थी। पलक झपकते ही मूर्ति अपने स्थान से गायब हो गई। उसके बाद से ही पंडितो की कोशिश होती है कि भगवान की नजर किसी भी लड़की पर दो मिनट से ज्यादा ना पड़े &lt;/p&gt; एक बार बांके-बिहारी का दिल उस लड़की पर आ गया था जो मंदिर में उनके दर्शन करने पंहुची थी। पलक झपकते ही मूर्ति अपने स्थान से गायब हो गई। उसके बाद से ही पंडितो की कोशिश होती है कि भगवान की नजर किसी भी लड़की पर दो मिनट से ज्यादा ना पड़े (या यूं कहें कि किसी कन्या की नजर उनकी मूर्ति पर ज्यादा देर तक ना टिके)। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी मानें तो ये सबकुछ इसलिये किया जाता है जिससे मंदिर के कंपाउंड में भीड़ ज्यादा देर तक ना रुक सके। अगर भीड़ मंदिर में ज्यादा देर रुकेंगी, तो उसे संभालना मुश्किल हो जायेगा।&lt;br /&gt; वृदांवन और पूरी बृजभूमि में सैकड़ों मंदिर है। लेकिन एक अनोखी अनुभूति और जानकारी निधि वन में ही मिलेगी। तो एक बार आप भी जरुर निधि वन के दर्शन करके आईयेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-1439412329550658444?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/1439412329550658444/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=1439412329550658444' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1439412329550658444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/1439412329550658444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/07/blog-post_06.html' title='आज रात भगवान कृष्ण आ रहें हैं'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SHDo3ZZ0LTI/AAAAAAAAAXw/28Zn4glLAU8/s72-c/KRISHNA+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-3898554416012645538</id><published>2008-07-05T17:53:00.000+05:30</published><updated>2008-07-06T16:25:47.387+05:30</updated><title type='text'>बिकनी किलर की आशिकी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SG9rfayNvQI/AAAAAAAAAW0/c-BbVMOmbr8/s1600-h/CHARLES-NIHITA.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SG9rfayNvQI/AAAAAAAAAW0/c-BbVMOmbr8/s320/CHARLES-NIHITA.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219508680655748354" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; चार्ल्स शोभराज में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आई। उनकी आंखें मेरे ऊपर ठहर गईं। मैं जानती थी कि उन्हें मुझसे प्यार हो गया है। मैं भी उन्हें चाहने लगी&lt;/strong&gt;...एक अमेरिकी सैलानी की हत्या के आरोप में नेपाल में बंद कुख्यात अपराधी चार्ल्स शोभराज इन दिनों अपनी आशिकी के कारण चर्चा में है। 64 वर्षीय शोभराज, 20 वर्ष की एक नेपाली लड़की निहिता बिस्वास से आशिकी कर रहा है। दोनों एक-दूसरे पर फिदा हैं और लड़की की मां को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं है।&lt;br /&gt;निहिता ने हाल ही में स्कूली पढ़ाई पूरी की है और वह राजनीतिक संवाददाता बनना चाहती है। निहिता एक बंगाली पिता और नेपाली मां की पुत्री है। तीन महीने पहले निहिता की मुलाकात जेल में बंद शोभराज से हुई थी। शोभराज को एक द्विभाषिए और गाइड की जरूरत थी। किसी व्यक्ति ने तब निहिता का परिचय शोभराज से कराया। खबर है शोभराज को पहली ही मुलाकात में निहिता से इश्क हो गया।&lt;br /&gt;इस बारे में निहिता कहती है, “शोभराज में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आई। उनकी आंखें मेरे ऊपर ठहर गईं। मैं जानती थी कि उन्हें मुझसे प्यार हो गया है। मैं भी उन्हें चाहने लगी”। इसके बाद निहिता नियमित रूप से जेल का चक्कर लगाने लगी। बात यहां तक बढ़ी कि दोनों साथ-साथ खाना भी खाने लगे और भविष्य की योजना बनाने लगे। निहिता ने अपनी मां को इस प्यार के बारे में बताया और जेल में शोभराज से उनकी मुलाकात भी कराई। &lt;br /&gt;निहिता की मां ने कहा, “मैं मानवाधिकार कार्यकर्ता हूं। मुझे मालूम है कि शोभराज को बिना सबूत के फंसाया गया है”। &lt;br /&gt;निहिता और शोभराज की सगाई भी हो चुकी है। निहिता को उम्मीद है कि शोभराज मुक्त हो जाएगा और उसे अपने सपनों के इस राजकुमार के साथ घर बसाने का मौका मिलेगा। &lt;br /&gt;लेकिन जो लोग शोभराज को जानते हैं....वो ये भी जानते हैं कि इस शख्स की जिंदगी में न जाने कितनी खूबसूरत लड़कियां आईं और चली गईं...और बार-बार प्यार का बंधन तोड़कर आजाद हो गया ये बिकनी किलर। इस बार भी लोग ये सोच रहे हैं। दोनों के बीच का ये रिश्ता कैसा होगा? शोभराज की उम्र और निहिता की उम्र के बीच चालीस साल से ज्यादा का फासला है। बीस साल की मोहब्बत में कैद 64 साल का आशिक। क्या ये वो निशब्द रिश्ता है...जिसे हम फिल्मों में देखते और सुनते आए हैं।&lt;br /&gt;चार्ल्स शोभराज किलर है। वो ठग है। वो स्मगलर है। वो ज्वेलथीफ है....और वो है दुनिया का सबसे चालाक हत्यारा। उससे भी ज्यादा वो है लड़कियों का दीवाना। लेकिन अब तक जो भी लड़की उसकी जिंदगी के करीब आया, उसे मिली मौत। ये हम नहीं तमाम देशों के पुलिस रिकार्ड कह रहे हैं, जहां इस नटवरलाल ने लड़कियों का किया है कत्ल। &lt;br /&gt;लड़कियों के कत्ल की इन कहानियों से ही ये दुनिया में बिकनी किलर के नाम से कुख्यात हुआ है। अब इसकी जिंदगी में आई है निहिता विश्वास। प्यार के एक नए अंदाज और नए तेवर के साथ। अब दुनिया जानना चाहती है गुनाह के गॉडफादर की इस प्रेमकहानी का क्या होगा अंजांम?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर गुनाह का गॉडफादर नेपाल की जेल से छूट भी गया, तो थाइलैंड की जेल को है उसका इंतजार। शोभराज के सभी गुनाह अगर अदालत में साबित हो जाएं और उसे कम से कम दो सौ चालीस साल की सजा मिलेगी। यानी जितनी उम्र है उससे चार गुनी सजा। ऐसे में प्यार की इस कहानी की उम्र कितनी होगी। वाकई लोग इसे जानना चाहेंगे। लेकिन इस खबर के बाद नेपाल में शोभराज पर पहरे बढ़ा दिए गए हैं और निहिता को उससे मुलाकात की इजाजत नहीं दी जा रही। ( &lt;strong&gt;न्यूज एजेंसी &lt;em&gt;आईएएनएस&lt;/em&gt; से साभार)&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-3898554416012645538?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/3898554416012645538/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=3898554416012645538' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/3898554416012645538'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/3898554416012645538'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='बिकनी किलर की आशिकी'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SG9rfayNvQI/AAAAAAAAAW0/c-BbVMOmbr8/s72-c/CHARLES-NIHITA.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-8486353526080464916</id><published>2008-06-09T01:12:00.002+05:30</published><updated>2010-08-13T14:37:23.433+05:30</updated><title type='text'>ब्लॉग के लिये टाइम नहीं मिला</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SEw3ebXvTnI/AAAAAAAAAWc/trVgqoEbcmc/s1600-h/ARUSHI+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SEw3ebXvTnI/AAAAAAAAAWc/trVgqoEbcmc/s320/ARUSHI+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209599864843751026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;strong&gt;काफी मसाला मिल गया है ब्लॉग के लिये। आरुषि पर तो आप ब्लॉग पर चार-पांच पोस्ट डाल सकते हैं। कई दिन बाद ऑफिस पहुंचा तो एक साथी पत्रकार की यही टिप्पणी थी। &lt;/strong&gt;दरअसल 17 मई—जिस दिन आरुषि के नौकर हेमराज की लाश फ्लैट नंबर L-32, जलवायु विहार, सेक्टर 25, नोएडा की छत पर पड़ी मिली थी—के बाद करीब एक हफ्ते बाद मैं ऑफिस पहुंचा था। पिछले एक हफ्ते में—जो शायद अबतक बरकरार है— आरुषि मामला इतना चर्चित हो चुका था कि बच्चों तक की जुबान पर एक ही नाम था—आरुषि। नोएडा के डीपीएस स्कूल की नौवी कक्षा की छात्रा आरुषि की हत्या। &lt;br /&gt;16 मई की सुबह जब ख़बर पता चली कि डीपीएस, नोएडा की छात्रा की लाश उसके घर में मिली है और वारदात के बाद से ही नौकर गायब है तो मैंने इस खबर पर एक साथी रिपोर्टर को लगा दिया। दिन-भर मेरी भी नजर इसी खबर पर थी, लेकिन चौबीस घंटे बाद ही ये वारदात अबतक की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री में तब्दील हो जायेगी, इसका अंदाजा नहीं था। आरुषि की लाश मिलने के करीब चौबीस घंटे बाद तक हर कोई—पुलिस से लेकर आम आदमी और मीडिया—तक उसके नौकर हेमराज को ही हत्यारा मान रहा था। इसका कारण ये है कि दिल्ली और आस-पास के इलाकों में आये दिन नौकरों—खासतौर से नेपाली और बांग्लादेशी—द्वारा वारदातों को अंजाम देने के चलते शक की सुई सबसे पहले उन पर ही घूमती है। आरुषि मामले में तो नोएडा पुलिस ने आनन-फानन में नौकर हेमराज पर बीस हजार रुपये का इनाम भी घोषित कर दिया। उसकी तलाश में नेपाल बार्डर तक पुलिस की एक टीम रवाना हो चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SEw34Lbc1_I/AAAAAAAAAWs/njpYMYPcsLc/s1600-h/ARUSHI+2.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SEw34Lbc1_I/AAAAAAAAAWs/njpYMYPcsLc/s320/ARUSHI+2.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209600307240949746" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अगली सुबह ये खबर इतनी बड़ी हो जायेगी, इतनी चर्चित हो जायेगी, इतनी सनसनीखेज़ बन जायेगी, इसका अंदाजा कतई नहीं था। जैसे ही खबर पता चली कि आरुषि के ‘हत्यारे’ की लाश फ्लैट की छत पर मिल गई है, एक बार तो मेरे भी पैरो तले जमीन खिसक गई। खबर की पुष्टि होते ही मै सीधा L-32  फ्लैट पहुंचा। हेमराज की लाश वहां से जा चुकी थी। लेकिन फ्लैट का बाहर से मुआयना करने के बाद जैसे ही मैं सीढ़ियों की ओर बढ़ा तो मेरे पैर ठिठक गये। फ्लैट से छत की ओर जाने वाली 17 सीढि़यों में से तीन पर खून के छीटें पड़े थे। किसी ने बताया कि इन्हीं खून के छीटों को देखकर नोएडा के रिटायर्ड डीएसपी के के गौतम छत तक पहुंचे थे और हेमराज की लाश का पता चल पाया था। लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा था कि एक दिन पहले जब नोएडा पुलिस का लावो-लश्कर फ्लैट में पहुंचा था तो क्या उन्होंने इन खून के निशानों को नहीं देखा था। खैर जैसे ही मैं फ्लैट की छत पर पहुंचा तो देखा कि वहां खून ही खून था। साथ ही वहां दर्जनो पत्रकार मौजूद थे। कैमरामैन अलग-अलग एंगिल से फोटो लेने में व्यस्त थे। लेकिन सबसे हैरानी की बात थी कि इतने संवदेनशील मामले में पुलिस का कोई भी मुलाजिम वहां मौजूद नहीं था। यहां तक की कोई फॉरेसिंक एक्सपर्ट तक मौजूद नहीं था। &lt;a href="http://gunaahgar.blogspot.com/2007/10/blog-post_09.html"&gt;कैमरामैन-रिपोर्टर &lt;/a&gt;का जहां मन कर रहा था हाथ रख रहे थे, जहां मन कर रहा था पैर रख रहे थे। साफ था कि मौका-ए-वारदात पर मौजूद सबूत जाने-अनजाने में मिट रहे थे। फ्लैट में पता किया तो पता चला कि आरुषि के मां-बाप हरिद्वार गये हुये है। इतने में ही एक रिपोर्टर ने जबाब दिया, “इतनी जल्दी”। कल शाम ही तो आरुषि का अंतिम-संस्कार हुआ है। आज सुबह ही उसके फूल लेकर हरिद्वार चले गये मां-बाप। वो सब तो (पिंड-दान वगैरहा) दो-तीन दिन बाद होता है नीरज जी।” मैंने उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ‘फोनो-लाइव-चैट’ में व्यस्त हो गया। मुझे लगा कि अंतिम-संस्कार के कार्य तो घरवाले ही तैयार करते हैं। बड़े लोग है पंडित से पूछना उचित नहीं समझा होगा, इसलिये चले गये होंगे। &lt;br /&gt;हमारे पहुंचने के बाद और जब न्यूज चैनल पर आरुषि-हेमराज की हत्या की खबर चलने लगी, तब जाकर यू.पी पुलिस नींद से जागी। उन्हें तब एहसास हुआ कि कितनी बड़ी घटना है ये। कितनी बड़ी गलती (लापरवाही) की थी उन्होंने फ्लैट से छत की ओर जाने वाली 17 सीढियां ना चढ़कर। कुछ समय बाद ही नोएडा पुलिस के आला-अधिकारी वहां पहुंच गये। दबी जुबान में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की, हर बार की तरह जल्द ही हत्यारों को पकड़ने का दावा ठोका और एक-दो खाकी-वर्दीधारियों को वहां तैनात कर चलते बने।&lt;br /&gt;उसदिन के बाद से आज का दिन है (8 जून, यानि पूरे 22 दिन बाद) ब्लॉग पर कुछ लिखने का टाइम नहीं मिला। वीकली-ऑफ भी कैंसिल करने पड़ गये। अपना ब्लॉग भी ठीक से नहीं खोल पाया। आज थोडा़ टाइम मिला तो सोचा जो साथी पत्रकार ने कहा था कि मसाला मिल गया है—जैसा कि हर कोई सोच रहा है कि मीडिया (अखबारवालों सहित) को आरुषि-हेमराज हत्यकांड नहीं टीआरपी बढा़ने का मसाला मिल गया है।  &lt;br /&gt; लेकिन मैं यहां इसलिये नहीं लिख रहा कि कि दो (मासूम) लोग अपने जान से हाथ धो बैठे हैं। मेरे लिये ये केस कोई मसाला नहीं है। ना ही 15-16 घंटे जलवायु विहार और नोएडा (गाजियाबाद) कोर्ट में खड़ा होना मुझे अखरा है। ना ही मुझे अपना काम उबाऊ या फिर बोझ लगा। बल्कि मैं इसलिये लिख रहा हूं कि &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; एक क्राइम रिपोर्टर की प्रोफेशनल-जिंदगी में ऐसे केस कम ही सामने आते हैं। पुलिस और सीबीआई के साथ-साथ एक क्राइम रिपोर्टर भी अपनी इंन्वेस्टीगेशन जारी रखता है। अलग-अलग थ्योरी पर काम करता है। हर उस शख्स को संदेह की नजरों से देखता है जो इस केस से जुड़ा़ हुआ है। &lt;/p&gt; एक क्राइम रिपोर्टर की प्रोफेशनल-जिंदगी में ऐसे केस कम ही सामने आते है। पुलिस और सीबीआई के साथ-साथ एक क्राइम रिपोर्टर भी अपने इंन्वेस्टीगेशन जारी रखता है। अलग-अलग थ्योरी पर काम करता है। हर उस शख्स को संदेह की नजरों से देखता है जो इस केस से जुड़ा़ हुआ है। पुलिस और देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी की जांच पर ही सवाल खड़े कैसे किये जाते है इसका अनुभव शायद ही कभी मिल पायेगा। जांच एजेंसियां कहां-कहां गलतियां कर रही हैं, उन्हें जांच करते समय किन-किन बिंदुओ पर सोचना चाहिये, ये सब वो कहीं ना कहीं एक क्राइम रिपोर्टर से भी सीखते है। जिन बिंदुओ पर मीडिया ने नोएडा पुलिस की खिंचाई की, उसपर सीबीआई ने अच्छे से गौर  फरमाया। यहां तक की टी.वी चैनल्स से पहले दो दिन की वीडियो फुटेज की भी डिमांड की है सीबीआई ने।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SEw3nzxq29I/AAAAAAAAAWk/SL4QB2_CJNI/s1600-h/ARUSHI-FATHER.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SEw3nzxq29I/AAAAAAAAAWk/SL4QB2_CJNI/s320/ARUSHI-FATHER.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209600026013785042" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लेकिन 22 दिन बीत जाने के बाद भी हर किसी के जेहन में एक ही सवाल दौड़ रहा है—आरुषि-हेमराज का हत्यारा कौन। क्या एक बाप अपनी बेटी को ही मौत के घाट उतार सकता है ? क्या नोएडा पुलिस ने सही कातिल को गिरफ्तार किया था ? क्या एक मां अपनी पति को बचाने का प्रयास कर रही है ?  नोएडा पुलिस से जांच तो छीन ली गई लेकिन क्या सीबीआई कभी इस अनसुलझी पहेली को हल कर पायेगी। अगले ही दिन हरिद्वार जाने के पीछे तलवार दंपति का क्या मकसद था? पिंडदान करते वक्त उन्होंने अपनी बेटी की मौत का वक्त रात के दो-तीन बजे ही क्यों बताया ?  L-32 फ्लैट में मौत का तांडव होता रहा लेकिन घर में मौजूद तलवार दपंति को कानों-कान खबर क्यों नहीं लगी ?  क्या वाकई तलवार इतनी गहरी नींद में सो रहे थे कि उन्हे कोई चीख-पुकार सुनाई  नहीं पड़ी?  क्या हत्यारा, तलवार दंपति का कोई जानने वाला था? लेकिन कौन, इसका अंदाजा उन्हें भी नहीं है ?  क्या हत्यारा सिर्फ हेमराज को खत्म करने के इरादे से फ्लैट में दाखिल हुआ था और आरुषि को सिर्फ इसलिये मौत की नींद सुला गया कि कहीं वो उसके उसका राज फाश ना कर दे ?  क्या आरुषि, हेमराज की हत्या की चश्मदीद थी?  ऐसे ही ना जाने कितने अनगिनत सवालों को पिछे बाईस दिनो से मैं, मेरे साथी पत्रकार और सीबीआई खंगाल रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2461553776931835162-8486353526080464916?l=gunaahgar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gunaahgar.blogspot.com/feeds/8486353526080464916/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2461553776931835162&amp;postID=8486353526080464916' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/8486353526080464916'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2461553776931835162/posts/default/8486353526080464916'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gunaahgar.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='ब्लॉग के लिये टाइम नहीं मिला'/><author><name>Neeraj Rajput</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04539779918627905380</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/TIkL7aJMYXI/AAAAAAAAAyE/T82K2E7JEpM/S220/NEERAJ.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SEw3ebXvTnI/AAAAAAAAAWc/trVgqoEbcmc/s72-c/ARUSHI+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2461553776931835162.post-541053480007884137</id><published>2008-05-15T00:59:00.000+05:30</published><updated>2008-05-16T15:45:38.965+05:30</updated><title type='text'>मै मरने जा रही हूं...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SCtEKcKOceI/AAAAAAAAAWU/Dl_vlxaaCdQ/s1600-h/SUICIDE.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SCtEKcKOceI/AAAAAAAAAWU/Dl_vlxaaCdQ/s320/SUICIDE.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5200325140877832674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सर, उस लेडी का फोन आया था। वो आत्महत्या करने की धमकी दे रही है। अपनी मौत का कसूरवार वो हमे ठहराकर जायेगी। बाकयदा सुसाईड-नोट लिख रही है हमारे नाम का... सर, मुझे डर लग रहा है... &lt;/strong&gt;  सनसनी अभी खत्म ही हुआ था कि, मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर नंबर देखा तो पता चला कि साथी रिपोर्टर का फोन है। मेरे हैलो बोलने से पहले ही वो बोल उठा। “सर बहुत गड़बड़ हो गई है।” । मैने पूछा क्या हुआ? रिपोर्टर बेहद घबराया हुआ था।  “सर,वो लेडी मरने जा रही है।” मै खीज उठा!  अरे हुआ क्या, ये तो कुछ बताओ ना। “सर जिसकी स्टोरी अभी हमने सनसनी में चलाई है, उसका फोन आया था। वो  आत्महत्या करने की धमकी दे रही है”,  साथी रिपोर्टर ने जबाब दिया। मैने हँसकर रिपोर्टर से पूछा, “फिर क्या किया जायें ?” सर आप बतायें क्या करना चाहिये। अभी तक मैने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नही लिया था-- जैसा अक्सर मै ऐसी गीदड़ भभकियों के दौरान नहीं लेता हूं। मैने उसको समझाया कि वो लेडी उसे डराने के लिये आत्महत्या की धमकी दे रही होगी। “वो नही करेगी, मै गारंटी लेता हूं”, मैने तर्जुबे के हिसाब से उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की। लेकिन साथी रिपोर्टर समझने को तैयार नही था। “सर वो मुझे कई बार फोन करके ये बात (खुदकुशी) बोल चुकी है।” मैने साथी रिपोर्टर को हौसला बंधाया और बॉस से सलाह करने की बात कहकर फोन काट दिया। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SCs95sKOcaI/AAAAAAAAAV0/3jXWuvGYnLs/s1600-h/FALSE+ALLEGATION+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SCs95sKOcaI/AAAAAAAAAV0/3jXWuvGYnLs/s320/FALSE+ALLEGATION+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5200318256045257122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जैसे ही मैने धमकी की बात बॉस को बताई, वो घबरा गई। उन्होने कहां कि तुमने पहले बताया होता तो हम स्टोरी में कुछ फेरबदल कर सकते थे। लेकिन अब तो कुछ नही हो सकता। मैने अपने साथी रिपोर्टर की बात तो बॉस को बता दी थी, लेकिन अभी भी ज्यादा सीरियस नही था। मैने बॉस को बताया कि वो खाली धमकी दे रही है। वो कभी भी खुदकुशी जैसा बड़ा कदम नहीं उठायेगी। लेकिन बॉस ने जबाब दिया, “अगर (खुदकुशी) कर ली तो!”  फिर तो अनर्थ हो जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SCs-iMKOccI/AAAAAAAAAWE/Yih2KFBrgKs/s1600-h/FALSE+ALLEGATION+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZQz5Wrl7rBk/SCs-iMKOccI/AAAAAAAAAWE/Yih2KFBrgKs/s320/FALSE+ALLEGATION+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5200318951829959106" /&gt;&lt;/a&gt; इससे पहले की अनर्थ हो जाये, मैने रिपोर्टर को रात के बारह बजे ही आत्महत्या करने की धमकी देने वाली महिला के पास भेजने का आदेश जारी कर दिया। रात में ही रिपोर्टर डरता-डराता उस महिला के घर पहुंचा। उसकी बाईट (इंटरव्यू) ली और अगले दिन सुबह के न्यूज बुलेटिन में उसका पक्ष चल गया। उसके बाद से उस महिला ने फिर कभी हमारे रिपोर्टर को फोन नहीं किया। &lt;br /&gt;लेकिन करीब आठ महीने बाद उस महिला का ये ड्रामा मेरे सामने तैरने लगा। कैसे &lt;p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;"&gt; आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है।  जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है। &lt;/p&gt; आत्महत्या की धमकी देकर उसने हमारी नींद उड़ा दी थी। उसी दिन मै समझ गया था कि वो महिला कितनी बड़ी “ब्लैकमेलर” है।  जो महिला एक क्राइम रिपोर्टर को ब्लैकमेल कर सकती है उसके सामने आम आदमी की क्या बिसात है। उस दिन के बाद से यही नजरिया था मेरा उस महिला के प्रति। &lt;br /&gt;जो मै आठ महीने पहले सोच रहा था, वो अब साबित हो गया है। ये है पूरी कहानी...&lt;br /&gt;  ब्लैकमेलर महिला का नाम है नीरजा शर्मा। दिल्ली के नरेला इलाके में रहने वाली इस महिला की उम्र है करीब पैतीस (35) साल। नीरजा के निशाने पर रहते है 40 से 50 साल की उम्र के रईस आदमी। वो पहले तो उनसे किसी ना किसी बहाने से दोस्ती गाढ़ती है और फिर उन्हे (पैसो के लिये) ब्लैकमेल करने लगती है। अगर किसी ने पैसे देने में आनाकानी की तो उसके खिलाफ छेड़छाड़ और बलात्कार 
